🏋️संवेगात्मक विकास 🏋️
✨(Emotional expression)✨

🎯मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है।

🎯संवेगात्मक विकास नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है।

🎯संवेगो को का प्रत्यक्षीकरण अलग-अलग हो सकता है किंतु संवेग सबको आता है।

💫जैसे÷ क्रोध आने पर कुछ बालक अपने खिलौने को तोड़ देते है ,तो कुछ बालक क्रंदन करने लगते हैं।

✨शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास✨

🎯अवस्था में संवेगात्मक विकास अस्पष्ट होता है।

🎯शिशु के संवेग मंद गति से आदत से जोड़ते हैं।

➡️जन्म के समय -उत्तेजना⬅️

1️⃣माह- पीड़ा/ आनंद

3️⃣माह – क्रोध

4️⃣माह परेशानी

5️⃣माह-भय

🔟माह-प्रेम

1️⃣5️⃣माह-ईर्ष्या

2️⃣4️⃣माह- खुशी/प्रशंनता

✨बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास✨

🎯इस अवस्था में संवेग में स्थाई तो आने लगता है;

🎯समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगते है;

🎯प्रत्येक क्रिया के प्रति ईर्ष्या घृणा प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना शुरू कर देते हैं।

✨किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास✨

🎯संवेग में परिपक्व (consciousness) अवस्था में आ जाता है;

🎯संवेग में चेतन और जागरूकता आ जाती है;

🎯बच्चे प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शित करते हैं;

🎯क्रोध, प्रेम ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा का तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शित करते हैं;

🌈चारित्रिक विकास

🏹इसके अंतर्गत नैतिकता की भावना उचित अनुचित का ज्ञान सही गलत के बीच विभेद करना आदर्श व्यक्तित्व का विकास होना धार्मिक भावना का विकास होना तथा सभ्यता संस्कृति को समझने का विकास होना इत्यादि है।

✨शैशवावस्था में चारित्रिक विकास✨

🎯उचित अनुचित का ज्ञान ना होना;

🎯अहम् की भावना का प्रबल होना;

🎯नैतिकता का उदय पनपने लगता है;

🎯कार्य के प्रति चेतना का उदय (कोई भी बच्चा हो उसमें बचपन से ही नैतिकता की भावना का उदय होने लगता है इसलिए बच्चों के सामने लड़ाई झगड़े व अन्य अनुचित कार्य नहीं करनी चाहिए क्योंकि बच्चा अनुकरण करता है भले ही वह तर्क ना कर सके किंतु उसमें चेतना आने लगती हैं)भी होने लगता है।

✨बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास✨

🎯इसे अधिक सीखने की अवस्था कहते हैं;

🎯चारित्रिक विकास को स्थायित्व देता है;

🎯हम की भावना का विकास होना;

🎯सही गलत के बीच में अंतर करना सीख जाता है;

🎯न्याय अन्याय में अंतर करना सीख जाता है;

🎯आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव करने लगता है (इसलिए 🎯इस अवस्था को जीवन का आदर्श काल भी कहते हैं।
🎯धार्मिक भावना का उदय होने लगता है;

✨किशोरावस्था का चारित्रिक विकास✨

🎯पूरे चारित्रिक गुणों का विकास हो जाना;

🎯बच्चों के अंदर गंभीरता का आ जाना;

🎯मानव धर्म को समझने लगता है;

🎯सभ्यता संस्कृति को समझने लगता है;

🎯समायोजन का अभाव होना (जानबूझकर गलती कर जाना)।

🌺🌺Notes by-$hikhar pandey🌺🌺

🌀🌀🌀संवेगात्मक विकास
(Emotional expression)🌀🌀🌀
✳️मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है।

✳️संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है।

✳️ जब व्यक्ति अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे सवेगात्मक विकास कहते है।

📌शैशवा वस्था में संवेगात्मक विकास📌

💠अवस्था में संवेगात्मक विकास अस्पष्ट होता है।

💠शिशु के संवेग मंद गति से आदत से जोड़ते हैं।

🀄जन्म के समय -उत्तेजना

🀄1माह- पीड़ा/ आनंद

🀄3माह – क्रोध

🀄4माह परेशानी

🀄5माह-भय

🀄10माह-प्रेम

🀄15माह-ईर्ष्या

🀄24माह- खुशी/प्रशंननता

☑️बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास☑️

✳️इस अवस्था में संवेग में स्थाई तो आने लगता है|

✳️समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगते है|

✳️प्रत्येक क्रिया के प्रति ईर्ष्या घृणा प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना शुरू कर देते हैं।

🟩किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास🟩

🌀संवेग में परिपकव अवस्था में आ जाता है|

🌀संवेग में चेतन और जागरूकता आ जाती है|

🌀बच्चे प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शित करते हैं|

🌀क्रोध, प्रेम ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा का तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शित करते हैं|

🟣चारित्रिक विकास🟣

🌐शैशवावस्था में चारित्रिक विकास🌐

❇️उचित अनुचित का ज्ञान ना होना|

❇️अहम् की भावना का प्रबल होना|

❇️नैतिकता का उदय पनपने लगता है|

❇️कार्य के प्रति चेतना का उदय होने लगता है।

🔻🔻बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास🔻🔻

⚛️इसे अधिक सीखने की अवस्था कहते हैं|

☸️चारित्रिक विकास को स्थायित्व देता है|

☸️हम की भावना का विकास होना|

☸️सही गलत के बीच में अंतर करना सीख जाता है|

☸️न्याय अन्याय में अंतर करना सीख जाता है|

☸️आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव करने लगता है|
☸️धार्मिक भावना का उदय होने लगता है|

🔯🔯किशोरावस्था का चारित्रिक विकास🔯🔯

🟤पूरे चारित्रिक गुणों का विकास हो जाना|

🟤बच्चों के अंदर गंभीरता का आ जाना|

🟤मानव धर्म को समझने लगता है|

🟤सभ्यता संस्कृति को समझने लगता है|

🟤समायोजन का अभाव होना | Notes by 🖊️🖊️PRAGYA..🙏🏻🙏🏻

🌼🌼🌼संवेगात्मक विकास🌼🌼🌼

🌼 मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है जब व्यक्ति अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं!!

🌼🌼🌼शैशवा अवस्था में संज्ञानात्मक विकास🌼🌼——- इस अवस्था में संवेगओं का विकास स्पष्ट होता है शिशु के संवेग मंद गति से आदत से जुड़ते हैं

🌼🌼जन्म के समय –उत्तेजना
🌼🌼एक माह में –पीड़ा /आनंद
🌼🌼 3 माह में– क्रोध
🌼🌼 4 माह में- -परेशानी
🌼🌼5 माह में –भय
🌼🌼10 माह में- प्रेम
🌼🌼15 माह में — ईर्ष्या
🌼🌼 24 माह में –खुशी और प्रसन्नता

🌼🌼🌼 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास🌼🌼

🌼 इस अवस्था में संवेग में स्थायित्व आने लगता है
🌼 समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगते हैं
🌼 प्रत्येक क्रिया के प्रति प्रेम ,ईर्ष्या, घृणा प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना प्रारंभ कर देता है

🌼🌼🌼 किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास 🌼🌼🌼

🌼संवेगात्मक परिपक्व अवस्था में आ जाते आ जाता है
🌼संवेग में प्रेरणा चेतना जागरूकता आ जाती है
🌼 प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ के साथ संवेग प्रदर्शन करते हैं
🌼क्रोध ,प्यार ,ईर्ष्या ,प्रतिस्पर्धा का खुद पर प्रयोग करते हैं

🌼🌼🌼🌼चारित्रिक विकास🌼🌼🌼

🌼🌼शैशवावस्था🌼🌼🌼
🌼 उचित अनुचित का ज्ञान ना होना
🌼 अहम की भावना प्रबल होना
🌼 नैतिकता का उदय पनपने लगता है
🌼कार्य के प्रति चेतना का उदय भी होने लगता है

🌼🌼🌼बाल्यावस्था🌼🌼🌼
🌼 इसे “अधिक सीखने “की आवश्यकता कहते हैं
🌼चारित्रिक विकास का स्थायित्व देती है
🌼 हम की भावना का विकास होता है
🌼सही गलत न्याय अन्याय में अंतर करना सीख जाते हैं
🌼 आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव धार्मिक भावना का उदय ..

🌼🌼🌼किशोरावस्था का चारित्रिक विकास🌼🌼
🌼 पूरे चारित्रिक गुणों का विकास मानव धर्म को समझने लगता है
🌼सभ्यता संस्कृति को समझने लगता है
🌼 समायोजन की का अभाव!!

By manjari soni🌼

🌺🌺 संवेगात्मक विकास🌺(Emotional expression)

🌺संवेगात्मक विकास मानव जीवन के विकास व उन्नति के लिए आवश्यक है

🌺यह विकास मानव जीवन को बहुत प्रभावित करता है वह उसी से उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहायता मिलती है

🌺जब व्यक्ति अपने संवेगों जैसे भय, क्रोध ,प्रेम आदि का सही प्रकाशन करना सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं

🎯शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास➖

⚡ शिशुओं में संवेगात्मक विकास धीरे-धीरे स्पष्टता की ओर होता है।

⚡ विशिष्ट संवेग मंद गति के स्वभाव के साथ जुड़ता है

⚡शैशवावस्था मैं मुख्यतः भय, क्रोध व प्रेम आदि तीन ही संवेगो
का विकास होता है

👉🏼 जन्म के समय- उत्तेजना

👉🏼 1 माह-पीड़ा/ आनंद

👉🏼 3 माह- क्रोध

👉🏼 4 माह- परेशानी

👉🏼 5 माह- भय

👉🏼 10 माह-प्रेम

👉🏼 15 माह-ईर्ष्या

👉🏼 24 माह-खुशी/ प्रशंसा

🎯 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास (emotional development in childhood)

👉🏼 इस अवस्था में संवेगों में स्थायित्व आना आरंभ हो जाता है

👉🏼 बालक संवेग व समाज के नियमों में समायोजन करने लगता है

👉🏼वह प्रत्येक क्रिया के प्रति प्रेम, ईर्ष्या, घृणा व प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करने लगता है

🎯 किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास (emotional development in adolescence)

👉🏼 संवेग में परिपक्व अवस्था में आ जाता है

👉🏼 संवेग में चेतन और जागरूकता आ जाती है

👉🏼प्रेम, क्रोध, दया ,सहानुभूति आदि संवेग स्थाई रूप धारण कर लेते हैं वह उन पर नियंत्रण नहीं कर पाता है

🌺🌺 चारित्रिक विकास🌺🌺

🎯 शैशवावस्था मैं चारित्रिक विकास➖

👉🏼 उचित अनुचित का ज्ञान होने लगता है अहम की भावना प्रबल हो जाती है
👉🏼 नैतिकता का उदय पनपने लगता है कार्य के प्रति चेतन का उदय भी होने लगता है

🎯 बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास➖

👉🏼 इससे अधिक सीखने की अवस्था कहते हैं
👉🏼 चारित्रिक विकास को स्थायित्व देती है’ हम’ की भावना का विकास होता है
👉🏼 सही- गलत, न्याय -अन्याय में अंतर करना सीख जाते हैं
👉🏼 आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव का नहीं रखते हैं धार्मिक भावना का उदय होने लगता है

🎯 किशोरावस्था में चरित्र विकास➖

👉🏼 पूरे चारित्रिक गुणों का विकास मानव धर्म को समझने लगता है
👉🏼 सभ्यता /संस्कृति को समझने लगता है समय नियोजन का अभाव हो जाता है

🖊️🖊️📚📚 Notes by….. Sakshi Sharma📚📚🖊️🖊️

💥💫संवेगात्मक विकास 💫💥

🌹मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है
🌺 संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है
🌷 जब व्यक्ति अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं

🔥🌟 शैशवास्था में संवेगात्मक विकास 🌟🔥

🌹 इस अवस्था में संवेगो का विकास अस्पष्ट होता है।
🌷शिशु के संवेग मंद गति से आदत से जुड़ते हैं
✨जन्म के समय – उत्तेजना
✨1माह – पीड़ा/आनन्द
✨3माह – क्रोध
✨4माह-परेशानी
✨ 5माह – भय
✨15 माह- ईष्या
✨24 माह- खुशी/प्रसन्नता

💫💥 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास 💥💫

🌺इस अवस्था में संवेग में स्थायित्व आने लगता है

🌹 समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगते हैं
🌷प्रत्येक क्रिया के प्रति ईष्या, घृणा, प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना प्रारंभ कर देता है

💥✨ किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास ✨💥

🌼 संवेग परिपक्व अवस्था में आ जाता है
🌷 संवेग में चेतना और जागरूकता आ जाती है
🌻 प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रर्दशन करते हैं
🌹क्रोध ,प्यार, ईष्या, प्रतिस्पर्धा का खुलकर प्रयोग करते हैं

💫💥🌸 चारित्रिक विकास 🌸💥💫

🌸✨ शैशवास्था ✨🌸

⚡👉 उचित अनुचित का ज्ञान न होना
🌹अहम की भावना प्रबल होती है
🌻 नैतिकता का उदय होने लगता है
🌺कार्य के प्रति चेतना का उदय भी होने लगता है

💫⚡ बाल्यावस्था ⚡💫

🌻इसे मनोवैज्ञानिकों ने अधिक सिखने की अवस्था कहा है
🌺 चारित्रिक विकास को स्थायित्व देती है
🌷 हम की भावना का विकास होता है
🌼 सही गलत, न्याय अन्याय में अन्यत्र करना सीख जाते हैं
🌸 आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव करने लगता है
🌻 धार्मिक भावना का उदय होने लगता है

💫🌺 किशोरावस्था का चारित्रिक विकास 🌺💫

🌺पूरे चारित्रिक गुणों का विकास होता है
🌻मानव धर्म को समझने लगता है
🌼 सभ्यता/संस्कृति को समझने लगता है
🌹 समायोजन का अभाव होने लगता है।

💫🌻🌹Notes by ÷Babita yadav 🌹🌻💫

🚼संवेगात्मक विकास🚼

मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित् विघटित हो जाता है

” जब तक कि अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं”

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास :- इस अवस्था में संवेग का विकास अस्पष्ट होता है शिशु के संवेग मंद गति से आदत से जुड़ते हैं

जन्म के समय उत्तेजना से भरा
1 माह ——पीड़ा आनंद
3 माह—— क्रोध आने लगता है
4 माह ——–परेशानी
5 माह ———भय
10 माह ——–प्रेम
15 माह——– ईर्ष्या
24 माह ———-खुशी/ प्रसन्नता

🚼बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास🚼

इस अवस्था में बच्चे में संवेग में स्थायित्व आने लगता है

समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगता है

प्रेत्यक क्रिया के प्रति एक जागरण प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना प्रारंभ कर देता है

🚼 किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास🚼

इस अवस्था में बच्चों में संवेग परिपक्व अवस्था में आ जाता है

संवेग में चेतना और जागरूकता आ जाती है

प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शित करते हैं

क्रोध प्यार ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा का अक्सर प्रयोग करते हैं

🚼चारित्रिक विकास🚼

शैशवावस्था में चारित्रिक विकास:-
उचित अनुचित का ज्ञान नहीं होता है
अहम की भावना प्रबल
नैतिकता का उदय पनपने लगता है
कार्य के प्रति चेतना का उदय भी होता है

बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास:- “इसे अधिक सीखने की अवस्था भी कहते हैं”

चारित्रिक विकास को स्थायित्व देता है

हम की भावना का विकास होता है

सही गलत न्याय अन्याय में अंतर करना सीख जाता है
आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव करता है
धार्मिक भावना का उदय होता है

किशोरावस्था में चारित्रिक विकास:-

पूरे चारित्रिक गुणों का विकास हो जाता है
मानव धर्म को समझने लगता है
परंतु समायोजन का अभाव रहता है
🙏🙏🙏🙏 सपना साहू🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🌹🌹 *संवेगात्मक विकास* 🌹🌹

*संवेगात्मक विकास* :-

मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है।
संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है।
जब कोई भी व्यक्ति अपने संवेगों का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं।

संवेगात्मक विकास विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है, जैसे :-

1. 🌲 *शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास*

इस अवस्था में संवेगों का विकास अस्पष्ट होता है।
शिशु के संवेग मंद (धीमी) गति से आदत से जोड़ते हैं।

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास निम्नलिखित प्रकार से होता है :-

👉 *जन्म के समय*
बच्चे का संवेग ” उत्तेजना ” से भरपूर रहता है।

👉 *1 माह में*
1माह में बच्चों में ” पीड़ा और आनंद ” का संवेग आ जाता है।

*👉3 माह में*
3 माह में बच्चों में ” क्रोध ” का संवेग आ जाता है।

👉 *4 माह में*
4 माह में बच्चों में ” परेशानी ” का संवेग आ जाता है।

👉 *5 माह में 5*
माह में बच्चों में ” भय ” का संवेग आ जाता है।

*👉10 माह में*
10 माह में बच्चों में ” प्रेम ” का संवेग आ जाता है।

*👉15 माह में*
15 माह में ” ईर्ष्या ” की भावना (संवेग) आ जाता है।

👉 *24 माह में*
24 माह में ” खुशी और प्रसन्नता ” का संवेग आ जाता है।

*2. 🌲 बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास*

इस अवस्था में संवेग में स्थायित्व(ठहराव )आने लगता है।

इस अवस्था में बच्चे समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगते हैं।

इस अवस्था में बच्चे प्रत्येक क्रिया के प्रति प्रेम , ईर्ष्या ,घृणा , प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना (दिखाना) आरंभ कर देते हैं।

3. 🌲 *किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास*

इस अवस्था में बच्चों के संवेग परिपक्व अवस्था में आ जाते हैं।

इस अवस्था में बच्चों के संवेगों में चेतना और जागरूकता आ जाती है।

इस अवस्था में बच्चे प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शन करने (दिखाने) लगते हैं।

इस अवस्था में बच्चे क्रोध , प्रेम , ईर्ष्या , प्रतिस्पर्धा जैसे संवेगों का खुलकर प्रयोग करते हैं।

🌹 *चारित्रिक विकास* 🌹

1. 🌲 *शैशवावस्था में चारित्रिक विकास*

इस अवस्था में उचित – अनुचित का ज्ञान नहीं होता है।

अहम की भावना प्रबल होती है।

नैतिकता का उदय होने लगता है।

नकल (अनुकरण) के प्रति चेतना का उदय भी होने लगता है।

*2. 🌲 बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास*

बाल्यावस्था को अधिक सीखने की अवस्था कहते हैं।

बाल्यावस्था , चारित्रिक विकास को स्थायित्व देती है।

बाल्यावस्था में “हम” की भावना का विकास होता है।

बाल्यावस्था में बच्चे सही – गलत , न्याय – अन्याय में अंतर करना सीख जाते हैं।

बाल्यावस्था में चारित्रिक विकास के आधार पर बच्चों में आदर्श व्यक्तित्व के चुनाव करने की समझ विकसित हो जाता है।

बाल्यावस्था में बच्चों में धार्मिक भावना का उदय भी होता है।

3. 🌲 *किशोरावस्था में चारित्रिक विकास*

किशोरावस्था में बच्चों में संपूर्ण चारित्रिक गुणों का विकास हो जाता है।

किशोरावस्था में बच्चे मानव धर्म को समझने लगते हैं।

इस अवस्था में बच्चों में अपनी सभ्यता / संस्कृति को समझने का गुण आ जाता है।

अतः किशोरावस्था में बच्चों में समायोजन का अभाव होता है।
अर्थात इस अवस्था में बच्चे अपने नये वातावरण के साथ समायोजन (Adjustment) करने में अक्षम रहते हैं।

🌹 ✒️ Notes by – जूही श्रीवास्तव ✒️ 🌹

🏹 संवेगात्मक विकास🏹

🎯मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संवेग का होना परम आवश्यक है ।

🎯संवेग विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विपरीत हो जाता है।

🎯जब व्यक्ति अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास कहते हैं।

🥏शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास🥏

🎯 इस अवस्था में संवेगों का विकास अस्पष्ट होता है क्योंकि उसका संवेग मंद गति से आदत से जुड़ते हैं।

🎯जन्म के समय बच्चे का संवेग पूरी तरह से उत्तेजना से भरी होती है।
👉1 माह—- पीड़ा और आनंद ये संवेग आ सकते हैं।

👉3 माह—- बच्चे के अंदर क्रोध आने लगते हैं।

👉4 माह —- परेशानी वाला संवेग आने लगता है।

👉5 माह—- बच्चों के अंदर भय का संवेग आने लगता है।

👉10 माह —- इस उम्र में बच्चों में प्रेम का संवेग आने लगता हैं।

👉15 माह —- ईष्या की भावना आने लगता हैं।

👉24 माह —- बच्चों में खुशी और प्रशन्नता आ जाती है।

🏹बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास

👉 इस अवस्था में संवेग में स्थायित्व आने लगता है

🍁समाज के नियमों और संवेग से समायोजन करने लगते हैं

🌀प्रत्येक क्रिया के प्रति प्रेम, ईष्या घृणा, प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना प्रारंभ कर देता है।

🏹 किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास

🥏 संवेग परिपक्व अवस्था में आ जाता है।

🥏 संवेग में चेतना और जागरूकता जाती है।

🥏प्रत्येक क्रिया में अधिक तीव्रता के साथ संवेग प्रदर्शन करते हैं।

🌾 क्रोध प्यार ईष्या ,प्रतिस्पर्धा का खुलकर प्रयोग करते हैं।

🎯चारित्रिक विकास🎯

🏹शैशवास्था:-

👉उचित अनुचित का ज्ञान ना होना।

👉अहम की भावना प्रबल हो जाती है।
👉नैतिकता की भावना अपनने ने लगता है ।
👉कार्य के प्रति चेतना का उदय होने लगता है ।

🎯बाल्यावस्था :-

🌾इसे अधिक सीखने की अवस्था करते हैं ।

🥏यह चारित्रिक विकास को अस्थायित्व देती है।

☘️ हम की भावना का विकास होता है ।
☀️सही- गलत ,न्याय -अन्याय में अंतर करना सीख जाते हैं।

🌹 आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव करने लगता है।

💐इस उम्र मेंधार्मिक भावना का उदय हो जाता है।

🌴 किशोरावस्था का चारित्रिक विकास

🎯इस अवस्था में बच्चों में पूरे चारित्रिक गुणों का विकास हो जाता है।

☀️ इस उम्र में बच्चा मानव धर्म को समझने लगता है।

🍂 सभ्यता और संस्कृति को समझने लगता है ।

🌀बच्चे के अंदर समायोजन का अभाव रहता है।
🌹💐🌺Notes by–SRIRAM PANJIYARA🌹🌾🌿

🌻संवेगात्मक विकास🌻

👨‍🦱मानव जीवन के विकास और उन्नति के लिए संदेश का होना परम आवश्यक है

👉संवेगात्मक विकास सही नहीं होने पर व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो जाता है

👉 जब व्यक्ति अपने संवेग का सही प्रकाशन सीख लेता है तो उसे संवेगात्मक विकास करते हैं

🤓 शैशव अवस्था:— में संवेगात्मक विकास इस अवस्था में संभव का विकास अस्पष्ट होता है शिशु के संवेग मंद गति के आदत से जुड़ता है

👉जन्म का समय :—उत्तेजना

👉1 माह:— पीरा आनंद

👉3 माह:— क्रोध

👉4 माह :—परेशानी

👉5 माह माह :—भय

👉10 माह :—प्रेम

👉15 माह :—ईर्ष्या

👉24 माह :—खुशी /प्रसन्नता

😎बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास:—
👉 इस अवस्था में संवेग में स्थानीत्व आने लगता है
👉समाज के नियम और संवेग से समायोजन करने लगता है

👉 प्रत्येक क्रिया के प्रति प्रेम ,ईर्ष्या, घृणा, प्रतिस्पर्धा की भावना प्रकट करना प्रारंभ कर देता है

🤠किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास:—

👉संवेग परिपक्व अवस्था में आ जाता है
👉संवेग में चेतना और जागरूकता आ जाती है

👉प्रत्येक क्रिया में अधिक तेजी के साथ संवेग प्रदर्शन करते हैं

👉क्रोध , प्यार ,ईर्ष्या ,प्रतिस्पर्धा का खुलकर प्रयोग करता है चारित्रिक विकास

🌻चारित्रिक विकास:—

🤓शैशवावस्था:— उचित अनुचित का ज्ञान ना होना
👉अहम की भावना प्रकट

👉नैतिकता का उदय पनपने लगता है
👉कार्य के प्रति चेतना का उदय होने लगता है

😎बाल्यावस्था :—-इसे अधिक सीखने की अवस्था करते हैं चारित्रिक विकास को स्थायित्व देती है

👉 हम की भावना का विकास सही
👉 सही- गलत, न्याय -अन्याय में अंतर करना सीख जाते हैं
👉आदर्श व्यक्तित्व का चुनाव
👉धार्मिक भावना का उदय

🤠किशोरावस्था का चारित्रिक विकास:—

👉पूरे चरित्र गुणों का विकास
👉मानव धर्म को समझने लगता है
👉सभ्यता संस्कृति को समझने लगता है
👉समायोजन का अभाव

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

Notes by:—sangita bharti✍️

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