🌺By रश्मि सावले🌺

संवेग की प्रकृति या विशेषताएं ( Nature and characteristics of emotions) :– (1) संवेग से संज्ञानात्मक विकास का पता चलता है …. (2) संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है लेकिन इसकी प्रबलता प्रत्येक व्यक्ति में अलग अलग होती है (3 ) संवेग के कारण शारीरिक बदलाव आते हैं ये परिवर्तन दो प्रकार से होते हैं (१) आंतरिक परिवर्तन :– सांस बढना , धड़कन तेज चलना, चिंता होना, पाचन क्रिया में बदलाव आदि…. (२) बाहरी परिवर्तन :– आवाज में परिवर्तन, चेहरे के भाव परिवर्तन आदि | (4) संवेग में हम सामान्य स्थिति में नहीं रहतें है उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता विचार प्रक्रिया लुप्त हो जाती है | . . ( 5 ) मूल प्रवृत्ति से संबंध अर्थात संवेग मूल प्रवृत्ति का आधार है | …( 6 ) संवेग से वैयक्तिकता (स्वभाव ,अवस्था, परिस्थिति) आती है | संवेग अस्थिर होता है चिंतन ,सोच, अभिवृत्ति पर निर्भर होता है क्रोध खुशी सब कुछ तत्कालिक होता है… (8) संवेग क्रियात्मक क्षेत्र को रखते हुए कार्य करता है सदैव कार्यात्मक या क्रियात्मक प्रवृत्ति पर कार्य करता है | 🌺🌺 ….


✍️BY➖ Anamika Rathore

==संवेग की प्रकृति और विशेताएं==

✍️संवेग में पाई जाने वाली प्रकृति और विशेषताएं निम्न है–
1: संवेग से संज्ञानात्मक विकास➖
हर व्यक्ति में संवेग के साथ संज्ञान भी होता है। हर संवेग का संज्ञानात्मक से संबंध होता है। व्यक्ति की बुद्धि और विवेक से निकल कर संवेग आता है जो उसके संज्ञान से जुड़ा होता है।

2: संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है ➖
संवेग का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत होता है। सभी प्राणियों में संवेग पाया जाता है, परन्तु किसी व्यक्ति में कम और किसी में ज्यादा होता है ।
3:संवेग से शारीरिक परिवर्तन ➖
व्यक्ति के संवेग के प्रभाव के कारण शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं । यह परिवर्तन आंतरिक और बाह्य दोनों होते है।
जैसे – आंतरिक के अन्तर्गत सांस फूलने, धड़कन का तेज होना , पाचन क्रिया पर प्रभाव और सरदर्द का होना आदि ।
बाह्य के अन्तर्गत आवाज का बदलना, पसीना आना, हावभाव में परिवर्तन आदि ।

4: सामान्य स्तिथि ➖
संवेग की स्तिथि अलग अलग जगह पर अलग अलग होती है। जैसे- क्रोध आने पर व्यक्ति को उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता है। सकारात्मक विचार लुप्त हो जाते हैं। सोचने समझने की क्षमता कम हो जाती है।
बहुत ज्यादा खुशी में भी व्यक्ति की सोचने समझने की क्षमता क्षीण हो जाती है।
5: मूल प्रवृत्ति से संबंध ➖
मूल प्रवृत्ति और संवेग एक दूसरे से जुड़े है। जहां संवेग होगा वहां पर मूल प्रवृत्ति भी अवश्य होगी। मूल प्रवृत्ति, आधार है और संवेग, उसका भाव है।
6: वैयक्तिकता ➖
व्यक्ति के स्वभाव, अवस्था, परिस्थिति के अनुसार संवेग , वैयक्तिकता के रूप में निकलता है।

7: अस्थिरता ➖
संवेग , व्यक्ति में स्थिर नहीं होता है, अर्थात् ज्यादा समय के लिए नहीं होता है। व्यक्ति के अंदर क्रोध या बहुत ज्यादा खुशी तात्कालिक होती है। लंबे समय तक दिमाग में किसी बात का रहना व्यक्ति की सोच, अभिवृति या चिंतन बन जाता हैं।
8: क्रियात्मकता ➖
संवेग कार्यात्मक या क्रियात्मक प्रवृत्ति पर कार्य करता है। व्यक्ति के एक्शन के अकॉर्डिंग संवेग होता है। ✍️


🌼 संवेग की प्रकृति और विशेषता 🌼
➡️व्यक्ति के संवेग से उसकी संज्ञानात्मक विकास को समझ सकते हैं। क्योंकि उसके व्यवहार मे उसकी प्रकृति का पता चल जाता है।
➡️संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक हैं। सभी प्राणियो मे संवेग पाये जाते हैं। सब मे संवेग का प्रभाव अलग अलग होती हैं।
➡️संवेग से शारीरिक परिवर्तन होते हैं। ये शारीरिक परिवर्तन दो प्रकार से हो सकते हैं -आन्तरिक और बाह्य
आन्तरिक परिवर्तन मे श्वास प्रक्रिया, धडकन ,पाचन क्रिया तेज गति से होती है।
बाह्य परिवर्तन मे आवाज मे परिवर्तन हो जाता है, चेहरे के हाव भाव बदल जाते हैं।
सामान्य स्थिति मे नहीं रहते हैं।
उचित -अनुचित का ज्ञान नहीं रहता है।
विचार प्रक्रिया लुप्त सी हो जाती है।
➡️संवेग का प्रदर्शन मूल प्रवृति के आधार पर होता है जैसे हमारी मूल प्रवृति भागने की है तो वहा हमे भय का संवेग उत्पन्न होगा।

➡️संवेग पर वैयक्तिकता का प्रभाव पडता है। अलग अलग व्यक्तियों के अलग अलग परिस्थिति मे उनके स्वभाव, अवस्था के अनुसार संवेग प्रदर्शित होते हैं।
➡️संवेग अस्थिर होता है अर्थात् यह ज्यादातर समय तक नहीं रहता है जैसे क्रोध, खुशी ज्यादा समय तक नहीं रहता है ।यह क्षणिक होता है। ज्यादा समय रहने पर यह हमारी चिंतन, सोच के रूप परिवर्तित हो जाता है ।
➡️संवेग क्रियात्मक प्रवृत्ति का होता है। मतलब संवेग आने पर हम कुछ न कुछ क्रिया करेगे।

Notes by – रवि कुशवाह


संवेग की विशेषतायें एवं प्रकृति
1)संवेग एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया हैं ।
2) संवेग एक व्यापक प्रक्रिया हैं ।
3)संवेग के कारण विचार लुप्त हो जाता है ।
4)संवेग के कारण शारीरिक और मानसिक परिवरतन होता हैं यह आंतरिक और बाह्य दोनो तरीके से होता हैं जैसे गुस्से मे धड़कन का तेज हो जाना, सांस फूलना,अवाज बदल जाना आदि ।
5)संवेग का मुल्पृवतीयो से भी संबंध होता हैं ।जैसे किसी चीज से भय हुआ तो इन्सान पलायन कर जाता है ।
6) वैयक्तिक भिन्नता भी संवेग मे पाई जाती हैं जैसे प्रतेक बच्चा मे अलग अलग तरह के संवेग होते है ।उनके स्वभाव,अवस्था आदि अलग अलग होते हैं ।
7) संवेग आस्थिर होता हैं कभी कम कभी ज्यादा कभी छड़ भगुर होता हैं संवेग । यह चिंतन,,सोच अभिव्रती पर निर्भित होता है ।
8)संवेग क्रियात्मक प्रव्रति का होता हैं।
9) संवेग मे विवेकशक्ति का विलोपन हो जाता है ।
10)संवेग की मात्रा आनिश्चीत होती है।
11)संवेग सकारत्मक और नकरात्मक दोनो तरीके से होता है।
12)संवेग मे परिवर्तनशिल होता है।
13) सामान्य स्थिति- संवेग की स्थिति अलग अलग जगह पर अलग अलग होती है जैसे गुस्से पर ऐसे😡 😡😠खुशी पर ऐसे 😁😄🤗 प्यार पर ऐसे🥰😍😘 शर्ममाने पर ऐसे🙈🙈और आश्चर्य पर ऐसे🙀🙀😳
🖋 मालती साहू 🖋


✍🏻manisha gupta ✍🏻 संवेग की प्रकृति एवं विशेषताएं:- 🗼(1) किसी के संवेग से हम संज्ञानात्मक विकास को समझ सकते हैं➖ किसी व्यक्ति के प्रकृति व्यवहार के स्वभाव को देखकर उसके मानसिकता या संज्ञान को समझ सकते हैं । संवेगात्मक विकास संज्ञानात्मक विकास पर पूर्ण रूप से निर्भर होता है। संज्ञान अर्थात हमारी बुद्धि या विवेक से निकलकर ही संवेग आती है। 🗼(2):- संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है➖ सभी प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के संवेग पाए जाते हैं किसी में कम यह किसी में ज्यादा संवेग पाया जाता है किसी के समय की जानकारी उस स्तर तक ही हम कर पाते हैं जिस स्तर तक हम सोचते हैं ।संवेग का क्षेत्र तो व्यापक होता है लेकिन इसकी प्रबलता हर व्यक्ति में अलग अलग होती है। 🗼(3):- संवेग से शारीरिक परिवर्तन➖ प्रत्येक व्यक्ति में संवेग के प्रभाव के कारण शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं यह परिवर्तन आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार से हो सकते हैं आंतरिक परिवर्तन अर्थात (सांस तेज होना, धड़कन बढ़ना, सिर दर्द होना और पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है) बाह्य परिवर्तन अर्थात( आवाज में परिवर्तन ,चेहरे का हाव भाव,रोना) जिंदगी में एक व्यक्ति को (balance) संतुलन बना कर रखना चाहिए या एक सीमा तक ही कोई संवेग करना चाहिए। 🗼🗼(4):- संवेग में सामान्य स्थिति➖व्यक्ति संवेग में सामान्य स्थिति में नहीं रहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को उचित या अनुचित का ज्ञान नहीं रहता है ,विचार प्रक्रिया लुप्त सी हो जाती है, किसी व्यक्ति का सामान्य स्थिति में रहना जरूरी होता है, बहुत ज्यादा गुस्सा थी कुछ गलत करवा जाता है और बहुत ज्यादा खुशी में भी हमारी सोचने समझने की क्षमता छीण हो जाती है। 🗼(5):- मूल प्रवृत्तियों से संबंध➖ संवेगो का संबंध मूल प्रवृत्तियों से होता है प्रत्येक संवेग अपने मूल प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है जैसे जिज्ञासा से आश्चर्य होगा, आत्म गौरव से श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न होगी ,स्वामित्व की भावना से संचय प्रकृति होगा। 🗼(6):-वैयक्तिकता ➖ संवेग की प्रकृति व्यक्तिगत होती है प्रत्येक व्यक्ति में परिसि्खति के आधार पर ही संवेग अलग-अलग होते हैं और अलग-अलग व्यक्तियों में भी स्थितियों ,स्वभाव ,अवस्था के आधार पर ही संवेग अलग-अलग होते हैं सामान्य शब्दों में ऐसा कह सकते हैं कि व्यक्ति का स्वभाव ,अवस्था, परिस्थिति संवेग पर निर्भर करता है। 🗼(7)➖संवेग अस्थिर होता है- कोई भी संवेग व्यक्ति में कुछ ही पल के लिए होता है जैसे क्रोध खुशी तत्कालिक ही होते हैं संवेग में व्यक्ति स्थिर नहीं होता है ।यदि कोई संवेग लंबे समय तक दिमाग में रह जाता है तो वह व्यक्ति की सोच या अभिवृत्ति या चिंतन बन जाती है । 🗼(8)क्रियात्मकता➖संवेग क्रियात्मक प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर ही काम करता है इसमें कुछ ना कुछ एक्शन होता ही रहता है व्यक्ति के एक्शन के आधार पर ही संदेश क्रियात्मक प्रकृति को ध्यान रखते हुये कार्य करता है।✍️✍️


💫Notes by :- Neha Kumari

📚 की प्रकृति एवं विशेषताएं( Nature & characteristic of emotions) :-

📚संवेग से होनेवाली अनेक प्रकार की परिवर्तन और उसकी विशेषताएं :-

📚संवेग के अन्तर्गत संज्ञानात्मक विकास :- हर एक व्यक्ति में संवेग तथा संज्ञान दोनों विद्यमान होता है, ये परस्पर रूप से एक – दूसरे से जुड़े हुए होते हैं,क्योंकि हमारी बुद्धि और विवेक से संवेग निकलकर आती है, जो कि संज्ञान से जुड़ा हुआ है। अंततः संवेग एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है।

📚संवेग का क्षेत्र बहुत ही व्यापक होता है :- संवेग प्रत्येक व्यक्ति में पाया जाता है,परंतु किसी में ज्यादा किसी में कम।

📚संवेग परिवर्तनशील होता है।इस से अनेक प्रकार की शारीरिक,मनोवैज्ञानिक,आंतरिक और बाह्य तथा अन्य प्रकार के परिवर्तन भी होते हैं,जैसे कि :-
▪️आंतरिक परिवर्तन के अन्तर्गत :- सांस का फूलना,धड़कने तेज हो जाना,सिरदर्द होना तथा पाचन क्रिया पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
बाह्य परिवर्तन के अन्तर्गत :- आवाज का बदलना मतलब खूब कर्कश आवाज में आंखे घुर -२ कर बोलना🙄 पसीना आना, गुस्से में कोई चीज तोड़ – फोड़ करना,किसी से मार – पिट कर लेना,हावभाव में परिवर्तन तथा चिड़चिड़ापन आदि।

📚संवेग का हमारे वैयक्तिकता से संबंध :- इसमें व्यक्ति के परिस्थिति,स्वभाव और अवस्था के अनुसार संवेग में परिवर्तनशीलता आती है, जो हमारे वैयक्तिकता के रूप में प्रदर्शित होती है।

📚संवेग में अस्थिरता :- संवेग,एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी भी व्यक्ति विशेष में स्थिर नहीं रहती,हमेशा बदलती रहती है।जैसे कि :- किसी चीज को लेकर,कोई भी झगड़ा – लड़ाई इत्यादि से पल में गुस्सा और कुछ ही पलों में स्वयं ही तात्कालिक खुशी/ आंनद की अनुभूति आ जाना। ये अच्छी बात भी है क्योंकि,ज्यादा समय तक व्यक्ति का किसी तनाव,चिंता या क्रोध में होना भी अत्यंत हानिकारक होता है।

📚सामान्य स्थिति में संवेग :- संवेग अनेक प्रकार के होते हैं,तथा सबकी स्थिति अलग – अलग होती है।जैस की :- जब हम क्रोध आती है तो उचित – अनुचित का ज्ञान नहीं रह जाता, हम क्रोध में कुछ भी के जाते हैं लेकिन बाद में पछतावा होने लगी गई कि यार,मैंने ऐसा क्यों किया?? ये नहीं करना चाहिए था? कुछ भी…. जैसे अनेक प्रकार के ख्याल।

📚संवेग का मूल प्रवृत्ति से संबंध :- मूल प्रवृत्ति और संवेग एक – दूसरे से जुड़े हुए है,बोले तो सगे भाई जैसे होते हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा।इसलिए जहां संवेग होती वहां मूल प्रवृत्ति भी अवश्य होगी।क्योंकि संवेग ही मूल प्रवृत्तियां का आधार है,उनका भाव है।

💫 ये ज्ञात होता है कि संवेग के बिना जीवन में कुछ भी संभव नहीं है। जीवन के हर एक परिस्थिति,हर एक पहलू पर संवेग का महत्वपूर्ण स्थान जुड़ा हुए है क्योंकि संवेग के द्वारा ही हम अपने अनुभूति और संवेदनाओं की प्रकट कर पाते हैं।

धन्यवाद्👏


✍🏻Notes By – Vaishali Mishra

“संवेग की प्रकृति एवम् विशेषताएं” (Nature and characteristics of emotion)➖
▪️1) संवेग की मदद से या उसकी प्रकृति से हम संज्ञानात्मक विकास को समझ सकते है।
” संवेग के द्वारा हम किसी व्यक्ति के स्वभाव, मस्तिष्क बुद्धि, उसकी सोच या विचार, व्यवहार के बारे में पता कर सकते हैं।
▪️2) संवेग जा क्षेत्र बहुत ही व्यापक होता है। और यह सभी जीवित प्राणियों में पाया जाता है।

  • संवेग का प्रभाव ओर उसकी प्रबलता सभी में अलग अलग रूप से होती है।शिक्षण कार्य हेतु एक शिक्षक को भी बच्चे के संवेग को ध्यान में रखते हुए शिक्षण कार्य सम्पन्न करना चाहिए।
    ▪️3)संवेग के कारण हमारे शरीर में कई शारीरिक परिवर्तन होते है जो बाहरी और आंतरिक दोनों रूपों में नजर आते है।
  • आंतरिक रूप से परिवर्तन में हमारे शरीर की कई अंत: क्रियाएं जैसे सांस जोर से चलना , धड़कन तेज होना , पाचन क्रिया प्रभावित होना,सिरदर्द जैसी आदि क्रियाएं होने लगती है।
  • बाहरी रूप से परिवर्तन में आवाज तेज होना, चेहरे के हाव भाव बदलना, आंखे लाल हो जाना जैसी कई सारी क्रियाएं देखते है
    ▪️4)जब भी हमारे संवेग सामने आते है तब हम सामान्य स्थिति में नहीं रहते है,हमारे अंदर उचित और अनुचित का ज्ञान भी खत्म हो जाता हैं, और हमारे विचार उस संवेग के प्रति ,लुप्त हो जाते है।या हमारे अंदर कोई सकारात्मक विचार नहीं आ पाते है।
    ▪️5) संवेग मूल प्रवृति से ही संबंधित है या इसी से जुड़ा हुआ है दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते है मूल प्रवृति संवेग का ही आधार है।
    ▪️6) संवेग व्यक्तिकता के रूप में होते है हर व्यक्ति में अलग अलग परिस्थिति के अनुसार अलग अलग प्रकार के संवेग आते है।
    हम अपने स्वभाव, अवस्था और परिस्थिति के आधार पर ही संवेग को व्यक्तित्वता के रूप में प्रदर्शित करते है
    ▪️6) संवेग अस्थिर होते हैं। जैसे कि खुशी , क्रोध आदि संवेग तात्कालिक होते है जो बदलते रहते है।
    संवेग वहीं होते है जो हमारे मस्तिष्क में चिंतन ,सोच और अभिवृद्धि से आते है।
    ▪️7) संवेग क्रियात्मक होते है।
    संवेग हमेशा कार्यात्मक प्रवृति पर कार्य करते है।जब हम किसी कार्य को करते है या उस कार्य के लिए कोई क्रिया करते है तो हमारे अंदर संवेग भी आ जाते है।

Note by ➖पूर्वी
संवेग {Emotion} ➖
संवेग (emotion) लैटिन भाषा के शब्द “Emovere” से बना है जिसका अर्थ होता है उत्तेजना, हल चल या उथल-पुथल.
संज्ञान ➖
संवेग हमारे संज्ञान पर आधारित होता है संज्ञान के बिना हम संवेग को प्रदर्शित नहीं कर सकते संज्ञान हमारी मानसिक क्रियाएं, शक्ति, बुद्धि, तर्क, संवेदना के कारण उत्पन्न होता है |
मूल प्रवृत्ति ➖
जो हमारा वास्तविक व्यव्हार होता है यह सबके अंदर होती है संवेग जो हम दिखाते है (represent)करते है.
वुडवर्थ➖”संवेग व्यक्ति की उत्तेजित दशा है |”
क्रो & क्रो ➖”संवेग वह भावनात्मक अनुभूति (emotional feeling) है जो किसी व्यक्ति की मानसिक /शारीरिक उत्तेजना से जुड़ी होती है आंतरिक समायोजन के साथ भी जुड़ी होती है|(जो हमारे अंदर की प्रवृत्ति है) जो अभिव्यक्ति द्वारा बाहरी व्यवहार के रूप में प्रदर्शित होती है |
मैक्डूगल के अनुसार –
संवेग की मूल प्रवृत्ति 14 प्रकार की होती हैं|
1- पलायन (escape) ➖भय (fear)
2- युयुत्सा (cambat) ➖क्रोध (anger)
3- निवृत्ति (repulsion) ➖घृणा (disgust)
4- जिज्ञासा (curiosity) ➖आश्चर्य (wonder)
5- शिशु रक्षा (parental) ➖ वात्सल्य (love)
6- शरणागति (apeal ) ➖ विषाद (distress)
7- रचनात्मक (construction) ➖संरचनात्मक भावना (feeling of construction)
8- संचय प्रवृत्ति (acquisition) ➖स्वामित्व की भावना (ownership)
9- सामुहिकता (gregariousness ➖एकाकीपन (loneliness)
10- काम (sex) ➖कामुक्ता (lust)
11- आत्मगौरव (self asseration) ➖श्रेष्ठता की भावना (positive self feeling)
12- दैन्य (submission) ➖आत्महीनता (negetive self feeling)
13- भोजन अन्वेषण (food seeking) ➖भूख (appetite)
14- हास्य (laughter) ➖आमोद (amusement).

संवेग की प्रकृति और विशेषता ➖
➖संवेग से संज्ञानात्मक विकास – संवेग से ही संज्ञानात्मक विकास होता है जो हमारे अंदर अलग अलग रूप में दिखाई देता है |
➖संवेगात्मक और संज्ञानात्मक एक दूसरे पर निर्भर होते हैं जो व्यक्ति की बुद्धि, तर्क, अभिवृत्ति से सामने आता है |
➖ संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है जो कि यह सभी प्राणियों में पाया जाता है लेकिन यह हर एक व्यक्ति में एक समान नहीं होता है किसी में कम किसी में ज्यादा होता है |
➖संवेग से शारीरिक परिवर्तन – संवेग के कारण व्यक्ति में शारीरिक परिवर्तन भी होता है यह बदलाव आंतरिक और बाह्य दोनों ही रूप में होता है।
आंतरिक परिवर्तन – साँस फूलना, धड़कन तेज होना,सिर दर्द होना, पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है।
बाह्य परिवर्तन – आवाज बदलना, चहरे का हाव भाव बदलना, पसीना आना बाहरी परिवर्तन है।
➖समान्य स्तिथि – संवेग की समान्य स्तिथि में उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता है विचार प्रक्रिया लुप्त हो जाती है।
➖संवेग का मूल प्रवृत्ति से सम्बंध – व्यक्ति के हर संवेग मूल प्रवृत्ति से जुड़े होते हैं। मूल प्रवृत्ति संवेग का आधार है मूल प्रवृत्ति के बिना कोई भी संवेग सम्भव ही नहीं है।
➖वैयक्तिकता – हर व्यक्ति में अपना अलग -अलग स्वभाव, अवस्था, परिस्थित होती है। यह स्वभाव व्यक्ति के संवेग से उत्पन्न होती है।
➖संवेग अस्थिर होता है यह तात्कालिक रूप से आता है जेसे कि व्यक्ति खुश होता है कभी गुस्सा भी होता है यह व्यक्ति की परिस्थिति पर निर्भर होता है।
➖क्रियात्मक प्रवृत्ति व्यक्ति के कार्य करने पर निर्भर होता है जेसे आश्चर्य होना यह व्यक्ति के संवेग के आने से क्रिया होती है।
धन्यवाद 😊


वंदना शुक्ला- द्वारा
✳️Nature and characteristics of emotions✳️
✳️ संवेग की प्रकृति एवं विशेषताएं✳️

1🔸 संवेग से संज्ञानात्मक विकास का पता चलता है संवेगात्मक अनुभव किसी मूल प्रवृत्ति से या उत्तेजना से जुड़े होते हैं बच्चे में उम्र के अनुसार मूल प्रवृत्ति बढ़ती रहती है और मूल प्रवृत्ति के बढ़ने से संवेग में बढ़ोतरी होती है छोटे बच्चों में हर्ष स्नेह ईर्ष्या उत्सुकता यह संवेग पाए जाते हैं और किशोरों में डर क्रोध ईर्ष्या हर्ष जिज्ञासा चिंता दुख संवेग पाए जाते हैं।
2🔸संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है सभी प्रकार के प्राणियों में अलग-अलग प्रकार के संवेग पाए जाते हैं संवेग सभी में उपस्थित होते हैं पर किसी में तीव्रता से प्रदर्शित होते हैं और किसी में धीमी गति से प्रदर्शित होते हैं।

3🔸संवेग से शारीरिक परिवर्तन संवेग से 2 तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं 1 बाहरी शारीरिक परिवर्तन एवं 2आंतरिक शारीरिक परिवर्तन
1 बाहरी शारीरिक परिवर्तन मे शरीर का हाव-भाव बदल जाता है क्रोध में तौरियां चढ़ जाती हैं सुख होने पर चेहरा दमकने लगता है 2 आंतरिक शारीरिक परिवर्तन सांसे तेज, धड़कन बढ़ जाना, सिरदर्द ,पाचन क्रिया में प्रभाव।

4🔸सामान्य स्थिति -उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता विचार करने की प्रक्रिया लुप्त सी हो जाती है।
5🔸 मूल प्रवृत्तियों से संबंध- संवेगो का मूल संबंध मूल प्रवृत्तियों से सीधा होता है प्रत्येक संवेग अपने मूल प्रवृत्ति के साथ होता है जैसे मूल प्रवृत्ति पलायन से भय संवेग का उत्पन्न होना
, जिज्ञासा से आश्चर्य संवेग का प्रकट होना
6🔸 व्यकि्तकता- संवेग से व्यक्ति के स्वभाव का उसकी स्थिति और मूल प्रवृत्ति का पता चलता है।
7🔸अस्थिरता- संवेग किसी भी व्यक्ति में स्थिर नहीं होता है यह अस्थिर होता है परिस्थिति के अनुसार आता है और थोड़ी देर बाद चला जाता है।

8🔸 क्रियात्मक -संवेग व्यक्ति के क्रियात्मकता के अनुसार होता है जैसा उसका कार्य होगा संवेग उससे प्रभावित होगा।

धन्यवाद


😰संवेग की प्रकृति और उसकी विशेषताएं 🙄1- संवेग से संज्ञानात्मक विकास का संबंध का पता चलता है 2-संवेग का क्षेत्र बहुत व्यापक है संवेग सभी प्राणियों में पाई जाती है
3-संवेग शारीरिक रूप से भी बदलते हैं यह दो तरह के होते हैं
A, आंतरिक 💚 इसमें व्यक्ति का जल्दी जल्दी सांस लेना, पाचन क्रिया प्रभावित होना, धड़कन तेज होना, body temprature बढ़ जाता है
B बाह्य👁️ आंख लाल होना
😍 चेहरे का भाव बदल जाना
आवाज भारी हो जाना
4-संवेग सामान्य स्थिति में उचित या अनुचित का ज्ञान नहीं रहता है
इस समय किसी प्रकार का निर्णय ले लेना या किसी को कुछ भी बोल देना
5-हर संवेग अपने मूल प्रवृत्ति से जुड़ी होती है
6 -संवेग Individuality (व्यक्तिक) हर किसी में अलग अलग होती है
7-संवेग स्थिर नहीं रहता यह हमेशा चिंतन, सोच,मैं बदल जाता है
Notes by ehtasham raj 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

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