🌻🌿🌻 बाल विकास 🌻🌿🌻 बाल विकास का अर्थ यह है, कि बालक का संपूर्ण विकास जो कि जन्म से या जन्म के पूर्व से प्रारंभ होकर मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है। बालक के विकास के लिए आवश्यक है, कि शिक्षक को बालक के बारे में संपूर्ण जानकारी हो। इसी के आधार पर शिक्षक बालक को शिक्षण करवाएगा। बालक को क्या पढ़ाना है? कैसे पढ़ाना है? एवं उसकी कमियों का पता लगाना तथा उन कमियों का पता लगाने के पश्चात उन कमियों को दूर करने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे। यह एक शिक्षक के लिए आवश्यक होता है। अतः शिक्षक की सर्वप्रथम एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह है कि वह बालक के विकास की प्रक्रियाओं को समझें तभी वह बालक को उचित ढंग से दिक्षित कर पाएगा।

🌿 प्रत्येक बालक समान नहीं होता है, सब बालकों म में किसी न किसी प्रकार की विभिन्नताएं होती है। इन विभिन्नताओं को मध्यस्थ रखकर ही शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया प्रारंभ करनी होगी।
बालकों में विभिन्नता के आधार~
👉🏻 सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं,
👉🏻 आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं,
👉🏻 सांस्कृतिक आधार पर विभिन्नताऐ,
👉🏻 आयु वर्ग के आधार पर विभिन्नताएं,
👉🏻 निवास स्थान के आधार पर विभिन्नताएं,
इत्यादि कई आधार है जिस पर विभिन्न विधाएं होती है इन सभी को ध्यान में रखकर ही शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया करनी होगी एवं शिक्षक को बालकों को शिक्षित करने के लिए इन सभी विभिन्नताओं को जानना होगा।

🌿 शिक्षक की बालकों के प्रति जिम्मेदारी ~
👉🏻 बालक की विशेषताओं को ध्यान में रखें,
👉🏻 बालक की योग्यताओं को ध्यान में रखें,
👉🏻 बालक की कमियों व समस्याओं को ध्यान में रखें,
👉🏻 बालक की क्षमताओं को ध्यान में रखें।
इन सभी को ध्यान में रखकर ही शिक्षक बालक को शिक्षित कर पाएगा। अध्यापक का यह दायित्व है, कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाएं। ऐसे परिवर्तन जो कि बालक के लिए लाभदायक हो; जिससे कि बालक को~

• अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके~
जब बालक अपने दायित्व कर्तव्यों को समझ जाएगा, तो वह एक अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी बखूबी निभा पाएगा। जो कि प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है।
• राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें
जब बालक अपने कर्तव्य को समझ जाएगा, तो वह अपने राष्ट्र के लिए वह कार्य करेगा। जो कि एक जिम्मेदार नागरिक को करना चाहिए। वह राष्ट्र के हित को लेकर अपने कार्यों का निर्वहन करेगा। जिससे कि वह राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकेगा। अतः इन सभी के लिए आवश्यक है, कि बच्चों को शिक्षित करना होगा। बालक को शिक्षित करने के लिए शिक्षा का माध्यम चाहे औपचारिक हो या अनौपचारिक। बालक को किसी भी माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाए। लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य यही होगा, कि बालक का विकास हो, बालक प्रगति करें।

[ ( औपचारिक शिक्षा- वह शिक्षा जो एक व्यवस्थित तरीके से प्रदान की जाती है, जिसके लिए कुछ नियम, कानून होते हैं। उदाहरण- स्कूल, कोचिंग सेंटर, एवं अन्य संस्थाएं इत्यादि।)
(अनौपचारिक शिक्षा- ऐसी शिक्षा जो कि किसी भी समय दी जा सकती है। इसके लिए किसी भी प्रकार के नियम, कानून या कोई व्यवस्थित तरीके की आवश्यकता नहीं है। उदाहरण- घर, खेल का मैदान, गार्डन इत्यादि अन्य स्थान।) ]

⚡ बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना होगा।
जब शिक्षक बालक के वृद्धि एवं विकास के प्रत्येक पहलू को समझ जाएगा। तो उसे यह ज्ञात हो जाएगा, कि बालक को किस प्रकार की आवश्यकता हैं, एवं उसी के आधार पर शिक्षक, बालक को शिक्षा दे पाएगा। अतः आवश्यक है, कि शिक्षक को बालक के वृद्धि एवं विकास के संबंध में जानकारी होना चाहिए।

⚡ इसके लिए शिक्षक को सही दिशा निर्देशन, उपयुक्त शिक्षा देने की आवश्यकता है। जिससे कि बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो सके।
शिक्षा का बालक की व्यवहार को जान जाएगा तब वह बालक को उचित दिशा निर्देशन दे पाएगा जिससे कि बालक अपना संपूर्ण विकास कर पाएगा।

👉🏻 बालक के विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है।
इसके पश्चात बालक के जन्म के बाद वह विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए चला जाता है, या चलता रहता है।

🌻 वृद्धि और विकास एक-दूसरे के पर्याय हैं,
🌻 वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित होते हैं,
🌻 वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।

🌺 वृद्धि ( Growth) 🌺

👉🏻 कुछ मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि की परिभाषाऐ दी है, जो कि निम्नलिखित है ~

🍂🍃 सोरेन्सन के अनुसार~
अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर के वाह अंगो के बाल एवं आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।

🍂🍃 फ्रंक के अनुसार~
अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होती है।
शरीर व व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है, उसे ही अभिवृद्धि कहते हैं।

🍂🍃 हरलॉक के अनुसार~
विकास, अभिवृद्धि तक सीमित नहीं है। इसकी वजह इसमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताऐ और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है।
📗 समाप्त 📗
✍🏻 PRIYANKA AHIRWAR ✍🏻
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☘️🍁🦚 बाल विकास 🦚🍁☘️

🌟 बाल विकास का अर्थ बालक के जन्म से आरंभ होकर जीवन पर्यंत तक चलने वाले हर एक प्रक्रियाओं का अध्ययन है जो एक व्यक्ति के दिन प्रतिदिन के जीवन काल में हमेशा गठित होता है उसका अध्ययन करना उसकी समझ विकसित करना तथा उसके समस्याओं का समाधान करना है।

🍁 एक शिक्षक के लिए बालक के सर्वांगीण विकास जैसे कि :- उनमें गुण – दोष,अच्छाई – बुराई और वैयक्तिक विभिन्नताएं इत्यादि को ध्यान में रखकर च्चों को किस क्षेत्र में किस तरह के शिक्षण सामग्री या पाठ्यक्रम की आवश्यकता है कैसे उनकी कमियों को दूर किया जाए तथा कब,कैसे और किस मात्रा में उन्हें शिक्षण कराया जाए ताकि उनके शिक्षण अधिगम प्रक्रिया सुदृढ़ हो सके।अन्य विशेषताओं को ध्यान में रखकर उसके उपयुक्त शिक्षण कराना तथा उनके समस्याओं का समाधान करना है बाल विकास शिक्षण का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

🌳 हर एक बालक व्यक्ति सम्मान नहीं होता हम सब में कोई ना कोई,किसी ना किसी प्रकार की व्यक्तिगत विभिन्नताएं जरूर पाई जाती हैं।जो कि निम्नलिखित है :-

🌿 सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं
🌿आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं
🌿 सांस्कृतिक आधार पर विभिन्नताएं
🌿 आयु वर्ग के आधार पर विभिन्नताएं
🌿निवास स्थान के आधार पर विभिन्नताएं इत्यादि ।

🍁इसके अलावा हम सब में और भी कुछ न कुछ विभिन्नताएं जरूर पाई जाती हैं।जिसके आधार पर शिक्षण प्रक्रिया कराई जाए तो एक अच्छे शिक्षण-प्रशिक्षण वातावरण का निर्माण होगा।

🌲 इस कार्य के लिए शिक्षकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो कि निम्नलिखित है:-

🌿 बालक की विशेषताओं को ध्यान में रखना।
🌿बालक की योग्यताओं को ध्यान में रखना।
🌿 बालक की सामाजिक – सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखना।
🌿 बालक के व्यवहारों को ध्यान में रखना।
🌿बालक की क्षमताओं को ध्यान में रखना।
🌿बालक की कमियों व समस्याओं को ध्यान में रखना।

🌸 इन सभी विशेषताओं को ध्यान में रखकर कार्य करने से ही एक उपयुक्त शिक्षण अधिगम वातावरण का निर्माण हो सकता है।

🌲 शिक्षकों का भी कर्तव्य होता है कि विद्यार्थियों को उनके वास्तविक जीवन के वांछनीय उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। जिससे बालक अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें।

🍁 जैसे कि :-
🌿अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सकें।
🌿 राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दे सकें।

🌿 अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सकें :-

🌸 जब बालक अपने दायित्व और कर्तव्य को बखूबी समझने लगेगा तथा उस पर कार्य करना शुरू कर देगा तो वह एक अच्छे और जिम्मेदार नागरिक के रूप में उभर कर आएगा।

🌿 अच्छे राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकें :-

🌸 जब बालक अपने कर्तव्यों को समझ जाएगा तो वह अपने राष्ट्रीय निर्माण के लिए कार्य करेगा जो कि एक जिम्मेदार नागरिक की स्वभाविकता है। जिससे एक अच्छे राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

🌟औपचारिक शिक्षा :-

🌿 इसके अंतर्गत शिक्षा व्यवस्थित और नियमानुसार दी जाती है। इस प्रकार के शिक्षण में कुछ नियम कानून बनाए जाते हैं जिसके अंतर्गत ही हमें कार्य करना होता है। इसे औपचारिक शिक्षण कहते हैं।

🍁 जैसे कि :-
🌿विद्यालय
🌿कोचिंग संस्थान
🌿 शिक्षण प्रशिक्षण केंद्र इत्यादि।

🌟 अनौपचारिक शिक्षा :-

🌿 ऐसी शिक्षा जो किसी भी प्रकार की,भी समय या किसी भी वेशभूषा में,कोई कार्य करते हुए, अन्यथा कुछ भी करते हुए ली जा सकती है। इसमें कोई नियम कानून नहीं होता इसे अनौपचारिक शिक्षण कहते हैं।

🍁 जैसे कि :-
🌿 घर
🌿खेल का मैदान
🌿 धार्मिक स्थल इत्यादि।

🌷🌷 अर्थात् इसके लिए यह आवश्यक है कि, शिक्षा का माध्यम औपचारिक हो या अनौपचारिक, हमें बच्चों को उनकी विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षित करना चाहिए। जिससे वे एक अच्छे राष्ट्र और भविष्य का निर्वहन/निर्माण कर सकें। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि बालक को एक अच्छे भविष्य और सर्वांगीण विकास के लिए तैयार किया जाए🌷🌷

🌷🌷🌷🌷 विकास🌷🌷🌷🌷

🦚 विकास एक ऐसी प्रक्रिया है, जो कि एक व्यक्ति में जन्म से पहले से ही प्रारंभ हो जाती है। और जीवन पर्यंत चलती है जिसमें इसे विभिन्न स्तरों से गुजरना पड़ता है।

🌿 विकास एक गुणात्मक प्रक्रिया है।
🌿इसे मापा नहीं जा सकता परंतु इसे महसूस किया जा सकता है।
🌿 विकास वर्तुलाकार होता है।
🌿 विकास जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।

🌷🌷🌷🌷🌷 वृद्धि🌷🌷🌷🌷🌷

🌿 यह एक मात्रात्मक प्रक्रिया है।
🌿 इसमें शरीर के आकार या वजन में वृद्धि होती है।
🌿 वृद्धि को हम देख सकते हैं।
🌿 इसे मापा तोला भी जा सकता है।
🌿 वृद्धि विकास का हीं एक भाग है।

🦚वृद्धि एवं विकास से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :-

🌸वृद्धि एवं विकास एक दूसरे से अंतः सबंधित होते हैं।
🌸 वृद्धि एवं विकास दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।
🌸 वृद्धि एवं विकास एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।
🌸वृद्धि एवं विकास में परस्पर संबंध होता है।

🌳 वृद्धि के संबंध में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की कथन दिए हैं।जो कि निम्नलिखित है :-

🌟 सोरेन्सन के अनुसार :- 🌿अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर के वह अंगो के बाल एवं आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।

🌟 फंक के अनुसार :- 🌿अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होती है। शरीर व व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है। उसे ही अभिवृद्धि कहते हैं।

🌟 हरलॉक के अनुसार :- 🌿 विकास,अभिवृद्धि तक सीमित नहीं है। इसकी वजह इसमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है।

🌟🦚🌟समाप्त 🌟🦚🌟

🌸Notes by :- Neha Kumari 😊

🌸🌿🌸🌿🌸धन्यवाद् 🌸🌿🌸🌿🌸

🍁⭐🍁 बाल विकास🍁⭐🍁

बाल विकास का अर्थ है बालक की संपूर्ण विकास से विकास जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तक चलता रहता है एक व्यक्ति के दिन प्रतिदिन के जीवन काल में हमेशा गठित होता है उसका अध्ययन करना तथा समस्याओं का समाधान करना

बाल विकास के लिए आवश्यक है कि एक शिक्षक को बच्चे के बारे में संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए इसी के आधार पर शिक्षा बालक को शिक्षक प्रदान कर सकता है बच्चे के लिए क्या करना चाहिए क्या पढ़ाना है तथा किस प्रक्रिया का उपयोग करना है जिससे बच्चे की कमियों का पता लगाकर उन कमियों का निदान कर सके शिक्षक के लिए आवश्यक होता है कि वह बाला की जिम्मेदारी तथा विकास की क्रियाओं को समझने बाला को उचित ढंग से शिक्षित कर पाएं

⭐ प्रत्येक बालक एक समान नहीं होता है हर बाला की अपनी एक विशेषता होती है इन विभिन्नताओं को समझते हुए बालक का उचित विकास करना तथा शिक्षण प्रक्रिया आरंभ करनी होगी

🍁 बालकों के विभिन्नताओं के आधार पर

🎯 सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं

🎯आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं

🎯सांस्कृतिक आधार पर विभिन्नताएं

🎯आयु वर्ग के आधार पर विभिन्नताएं

🎯निवास स्थान के आधार पर विभिन्नताएं

ऐसा भी विभिन्न नेताओं के आधार को ध्यान में रखकर ही शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया करनी होगी एवं शिक्षक को बाल को शिक्षित करने के लिए इन सभी विभिन्नताओं को जानना होगा

🌈शिक्षक की बालकों के प्रति जिम्मेदारी:-

⭐ बालक की योग्यता को ध्यान में रखें

⭐ बालक की कमियों व समस्याओं को ध्यान में रखें

⭐ बाला की क्षमताओं को ध्यान में रखें

⭐ बालक की विशेषताओं को ध्यान में रखें

इन सभी को ध्यान में रखकर ही शिक्षक को बालक को शिक्षित करना होगा

🍁 अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों मैं वांछनीय परिवर्तन लाएं ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें इसके लिए उस बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है
जब बालक अपने दायित्व कर्तव्य कुछ समझ जाएगा तो वह एक अच्छा नागरिक होने की जिम्मेदारी निभा पाएगा जो कि प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है अतः इन सभी के लिए आवश्यक है कि बच्चों को शिक्षित करना होगा

🎯 औपचारिक शिक्षा
औपचारिक शिक्षा से आशय है इसमें नियम कानून के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती है इसे हम औपचारिक शिक्षा कहते हैं जैसे विद्यालय की शिक्षा कोचिंग ओं की शिक्षा इत्यादि

🎯 अनौपचारिक शिक्षा
अनौपचारिक शिक्षा से आता है जिसमें किसी भी प्रकार के नियम कानून नहीं होता है यह दैनिक कार्यों की शिक्षा कहते हैं जैसे घर की शिक्षा खेल के मैदान इत्यादि

” जैसे रास्ते में जाते समय किसी ने रास्ता बताया या अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत आता है”

⭐ बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षा को सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलू को समझना अनिवार्य है सही दिशा सही निर्देश उपयुक्त शिक्षा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर पाए

⭐ बालक के विकास की प्रक्रिया मां के गर्भ से लेकर मृत्यु तक चलती है इसने बालक के बाद वह विभिन्न अवस्था में गुजरते हुए चला जाता है या चलता रहता है

🍁 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पूरक होते हैं

🍁 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय होते हैं

🍁 वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर होते हैं

🍁 वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित होते हैं

🎯 वृद्धि:-
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि की परिभाषा दी है जोकि निम्नलिखित है

⭐ सोरेन्सन के अनुसार:-

अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर का वह अंग के भार और आकार के लिए किया जाता है

⭐ फ्रेंक के अनुसार:-
अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होती है शरीर व व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं

⭐ हरलॉक के अनुसार:–
विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यता प्रकट होती है

✍🏻✍🏻✍🏻Menka patel ✍🏻✍🏻✍🏻

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🔆 बाल विकास एवम् शिक्षा शास्त्र

बाल विकास एवम् शिक्षा शास्त्र को हमे तीन रूप में जानना है।

🔅 बाल विकास – बच्चो को शिक्षा देने के लिए हमे बच्चो को जानना व समझना होगा कि बच्चों को किस तरह से पढ़ाया जाए। और इसके लिए बाल विकास का अध्ययन करना आवश्यक है।

🔅 समावेशी शिक्षा की अवधारणा एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की समझ

  • बालक को शिक्षित करने के लिए बालक को जो भी परेशानी है या जो भी समस्या है या जो भी उसे जरूरत है उसके बारे में भी हमें जानना आवश्यक है, जिसे हम समावेशी शिक्षा की अवधारणा एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की समझ से जान सकते हैं।

🔅 अधिगम और शिक्षाशास्त्र
जब हम बच्चे को जानकर और उसकी परेशानियों या समस्या को जानकर यह समझ जाते हैं कि बच्चे को हमें किस तरीके से पढ़ाना है या कैसे पढ़ाना है।

यदि शिक्षक को छात्र के बारे में जानकारी होगी तो शिक्षक को यह आसानी से मालूम चल जाएगा कि बच्चो को कैसे पढ़ाया जाना चाहिए। इसी कारण से शिक्षक को बच्चों के बारे में जानना और समझना अति आवश्यक है।

▪️ जो भी बच्चे होते हैं उनमें कई रूपों में भिन्नताएं पाई जाती हैं।
जैसे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आयु समूह
हर बच्चे की इन अलग-अलग भी भिन्नताएं के साथ साथ अलग-अलग विशेषताएं, योग्यताएं,समस्याएं और क्षमता भी होती हैं।
एक शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वह बच्चे की इन सभी भिन्नताओ के साथ ही या इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए शिक्षक अध्यापन कार्य करें।

▪️अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लेकर आए ताकि वह बच्चा एक अच्छा नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके और राष्ट्र के हित में अपना योगदान दे सकें।

▪️ शिक्षक को इन सब के लिए बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक है।
बच्चों को शिक्षित करने के लिए या किसी भी विषय या किसी वस्तु के बारे में शिक्षित करने के लिए शिक्षा को देना है यह शिक्षा “अनौपचारिक और औपचारिक” या किसी भी रूप में या किसी भी तरीके से दी जा सकती है।

• “औपचारिक शिक्षा”- जिसमें निर्धारित नियम व समय के साथ शिक्षा दी जाती है।
• “अनौपचारिक शिक्षा”- वह शिक्षा जो औपचारिक नहीं है या जो चीज हम नहीं जानते हैं यदि वह चीज हमें कहीं भी किसी भी माध्यम से या किसी भी रूप में जानते व सीखते हैं तो वह अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है ।

💠 बच्चों में शिक्षा का विकास करने हेतु –
शिक्षक को बच्चे में शिक्षा का विकास करने के लिए सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है।
क्योंकि इन्हीं के द्वारा ही जानकर शिक्षक बच्चे को “सही दिशा निर्देशन” व “उपयुक्त शिक्षा” देकर बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर पाएंगे।
▪️और बच्चे की जो विकास की प्रक्रिया है वह जन्म के पूर्व से ही मां के गर्भ से प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए चलता रहता है।

▪️ वृद्धि और विकास दोनों एक दूसरे के पर्याय या एक दूसरे पर आधारित या एक दूसरे से संबंधित या एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।दोनों का ही अपना अपना योगदान है दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
जैसे यदि हमारे हाथ में (शारीरिक) चोट लगे तो हम मानसिक रूप से भी शिथिल हो जाते हैं।

कई मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि के बारे में अपने मत प्रस्तुत किए।

🌀 सोरेनसन के अनुसार
अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।

🌀 फ्रैंक के अनुसार
अभिवृद्धि का प्रयोग कोशिय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है और शरीर व व्यवहार में से पहले जिसमे जो भी परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।

(हमारी उम्र के हिसाब से हमारे शरीर में कई परिवर्तन या कई व्यवहारिक परिवर्तन या इन सभी के कारण सामान्य व्यवहार में जो भी परिवर्तन किसी न किसी रूप में दिखते है वह अभिवृद्धि कहलाती है।
वृद्धि शारीरिक परिवर्तन है विकास परिपक्वता की तरफ धीरे धीरे बढ़ता है यह निश्चित परिवर्तन होता है जो निरंतर चलता रहता है।)

🌀 हरलॉक के अनुसार
विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है ,अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम और विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नवीन विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती हैं।
(हमारा विकास हमारे प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य पर या हम कैसा जीवन यापन करना या जीना चाहते हैं उसका जो लक्ष्य है, उसे पाने के लिए जो भी हम करते हैं,तो उसके परिणाम स्वरूप जो भी परिवर्तन होता है वही विकास कहलाता है।)
✍🏻
Notes By-Vaishali Mishra

🚣‍♀️🚣‍♀️बाल विकास 🚣‍♀️🚣‍♀️

बाल विकास का अर्थ है जो बालकों के व्यवहार का अध्ययन गर्भावस्था से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है परन्तु इसे वर्तमान समय में बाल विकास में परिवर्तित कर दिया गया यह बालक की क्षमताओं का अध्ययन करता है बाल विकास के अन्तर्गत बालकों के विभिन्न शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का मापन व मूल्यांकन किया जाता है
बालक के विकास के लिए शिक्षक को चाहिए कि बालक को क्या पढ़ाना है , कैसे पढ़ाना है और उसकी कमियों का पता लगाए तभी शिक्षक बालक की परेशानी को दूर कर पायेंगे और उचित ढंग से शिक्षित कर पायेगें |

👉सभी बालक समान नहीं होते हैं ये भिन्न – भिन्न प्रकार के होते हैं और सारे बालकों को ध्यान में रखकर ही शिक्षण प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए |

🌈बालकों में भिन्नता के आधार :-
🌷आर्थिक
🌷सामाजिक
🌷सांस्कृतिक
🌷आयु समूह
🌷निवास स्थान

इनके आधार पर कई विभिन्नताएं पायी जाती है इन सब को ध्यान में रखकर ही ही शिक्षक को शिक्षण कार्य प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए बालकों को अच्छी शिक्षा देने के लिए इन सभी विभिन्नताओं को जानना शिक्षक के लिए आवश्यक है

🌈शिक्षक की जिम्मेदारीयां :-
👉बालकों की विशेषता को ध्यान में रखना|
👉उनकी योग्यताओं को ध्यान में रखना |
👉बालकों कि समस्याओं को ध्यान में रखना
👉बालक कि क्षमताओं को ध्यान में रखना

इन सभी जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर एक शिक्षक बच्चों को पूर्णरूप से शिक्षित कर पायेंगे |

🌺अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाए ताकि वे-
👉अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके |
👉राष्ट्र कि सेवा करे और राष्ट्र के विकास व उन्नति में अपना पूर्णरुप से योगदान दे सके |
👉इसके लिए बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक है |

अत: इन सभी के लिए बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक है चाहे वह औपचारिक हो या अनौपचारिक हो उसका मुख्य उद्देश्य बालक की विकास से होना चाहिए जो दोनों तरीको की शिक्षा से होती है |

🌹औपचारिक शिक्षा :- यह शिक्षा एक नियोजित ढ़ग से दी जाने वाली शिक्षा है जिसे पूरे कठिन परिश्रम के साथ उद्देश्यपूर्ण तरीके से दी जाती है यह शिक्षा कही भी , कभी भी किसी के द्वारा नहीं दी जा सकती है इसके लिए नियम बनाएं जाते हैं
जैसे- विद्यालय, कोचिंग सस्थांन , इत्यादि |

🌹अनौपचारिक शिक्षा :- इसमें नियम व योजना नहीं होती है इसमें बच्चा स्वतंत्रत रूप से सकता है इसमें कुछ भी निश्चित नहीं होता है पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ, शिक्षा का उद्देश्य ईत्यादि |

🌞बच्चे में शिक्षा का विकास करे तो विकास करने के लिए एक शिक्षक का सबसे पहले बच्चे के वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है
जैसे-
🌷सही दिशा निर्देश देना ताकि बालक का सर्वांगीण विकास हो|
🌷ताकि इन्हें पूर्ण शिक्षा मिले |

🌈वृद्धि :–
बच्चे के विकास कि प्रक्रिया जन्म से पूर्व माँ के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरती चली जाती है
वृद्धि और विकास के एक – दूसरे के पूरक है तथा एक- दूसरे पर निर्भर होते हैं |
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निम्नलिखित परिभाषा है-
🎄सोरेन्सन के अनुसार :- अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगो के भार , आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है |

🎄फ्रैंक के अनुसार :- अभिवृद्धि का प्रयोग कोशिका वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है शरीर और व्यवहार में से पहले जिसमें जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं |

🎄हरलॉक के अनुसार :- विकास , अभिवृद्धि की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं रहती है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य कि ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है |

🌷🌷 Thank you 🌷🌷

🌹Meenu Chaudhary🌹

💫 बाल विकास💫

बाल विकास का अर्थ है बालक का संपूर्ण विकास। मानव विकास जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। बाल विकास माता के गर्भ से शुरू हो जाता है तथा जीवन पर्यंत चलता रहता है। मानव का विकास किसी ना किसी रूप में हर दिन हर पल होता रहता है

बाल विकास के लिए आवश्यक है कि एक शिक्षक को बच्चे के बारे में संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए इसी के आधार पर शिक्षक बालक को शिक्षा प्रदान कर सकते हैं बच्चे के लिए क्या करना चाहिए क्या पढ़ाना है तथा किस शिक्षण विधि या प्रक्रिया का उपयोग करना है जिससे बच्चे की कमियों का पता लगाकर उन कमियों का निदान कर सके शिक्षक के लिए आवश्यक होता है कि वह बालक की जिम्मेदारी तथा विकास की क्रियाओं को समझे और उनके विचार को समझ के उनका सही ढंग से शिक्षण कर सके।

🔅 प्रत्येक बालक एक समान नहीं होता है हर बालक की अपनी एक विशेषता होती है इन विशेषताओं को समझते हुए बालक का उचित विकास करना तथा शिक्षण प्रक्रिया प्रारंभ करना होगा

💫बालकों के विभिन्नताओं के आधार पर

🔅 सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं

🔅आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं

🔅सांस्कृतिक आधार पर विभिन्नताएं

🔅आयु वर्ग के आधार पर विभिन्नताएं

🔆निवास स्थान के आधार पर विभिन्नताएं

ऐसा भी विभिन्नताओं के आधार को ध्यान में रखकर ही शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया करनी होगी एवं शिक्षक को बालक को शिक्षित करने के लिए इन सभी विभिन्नताओं की जानकारी रखना आवश्यक है यदि शिक्षक इन सभी विभिन्न नेताओं की जानकारी रखता है तो वह बाल विकास को आसानी से समझ सकता है और विभिन्न बालकों के बीच आने वाली विभिन्न समस्याओं को वह आसानी से हल कर सकता है।

🔆शिक्षक की बालकों के प्रति जिम्मेदारी:-

1️⃣ बालक की योग्यता को ध्यान में रखें

2️⃣बालक की कमियों व समस्याओं को ध्यान में रखें

3️⃣बाला की क्षमताओं को ध्यान में रखें।

4️⃣ बालक की विशेषताओं को ध्यान
में रखे

5️⃣ बालक के व्यवहार को ध्यान में रखें।

6️⃣बालक की सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखें।
इन सभी को ध्यान में रखकर ही शिक्षक को बालक को शिक्षित करना होगा

🔅 अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाएं ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें इसके लिए उस बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है।
जब बालक अपने दायित्व कर्तव्य कुछ समझ जाएगा तो वह एक अच्छा नागरिक होने की जिम्मेदारी निभा पाएगा जो कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक हैं। हमें एक सुदृढ़ भारत तैयार करने के लिए बालक में वांछनी परिवर्तन करना आवश्यक है।

🌱 औपचारिक शिक्षा
औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है इसमें नियम कानून के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती है इसे हम औपचारिक शिक्षा कहते हैं जैसे विद्यालय की शिक्षा की शिक्षा।
🌱अनौपचारिक शिक्षा
अनौपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है जिसमें किसी भी प्रकार के नियम कानून नहीं होता है बालक किसी भी प्रकार से नियमों से बंधा हुआ नहीं होता है इसमें बालक सबसे पहली परिवार आस-पड़ोस से दैनिक कार्यों की शिक्षा लेते हैं जैसे घर की शिक्षा खेल के मैदान इत्यादि।

🔅बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलू को समझना अनिवार्य है सही दिशा सही निर्देश के द्वारा एक शिक्षक बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकता है।

🔅 बालक के विकास की प्रक्रिया मां के गर्भ से लेकर मृत्यु तक चलती है इसके बाद बालक विभिन्न अवस्था से गुजरता जाता है।

💫 वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।

💫 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय होते हैं

💫वृद्धि और विकास एक दूसरे पर पूरक होते हैं।

💫 वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित होते हैं

🔅 वृद्धि:-
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि की परिभाषा दी है जो निम्नलिखित है

🔆 सोरेन्सन के अनुसार:-

अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर के अंगो और उनके भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।

🔅 फ्रेंक के अनुसार:-
अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होती है
शरीर व व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।

🔅हरलॉक के अनुसार:–
विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यता प्रकट होती है

✍🏻✍🏻 Notes by Raziya khan✍🏻✍🏻

🌸 बाल विकास🌸
बाल विकास से तात्पर्य बालक के जन्म से लेकर मृत्यु तक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया से है बाल विकास में बालक के व्यक्तित्व के समस्त पहलुओं शारीरिक सामाजिक संवेगिक मानसिक इन सबका विस्तृतअध्ययन ही बाल विकास है ।
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🌺 बाल विकास में अत्यंत आवश्यक है कि शिक्षकों को बालक के हर पहलुओं का ज्ञान होना चाहिए अर्थात बच्चों को क्या समस्या है उसका निराकरण कैसे करना चाहिए क्या बालक के लिए उपयुक्त है और क्या अनुपयुक्त है उन बच्चों को कैसे पढ़ाया जाना चाहिए जिससे वह आसानी पूर्वक और जल्दी सीख सकें इन सब का ज्ञान एक शिक्षक को होना अत्यंत आवश्यक है।

🌺प्रत्येक बालक अपने आप में एक विशिष्ट बालक होता है बालक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उनके शिक्षण कार्य की प्रक्रिया को संपन्न कराना चाहिए बच्चे में अनेक विभिन्नता होती हैं उन सभी विभिन्नताओ का आधार निम्नानुसार हो सकता है
✍️ सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं,
✍️ आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं,
✍️ सांस्कृतिक आधार पर विभिन्न बताएं,
✍️ आयु समूह से संबंधित भिन्नता
इत्यादि विभिन्नताओ को ध्यान में रखकर बालक के शिक्षण कार्य को संपूर्णता की ओर ले जाना चाहिए
✍️ शिक्षक की बालकों के प्रति जिम्मेदारी:-
🍁 बालक की विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य
🍁 बालक की योग्यताओं को ध्यान में रखना
🍁 बालक की कमियों व समस्याओं को ध्यान में रखना
🍁 बालक में विद्यमान क्षमता को ध्यान में रखकर
इन सभी विशेषताओं को ध्यान में रखकर बालक का अध्यापन कार्य किया जाना चाहिए अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चे में वांछनीय परिवर्तन लेकर आएं ताकि वे 🌺एक अच्छे नागरिक बन सके और अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके
🌸 राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें इसके लिए बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक हैअगर बालक शिक्षित होगा तो वह अपने कर्तव्य को समझेगा और उन कर्तव्यों का पालन दृढ़ता पूर्वक करेगा शिक्षा ही भावी जीवन की आधारशिला है अर्थात प्रत्येक बच्चे का शिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है इस भाव से शिक्षक का शिक्षण कार्य बच्चे को एक जिम्मेदार नागरिक बनाएगा जो राष्ट्र को उन्नत करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
🌟 बाल विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका🌟
शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए कि बालक समाज में प्रगति करें बालक का संपूर्ण विकास हो वह शिक्षा के माध्यम से नित नए रचनात्मक कार्य कर सकें शिक्षा का माध्यम औपचारिक या अनौपचारिक कुछ भी हो सकता है महत्वपूर्ण यह है कि बालक की प्रगति हो।

🍀1- औपचारिक शिक्षा: निश्चित नियम कानून को ध्यान में रखकर बालक को प्रदान की गई शिक्षा जिसका स्वरूप अनुशासित और व्यवस्थित होता है जिस के नियम सर्व मान्य और सर्व व्यापक है औपचारिक शिक्षा कहलाएगा। जैसे-स्कूल ,कोचिंग संस्थान , अन्य शैक्षणिक संस्थाएं।

🍀2- अनौपचारिक शिक्षा: ऐसी शिक्षा जिसके लिए निश्चित नियम कानूनों की आवश्यकता नहीं होती है किसी भी माध्यम से प्रदान की गई शिक्षा
जैसे- परिवार समाज घर खेल का मैदान इत्यादि।
🍁 बच्चों में शिक्षा का संपूर्ण विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अत्यंत अनिवार्य है तभी शिक्षक
सही निर्देशन और उपयुक्त शिक्षा के माध्यम से बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर पाएंगे।

🍁बाल विकास🍁

✍️ बच्चे के विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व से ही मां के गर्भ से प्रारंभ हो जाती है।
🍁विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है यह जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरती चली जाती है।
🍁 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय हैं।
🍁वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित है यह दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर है।

🍀 वृद्धि🍀
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि के संबंध में निम्न परिभाषाएं प्रस्तुत की है-
🍁🌟 सोरेन्सन के अनुसार:-
अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।
🍁🌟 फ्रंक के अनुसार:-
अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।
🍁🌟 हरलॉक के अनुसार:-विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है।
विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यता प्रकट होती है। 🌟 धन्यवाद🌟

Notes by – Abhilasha pandey

👦 BAL VIKAS 👧 🔰 Parichaye 🔰 Bal Vikas ke antargat Ham sikhate Hain Ki Balak ko kaise padhana hai, Balak ko kya padhana hai uski kamjoriyan Ka Pata Laga Kar balak ko kaise Shiksha deni hai.

🔸️ Ek Shikshak ko chahie ki vah Balak ko uske Samajik,sanskritik, Arthik, aur uski ayou ko dhyan me rakhar use Shiksha de.
➡️ Shikshak ki jimmedari
➖Pirtyek balak ki chamta,visheshta yogyata aur samasya bhinn bhinn hoti hai. Islie Shikshak ko chahie ki vah Shikshan prakriya ke dauran Balak ki chamta visheshta, yogyata aur samasya ke anusar hi use Dhyan Mein rakhte Hue Shiksha De jisse Shikshan pirkriya bhalibhati ho sake.
➖ Balak ke sarvangin Vikas ke liye ek Adhyapak ka yah Daitua hai ki wo bachon Mein Aise vanchaniye Parivartan laya taki bache achche Nagrik ki jimmedari Nibha sake aur Rashtra ke Vikas Mein Apna yogdan bhalibhati De sake.iske lie use bacho ko sikchit krne ki avsyakta hai.
🖊Sikcha🖊
➖Aupcharik sikcha
➖Anaupcharik sikcha
✔Aupcharik Sikcha- Kisi Vidyalay yah Sansthan ke madhyem ke dwara Niyamit roop se di jane wali Shiksha aupcharik shiksha ke antargat aati hai.
✔Anaupcharik sikcha
– anopcharik Shiksha Ke Liye hume Kisi VishesMadhyam ki jarurat Nahin Hoti yah Ham Kisi bhi isthan per Kahin bhi kisi bhi madhyam ke duara kisiJagah se grahan kar sakte hain.iske lie hume kisi vises madhyem ki jarrort nahi hoti.
🔰 Virdhi or vikas 🔰
✔Virdhi matratmak ya parinatmak hoti hai. Virdhi se tatparye balak ke saririk badlav se hai.jaise balak ki lambai, bajan sarirk kad etc.
✔Vikas ka arth vyapak hota hai ye niranter chalne wali pirkriya hai. Vikas se tatparye Balak ki gunatmak chamta ka tatprye saririk,mansik or vivharik guno se hai.
Bacho Mein Shiksha ka Vikas karne ke liye ek Shikshak ko sabse pahle Ek bacche ki vridhi aur Vikas ke sabhi pahlon ko samajhna Aasan Hai Tabhi vo bacche ki Sahi Disha nirdeshan or opyukt Shiksha De Payega.
Agr ek sichak Balak ka sarvangin Vikas Chahta Hai to use balak ke virdhi aur Vikas donon pahlu Ko samajhna Hoga.
✔ bacche ke Vikas ki prakriya Janm ke purv maa ke garbh Se hi prarambh Ho Jaati Hai Aur Janm ke bad vibhinn avastha se Gujarte Hue Chalti Hai.
✔ vriddhi Aur Vikas Ek dusre Ke paryae Hain or ek dusre se sammandhit hai aur ek dusre pr nirbhar hai.
✔ sorsen ke anusar➖ sorsen ne vriddhi Shabd ka prayog Sharir or Uske angon ke bhar aur Aakar Mein vriddhi ke liye Kiya hai.
✔ Frank Ke anusar➖ abhvirdhi ka prayog koskiye ki vriddhi ke arth Mein prayog Hota Hai ➖Sarir or vyavhar Mein jismein pahle Parivartan hota hai use hi virdhi ya abhivirdhi Kahate Hain.
✔Harlok ke anusar➖ Vikas ki Seema abhividhi Tak simit Nahin balki pronavastha Ki Lakshya ki aur Parivartan ka pragatisheel Kadam Niharth rahata Hai.Vikas ki Pranam Suaroop vyakti Mein Anek visheshtaen or yogtaye prakat hoti hain.
🖊Krishna gangwar

🌻🌱बाल विकास और शिक्षण शास्त्र 🌻🌱

बाल विकास जन्म से लेकर जीवन पर्यतन चलती रहती हैं बाल विकास में बच्चे को क्या पढाना है कैसे पढाना है उनकी परेशानी को जानना है ताकि उन्की समसयाओ का समाघान कर सके।

ः हर एक बच्चे के वयक्तितव को घ्यान में रखते हुए शिक्षा देनी चाहिए।
🌴प्रत्येक बालक का वयक्तिव समान नहीं रहता है जो कि निम्नलिखित है
🌿सामाजिक आघार पर विभिन्नताएं
🌿आथिंक आघार पर विभिन्नताएं
🌿सांस्कृतिक आघार पर विभिन्नताएं
🌿आयु समुह के आघार पर विभिन्नताएं
🌴निवास के स्थान पर विभिन्नताएं
हर एक बालक विशेष माना जाता है
🌻🌱शिक्षको की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है जो निम्नलिखित हैं।
🌴बालक की विशेषताएँ को घ्यान में रखकर।
🌴बालक की योगयताओं को घ्यान में रखकर।
🌴बालक की समस्याओं को घ्यान में रखकर ।
बालक की क्षमता को घ्यान में रखकर।
🌸🌻इन सभी को घ्यान मे रखकर अध्यापन करे।
🌸अध्यापक का दायित्व है कि वह बच्चे में वांछनीय परिवर्तन लाए ताकि वो एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सके। इनके लिए बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है।
📝🌻शिक्षा औपचारिक और अनौपचारिक दोनों होता है।
🌸औपचारिक और अनौपचारिक दोनों बच्चे के प्रगति को अग्रसर करती हैं
🌸औपचारिक शिक्षा स्कूल में मिलती है जैसे समय से स्कूल जाना, पुरे Dress मे जाना, समय से छुट्टी होगी।
🌸अनौपचारिक शिक्षा में कोइ समय सारणी नही होती हैं।
ः अनौपचारिक शिक्षा उसे कहते है जो हमे घर पे मिलती है।
🌸ः बच्चो मे शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक सबसे पहले बच्चो के बुद्धि और विकास के सभी पहलु को समझना अनिवार्य है।
🌸बच्चो को सही दिशा निदेर्शन देना चाहिए।
ः उपयुक्त शिक्षा देना
ःवयक्तिव का सर्वागुण विकास के लिए तैयार करना।
🌻विकास 🌻
ः🌴 बच्चे के विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व मां के गर्भ से प्रारम्भ होता है और जन्म के बाद विभिन्न अवसथाओ से गुजरते हुए चलता है।
🌴विकास एक गुणात्मक प्रक्रिया है।
🌴विकास को मापा नही जाता है।
विकास जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।
🌸वृद्धि 🌸
🌴वृद्धि एक निश्चित समय पे आकर रूक जाती हैं ।
🌴वृद्धि एक मात्रात्मक प्रक्रिया है।
🌴वृद्धि को माप तोल सकते हैं।
🌴वृद्धि विकास का ही भाग है।

🌻🌴वृद्धि और विकास की महत्वपूर्ण बाते निम्नलिखित हैं :-
🌴वृद्धि और विकास एक दूसरे के पूरक हैं।
🌴वृद्धि और विकास दोनों अंतः संबंघित है।
🌴वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं।

🌻सोरेन्स के अनुसार 🌻
🌴अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगो के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।
🌻फ्रेक के अनुसार 🌻
🌴अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
शरीर और व्यवहार में से पहले जिसमे जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते है।
🌻हरलाँक के अनुसार 🌻
🌴विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रोढावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील है।
विकास के परिणाम स्वरूप वयक्ति में अनेक नई विशेषताएँ और योग्यता प्रकट होती हैं।

Notes By :-Neha Roy

👨‍👩‍👧 बाल विकास (Child Development)👨‍👩‍👧

☃️ बाल विकास का अर्थ(Meaning of child Development):➖

🌸किसी बालक के विकास से आशय गर्भाधान
( गर्भ में आने से पहले) से लेकर मरणोपरांत तक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है यह विकास की प्रक्रिया लगातार चलती रहती हैं इसी के फलस्वरूप बालक विकास के विभिन्न अवस्थाओं से गुजरता है।
जिसके अंदर बालक की शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक विकास होती हैं।

🌻एक शिक्षक को बाल विकास की संपूर्ण जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है इसी के आधार पर बालकों की विभिन्न गतिविधियों।
दूसरे शब्दों में ,
बालक के लिए क्या अच्छा है ,क्या बुरा है उन्हें किस वातावरण में कैसी शिक्षा दे और यह भी जानने की कोशिश करना होगा कि कैसे बढ़ाना है क्या पढ़ाना है अर्थात् उसे किताबी ज्ञान की कितनी जानकारी है इसलिए हमें पहले उसको जानना होगा जिसे पढ़ाना है जब जानेंगे कि उसे क्या पढ़ाना है तभी हम उस बच्चे की बातों को आसानी से समझ सकेंगे लेकिन उस बच्चे को पढ़ाई में कुछ ना कुछ परेशानी भी होगी एक शिक्षक होने के नाते हमें उन परेशानियों को समझकर कर उनका समाधान निकालना होगा जिससे बच्चे आसानी से खुद को शिक्षक के साथ ढाल सकें और बेझिझक अपनी अपनी परेशानियों को सामने रख सकें।

सभी बच्चे के अंदर कुछ ना कुछ भी भिन्नताएं होती है➖
🌳सामाजिक भिन्नताएं :-
सभी बच्चे अलग-अलग समुदाय से संबंधित रखते हैं जिसके अंदर सभी तरह के बच्चे रहते हैं और सभी बच्चों को शिक्षित करना उनकी हर एक गतिविधियों की पूरी जानकारी होना शिक्षक का परम कर्तव्य है।

🌳आर्थिक स्थिति:-
ऐसे बालकों के बीच अनेक प्रकार के परिवार के बालक रहते हैं अर्थात् सभी बालकों की परिवार की आर्थिक स्थिति एक समान नहीं रहती।
जैसे ➖अमीर ,गरीब, मध्यम वर्ग के परिवार।

🌳सांस्कृतिक:-
कोई भी बालक एक तरह की संस्कृति से नहीं रहते हैं सभी अलग-अलग धर्म ,संस्कृति को अपनाते हैं।

🌳आयु समूह:-
सभी बच्चों की आयु समूह भी अलग होती है बच्चे जिस आयु के रहते हैं वह उसी प्रकार के समूह में रहना पसंद करते हैं इन सारी गतिविधियों को ध्यान में रखकर एक शिक्षक को बालकों को शिक्षित करना चाहिए। 🌳🌸बालकों की विशेषताएं🌸🌳

🌤️ हर बच्चे में अपनी अलग अलग विशेषताएं योग्यताएं ,क्षमता और समस्या होती हैं एक शिक्षक होने के नाते यह जिम्मेदारी होती है जितने भी तरह के बच्चे हैं उनकी सारी समस्याएं ,विशेषताएं , योग्यता और क्षमता को ध्यान में रखकर उनके अनुसार ही बच्चों को शिक्षा देनी होगी।
अर्थात् बाल विकास को समझना अत्यंत आवश्यक है इसके अंतर्गत :➖
🌿बच्चों के व्यवहार को जानते हैं।
🌿कैसे समझता हैं ।
🌿उन्हें कैसे पढ़ाएं ।
🌿व्यक्तिगत विभिन्नता ।
🌿सही समय पर सही तरह के विकास हो।
🌿सही शिक्षा दी जा सके।
इन सारी गतिविधियों को जानना एक शिक्षक का परम कर्तव्य है।

🍁 इसके अंतर्गत अध्यापक का यह दायित्व होता है कि वह बच्चों में ” वांछनीय परिवर्तन लाएं” ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके और राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं।
इसके लिए उस बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है।

💧अगर बच्चा अपने कर्त्तव्यों, परिवार ,समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझेगा और उन सारी जिम्मेदारियों को हल करने में सक्षम होगा तभी वह एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर सकेगा।

🔅 शिक्षा के दो प्रकार है:-

🌀औपचारिक शिक्षा:-
इसके अंतर्गत बच्चे को एक सुव्यवस्थित तरीके से शिक्षा दी जाती है।
जैसे :-विद्यालय ,शिक्षण केंद्र।

🌀अनौपचारिक शिक्षा :-
इसके अंतर्गत बच्चों को दिशानिर्देशों के आधार पर शिक्षा देना अनिवार्य नहीं है बच्चे किसी भी रूप में किसी भी तरह ज्ञान अर्जन कर लेते हैं।
जैसे➖ समाज ,आस-पड़ोस, रेडियो , टेलीविजन खेल का मैदान। दूसरे शब्दों में, शिक्षा औपचारिक हो या अनौपचारिक उससे फर्क नहीं पड़ता यह बच्चों को आगे की ओर अर्थात् प्रगति की ओर अग्रसर करती है। यही बहुत बड़ी बात है मतलब शिक्षित होने से हैं फिर वह शिक्षा प्रत्यक्ष (Direct) मिले या अप्रत्यक्ष (indirect) !

🌻🌻वृद्धि (अभिवृद्धि) और विकास (Growth and Development)➖

🎯 बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चों की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य हैं जिससे हम बच्चों को दिशा निर्देशन और उपयुक्त शिक्षा दे सकते हैं।

🎯बच्चों के विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए चले जाते ।

🎯वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय ( पर्याय अर्थात् हाथ में चोट लगती है तो मन भी प्रभावित होता है )दोनों एक दूसरे से संबंधित हैं ,निर्भर है, और दोनों का अपना अपना योगदान है।

🌪️ वृद्धि( अभिवृद्धि):-
🔅आकार में वृद्धि।
🔅शरीर में होने वाले परिवर्तन।
🔅निश्चित समय पर रुक जाना।
🔅वृद्धि विकास का ही हिस्सा है।
🔅मापा जा सकता है।
🔅मात्रात्मक होती है।
🔅वृद्धि में परिवर्तन दिखता है।

🌪️ विकास:-
विकास धीरे-धीरे परिपक्वता की तरफ बढ़ता है और निश्चित परिवर्तन होता है कहीं ना कहीं यह गर्भ से ही शुरू हो जाता है।
अर्थात विकास:-
🔅गुणात्मक होती है।
🔅निरंतर चलता है।
🔅मापा नहीं जा सकता।
🔅महसूस किया जा सकता है।
🔅वर्तुलाकार होता है ।

🎭 सोरेन्सन के अनुसार:-
“अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है”।

🎭 फ्रैंक के अनुसार:-
” अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग कोशिकीय वृद्धि के अर्थ में किया जाता है”।

🌀शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।

🔆शरीर के परिवर्तन में वृद्धि अर्थात् हमारे शरीर में जो दिखता है जो परिवर्तन होता है उसे व्यवहार कहते हैं।

🎭 हरलॉक के अनुसार :-
विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं होती बल्कि जो उम्र हमारा बढ़ता है अपितु प्रौढ़ावस्था कि लक्ष्य की ओर प्रगतिशील क्रम है।
अर्थात विकास गर्भ से मृत्यु तक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है इसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती है!🌪️🌪️Notes by➖Mahima kumari

👶 बाल विकास ( Child Devopment):–

बाल विकास का अर्थ–
बाल विकास का अर्थ “बालक के सर्वांगीण” से होता है , जो बालक के जन्म पूर्व या माँ के गर्भधारण से लेकर जीवन पर्यंत या मृत्यु पर्यंत तक चलने वाली प्रक्रिया “बाल विकास” कहलाती है।

🧑🏻‍🏫 एक अध्यापक को बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए बाल विकास का ज्ञान होना आवश्यक है। क्युकी एक शिक्षक के लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक हो जाता है , कि बालक को क्या पढ़ाना है, कैसे पढ़ाना है और क्यों पढ़ाना है और को इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए शिक्षक को बाल विकास के साथ-साथ शिक्षा शास्त्र का भी ज्ञान होना आवश्यक है।
इसलिए बाल विकास को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है–

◼️ १. बाल विकास– इसमें बालक को किस प्रकार से शिक्षा दी जाए कि बालक के सर्वांगीण विकास के लिए उचित हो जैसे बालक को क्या पढ़ाना है ,कैसे पढ़ाना है आदि के लिए शिक्षक को बाल विकास का अध्ययन करना आवश्यक है।

◼️ २. समावेशी शिक्षा– समावेशी शिक्षा के अंतर्गत शिक्षक को पहले यह जानना जरूरी है, कि किस प्रकार के बच्चो को
शिक्षा देनी है ,जिससे उनको उनके आवश्यकता अनुसार चाहे वो प्रतिभाशाली बालक , सामान्य बालक , विशिष बालक या शारीरिक/ मानसिक रूप से पिछड़े बालक की श्रेणी में आते हो।सभी को एक समान शिक्षा दी जा सके।

◼️ ३. अधिगम/शिक्षा शास्त्र– शिक्षा शास्त्र के द्वारा हम बच्चों की कमजोरियों , परेशानियों और समस्या को जानकर उनका समाधान या निवारण कर सकते हैं।

▪️ शिक्षक की जिम्मेदारी-

★जब एक अध्यापक बच्चों को पढ़ाता है तो बच्चों में व्यक्तिग रूप से उनमें कई विभिन्नताएं पाई जाती हैं जो अलग-अलग श्रेणी में आते हैं जैसे–सामाजिक , आर्थिक, सांस्कृतिक और आयु समूह इन सभी चीजों के साथ–साथ भिन्न-भिन्न विशेषताएं, योग्यताएं, समस्याएं और क्षमता से भी भिन्न होते हैं तथा इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए शिक्षक को शिक्षा देनी चाहिए।

★अध्यापक का यह दायित्व है, कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाएं ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी को निभा सके और राष्ट्र के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। इसके लिए बच्चों को शिक्षित करना आवश्यक है।

◼️ शिक्षा के प्रकार– शिक्षा के दो प्रकार हैं–

१. औपचारिक शिक्षा
२. अनौपचारिक शिक्षा

▪️ १. औपचारिक शिक्षा– औपचारिक शिक्षा में बच्चे को किसी निर्धारित समय में व नियमित विद्यालय से शिक्षा दी जाती है ।

▪️ २. अनौपचारिक शिक्षा– वह शिक्षा जो औपचारिक ना हो अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है। अनौपचारिक शिक्षा हमें किसी के भी द्वारा दी जा सकती है या ली जा सकती है ।

★“औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा दोनों रूप से बच्चे की प्रगति को अग्रसर करती है।”

◼️ बच्चे का शिक्षा में विकास करने हेतु– बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चे के “वृद्धि” और “विकास” के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है । जिससे बच्चे को –”सही दिशा निर्देशन”और “उपर्युक्त शिक्षा” दी जा सके और बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सके।

★बच्चे के विकास की जो प्रक्रिया है वह जन्म पूर्व मां के गर्भ में आने से प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरती रहती है।

★ “वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय हैं”

★“वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं”

★“वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित है”

◼️ अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग–

▪️ सोरेन्सन के अनुसार– “सामान्य रूप से अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर के अंग के भार या आकार में वृद्धि” के लिए किया जाता है।”

▪️ फ्रैंक के अनुसार– “ अभिवृद्धि का प्रयोग कोशिय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा शरीर और व्यवहार में सबसे पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।”

★विकास धीरे-धीरे परिपक्वता की ओर बढ़ता है तथा निश्चित परिवर्तन होते रहता है।

▪️ हरलॉक के अनुसार– “विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है, अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की और परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है।”

Notes by–Pooja

Nots by – Shubha dwivedi
🌺 बाल विकास 🌺
बाल विकास से आशय है कि बालक का विकाश किस दिशा में किस ओर हो यह हमें बलविकास से पता चलता है इसमें बालक को क्या पढ़ाना है , क्या सिखाना है , किस स्तर पर पढ़ाना है , कैसे पढ़ाना है इन सब बातो को जानकारी मिलती है। यह जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है।
बालविकास में यह जरूरी है कि शिक्षक बच्चो के समस्याओें को समझ कर उनका निराकरण करे । बालको की विभिन्नताओं को समझ कर उनको शिक्षा प्रदान करे बालक की विभिन्नता निम्न प्रकार की है –
🩸 सामाजिक आधार पर विभिन्नताएं
🩸 मानसिक आधार पर विभिन्नताएं
🩸 आर्थिक आधार पर विभिन्नताएं
🩸आयु से सम्बंधित विभिन्नताएं
इन सभी विभिन्नताओं को ध्यान में रख कर शिक्षक को शिक्षा देनी चाहिए
🌺 शिक्षक की बालको की प्रति जिम्मेदारियां –
🩸बालको की योग्यताओं को ध्यान में रख कर कार्य करना ।
🩸 बालक की विशेषताओं को ध्यान में रखना
🩸 बालक की छमता को ध्यान में रखना
🩸 बालक की समस्यायों को ध्यान में रखना
इन सभी बातो को ध्यान में रख कर ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे बालक में संपूर्ण विकाश हो सके और एक सफल नागरिक बनाया जा सके ।
🌺 राष्ट्र के विकाश में योगदान – 🌺
बालको को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे वह सही गलत को समझ सके को राष्ट्र हित के लिए कार्यों का प्रयास करे ।
🌺 शिक्षा के दो प्रकार है🌺
🩸औपचारिक –
ऐसी शिक्षा जो हमें विभिन्न नियमो ओर सुव्यवस्थित तरीके से मिलती है। जैसे स्कूल , आफिस में समय ओर नियमित जाना आदि ।
🩸 अनौपचरिक – ऐसी शिक्षा जो हमें शैशवास्था में दी जाती है जैसे – सही से बोलना , कपड़े ठीक से पहनना , बड़ों से आदर से बात करना , शौच आदि की क्रिया को सिखाना ।
🌺 विकास 🌺
यह प्रक्रिया गर्भ से जीवन पर्यन्त चलती रहती है इसी में वृद्धि भी सम्मिलित है ।इसे ना तो मापा का सकता ना ही देखा जा सकता है बस महसूस किया जा सकता है इसलिए इसे गुणात्मक क्रिया कहा जाता है ।यह विभिन्न जीवन काल में समान रूप से नहीं चलती है । कभी तेज कभी धीमी प्रक्रिया होती है ।
🌺 वृद्धि🌺
यह प्रक्रिया निश्चित समय तक होती है। इसे मापा जा सकता है और देखा भी का सकता है इसलिए इसे मात्रात्मक प्रक्रिया कहते है जैसे शरीर में वृद्धि
, वजन बढ़ना , आदि
🌺 कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा वृद्धि और विकास के बारे में दिए गए कथन 🌺
👉 सोरेंसन “- अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर में वृद्धि तथा उसके अंगों के भर , आकर के लिए किया जाता है”👈

👉फ्रैंक – ” अभिवृद्धि का प्रयोग कोशिय वृद्धि के लिए प्रयोग होता है तथा शरीर और व्यवहार जिसमें पहले परिवर्तन होता है उसे अभी वृद्धि कहते हैं 👈

हरलॉक -” विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं अपितु यह प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है । 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🌷🌷 बाल विकास 🌷🌷

🌷 Child Development 🌷

बाल विकास = एक बालक का विकास
बाल विकास में बच्चे का सर्वांगीण विकास माँ के गर्भ से ही शुरू होकर जीवन पर्यन्त चलता है।

प्रत्येक छात्र एक समान नहीं होते हैं , अर्थात प्रत्येक बालक में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, अलग अलग आयु वर्ग एवं स्थान , परिवेश आदि में अलग- अलग प्रकार की भिन्नताएं पायी जातीं हैं , तथा प्रत्येक बालक की समस्या, क्षमता, योग्यताएं , विशेतायें आदि में भी अन्तर पाया जाता है। परन्तु एक शिक्षक का दायित्व है कि वह बालकों की निम्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक बालक को उनके अनुकूल शैक्षिक वातावरण दें।

शिक्षक का ये दायित्व होता है कि वह बच्चे में वांछनीय परिवर्तन लाए ताकि वह –
👉 एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके। और

👉राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें।

इसके लिए बच्चों को शिक्षित करना अति आवश्यक है।
अतः बच्चों को शिक्षित करने के लिये शिक्षक –
👉 औपचारिक शिक्षा, और

👉अनौपचारिक शिक्षा

के तरीकों को अपनाते हैं।

👉औपचारिक शिक्षा में बच्चों को शिक्षा देने के साथ-साथ शैक्षिक वातावरण के नियम भी सिखाये जाते हैं जैसे-
समय पर और नियमित विद्यालय जाना, अपने शिक्षकों का सम्मान करना,व्यवस्थित अपनी शिक्षा ग्रहण करना आदि।

👉अनौपचारिक शिक्षा में पुस्तकीय ज्ञान को न जोड़कर बल्कि बच्चे जो कार्य अपने बाहरी वातावरण से सीखते, ज्ञान अर्जित हैं उसे अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत रखा जाता है।

शिक्षा चाहे औपचारिक हो या अनौपचारिक हो पर बच्चे के प्रगति को अग्रसर जरूर करती है।

बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के लिए सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है। अतः इसी के आधार पर एक शिक्षक बच्चे का

👉सही दिशा निर्देशन कर सकेंगे

और बच्चे को

👉उपयुक्त शिक्षा दे सकेंगे

तथा इसके बाद ही बच्चे का सर्वांगीण विकास होगा।

🌺 बच्चे के विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए मृत्यु पर्यन्त चलती है। 🌺

वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय हैं , एक दूसरे से संबंधित हैं , और एक दूसरे पर निर्भर है ।

निम्नलिखित मनोवैज्ञानिकों ने वृद्धि और विकास के संदर्भ में अपने अपने मत प्रस्तुत किये हैं –

🌺 सोरेन्सन के अनुसार :-

‘ अभिवृद्धि ‘ शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है।

🌺 फ्रेंक के अनुसार :-

‘ अभिवृद्धि ‘ का प्रयोग ( कोशीय ) वृद्धि के अर्थ में होता है ,
अर्थात शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं।

🌺 हरलॉक के अनुसार :-

विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु , प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है । और विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नवीन विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती हैं। 🌹 जूही श्रीवास्तव 🌹

🔆बालविकास (child development)🔆
बाल विकास का अर्थ है बालको का संपूर्ण विकास जन्म से मृत्यु तक चलता रहता है| विकास माता के गर्भ से शुरू शुरू हो जाता है जीवन पर्यंत तक चलता रहता है मानव का विकास किसी ना किसी रूप में हर दिन हर पल बदलता रहता है बाल विकास में बच्चों को क्या पढ़ाना चाहिए विषय का ज्ञान होना चाहिए और कैसे पढ़ाना है पहले हमें बच्चों को जानना हमें बच्चों को जानना होगा फिर उसकी परेशानियों को जानेंगे क्या परेशानी या समस्या है उसको दूर करेंगे |
बच्चों में भिन्नता का आधार –
🔹 सामाजिक भिन्नता के आधार पर
🔹 आर्थिक में भिन्नता के आधार पर
🔹 सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर
🔹 आयु समूह भिन्नता के आधार पर
सामाजिक पृष्ठभूमि से आर्थिक दृष्टि से आर्थिक स्थिति अलग अलग होती है सांस्कृतिक आयुसमूह से सारे बच्चों को पढ़ाना चाहिए यह शिक्षक का कर्तव्य होता है|
हर बच्चे की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं शिक्षक की जिम्मेदारी है
🔹 विशेषता
🔹योग्यता
🔹सभी बच्चे की समस्या
🔹क्षमता
विशेषता योग्यता सभी बच्चों को समस्या और उसकी क्षमता के अनुसार ध्यान में रखते हुए हमें बच्चों को शिक्षा देनी चाहिए|
🔸अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाएं ताकि एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सकें|
🔸राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें|
🔸 इसके लिए उस बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है|
वांछनीय परिवर्तन लाना है चाहे वह सामाजिक हो या सांस्कृतिक परिवर्तन लाना है और बच्चे को शिक्षित करना है|
शिक्षा ▪ शिक्षा औपचारिक या अनौपचारिक को बच्चों को आगे बढ़ाती है लेकिन बच्चों की प्रगति को अग्रसर करती है|
औपचारिक शिक्षा🔸 इसमें बच्चों को अनुशासन नियम कानून के साथ-साथ जो कार्य समय पर करता हैं वह औपचारिक शिक्षा कह लाती है|
अनौपचारिक शिक्षा🔸 कोई भी बालक जब किसी चीज या वस्तु के बारे में नहीं जानता है या किसी के बताने पर उस कार्य को करता है तो वह अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है|
किसी भी चीज को औपचारिक या अनौपचारिक कह सकते हैं शिक्षा पढ़ने या पढ़ाने का तरीका हो औपचारिक हो या अनौपचारिक दोनों ही बेहतर होते है बच्चों को आगे बढ़ाता है और शिक्षा दी जाती है|
*बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक को सबसे पहले बच्चे में वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है|

  • बालक को सही दिशा निर्देशन देना|
  • उपर्युक्त शिक्षा इससे बच्चों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करेंगे
    बच्चे के विकास की प्रक्रिया है जो जन्म से पूर्व मां के गर्भ से प्रारंभ हो जाती है जिस समय वह घर में आता है तो विकास शुरू हो जाता है और जन्म के बाद विभिन्न आवश्यकताओं से गुजरती चली जाती है|
    .वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय है|
    .एक दूसरे से संबंधित है|
    .एक दूसरे पर निर्भर है या आधारित है|
    कई मनोवैज्ञानिक ने पृथ्वी के बारे में अपने मत दिए हैं ➖
    🔅 सोरेन्सन के अनुसार – अभिवृध्दि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है|
    🔅 फ्रेंक के अनुसार – अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है शरीर और व्यवहार में से पहले जिसमें जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृत्ति कहते हैं|
    🔅 हरलॉक के अनुसार – विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था की लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है विकास के परिणाम स्वरुप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती है|
    Notes by- Ranjana Sen

🔆 बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र

बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है➖

🔅 बाल विकास
बाल विकास के अंतर्गत बालक के सर्वांगीण विकास का अध्ययन किया जाता है जोकि बालक के जन्म के पूर्व से लेकर जीवन पर्यंत तक चलता रहता है

समावेशी शिक्षा का अध्ययन
इसके अंतर्गत बच्चे को कैसी शिक्षा देनी है उसे उसे क्या समस्या है या उसकी क्या जरूरत है उसके अनुसार शिक्षा देना जो उसके लिए आवश्यक है तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान कर उनको समझना तथा उनकी आवश्यकता के अनुसार उनको शिक्षा देना यह समावेशी शिक्षा के अंतर्गत आता है |

शिक्षाशास्त्र

इसके अंतर्गत बच्चे की समस्या को समझ कर उसको सही रूप से शिक्षा देना कि उसको क्या जरूरत है क्या शिक्षण विधि अपनाने चाहिए और पाठ्यक्रम किस प्रकार का होना चाहिए जिससे शिक्षण किस प्रकार से प्रभाव कारी हो सकता है इसका अध्ययन इसके अंतर्गत किया जाता है |

🔹 एक विद्यालय में सभी बच्चों में जो विभिन्नता का आधार है उसमें सभी बच्चे अलग अलग सामाजिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक और अलग आयु वर्ग की पृष्ठभूमि से आते हैं जिन्हें शिक्षा देना होता है प्रत्येक बच्चे की अपनी विशेषता होती है चाहे वह सामाजिक ,आर्थिक ,या सांस्कृतिक हो उनकी जिम्मेदारी एक शिक्षक की है कि इनकी विशेषता योग्यता या उनकी समस्या को कैसे समझ कर आगे बढ़ाया जा सकता है उनको किस प्रकार की शिक्षा दी जा सकती है |

🔹 अर्थात प्रत्येक बच्चे की व्यक्तिगत विभिन्नता को ध्यान में रखते हुए शिक्षा देना एक अध्यापक का परम कर्तव्य है |

🔹 अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लेकर आए ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सकें और राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें|

🔹 इसके लिए आवश्यक है कि बच्चे को शिक्षित किया जाए | अर्थात बच्चे को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा देना अनिवार्य है जो उसको प्रगति की ओर अग्रसर करती हो चाहे वह

  • औपचारिक हो
  • या अनौपचारिक हो |

औपचारिक शिक्षा
औपचारिक शिक्षा इस प्रकार की शिक्षा जिसमें समय और स्थान निर्धारित होते हैं जैसे स्कूल की शिक्षा |

अनौपचारिक शिक्षा
ऐसी शिक्षा जिसमें समय और स्थान निर्धारित नहीं होता है | अर्थात किसी भी समय पर शिक्षा दी जा सकती है चाहे वह किसी भी रूप में हो अर्थात जिसमें अनौपचारिक रूप से सीखते हों अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है | उदाहरण परिवारिक शिक्षा या घर में दी जाने वाली शिक्षा |

जो उसकी प्रगति को बढ़ाते हों |

🔹 किसी भी एक चीज को अनौपचारिक और औपचारिक दोनों क्षेत्र में पढ़ाया जा सकता है जो कि बच्चे की प्रगति का कार्य करते हैं |

बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए

🔹 यदि बच्चों में शिक्षा का विकास करना हो तो उनकी शिक्षा का विकास करने के लिए शिक्षक को बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य है जो कि बच्चे की वृद्धि और विकास में उसका सही दिशा निर्देशन ,या उपयुक्त शिक्षा से उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं |

🔹 बच्चे के विकास की जो प्रक्रिया है वह उसके जन्म के पूर्व से ही मां के गर्भ से प्रारंभ हो जाती है और जन्मे के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए चली जाती है |

🔹 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय हैं या पूरक हैं जो एक दूसरे से संबंधित है तथा एक दूसरे पर निर्भर है |
जैसे यदि हाथ में चोट लगती है तो उससे विकास भी प्रभावित होता है विकास गर्भ से लेकर मृत्यु तक चलता है विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है एवं वृद्धि कुछ समय के पश्चात स्थिर हो जाती है |

🔹 वृद्धि और विकास के संबंध में कई मनोवैज्ञानिकों ने अपने अपने विचार या मत प्रस्तुत किए हैं जो कि निम्नानुसार है➖

🔅 सोरेन्सन के अनुसार

अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है |

जब भी हम वृद्धि की बात करते हैं तो उसमें शरीर के पूरे आकार में वृद्धि होती है |

🔅 फ्रैंक के अनुसार अभिवृद्धि का प्रयोग कोशिय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है अर्थात शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं जैसे उम्र के अनुसार शरीर में कई परिवर्तन होते हैं जो व्यवहारिक और शारीरिक दोनों प्रकार के होते हैं |

वृद्धि परिवर्तन है जो कि कुछ समय के पश्चात रुक जाती है लेकिन विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो परिपक्वता की ओर संकेत करती है |

🔅 हरलॉक के अनुसार
विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है बल्कि प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम है और विकास के परिणाम स्वरुप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती हैं |

अर्थात विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जोकि वृद्धि तक सीमित नहीं है बल्कि वह परिपक्वता की ओर ले जाती है जोकि प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य पर निर्भर करता है कि हम कैसा जीवन यापन करना चाहते हैं जो हमारा लक्ष्य है उसे पाने के लिए हम जो भी करना चाहते हैं उसके परिणाम स्वरूप जो परिवर्तन होता है वह विकास है |

𝙉𝙤𝙩𝙚𝙨 𝙗𝙮➖ 𝙍𝙖𝙨𝙝𝙢𝙞 𝙨𝙖𝙫𝙡𝙚

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🌺 बाल विकास🌺

🌱 बाल विकास अर्थात बालक का विकास बच्चे के जन्म से पूर्वगर्भावस्था के दौरान ही शुरू हो जाता है जन्म लेने के बाद विभिन्न अवस्थाओं में जीवन पर्यंत चलता रहता है

🌱 बाल विकास के अंतर्गत एक शिक्षक को बच्चे को कैसे पढ़ाना है ,
उसको जानना होगा जिस को पढ़ाना है ,और क्या पढ़ाना है उसकी परेशानी को देखना पड़ेगा इन सब बातों को ध्यान में रखकर शिक्षक बच्चों को पढ़ाएंगे तो बच्चे का सर्वांगीण विकास होगा

🌱 बच्चे अलग-अलग प्रकार के होते हैं सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आयु समूह के होते हैं
शिक्षक की जिम्मेदारी है- बालकों की विशेषता, योग्यताएं ,समस्या ,क्षमता इन सब का ध्यान रखें एक अच्छे शिक्षक का यह दायित्व है कि बच्चों में वांछनीय परिवर्तन लाएं ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके और राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें
इसके लिए उस बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है

🌱 शिक्षा दो तरह से दी जाती है एक औपचारिक दूसरी अनौपचारिक
1- औपचारिक शिक्षा– इस शिक्षा के अंतर्गत नियम कानून के तहत शिक्षा दी जाती है जैसे स्कूली शिक्षा, college की शिक्षा आदि
2– अनौपचारिक शिक्षा—- इस शिक्षा के अंतर्गत नियम कानून नहीं होता किसी प्रकार की पाबंदी नहीं होती इस प्रकार की शिक्षा को बच्चे मोबाइल ग्रुप में आदि के माध्यम से सीखते हैं घर तथा खेल के मैदान धार्मिक स्थल या फ्रेंड से सीखना आदि

अर्थात हर चीज को औपचारिक और अनौपचारिक रूप में शिक्षा दे सकते हैं
🌱 बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए शिक्षक को सबसे पहले बच्चे के वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को अच्छी तरह से समझ ना अनिवार्य होता है
2 तरह से व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं
1– सही दिशा निर्देशन द्वारा
2– उपयुक्त शिक्षा द्वारा

🌱 विकास-/ विकास की प्रक्रिया बच्चे में जन्म के पूर्व मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरती चली जाती है
🌱 वृद्धि और विकास मैं अंतर

# विकास गुणात्मक होता है जबकि वृद्धि मात्रात्मक होती हैं

वृद्धि और विकास एक दूसरे से संबंधित होते हैं

वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर होते हैं

वृद्धि और विकास एक दूसरे के पूरक होते हैं

विकास निरंतर चलता है जबकि वृद्धि निश्चित समय पर रुक जाती है

विकास को मापा नहीं जा सकता महसूस किया जाता है जबकि वृद्धि को मापा जा सकता है

🌱 सोरेनसन के अनुसार अभिवृद्धि–/ अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उनके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है
🌱 फ्रैंक के अनुसार अभिवृद्धि–/ अभिवृद्धि का प्रयोग कोसीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं

🌱 हरलॉक के अनुसार विकास–/ विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील kram है
विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यता प्रकट होती है!

🌺 समाप्त🌺

♦️ रितु योगी♦️
🙏🏻 धन्यवाद🙏🏻

▪बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र ▪ बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र को हमें निम्नलिखित तीन रूप में जानना है 👉 बाल विकास :- बच्चों को शिक्षा देने के लिए हमें उन को जानना होगा समझना होगा कि बच्चों को कैसे और किस तरीके से पढ़ाया जाए ताकि उनका संपूर्ण विकास हो सके इसके लिए हमें बाल विकास का अध्ययन करना आवश्यक है । क्योंकि बाल विकास का अध्ययन करने के बाद ही हम किसी बालक की मनोवृत्ति को समझ पाएंगे और उसको उसकी जरूरत के हिसाब से शिक्षा दे पाएंगे इसलिए बाल विकास का अध्ययन करना आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है । 👉समावेशी शिक्षा:- बालक को शिक्षित करने के लिए हमें समावेशी शिक्षा की आवश्यकता है इसमें बालक को अगर कोई समस्या है उसे कोई विशेष आवश्यकता है उस समस्या को हमको जानना है और उसकी जरूरत के हिसाब से उसको शिक्षा देना है 👉 अधिगम और शिक्षाशास्त्र :- अधिगम और शिक्षा शास्त्र में बच्चे की परेशानी को समझते हैं फिर हम यह सुनिश्चित करते हैं कि बालक को हमें किस तरीके से पढ़ाना है और कैसे बढ़ाना है अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि हमें बाल केंद्रित शिक्षा देनी हैं बच्चा जिस प्रकार खेलने में रूचि लेता है उसी प्रकार पढ़ाई में भी रुचि ले हमको ऐसी गतिविधियों और तरीकों को अपनाना हैं यही शिक्षा शास्त्र है । अर्थात यदि शिक्षक को छात्र के बारे में जानकारी होगी तो उसको और उसकी मानसिकता को समझने में मदद मिलेगी फिर हम उसको उसकी जरूरत के हिसाब से वह जैसे समझता है उस हिसाब से पढ़ा पढाएगें। 👉बच्चों को कैसे और किस तरह पढ़ाया जाए उनको पढ़ाने के लिए कौन सी विधियां ,टेक्निक सही होगी एक शिक्षक को यह जानना अनिवार्य हैं। **** सामान्यतया देखा गया है कि जो भी बच्चे होते हैं अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं जैसे – सामाजिक ,आर्थिक सांस्कृतिक और आयु समूह इन सभी बच्चों की अलग-अलग विशेषताएं योग्यताएं और क्षमता होती हैं इन सब को हमें ध्यान में रखकर शिक्षा देना हैं। 👉 अध्यापक का यह दायित्व है कि वह बच्चे में बांछनीय परिवर्तन लाए ताकि वह एक अच्छे नागरिक की जिम्मेदारी निभा सके और राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें इसलिए बच्चों को शिक्षित करना अनिवार्य है बच्चों को शिक्षित करने के लिए हम औपचारिक या अनौपचारिक या विषय वस्तु से संबंधित हैं जो उस बच्चे के लिए उपयुक्त है अतः हम बच्चे को औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों शिक्षा दी जाती है बच्चे की प्रगति को हमें आगे बढ़ाना है वह चाहे औपचारिक हो या अनौपचारिक 👉 बच्चों में शिक्षा का विकास करने के लिए एक शिक्षक सबसे पहले बच्चे की वृद्धि और विकास के सभी पहलुओं को समझना अनिवार्य हैं। बच्चों को सही दिशा निर्देश एवं उपयुक्त शिक्षा देकर बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं । 👉 बच्चे की विकास की प्रक्रिया जन्म के पूर्व मां के गर्भ से शुरू हो जाती है और जन्म के बाद विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए चला जाता है 🌟 वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय हैं ( वृद्धि और विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं ,,वृद्धि विकास एक दूसरे से संबंधित हैं 👉 सोरेन्सन के कथना अनुसार : – अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि करने के लिए किया जाता है। 👉 फ्रेंक के कथनानुसार :- अभिवृद्धि का प्रयोग कोशीय वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है । शरीर और व्यवहार में से पहले जिस में जो परिवर्तन होता है उसे अभिवृद्धि कहते हैं । वृद्धि – फिजिकल डेवलपमेंट जिस में शारीरिक विकास होता है विकास इसमें मनुष्य धीरे धीरे परिपक्वता की ओर बढ़ता है **** विकास गर्भ से मृत्यु तक चलता है । हरलाँक के कथन अनुसार :- विकास की सीमा वृद्धि तक सीमित नहीं है अपितु प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तन का प्रगतिशील क्रम हैं। विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में अनेक नई विशेषताएं और योग्यताएं प्रकट होती हैं । धन्यवाद ✍️ notes by pragya shukla….

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