🙇बाल्यावस्था में सामाजिक विकास🙇

👨‍👩‍👦‍👦परिवार

👨‍👧‍👦बालकों का समूह

🌁🏫विद्यालय

🏟️खेल मैदान

✍️सामाजिक भावना÷
✨सामाजिक भावना में जागरूकता चेतना रुझान आता है।

✨समाजिक क्षेत्र व्यापक और विकसित होने लगता है

✨विद्यालय पर्यावरण में अनुकूलन स्थापित करने लगता है, नये मित्र बनाना,

✍️आत्मनिर्भरता÷
✨स्वयं को स्वतंत्र मानना, वा अपना काम स्वयं से करना, अपना खाना स्वयं से खाना, खेलने के लिए औरों के साथ बाहर जाना,

✍️गिरोह प्रवित्ति (Gang age), दल समूह, टोली आयु
खेल समूह, सांस्कृतिक समूह,

✨समूह का नियम बनाना एवं उसको मानना;
✨नागरिक गुणो का विकास होना;
✨आदतों और सामाजिक गुणों का विकास होना;
✨बाल अवस्था के अंतिम वर्षों में धन कमाने की इच्छा सुखी रहना ,विद्वान बन्ना डॉक्टर बनना, इंजीनियर बनना ,लेखक बनना ,पत्रकार बनना, नेता बनना, कवि बनना और भी बहुत सारी इच्छाएं बढ़ती हैं।

✨🎯बच्चों में सामाजिक विकास के अंदर भावना ग्रंथि का विकास होता है (अचानक से भभक का उठना ग्रंथ के कारण होता है)

🌺आडिपस ग्रंथि -लड़कों में (पुत्र माता से प्रेम करता है)
🌺इलेक्ट्रा ग्रंथी -लड़की में (पुत्री पिता से प्रेम करती है

👻किशोरावस्था में सामाजिक विकास👻

✨इस अवस्था को मानव जीवन की अनोखी अवस्था माना गया है।

✨इस अवस्था में आत्म प्रेम की भावना अधिक होती है (स्वयं से ही प्रेम करना स्वयं को ही बेहतर बनाना स्वयं को अच्छा प्रदर्शित करना स्वयं को खूबसूरत दिखाना स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना इत्याद

👀विषम लिंगी आकर्षण के कारण आकर्षक दिखना(भयानक 🏋️भयंकर 🤼संभावनाएं होती हैं);

✨सामाजिक चेतना का उदय;

✨समूह भावना आस्था त्याग श्रद्धा सबुरी आदि का होना ;

✨स्वयं का दायरा छोड़ कर मानवीय दायरे में प्रवेश करता है;

✨👍देश प्रेम की भावना का जागृत होना एवं उच्च स्तर पर होना;

✨🤸खुद की सामाजिक पहचान स्थापित करने के लिए क्रियाशील होना;

👉व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु तैयार रहना

Thank you

👉👉Notes by÷ ✍️Shikhar Pandey👈👈

🔆 बाल्यावस्था में सामाजिक विकास ➖

इस अवस्था में बच्चे का सामाजिक विकास अधिकतर परिवार से बाहर विद्यालय में होता है बच्चा अपने परिवार से बाहर निकलकर स्कूल के परिवेश में प्रवेश करता है जिससे उसके सामाजिक विकास में बहुत से परिवर्तन होते हैं इस अवस्था में बच्चे में समूह बनाने की प्रवृत्ति होती है |

🎯 सामाजिक भावना ➖

1) इस अवस्था में बच्चे की सामाजिक भावना में जागरूकता आती है समाज के प्रति रुझान, और चेतना बढ़ने लगती है |

2) शैशवावस्था की तुलना में बाल्यावस्था में सामाजिक क्षेत्र व्यापक और विकसित होने लगता है `

3) इस अवस्था में बच्चा विद्यालय के पर्यावरण से अनुकूल होने लगता है |

4) इस अवस्था में बच्चे नए मित्र बनाता है |

🎯 आत्मनिर्भरता➖

1) इस अवस्था में बच्चे खुद से कार्य करने लगते हैं |
जैसे खाना खाना कपड़े पहनना खेलना आदि स्वयं करने लगते हैं अर्थात स्वयं को स्वतंत्र मानते हैं |

3) बच्चों के साथ रहना पसंद करने लगता है वह खुद के हिसाब से काम करना सीख जाता है `|

🎯 गिरोह प्रवृत्ति ➖

1) इस अवस्था में बच्चे अपने समूह आयु, दल समूह,गैंग एज आदि में रहना पसंद करने लगते हैं |

2) खेल समूह में रुचि लेने लगते हैं खुद का सांस्कृतिक समूह बनाने लगता है और उसी के समूह के नियम को अपनाने लगता है |

🎯 नागरिक गुणों का विकास➖

1) इस अवस्था में बच्चों में आज सही आदतों और नागरिकों का विकास होने लगता है |

2) धन कमाने की इच्छा , सुखी, विद्वान, नेता बनने की इच्छा आदि जागृत होने लगती हैं |

🎯 भावना ग्रंथि का विकास ➖

इस अवस्था म में बच्चे की भावना ग्रंथि जागृत होने लगती है यदि इस ग्रंथि को कंट्रोल नहीं किया गया तो इससे बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है भावना ग्रंथि अनुभूति प्रदान करती है व्यक्ति जैसा सोचता है करता है | उस ग्रंथि को मस्तिष्क,संस्कृति क्षैतिज विकास आदि रोकते हैं |
सामाजिक विकास के संबंध में ओडिपस ग्रंथि लड़के का मां के प्रति और इलेक्ट्रा ग्रंथि लड़की का पिता के प्रति प्रेम को दर्शाती है |

🔆 किशोरावस्था में सामाजिक विकास ➖

किशोरावस्था को मानव जीवन का तूफानी काल कहा जाता है इसकौ सबसे अनोखा काल कहा जाता है बालक में जितने भी परिवर्तन होते हैं उन सब में ज्यादा सामाजिक विकास की भूमिका होती है |

🎯 इस अवस्था में बच्चे स्वयं से ही प्रेम करते हैं खुद से स्नेह करते हैं |

2) विषमलिंगी आकर्षण के कारण आकर्षक दिखने का शौक होता है खुद को दूसरों की तुलना में आकर्षक मानते हैं |

🎯 सामाजिक चेतना का उदय ➖

1) इस अवस्था में सामाजिक विकास का उदय होने लगता है |

2) समूह भावना किसी चीज के प्रति आस्था, त्याग आदि का विकास होता है |

3) इस अवस्था में बच्चा मानवीय दायरे में प्रवेश करता है |

4) इस अवस्था में बच्चे में देश प्रेम की भावना आती है वह राष्ट्र के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहता है |

🎯 सामाजिक पहचान ➖

1 ) प्रत्येक बच्चा इस अवस्था में अपनी पहचान बनाना चाहता है |

2) वह अपनी सामाजिक पहचान स्थापित करना चाहता है |

3) वह अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु सदैव तत्पर रहता है हमेशा खुद को ऊपर रखना चाहता है |

𝙉𝙤𝙩𝙚𝙨 𝙗𝙮➖ 𝙍𝙖𝙨𝙝𝙢𝙞 𝙎𝙖𝙫𝙡𝙚

🌻🌼🍀🌺🌸🌻🌼🍀🌺🌸🌻🌼🍀🌺🌸🌻

🌼🌼🌼” बाल्यावस्था में सामाजिक विकास”🌼🌼🌼

🌼 परिवार
🌼बालकों का समूह
🌼 विद्यालय
🌼 खेल का मैदान

🌼(A)सामाजिक भावना —
🌼सामाजिक भावना में जागरूकता ,चेतना, रुझान
🌼सामाजिक क्षेत्र में व्यापक और विकसित
🌼 विद्यालय पर्यावरण से अनुकूलन
🌼 नए मित्र बनाना

🌼(B) -आत्मनिर्भरता
🌼 स्वयं को स्वतंत्र मानना
🌼 बच्चों के साथ रहना
🌼खुद से या खुद के हिसाब से काम करना

🌼(C) -गिरोह प्रवृत्ति
🌼गैंग age, समूह आयु, दल समूह, खेल समूह, संस्कृति का समूह, समूह के नियमों को महत्वता या मान्यता देना!,

🌼(D)–नागरिक गुणों का विकास
🌼आज आदतों और नागरिक गुणों का विकास
🌼 धन कमाने की इच्छा
🌼 सुखी
🌼 विद्वान नेता
इन सभी की इच्छा बढ़ती है

🌼(E)-भावना ग्रंथि का विकास
🌼 ऑडिपस -लड़कों में (पुत्र ,माता से प्रेम करता है)
🌼इलेक्ट्रा -लड़की (पुत्री अपने पिता से प्रेम करती है )

🌼🌼🌼किशोरावस्था में सामाजिक विकास🌼🌼🌼🌼

🌼 मानव जीवन की अनोखी अवस्था है

🌼(A) -आत्म प्रेम-
🌼 खुद से स्नेह स्वयं से प्रेम
🌼विषम लिंगी आकर्षण के कारण अकर्षक देखना या खुद को आकर्षक दिखाना

🌼 (B)-सामाजिक चेतना का उदय
🌼समूह भावना ,आस्था ,त्याग
🌼स्वयं का दायरा छोड़कर मानवीय दायरे में प्रवेश करता है
🌼देश प्रेम की भावना

🌼(C) -सामाजिक पहचान
🌼सामाजिक पहचान स्थापित करने के लिए क्रियाशील होना
🌼 व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु तत्पर रहना

🌼 notes by manjari soni🌼

🌹 बाल्यावस्था में सामाजिक विकास 🌹

बाल्यावस्था में बच्चों का सामाजिक विकास निम्न आधार पर होता है :-

सामाजिक विकास :- परिवार 👉 बालकों का समूह 👉 विद्यालय 👉 खेल का मैदान

1. सामाजिक भावना :-

सामाजिक भावना में बच्चों में जागरूकता, चेतना , रुझान आने लगता है।
बच्चों का सामाजिक क्षेत्र व्यापक और विकसित होने लगता है।
बच्चों का विद्यालय और पर्यावरण से अनुकूलन होने लगता है।
बाल्यावस्था में बच्चों को नए मित्र बनाना अच्छा लगता है।

2. आत्मनिर्भरता :-
बच्चे स्वयं को स्वतंत्र मानते हैं।
बच्चों के साथ रहना ।
खुद के हिसाब से काम करना।

3. गिरोह प्रवृत्ति :-
गैंग age , समूह आयु , दल समूह , खेल समूह , सांस्कृतिक समूह । बच्चे इस अवस्था में समूह के नियमों को मान्यता देना सीख जाते हैं।

4. नागरिक गुणों का विकास :-
आदतों और नागरिक गुणों का विकास होता है।
इस अवस्था में बच्चों को धन कमाने की इच्छा होती है। सुखी , विद्वान , नेता आदि बनने की इच्छा बढ़ती है।

5. भावना ग्रंथि का विकास :-

🌺 ओडिपस ग्रंथि :- लड़कों में पायी जाती है।

अतः इस ग्रंथि के कारण ही लड़कों का प्रेम / लगाव अपनी ” माँ ” से होता है।

🌺 इलेक्ट्रा ग्रंथि :- लड़कियों में पायी जाती है।

अतः इस ग्रंथि के कारण ही लड़कियों का प्रेम / लगाव अपने ” पिता ” से होता है।

🌹 किशोरावस्था में सामाजिक विकास 🌹

किशोरावस्था को मानव जीवन की अनोखी अवस्था माना गया है।

1.🌺 आत्मप्रेम :-

स्वयं से प्रेम
विषम लिंगी आकर्षण के कारण स्वयं को आकर्षक दिखाना।

2. 🌺 सामाजिक चेतना का उदय :-

समूह भावना , आस्था , त्याग की भावना होती है।
स्वयं का छोटा दायरा छोड़कर सामाजिक , मानवीय दायरे में प्रवेश करता है।
इस अवस्था में बच्चों में देश प्रेम की भावना विकसित होने लगती है।

3. 🌺 सामाजिक पहचान :-

सामाजिक पहचान स्थापित करने के लिए क्रियाशील होना ।
व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु तत्पर रहना।

अतः इस अवस्था में बच्चों में स्वयं की एक नयी और अलग पहचान बनाकर सामाजिक रूप से दिखाने की बहुत इच्छा होती है, जिसके लिए बच्चे क्रियाशील रहते हैं।

🌹✒️✒️ Notes by -. जूही श्रीवास्तव✒️✒️🌹
🚼बाल्यावस्था में सामाजिक विकास🚼

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास निम्न प्रकार से होता है

1 परिवार:- परिवार बच्चे के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है परिवार से ही हमें समाज में किस तरह से रहना है यह सब सिखाया जाता है

2 बालकों का समूह: बाल्यावस्था में बच्चे अपनी हम उम्र के बच्चों के साथ हैं एक समूह बना लेते हैं जिससे बच्चे साथ खेलते हैं और उनका सामाजिक विकास होता रहता है

3 विद्यालय:- विद्यालय सामाजिक सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है विद्यालय में हम टीचर से मिलते हैं बहुत सारे बच्चों से मिलते हैं और उनके बारे में जानते हैं

4 खेल का मैदान:- खेल का मैदान सामाजिक के विकास में बहुत ही जरूरी होता है क्योंकि बच्चे सभी के साथ में खेलता है तो उसमें समूह की भावना आती है एवं वह तुरंत निर्णय लेने में भी सक्षम होता है

😊 सामाजिक भावना☺️

1 सामाजिक भावना में बच्चे में जागरूकता आती है चेतना रुझान आता है बच्चे अपने आसपास के वातावरण को समझने लगते हैं

2 सामाजिक क्षेत्र व्यापक और विकसित होने लगता है वह अपने घर से बाहर निकलता है और
अपने आस-पड़ोस के लोगों को जानने लगता है

3 विद्यालय पर्यावरण से अनुकूल होने लगता है इस समय बच्चा अपने घर के वातावरण के साथ-साथ पर विद्यालय के वातावरण से प्रतीत होता है और विद्यालय के वातावरण के अनुसार ढलता है

4 नए मित्र बनाना बच्चे जब घर से बाहर निकलते हैं तो वह अपने आस-पड़ोस के लोगों से मेलजोल करने लगते हैं और उनके हम उम्र के बच्चे उनके मित्र बन जाते हैं ऐसे ही वह विद्यालय जाते हैं तो उनके नए-नए दोस्त बनते हैं

😊 आत्मनिर्भरता😊

1 स्वयं को स्वतंत्र मानना बच्चे बाल अवस्था में स्वयं को स्वतंत्र मानते हैं
2 बच्चों के साथ रहना बाल अवस्था में बच्चों को बच्चों के साथ रहना बहुत पसंद होता है तू भी बच्ची आपस में एक दूसरे की बातों को बहुत ही अच्छी तरीके से समझते हैं
3 खुद के हिसाब से काम करना बाल्यावस्था में बच्चे अपने हिसाब से अपना काम करते हैं यदि उनको खेलना है तो खेलना है यदि खाना नहीं खाना है तो नहीं खाना है यदि मुझे यह चाहिए तो यही चाहिए

😊 गिरोह प्रगति😊

1 गैंग आयु:- बाल्यावस्था में बच्चे अपनी गैंग बनाकर रहते हैं
2 समूह आयु :- इस अवस्था में बच्चे अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ समूह में रहते हैं
3 दल समूह किस उम्र में बच्चे का अलग-अलग दल होता है
4 खेल समूह बच्चे जिसके साथ जो खेल खेलना पसंद करते हैं वह उन्हीं के साथ खेलते हैं इस खेल को वह दूसरे के साथ नहीं खेलते
5 सांस्कृतिक समूह इस उम्र में बच्चा थोड़ी बहुत धार्मिक कार्य में रुचि लेता है यदि वह घर पर देखता है कि कोई धार्मिक कार्य हो रहा है तो वह उस वातावरण में समायोजित हो जाता है
6 समूह के नियमों को मान्यता बच्चे जब साथ साथ खेलते हैं तो वह कुछ नियम बना लेते हैं और सभी बच्चे उस नियम को फॉलो करते हैं

😊नागरिक गुणों का विकास😊

आदतों और नागरिकों के गुणों का विकास धन कमाने की इच्छा सुखी जीवन विद्वान नेता बनने की इच्छा बढ़ती है

😊 भावना ग्रंथि का विकास😊

भावना ग्रंथि के कारण हमारे अंदर कई प्रकार की भावना उत्पन्न होते हैं
1 aadipas यह ग्रंथि लड़कों में पाई जाती है लड़कों में इसी ग्रंथि के कारण वे अपनी माता से प्रेम करते हैं

2 इलेक्ट्रा यह ग्रंथियां लड़कों में पाई जाती है लड़कियां ऐसी ग्रंथि के कारण अपने पिता से प्यार करती हैं
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🚼किशोरावस्था सामाजिक विकास🚼

किशोरावस्था को मानव जीवन की अनोखी अवस्था कहा जाता है

😊आत्मप्रेम😊
1 किशोरावस्था में बच्चों को खुद से स्नेह होता है वह अपने बारे में ही सोचता है खुद प्रसन्न रहने के बारे में ही सोचता है

2 स्वयं से प्रेम इस अवस्था में बच्चा अपने आप से ही प्रेम करता है अपने को अच्छा दिखाता है

3 समलिंगी आकर्षण इस अवस्था में बच्चा विषम लिंग के प्रति आकर्षित होता है

😊 सामाजिक चेतना का उदय😊

किशोरावस्था में बच्चों में समूह की भावना आस्था एवं त्याग की भावनाएं का उदय होता है
इस अवस्था में बच्चे सब कुछ है त्यागने की भावना आ जाते हैं यही अवस्था में बच्चे मैं आस्था आती हैं इसी अवस्था में बच्चा सब कुछ कर गुजरने की सोचता है
स्वयं का दायरा छोड़कर मानवीय दायरे में प्रवेश करने लगता है
देश प्रेम की भावना आती है

😊 सामाजिक पहचान😊

किशोरावस्था में बच्चा सामाजिक पहचान स्थापित करने के लिए क्रियाशील होता है व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु तत्पर रहता है इस अवस्था में बच्चे में जोश स्फूर्ति रहती हैं

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
😊☺️😊 sapna sahu 😊😊😊😊😊

💫बाल्यावस्था में सामाजिक विकास🌴

🌾इस अवस्था में बच्चे का विकास अधिकतर परिवार से बाहर विद्यालय में होता है बच्चे परिवार से निकलकर विद्यालय में आ जाता है जिससे उसके सामाजिक विकास में अनेक प्रकार से परिवर्तन आते हैं इस इस अवस्था में बच्चे समूह में रहना पसंद करते हैं।

🌲🌊सामाजिक भावना~

🌾इस अवस्था में बच्चे की सामाजिक भावना में जागरूकता आती है समाज के प्रति रुझान, चेतना बढ़ने लगती है।

🥀शैशवावस्था की तुलना में बलिया वस्त्रों में समाजिक क्षेत्र बड़े स्तर पर विकसित होने लगता है।

☀️इस अवस्था में बच्चा विद्यालय के पर्यावरण से अनुकूलित होने लगता है।

🍁इस अवस्था में बच्चे के नए-नए मित्र बनने लगते हैं।

💫आत्मनिर्भरता

👉इस उम्र में बच्चे खुद से कार्य करने लगते हैं जैसे खाना खाना कपड़े पहनना खेलना ब्रश करना नहाना इत्यादि कार्य को स्वयं से करते हैं अर्थात स्वयं को स्वतंत्र मानते हैं

👉इस अवस्था में बच्चे अपने साथ के बच्चे से मिलजुल कर रहना पसंद करता है वह अपने हिसाब से कम को करना सीख जाता है।

🌴गिरोह प्रवृत्ति

🌹इस अवस्था में बच्चा अपने समूह आयु, दल समूह, गैंग गेज आदि में रहना पसंद करने लगते हैं।

☘️खेल समूह में रुचि न लेने लगते हैं खुद का संस्कृतिक समूह बनाने लगता है और उसी के समूह के नियम को अपनाने लगता है।

💫नागरिक गुणों का विकास

🌿इस अवस्था में बच्चों में सही आदतों और नागरिकों का विकास होने लगता है।

✨धन कमाने की इच्छा ,सुखी, विद्वान नेता बनने की इच्छा आदि जागृत होने लगती है।

💫भावना ग्रंथि का विकास

🍂इस अवस्था में बच्चे में भावना ग्रंथि जागृत होने लगती है ,अगर बच्चा इस ग्रंथि को कंट्रोल नहीं किया जा जाए तो बच्चे अनेक समस्याओं का सम्मान करना पड़ता है भावना से अनुमति प्रदान करती है व्यक्ति जैसा सोचता है करता है इस ग्रंथि को मस्तिष्क ,संस्कृति ,क्षैतिज विकास आदि रोकते हैं सामाजिक विकास के संबंध में ओडिपस ग्रंथि लड़के का माँ के प्रति और इलेक्ट्रा ग्रंथि लड़की का पिता के प्रति प्रेम को दर्शाता है।

💫किशोरावस्था में सामाजिक विकास

🌾किशोरावस्था को मानव जीवन का तूफानी काल कहा जाता है इस को सबसे अनोखा काल कहा जाता है बालक में जितने भी परिवर्तन होते हैं उन सब में ज्यादा समाजिक विकास की भूमिका होती है।

👉इस अवस्था में बच्चे स्वयं से प्रेम करते हैं और खुद से स्नेह करते हैं।

👉विषम लिंगी के प्रति आकर्षण होता है तथा खुद को दूसरों की तुलना में आकर्षक मांनते हैं।

🌴💫सामाजिक चेतना का उदय

💐इस अवस्था में समाजिक विकास का उदय होने लगता है।
समूह भावना किसी चीज के प्रति आस्था त्याग का विकास होता है

👉इस अवस्था में बच्चे मानवीय दायरे में प्रवेश करता है ।

👉इस अवस्था में बच्चे में देश प्रेम की भावना आती है वह राष्ट्र के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहता है।

💫समाजिक पहचान

👉इस अवस्था में प्रत्येक बच्चा अपनी पहचान बनाना चाहता है।

👉वह अपनी सामाजिक पहचाना स्थापित करना चाहता है।

👉बच्चे अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने हेतु सदैव तत्पर रहता है हमेशा खुद के ऊपर रखना चाहता है।

💐🌺🌲🥀Notes by-SRIRAM PANJIYARA 🌈🌸💥🌺🙏

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