चिंतन की विशेषताएं

❇️1 चिंतन में मानसिक प्रक्रिया निहित होती है।

🔹मस्तिष्क के द्वारा की जाने वाली क्रियाएं मानसिक प्रक्रिया या मानसिक कार्य कहलाता है।

🔹किसी भी वस्तु पर मस्तिष्क द्वारा जब क्रिया की जाती है या मानसिक रूप से कोई कार्य किया जाता है तब वह चिंतन किया जाता है।

❇️2 चिंतन किसी न किसी माध्यम से प्रदर्शित हो जाता है यह माध्यम भाषा प्रतीकात्मक व्यवहार है।

🔹प्रतीकात्मक व्यवहार से तात्पर्य बोलने का लिहाजा चेहरे के हाव भाव तथा चिंतन के समय की गई गतिविधियां हैं।

🔹इन सभी संकेतों के माध्यम से ही यह ज्ञात किया जा सकता है की चिंतन किस प्रकार का है।

🔹एक ही चीज के चिंतन के प्रतीक अलग-अलग चीजों को दर्शाते हैं जैसे यदि कोई काम नहीं कर रहा है। तो इस नहीं करने का कारण कई अलग-अलग प्रकार के संकेत हो सकते हैं।

🔹जैसे यदि हमें गुस्सा नहीं करना है।
तो यहां गुस्सा नहीं करने के कई अलग-अलग प्रकार के संकेत हो सकते हैं।
जैसे
▪️गुस्सा करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

▪️गुस्सा करने से काम बिगड़ सकता है।

▪️गुस्सा करने से अन्य लोगो पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

❇️3 चिंतन के लिए कोई ना कोई समस्या का होना आवश्यक है यदि समस्या नहीं होगी तो चिंतन होगा ही नहीं

🔹समस्या से तात्पर्य केवल परेशानी से ही नहीं बल्कि किसी भी टास्क या कार्य या परिस्थिति या जिम्मेदारी या जरूरत से है।

🔹जब भी हमारे सामने कोई समस्या या कोई कार्य होता है तब उसके समाधान के लिए या उसको पूरा करने के लिए उस पर हम चिंतन करते हैं।

❇️4 चिंतन में प्रयास और त्रुटि दोनों ही नहीं रहती है।

🔹जिसमें कार्य समस्या का चिंतन किया जाना है उसका सफल समाधान करने के लिए उसमें कई प्रयास पढ़ने पड़ते हैं और साथ ही साथ उसने कई त्रुटियों का सामना भी करना पड़ता है अंततः एक उचित समाधान प्राप्त होता है। किसी भी कार्य में स्पष्ट और आसानी से सफलता प्राप्त हो जाए बिना किसी प्रयास और त्रुटि की ऐसा संभव ही नहीं है अर्थात जब कार्य को करने के लिए जब चिंतन किया जाता हैं तो उसमे कई प्रयास और त्रुटि होती है तभी उस कार्य को सफल रूप से किया जा सकता है।

🔹चिंतन के समय व्यक्ति समस्या से संबंधित विभिन्न विचारों को समस्या निदान के लिए लागू करता है। यदि एक विचार से समाधान नहीं कर पाता तो दूसरे विचार की सहायता लेता हैं और यह क्रम तब तक चलता है जब तक की समस्या का समाधान प्राप्त ना हो जाता।

❇️5 चिंतन शुरुआत में स्थूल होता है और बाद में सूक्ष्म

🔹अर्थात चिंतन स्थूल से सूक्ष्म की ओर होता है किसी भी समस्या के समाधान के लिए उस समस्या पर विस्तृत या व्यापक रूप से या स्थूल रूप में चिंतन करते हैं या समस्या से जुड़े सभी पक्षों पर चिंतन करते हैं इसके पश्चात ही सभी पक्षों पर चिंतन करने के फलस्वरूप ही एकीकृत रूप से एक सूक्ष्म समाधान प्राप्त हो जाता है।

❇️6 चिंतन में विश्लेषण और संश्लेषण दोनों आवश्यक है।

🔹किसी भी समस्या या कार्य का उचित समाधान प्राप्त करने हेतु उस समस्या का विश्लेषण अर्थात समस्या से जुड़े सभी पहलू या उसके छोटे-छोटे भागों को तोड़कर उसका अध्ययन किया जाता है तत्पश्चात समस्त भागों को एक रूप में जोड़कर अर्थात संश्लेषण कर समस्या का उचित समाधान प्राप्त किया जा सकता है।

🔹जब किसी भी समस्या का हम विश्लेषण करते हैं तो हम समस्या की गहराई या समस्या की मुख्य जड़ अर्थात जिस वजह से समस्या उत्पन्न हो रही है उस तक पहुंच जाते हैं तथा उस मुख्य जड़ पर ही कार्य करके यह समस्त भागों को एक सही रूप में संश्लेषित कर समस्या का बेहतर रूप से समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

❇️7 चिंतन में प्रत्यक्षीकरण ना होकर प्रमुख रूप से विचार तथा प्रतीक होते हैं।

🔹जिस भी चीज पर चिंतन किया जा रहा है वह मूर्त हो सकती हैं लेकिन उस वस्तु पर जो चिंतन किया जा रहा है वह मूर्त नहीं होता है बल्कि वह विचारों व संकेतों के आधार पर किया जाता है।

🔹जब भी कोई वस्तु हमारे सामने या मूर्त रूप में या प्रत्यक्ष रूप में होती है तो उस वस्तु पर हम विचारों व संकेतों का प्रयोग कर चिंतन लगाते हैं।

❇️8 चिंतन एक जटिल प्रक्रिया है लेकिन इसमें संज्ञानात्मक का अपेक्षाकृत अधिक महत्व होता है।

🔹किसी भी वस्तु पर चिंतन करना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें अधिक से अधिक हम अपने संज्ञान या अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हैं।

✨चिंतन के प्रकार ( types of thinking)
1 प्रत्यक्षात्मक चिंतन
2 कल्पनात्मक चिंतन
3 प्रत्यात्मक चिंतन

🌀1 प्रत्यक्षात्मक चिंतन (perceptual thinking)

🔸जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें उस ही चीज़ का चिंतन होगा जो प्रत्यक्ष होगी। अर्थात सामने होगी। इसमें बालक उन वस्तुओं के बारे के सोचता है जो उसके सामने भौतिक वातावरण में उपस्थित रहती हैं।

🔸इसका संबंध हमारी ज्ञानेंद्रियों से है हम इन ज्ञानेंद्रियों (आंख,कान,नाक,जीभ, त्वचा) से चीजों को महसूस कर उस पर चिंतन कर सकते हैं।

🔸सामान्यतः पशु और बालक चीजों को प्रत्यक्ष रूप से देखकर ही चिंतन कर पाते हैं।

🔸अर्थाथ ज्ञानेंद्रियों से संबंधित ज्ञान को ही प्रत्यक्ष ज्ञान कहा जाता है।

🔸कई बार हमारे चीजों के बारे में अपने मस्तिष्क में उसके काल्पनिक रूप या अप्रत्यक्ष या अमूर्त चिंतन को जानते हुए या समझते हुए भी हम उस वस्तु के प्रत्यक्ष रूप पर चिंतन करने लगते हैं।
जिसके परिणाम स्वरूप हम चीजों का यह निर्णय नहीं कर पाते कि वह हमारी लिए सही है या गलत।

🔸इस प्रकार के चिंतन में कल्पना का कोई स्थान नहीं होता अर्थात कल्पना के स्थान पर हम चीजों को प्रत्यक्ष रूप से देखकर चिंतन करते हैं।

✨उदाहरण एक कुत्ता रोटी पाने के लिए घर में घुसता है किंतु घर के मालिक को डंडा लेकर आता देखकर भाग खड़ा होता है। कुत्ते के भागने का कारण उसका प्रत्यक्क्षात्मक चिंतन है जिसमें उसका पूर्व अनुभव भी सम्मिलित होता है । उसी के आधार पर कुत्ता यह निश्चय करता है कि घर के मालिक ने घर में घुसने की पूर्व समय में भी डंडा मारा था इसीलिए आज भी मारेगा और वह भाग खड़ा होता है।

🌀2 कल्पनात्मक चिंतन (imaginative thinking)

🔸इसमें मूर्त वस्तु का अभाव रहता है लेकिन इसकी पूर्ति कल्पना से कर ली जाती है।

🔸इसको संबंध भविष्य से होता है लेकिन इसमें स्मृति का भी योगदान होता है।

🔸कल्पनात्मक चिंतन में स्मृति के आधार पर पूर्व अनुभव की पृष्ठभूमि से व्यक्ति के मानसिक प्रतिमान का निर्माण होता है।

🔸इसमे वस्तुओं के सामने न होते हुए भी उसके बारे में सोचना और चिंतन करना ही कल्पनात्मक चिंतन कहलाता है। इसमे बालक कल्पना करना सीख जाता है। अब वह वस्तुओं आदि के सामने न होते हुए भी उसके बारे में सोच सकता है।

🌀3 प्रत्यात्मक चिंतन (conceptual thinking)

🔸प्रत्यात्मक चिंतन का आधार प्रत्यय है।
प्रत्यय से तात्पर्य किसी सोच या विचार या तथ्य या अवधारणा या संप्रत्यय से है।

🔸अर्थात किसी तथ्य के गुणों के ज्ञान को प्रत्यय कहते हैं।

🔸अतः किसी भी बात के बारे में उसके ज्ञान हमारे दिमाग में होते हैं वही हमारा प्रत्यय होता है।
यह जब हमारे कोई चीज सामने होती है तो उस चीज से संबंधित जो भी ज्ञान हमारे मस्तिष्क में होता है वही उस चीज का संप्रत्यय कहलाता है।

🔸इसमें बालक में प्रत्यय का निर्माण बनना शुरू हो जाता है तब वह चिंतन करता है। बालक में जितना ज्यादा प्रत्यय बनेंगे। उतना ज्यादा प्रत्ययात्मक चिंतन उसमे होगा। प्रत्यय से आशय है किसी भी प्रकार की छवि बनने से है। बच्चा जानवर और वस्तुओं आदि को देखकर उनका चित्र दिमाग मे बनाना सीख जाता है। इसके आधार पर चिंतन शुरू करता है।

✨जैसे हाथी शब्द को सुनकर हमारे मस्तिष्क में हाथी से संबंधित संचित संप्रत्यय जाग जाता है और उसके बारे में संपूर्ण ज्ञान का आभास होने लगता है अतः प्रत्यय के माध्यम से चिंतन की प्रक्रिया सशक्त या मजबूत होने लगती है।

🔸संप्रत्यय चिंतन का प्रमुख साधन है।
जैसे यदि कोई बच्चा अपने घर के कुत्ते ,दोस्त के कुत्ते तथा सड़क के कुत्ते को देखकर “कुत्ता” शब्द का प्रयोग करता है तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि बच्चे का संप्रतय उस वस्तु के प्रति विकसित हो चुका है

प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं

📍1 जिनका संबंध व्यक्ति की ज्ञान इंद्रियों से होता है।

▪️किसी चीज को हम अपने ज्ञानेंद्रियों के आधार पर उस चीज का संप्रतय विकसित कर लेते हैं और उस पर मानसिक रूप से चिंतन करते हैं।

📍2 जिनका संबंध गुणों से होता है।

▪️किसी चीज को उसके गुणों के आधार पर अपनी मानसिक स्तर में संप्रत्यय का निर्माण कर लेते हैं और उस संप्रत्यय पर चिंतन करते हैं।

▪️गुणों के आधार पर विकसित संप्रतय मात्रा हमारी मांसपेशियों पर नहीं होता बल्कि यह बाहा ज्ञानेंद्रियों के द्वारा हमारी आंतरिक ज्ञानेंद्रियों तक पहुंचता है जिससे हम उस वस्तु के गुणों के आधार पर विकसित संप्रत्यय के ऊपर मानसिक चिंतन करते हैं।

✍️ Notes By-'Vaishali Mishra'

चिंतन की विशेषताएं

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1. चिंतन में मानसिक प्रक्रिया निहित रहती है।

2. चिंतन किसी न किसी माध्यम से प्रदर्शित हो जाता है यह माध्यम भाषा या प्रतीकात्मक व्यवहार हो सकता है।

3. चिंतन के लिए समस्या का होना जरूरी है समस्या नहीं होगी तो चिंता नहीं होगी।

4. चिंतन में प्रयास और त्रुटि निहित रहती है।

5. चिंतन स्थूल से सूक्ष्म की ओर होता है।

6. चिंतन में विश्लेषण और संश्लेषण दोनों आवश्यक है।

7. चिंतन में प्रत्यक्षीकरण ना होकर प्रमुख रूप से विचार तथा प्रतीक होते हैं।

8. चिंतन एक जटिल प्रक्रिया है लेकिन इसमें संज्ञानात्मक पक्ष का अपेक्षाकृत अधिक महत्व है।

चिंतन के प्रकार
(Kinds of thinking)

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चिंतन के मुख्य रूप से 3 प्रकार हैं…….

1. प्रत्यक्षात्मक चिंतन
2. प्रत्ययात्मक चिंतन
3. कल्पनात्मक चिंतन

1. प्रत्यक्षात्मक चिंतन
(Reflective thinking)
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इसका संबंध हमारे ज्ञानेंद्रियों (आंख, नाक, कान, जीभ, एवं त्वचा) से होता है। इसमें बच्चा उन वस्तुओं के बारे में सोचता है जो उसके सामने भौतिक वातावरण में उपस्थित रहती है। अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में/ सामने रहती है। इसमें मूर्त चिंतन होता है।

2. प्रत्ययात्मक चिंतन
(Conceptual thinking)

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प्रत्ययात्मक चिंतन का आधार प्रत्यय होता है। प्रत्यय को सूक्ष्म विचार कहा जा सकता है। इसमें बालक में प्रत्यय का निर्माण बनना शुरू हो जाता है तब वह चिंतन करता है। बालकों में जितना ज्यादा प्रत्यय बनेगा उतना ज्यादा प्रत्ययात्मक चिंतन उसमें होगा।
किसी तथ्य के गुणों के ज्ञान को प्रत्यय कहते हैं।

प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं…..

1. जिनका संबंध व्यक्ति की ज्ञानेंद्रियों से है। अर्थात मूर्त प्रत्यय

2. जिनका संबंध गुणों से होता है। अर्थात अमूर्त प्रत्यय

उदाहरण,
बच्चा किसी जानवर या वस्तुओं को देखकर उनका चित्र अपने दिमाग में बनाना सीख जाता है इसके आधार पर चिंतन करने लगता है। जैसे- हाथी को देखकर गणपति बप्पा की मूर्ति याद करना।

3. कल्पनात्मक चिंतन

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कल्पनात्मक चिंतन में मूर्त वस्तु का अभाव रहता है लेकिन इसकी पूर्ति कल्पना से कर ली जाती है।

वस्तुओं के सामने न होते हुए भी उसके बारे में सोचना और चिंतन करना ही, कल्पनात्मक चिंतन कहलाता है।

इसका संबंध भविष्य से होता है लेकिन स्मृति का भी योगदान होता है।

कल्पनात्मक चिंतन में,स्मृति के आधार पर पूर्व अनुभव की पृष्ठभूमि में व्यक्ति की मानसिक प्रतिमान का निर्माण होता है।

Notes by Shreya Rai…….✍️🙏

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