🔆शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया🔆

▪️हम शिक्षण को ज्ञान और कौशल के संप्रेषण के रूप में देखते हैं।

🔅ज्ञान और कुशलता –
यदि हम अपने सीखे हुए ज्ञान को एक real implementation या उसमे वास्तविक बदलाव कर लेते है तो वहीं कुशलता कहलाती है।
▪️यदि बच्चे से practically कोई काम करवाकर सिखाया जाए फिर उस काम का या उस ज्ञान का implementation किया जाएगा तभी ज्ञान से कुशलता तक जाने की अधिगम प्रक्रिया पूर्ण होगी।
▪️इस प्रक्रिया में सिखाने वाला – सीखने वाले को प्रभावित करता है।, सीखने वाला इसलिए प्रभावित होता है है क्योंकि सीखने के प्रति रुचि, अभिप्रेना की भावना जागृत होती है , और वह उस समय सिखाने वाले (शिक्षक) के व्यक्तित्व, भाव,विचार या उसकी सोच ।सीखने वाले (छात्रों) को ज्यादा प्रभावित कर जाते है।
यदि शिक्षक और छात्र एक दूसरे से प्रभावित या जुड़े नहीं होंगे तो अधिगम कार्य कभी सही नहीं हो पाएगा।
▪️शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सिखाने वाला (शिक्षक) सीखने वाले(छात्र) के लिए विभिन्न परिस्थिती या माहौल या वातावरण में विभिन्न साधनों और विधियों का प्रयोग कर या निर्माण कर अपने शिक्षण कार्य का सही उद्देश्य प्राप्त कर पाते है।
*शैक्षिक या ज्ञान का वातावरण शिक्षक व छात्र दोनों के द्वारा ही विकसित किया जाना चाहिए।
▪️शिक्षण का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक सीखने वाला नहीं सीख जाता और उसके व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं हो जाता।
यदि हम बच्चो को सीखना चाहते है तो उसे शिक्षा से जुड़ा हुआ माहौल या वातावरण दे और छात्रों द्वारा भी वह माहौल वातावरण बना रहना चाहिए ,तभी हम बेहतर और पूर्ण रूप से सीखा पाएंगे।

🔅 शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है
इसमें हम शिक्षण को सभी के योगदान से , सक्रिय होकर सामाजिक रूप से आगे बढाते है।

” शिक्षण को कई आधारो में बांटा गया है”
🔅उद्देश्य की दृष्टि के आधार पर➖

(1) ज्ञानात्मक – यह हमारी बौद्धिक ज्ञान,समझ ,सोच विचार को अपने जीवन में जोड़ने का एक आधार है।

(2) क्रियात्मक – यह हमारे ज्ञान को शारीरिक और मानसिक रूप से अपने कार्यों में प्रयोग लाने का एक आधार है।

(3) भावनात्मक- जो भी ज्ञान का हम प्रयोग किए है या कार्य में लाए है वह ज्ञान भावनात्मक रूप से या पूरे मन से बच्चो के साथ जुड़ा हुआ होने का आधार है।

▪️यदि आपके पास ज्ञान है लेकिन उस ज्ञान का प्रयोग या उस पर कार्य नहीं क्या गया है तो उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।
और यदि आपके पास ज्ञान है और आप उस ज्ञान का प्रयोग भी किए लेकिन यह ज्ञान आपके भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ा हुआ है तो हमारा उद्देश्य (ज्ञान को सीखना) कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
यदि हम अपने गया पर कार्य करे और वह भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ होगा तब हमारा उद्देश्य निश्चित ही पूरा हो जाएगा।

🔅 स्तर के दृष्टि के आधार पर➖

(1) स्मृति स्तर – जो भी हम सीखना चाहते है वह पूर्ण रूप से स्मृति में रखा जाए।

(2) बोध स्तर- जो भी सीखा हुआ ज्ञान हमारी स्मृति में है उस ज्ञान की समझ भी होना काफी जरूरी है ।
हम अपने स्मृति के ज्ञान की समझ को किसी परिस्थिति में बेहतर रूप से समझ भी पाए।
(3) चिंतन – जो भी ज्ञान हमारी स्मृति में बैठ गया है, उसे समझते हुए उस पर चिंतन करके उस ज्ञान को और निखारा जा सकता है।

✍🏻 वैशाली मिश्रा


शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया=√
शिक्षण अधिगम एक व्यापक मानसिक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है, इसमें निरंतरता का गुण पाया जाता है और विभिन्न चरणों से गुजर कर यह प्रक्रिया संपन्न होती है।।
🌈१) ज्ञान और कौशल से संप्रेषण==
जब व्यक्ति का वर्तमान व्यवहार , ज्ञान का भंडार तथा कुशलताएं उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती है , उसे नवीन ज्ञान का संचय करने और कौशल अर्जित करने की आवश्यकता होती है, अर्थात् एक शिक्षक द्वारा विधि, साधन और तौर तरीकों के माध्यम से सीखने की परिस्थिति का निर्माण करके छात्र की उसके प्रभाव से सहायता करना।।।
✍️एक अच्छे शिक्षण का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक –
1️⃣ जब तक कि छात्र ( सीखने वाला) , अच्छे से सीख न जाए ।
2️⃣जब तक कि छात्र के व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं हो जाता हैं।।
🌈 शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है==

शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान का उद्देश्य छात्र को सामाजिक रूप से जोड़ कर शिक्षण प्राप्त कराना है , शिक्षक का उद्देश्य ज्ञान के साथ में छात्र में सामाजिकता का भी विकास करना होना चाहिए। ।
✍️सामाजिक उद्देश्य प्राप्त करने के निम्न चरण है=
1️⃣ ज्ञानात्मक —
ज्ञानात्मक अधिगम का उद्देश्य अधिगमकर्ता ( छात्र) के संज्ञानात्मक व्यवहार में परिवर्तन लाना है, इस व्यवहार में ज्ञानेन्द्रियो तथा मस्तिष्क की भूमिका मुख्य रहती है, विभिन्न प्रकार की बौद्घिक और मानसिक क्रियाएं जैसे – सोचना , कल्पना करना, तर्क करना , स्मरण करना , वर्णन ओर व्याख्या करना तथा सामान्यीकरण करना आदि अधिगम आते हैं।।
2️⃣ क्रियात्मक —
क्रियात्मक अधिगम का उद्देश्य अधिगमकर्ता ( छात्र) के क्रियात्मक या मनोशारीरिक व्यवहार में परिवर्तन लाना है । विभिन्न प्रकार की क्रियाएं जैसे – चलना , दौड़ना, कूदना , नाचना, खाना पीना , गाना आदि अधिगम आते हैं।।
3️⃣ भावात्मक —
भावात्मक अधिगम का उद्देश्य छात्र के भावात्मक व्यवहार में परिवर्तन लाना है। इसमें शिक्षक ओर छात्र की भावनाएं एक – दूसरे से जुड़ी होती हैं, अगर व्यक्ति का भाव अच्छा नहीं होगा तो आत्मिक संतुष्टि नहीं आएगी। विभिन्न प्रकार की क्रियाएं जैसे- दुखी या सुखी होना , डरना , प्रेम , घृणा आदि आते है।।
✍️ सिर्फ ज्ञान जरूरी नहीं है उसके साथ में क्रिया और भाव भी होना चाहिए।✍️

🌈 स्तर के दृष्टिकोण से==
स्तर के तीन चरण होते है-
1️⃣ स्मृति स्तर —
स्मृति का स्तर ” हरबर्ट ” ने दिया था। स्मृति का उपयोग शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान को स्मृति में स्थापित करना या उसको स्मृति में बनाए रखना। अर्थात् जो भी हमारे द्वारा सीखा जाता है उसे स्मृति में बनाए रखना।।
2️⃣ बौध स्तर–
बोध का स्तर ” मॉरिसन ” के द्वारा दिया गया था। बोध – समझ का होना । अर्थात् हमारे द्वारा स्मृति के ज्ञान को समझना या उसका बोध होना ।
3️⃣ चिंतन स्तर–
चिंतन का स्तर ” हंट ” के द्वारा दिया गया था। चिंतन- तर्क करना। अर्थात् तार्किक रूप से स्मृति का चिंतन करना ।
“स्मृति के ज्ञान को बोधात्मक रूप से समझकर तार्किक रूप से चिंतन करना ।”

✍️ ANAMIKA RATHORE


✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया✍️

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, जो सीखने वाले मे उक्त प्रक्रिया द्वारा दिखायी देते है!
1)ज्ञान(किसी भी क्रिया को करने का तरीका और क्रिया के चरणों का हमारे मष्तिष्क मे स्थान होना या हमारी स्मृति मे समझ के अनुसार उसका स्थायित्व होना!)

2)कौशल ( किसी भी क्रिया या कार्य के प्राप्त ज्ञान का उपयोग करने की योग्यता को कौशल कहते है)

✍️ ज्ञान एवं कौशल का संबंध परस्पर एक दूसरे से होता है! ज्ञान से ही हम कौशल करने के योग्य बनते है और कौशल से ही ज्ञान का स्थायित्व और उसके प्रभाव का हमे पता चलता है!
का
✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया मे शिखाने वाले को चाहिए कि वो एक प्रभावशाली वातावरण का निर्माण करके ज्ञान का संप्रेषण शिक्षार्थियों के समक्ष करे, और शिक्षार्थियों को भी ये चाहिए कि वे निर्मित वातावरण मे समायोजन करके ज्ञानार्जन करे!

✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का कोई महत्त्व नहीं है जब तक कि अधिगम कर्ता शिक्षा को पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं करलेता है, अर्थात उसके व्यवहार मे अधिगम पश्चात वांछनीय परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है!

✍️अगर जिस अधिगम की योजना बनाकर शिक्षक अपने ज्ञान का संप्रेषण कर्ता है और अधिगम कर्ता मे और अधिगम कर्ता के व्यवहार मे वांछनीय परिवर्तन दिख जाता है तो वहां शिक्षण एक सार्थक क्रिया के रूप मे समझा जाता है!

✍️शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया भी है जिसमे समाज के विभिन्न पहलुओं का योगदान होता है जिनकी सहायता से अधिगम सुगम रूप से संचालित होता है!✍️

शिक्षण प्रक्रिया को दो रूपों मे बांटा गया है!
1)शिक्षण के उद्देश्य
2)शिक्षण के स्तर

1)शिक्षण के उद्देश्य – इसका मतलब है कि हमे क्यो शिक्षण ग्रहण करना है ये विचार हमारे मष्तिष्क मे बिना किसी उलझन के स्थिर होनी चाहिए!

इसके भी 3 पक्ष है जो कि निम्‍न है
👉) ज्ञानात्मक पक्ष
👉) क्रियात्मक पक्ष
👉) भावात्मक पक्ष

👉) ज्ञानात्मक पक्ष के अंतर्गत हम ये समझ सकते है कि हम किसी वस्तु, क्रिया, या स्थान का स्मृति है उसकी मानसिक समझ है लेकिन हमने उस मानसिक समझ का कभी प्रयोग नहीं किया!

👉) क्रियात्मक पक्ष के अंतर्गत जो ज्ञान हम अर्जित करते है उसका प्रयोग मे लाना उसकी मदद से अपने कार्यों और जीवन संबंधी समस्याओं का समाधान करना!

👉) भावनात्मक पक्ष के अंतर्गत वो क्रियाएं आती है जिनमे हम अपने ज्ञान एवं क्रिया को एक समर्पण भाव से करते है!

2) शिक्षण के स्तर – शिक्षण के स्तर का निर्माण ज्ञान के अधिगम की विभिन्न क्रियाओं द्वारा हुआ है!
जो कि निम्‍न प्रकार है
👉) स्मृति स्तर
👉) बोध स्तर
👉) चिंतन स्तर

👉स्मृति स्तर – इस स्तर मे मष्तिष्क द्वारा किसी मूर्त ज्ञान को अमूर्त स्थायित्व मे लाना, अर्थात किसी ग्यान को स्थिर रखना स्मृति है!

👉) बोध स्तर – इस स्तर मे प्राप्त ज्ञान का स्थायित्व समझ और भावनाओं के सहसम्बंध के साथ होना बोध स्तर को दर्शाता है!

👉) चिंतन स्तर – इस स्तर मे शिक्षार्थी के मन मष्तिष्क मे स्मृति, बोध के साथ किया गया चिंतन शिक्षार्थी को रचनात्मकता की और प्रेरित करता है और रचनात्मक कौशलो की व्रद्धी करता है!

👉यहा हम निष्कर्ष दे सकते है कि ज्ञान और कौशलों को संप्रेषित करने की क्रिया ही अधिगम कह लाती है! 👈

ASHWANY DUBEY


शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया
ज्ञान और कौशल के सम्प्रषण
बच्चों मे ज्ञान बस नही होना चाहिए उनमे कौशल का विकास होना चाहिए
सिखाने वाला हो जो सिखने वाले को प्रभावित
करे
तथा सिखाने वाला सिखाने के लिए अलग -अलग तरह की विधियों, साधनों, तथा तौर- तरीके का प्रयोग करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करे जिससे बच्चा सीखे
☀ शिक्षण का तब तक कोई अर्थ नही है जब तक सीखने वाला सीख नही जाता तथा उसके व्यहार मे वांछित परिवर्तन नही हो जाए
☀शिक्षण के प्रकार
(1) उद्देश्य के आधार पर 👉ज्ञानात्मक उद्देश्य ज्ञानात्मक अधिगम का उद्देश्य बच्चों की सोचने
की शक्ति का विकास करना विभिन्न प्रकार की बौद्धिक और मानसिक क्रिया -तर्क करना, सोचना, आदि
👉क्रियात्मक उद्देश्य
किसी चीज को शारीरिक, मानसिक दोनों
रुप से कार्य मे लाना जैसे- चलना, कूदना, दौड़ना आदि अधिगम मे आते हैं
👉 भावात्मक उद्देश्य
भावात्मक अधिगम का उद्देश्य इसमें शिक्षक और
छात्र की भावना एक दूसरे से जुड़ी होनी चाहिए प्यार, सुख, दुख
आदि
🌟स्तर के दृष्टिकोण से
1 . स्मृति स्तर बच्चों को स्मति क्षमता के अनुसार उनको सीखना चाहिए ज्ञान को स्मृति मे स्थापित करना

  1. बौध स्तर –
    किसी के बारे मे ज्ञान बस नही होना समझ का होना अवश्यक है
  2. चिंतन स्तर-
    चिंतन – तर्क करना अर्थात् तार्किक रूप से स्मृति का चिंतन करना
  3. ✒Menka patel

✴️✴️ शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया ✴️✴️
◾ शिक्षण को हम ज्ञान और कौशल के सम्प्रेषण के रूप में देखते हैं
यदि हम अपने सीखें हुए ज्ञान का प्रयोग वास्तविक बदलाव के लिए करते हैं तो वहीं कौशल है
◾ यदि बच्चे को कोई भी कार्य उस से स्वंय करवाया जायेगा तो ज्ञान से कौशल तक जाने की अधिगम प्रक्रिया होती है
◾ इस प्रक्रिया में सिखाने वाला सिखने वाले को प्रभावित करता है। अर्थात सिखने के प्रति रूचि अभिप्रेरणा की भावना सिखने के लिए वातावरण आदि सिखाने वाला निर्माण करता है। वह उस समय शिक्षक के विचार भाव और उसकी सोच से प्रभावित होता है
यदि शिक्षक और छात्र एक दूसरे से प्रभावित या जुड़ नहीं पाते है तो अधिगम प्रक्रिया प्रभावशाली नहीं होगी।
◾ शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक छात्रों के लिए विभिन्न प्रकार की परिस्थिती या वातावरण में विभिन्न प्रकार की अधिगम सामग्री या साधनों और विभिन्न विधियों का प्रयोग करके या निर्माण करके अपने शिक्षण को सही उद्देश्य तक पहुंचाने का कार्य करता है
◾ शैक्षिक या ज्ञान का वातावरण शिक्षक और छात्र दोनों के लिए विकसित किया जाना चाहिए।
◾ शिक्षण का तब तक कोई अर्थ नहीं होता है जब तक सिखने वाले ने कुछ सिखा नहीं है और अपने व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं किया है।
यदि हम छात्रों को कुछ सिखाना चाहते हैं तो हमें उनके लिए ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहिए जिस में वो सीख सकते हैं तभी वो बेहतर रुप से सीख सकते हैं
◾ शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है
इसमें हम शिक्षण को सभी के योगदान से सक्रिय होकर सामाजिक रूप से समूह में रह कर सिखाते हैं
✴️✴️ शिक्षण को कई आधारों में बांटा गया है ✴️✴️
◾ उद्देश्य के आधार पर ➖

  1. ज्ञानात्मक ➖ यह हमारी बौद्धिक ज्ञान,समझ, सोच, विचार को अपने जीवन में जोड़ने का एक आधार है।
    2.क्रियात्मक➖ यह हमारी शारीरिक मानसिक रूप से अपने कार्यो में प्रयोग में लाने का एक आधार है।
    3.भावात्माक➖ जो भी ज्ञान का हम प्रयोग करके कार्य में लाते हैं वह भावात्मक रूप से जुड़े होने का आधार है।
    यदि आपके पास ज्ञान है लेकिन उस ज्ञान का प्रयोग नहीं किया गया है तो उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है
    और यदि आपके पास ज्ञान है और आप उस ज्ञान का प्रयोग भी करते हैं लेकिन यह ज्ञान आपके भावात्मक रूप से नहीं जुड़ा है तो हमारा उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकता है।
    यदि हम अपने ज्ञान पर कार्य करें और वह भावात्मक रूप से जुड़ा हुआ होगा तब हमारा उद्देश्य निश्चित ही पूरा हो पाएगा।
    ✴️✴️ स्मृति के दृष्टिकोण से ✴️✴️
    1.स्मृति संयंत्र➖ जो भी हम सिखना चाहते हैं वह पूर्ण रूप से स्मृति में रहता है।
  2. बोध स्तर➖ जो ज्ञान हमने सीखा है उस ज्ञान की समझ होना काफी जरूरी है।
  3. चिन्तन स्तर➖ जो भी ज्ञान हमारी स्मृति में बैठ गया है उसे समझते हुए उस पर चिन्तन करके उस ज्ञान को और अधिक विश्लेषित करना होता है।
    📝📝 Gudiya Chaudhary 📝📝

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published.