🌲⚜️🔅संज्ञानात्मक विकास की अवस्था🔅⚜️🌲

⚜️संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएं होती हैं

🔅संवेदी पेशिय अवस्था(0-2year)

🔅पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(2-7year)

🔅 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(7-11year)

🔅अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(11-18year)

⚜️🌲संवेदी पेशीय अवस्था/ इंद्रियजनित गामक अवस्था(0-2year)➖️

🌲इसके अंतर्गत 6 प्रकार की अवस्थाएं आती है

🔅इसमें सहज क्रियाओं की अवस्था ( 0-1manth) ➖️  इसमें बच्चे केवल सहज  क्रिया करता है किसी वस्तु को मुंह में लेकर चूसने की प्रक्रिया यह इस अवस्था का प्रमुख भाग होता है

🔅वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था  ( 1-4manth )➖️  सहज क्रिया अनुभूति द्वारा कुछ सीमा तक परिवर्तित हो जाता है सहज़ क्रियाओं को दोहराया भी जाता है

 इस क्रियाओं को अनुभूतिऔर सहज़ क्रिया एक दूसरे के साथ जुड़ भी जाती हैं

 इस अनुक्रिया को प्रमुख इसलिए कहा जाता है क्योंकि बच्चे का शरीर मुख्य रूप से अनुक्रिया करता है और अलग-अलग तरह से अनुक्रिया करता है

 इस अवस्था तक बच्चा अपने अनुभव को बिना भय के अवश्य करता है

🔅गौड़ वृत्तीय अनुक्रिया की अवस्था ( 4-8manth ) ➖️वस्तुओं को स्पर्श करना,उनके छूने से बच्चों को सुखद एहसास होना इस अवस्था में प्रारंभ हो जाता है और बच्चे को 6 माह मे बहुत ही सुखद अहसास होने लगता है

 इस व्यवस्था में  बच्चे वस्तुओं को इधर-उधर हिलाने डुलाने लगते हैं

🔅गौड़ स्कीमेटो की समन्वयकीअवस्था(8-12manth )➖️ इस अवस्था में बच्चे उद्देश्य प्राप्त करने का साधन प्राप्त कर लेते हैं

अपनों से बड़ों की क्रियाओं का अनुकरण भी देते हैं जो अपने से बड़े होते हैं वह जो क्रिया करते हैं बच्चा भी उसी प्रकार की क्रिया करने लगता है

स्कीमा  मैं भी रहता है उसका सामान्य करण करने लगता है

🔅मानसिक संयोग द्वारा नई  के खोज की अवस्था(18-24manth)➖️

 देखे हुए वस्तुओं की अनुपस्थिति में भी अस्तित्व समझने लगता है जो वस्तु बच्चा देख लेता है वह  उसे अस्तित्व में समझने लगता है उसकी अनुपस्थिति में अगर वह ना देखे तो उसकी इमेज बनाने लगता है मन में

🌲🔅पूर्व संक्रियात्मक अवस्था /पाक़ संक्रियात्मक अवस्था( 2-7yr)➖️

🔅पाक सम्प्रत्यात्मक अवस्था(2-4yr)➖️ इस अवस्था में बच्चा अपने आसपास की वस्तुओं को और प्राणियों को सभी को पहचानने लगता है अपने विचारों को सही मानने लगता है और वह समझते हैं कि दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती है वह जो चाहते हैं वही उन्हें अच्छा लगता है इसलिए इस अवस्था को आत्मकेंद्रित की संज्ञा दी गई है

इस अवस्था में बच्चे का जो मन कहता है वह बच्चा वही काम करता है

वह सिर्फ अपने में ही खोया रहता है

🔅अंतरदर्शन की अवस्था(4-7yr)➖️ इस अवस्था में बच्चा भाषा सीखने लगता है

इसमें बच्चा सोचने लगता है चिंतन और तर्क करने लगता है

 गणित की यह जोड़ने घटाने जैसे प्रश्न करने लगता हैं

 6 वर्ष तक बच्चा मूर्त तथ्यों के साथ अमूर्त प्रत्यय का निर्माण  करने लगता है

🌲🔅मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(7-11) ➖️इस अवस्था में अधिक व्यवहारवादी या यथार्थवादी हो जाते हैं

बच्चे समस्या समाधान की क्षमता आ जाती है

मूर्त समस्या का समाधान ढूंढने लगता है जो वस्तुओं ने दिखाई देती हैं और जो सामने जो समस्या दिखाई देती है उसका समाधान वह ढूंढ लेते हैं

 अमूर्त नहीं सोच पाते हैं वस्तुओं के गुणों के आधार पर  बांट सकते हैं

चिंतन में क्रम बदलता नहीं होती है

🌲🔅अमूर्त औपचारिक संक्रियात्मक  अवस्था(11-18yr)➖️ इस अवस्था में बच्चे का मस्तिष्क से परिपक्व हो जाता है

इसमें चिंतन में क्रमबद्ध का आ जाती है

 अनुभव के आधार पर समस्या का समाधान करने में सुदृढ़ हो जाते हैं

औपचारिक संप्रत्यय चिंतन की क्षमता आ जाती हैं

Notes by sapna yadav

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाये

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13 april 2021

1.  इंद्रियजनित गामक / संवेदी गामक / संवेदी पेशीय  अवस्था  Sensory motar stage   ( 0 -2) )  वर्ष

2.  पूर्व संक्रियात्मक / पाक् संक्रियात्मक अवस्था   Pre – Operational stage  ( 2 – 7 ) वर्ष 

3.  मूर्त संक्रियात्मक अवस्था    Concrete  Operational stage ( 7 -11 )  वर्ष

4.  अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था  Formal  Operational  ( 11 – 18 )  वर्ष

जीन पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को निम्नलिखित  4  अवस्थाओं में वर्गीकृत किया है, जैसे :-

1.🌺   इन्द्रियजनित गामक अवस्था / संवेदी पेशीय अवस्था / संवेदी गामक अवस्था   ( 0 – 2 )  वर्ष

👉इसमें बच्चे मानसिक क्रियाओं को इंद्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करते हैं।

👉शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना एवं किसी चीज को पकड़ने लगता है।

👉 इस अवस्था की शुरुआत में बच्चा अपने भावों को रोकर व्यक्त करता है।

👉 बच्चे को जो चाहिए होता है वह उसे दिखाकर अपनी बात कहने की कोशिश करता है।

👉शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उन वस्तुओं का अस्तित्व होता है जो उनके सामने होतीं हैं ,  धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति होने तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं।

[ अतः इसी समय बच्चों में वस्तु स्थायित्व  Object permanence   का  गुण आने लगता है। ]

👉चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है।

3 – 4 माह तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

👉अतःवस्तु का सामने न होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है ,  इसे ही वस्तु स्थायित्व कहते हैं।

🌺🌺  जीन पियाजे के अनुसार संवेदी पेशीय अवस्था की 6 उप –  अवस्थाएं  :-

👉👉 1.सहज क्रियाओं की अवस्था  🙁 जन्म से 30 दिन ) 

इस अवस्था में बच्चे केवल सहज क्रिया करते हैं।

 किसी वस्तु को मुंह में लेकर चूसने की क्रिया इस अवस्था में प्रबल होती है।

 अर्थात इस अवस्था में बच्चों का बनावट स्वरूप नहीं होता है बल्कि उनका सहज / सरल रूप होता है जैसे कि यदि उनको भूख लगी है और वह कितने ही लोगों के बीच में क्यों ना हो पर वह रोएंगे , सोना हो तब भी रोएंगे,  खेलना हो तो खेलने की कोशिश करेंगे।

सहजता में रहेंगे।

👉👉 2. प्रमुख वित्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था :- 

(1 – 4 माह )

इस अवस्था में , सहज क्रिया में अनुभूति द्वारा कुछ सीमा तक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है।

तथा कई बार सहज क्रियायें बच्चों द्वारा दोहराई भी जाती हैं।

और इस समय अनुभूति और सहज क्रिया एक दूसरे से जुड़ जाती है।

अनुक्रिया को प्रमुख इसलिए कहा जाता है क्योंकि बच्चे का शरीर मुख्य रूप से विभिन्न तरह की अनुक्रिया करता है , इसलिए इन्हें वृत्तीय अनुक्रिया कहा जाता है ।

इस अवस्था तक बच्चा अपने अनुभव को बिना भय के अभिव्यक्त करता है।

 अर्थात इस अवस्था में बच्चों में भय का ज्ञान नहीं होता है।

👉👉 3. गौण वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था :- 

 ( 4 – 8 माह )

इस अवस्था में किसी चीज को स्पर्श करना , छूना , पकड़ने की कोशिश करना आदि बच्चों को सुखद एहसास कराता है ।

जैसे- वस्तुओं को छूना , इधर-उधर रखने की कोशिश करना आदि।

👉👉 4. गौण स्किमेटा की समन्वय की अवस्था :-

( 8 – 12 माह )

अब इस अवस्था में बच्चे उद्देश और प्राप्त करने के साधन में अंतर करने लगता है।

 अपने से बड़ों की क्रियाओं का अनुसरण करना सीखने लगते हैं ।

और बच्चों की स्कीमा ( दिमाग ) में जो रहता है उसका सामान्यीकरण करने लगते हैं।

👉👉5.  तृतीय तृतीय अनुक्रियाओं की अवस्था :-

( 12 – 18 माह)

इस अवस्था में बच्चे वस्तुओं के गुणों को ‘ प्रयास और त्रुटि ‘  द्वारा सीखते हैं।

 अर्थात वह कुछ भी खेलने , खाने के लिए आदि प्रयास करते हैं, गलती करते हैं और सीखते हैं।

👉👉 6.  मानसिक सहयोग द्वारा नए साधनों की खोज की अवस्था :-

( 18 – 24 माह)

 इस अवस्था में बच्चा देखी गई वस्तु की अनुपस्थिति में भी अस्तित्व समझने लगता है ।

अतः 2 साल तक बच्चों में वस्तु स्थायित्व पूरी तरह से आ जाता है , जो कि जीवन भर चलता है अर्थात 2 साल से जीवन भर प्रदर्शित करते रहते हैं।

2.🌺  पूर्व / पाक् संक्रियात्मक अवस्था    ( 2 – 7 )  वर्ष

👉भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है।

👉अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है।

👉वस्तुओं को पहचाने लगता है।

👉बच्चा इस उम्र में वस्तुओं में विभेद करना सीख जाता है।

👉5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।

👉इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु , समाप्त होने तक बच्चा सजीव – निर्जीव में विभेद करने लगता है।

🍁  पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दोष  :-

1.🌲   जीववाद  :-

इसमें बच्चा निर्जीव को सजीव समझने लगता है।

2.🌲   आत्मकेंद्रित / स्व-केंद्रित ( स्वलीनता )  :-

सिर्फ अपने विचारों / बातों को ही सत्य मानता है।

🍁 2 – 4 वर्ष की अवधि में,  बच्चों में यह दोष आने लगता है।

🍁 4 – 7  वर्ष में  चिंतन / तर्क ,  पहले ये अधिक परिपक्व हो जाता है।

इस अवस्था के दौरान बच्चों में भाषा विकास भी प्रारंभ हो जाता है ।

इस अवस्था में बालक नयी सूचना और अनुभवों को ग्रहण करता है।

 वस्तु स्थायित्व का गुण विकसित हो जा जाता है।

विकास के  इस चरण के दौरान छोटे बच्चे मानसिक प्रतीकों को उपयोग करके अपने वातावरण का विश्लेषण करना शुरू करते हैं , 

इन प्रतीकों में अक्सर ‘ शब्द और चित्र ‘ शामिल होते हैं। 

इस अवस्था में बच्चे विशिष्ट संगठनात्मक कार्यों को लागू करने में सक्षम बनने लगते हैं।

🍂🍂 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था की 2 उप- अवस्थाएं :-

👉 1. पाक् / पूर्व संक्रियात्मक अवस्था :-  2 -4 वर्ष

किस अवस्था में बच्चा अपने आसपास के वातावरण , वस्तु , प्राणी , शब्द आदी में संबंध समझने लगता है। 

बच्चे अनुकरण और खेल के द्वारा सीखना शुरू कर देते हैं।

अतः इस अवस्था के तहत जीन पियाजे जी ने कहा कि-  इस अवस्था मे बच्चे सभी निर्जीव तथ्यों/ वस्तुओं को सजीव समझता है।

 🌷 अतः इसे जीन पियाजे ने  :-

‘ जीववाद ‘  की संज्ञा दी है ।

इस समय बच्चे अपने विचारों को सही मानते हैं।

 कि दुनिया उनके इर्द-गिर्द ही घूमती है ।

इसलिए इसे :-

🌷  ‘ आत्मकेंद्रित / स्व – केंद्रित  ‘  🌷

की भी संज्ञा दी गई है।

👉 2.  अंतर्दशी अवस्था  :-  4 – 7 वर्ष

इस अवस्था में बच्चा भाषा सीखने लगता है।

 और अपने चिंतन / तर्क से सोचने लगता है। 

परन्तु उनका इतना ज्ञान विकसित नहीं होता है कि –

2 × 3 = 6  प्राप्त होता है पर

3 + 3 जोड़ने पर भी   6    ही आता है।

इस अवस्था के अंत तक बच्चे मूर्त प्रत्ययों के साथ-साथ अमूर्त प्रत्ययों का भी निर्माण करने लगते हैं।

3.  🌺 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था :-  7 – 11 वर्ष

इस अवस्था में बच्चे अधिक व्यवहारवादी और यथार्थवादी बनने लगते हैं।

समस्या समाधान की क्षमता विकसित होने लगती है।

मूर्त समस्या पर तो विशेष ध्यान देने लगते हैं पर अमूर्त  समस्या पर नहीं।

वस्तुओं को पहचानना , विभेद करना , वर्गीकृत करना तथा वस्तुओं के गुणों के आधार पर बांटना  सीखने लगते हैं।

ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।

समस्या समाधान का अमूर्त रूप विकसित नहीं होता है।

☘️☘️ मूर्त संक्रियात्मक अवस्था का दोष :-

इस अवस्था में अमूर्त सोच स्पष्ट रूप से विकसित नहीं हो पाती है तथा चिंतन में भी क्रमबद्धता नहीं आ पाती है।

4.🌺  अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था   ( 12 – 18 ) वर्ष 

👉 अब बच्चे का मस्तिष्क  परिपक्व होने लगता है।

👉चिंतन लचीला और प्रभावी हो जाता है।

👉चिंतन में वक्रमबद्धता आने लगती  है।

👉समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर , चिंतन करके , कर सकता है।

👉चिंतन वास्तविक हो जाता है।

👉 अनुभव एवं समस्या समाधान सुदृढ़ होने लगता है।

👉 औपचारिक संप्रत्यय चिंतन विकसित होने लगता है।

👉 प्रतीकात्मक शब्द  रूपक , उपमान आदि में अंतर और  अर्थ समझने लगते हैं।

👉 अमूर्त समस्या समाधान विकसित हो जाता है।

👉बालकों में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है। हालांकि यह अनुभव और शिक्षा पर निर्भर करता है।

🌻✒️ Notes by – जूही श्रीवास्तव ✒️🌻

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाये

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

🟢 इंद्रियजनित गामक / संवेदी गामक / संवेदी पेशीय  अवस्था  Sensory motar stage   ( 0 -2) )  वर्ष

🟢 पूर्व संक्रियात्मक / पाक् संक्रियात्मक अवस्था   Pre – Operational stage  ( 2 – 7 ) वर्ष 

🟢मूर्त संक्रियात्मक अवस्था    Concrete  Operational stage ( 7 -11 )  वर्ष

🟢अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था  Formal  Operational  ( 11 – 18 )  वर्ष

जीन पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत को निम्नलिखित  4  अवस्थाओं में वर्गीकृत किया है, जैसे :-

🟢 इन्द्रियजनित गामक अवस्था / संवेदी पेशीय अवस्था / संवेदी गामक अवस्था   ( 0 – 2 )  वर्ष

🌸इसमें बच्चे मानसिक क्रियाओं को इंद्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करते हैं।

🌸शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना एवं किसी चीज को पकड़ने लगता है।

🌸 इस अवस्था की शुरुआत में बच्चा अपने भावों को रोकर व्यक्त करता है।

🌸बच्चे को जो चाहिए होता है वह उसे दिखाकर अपनी बात कहने की कोशिश करता है।

🌸शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उन वस्तुओं का अस्तित्व होता है जो उनके सामने होतीं हैं ,  धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति होने तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं।

अतः इसी समय बच्चों में वस्तु स्थायित्व  Object permanence   का  गुण आने लगता है। ]

👉चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है।

3 – 4 माह तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

👉अतःवस्तु का सामने न होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है ,  इसे ही वस्तु स्थायित्व कहते हैं।

🟢 जीन पियाजे के अनुसार संवेदी पेशीय अवस्था की 6 उप –  अवस्थाएं  ।

🟢सहज क्रियाओं की अवस्था  🙁 जन्म से 30 दिन ) 

इस अवस्था में बच्चे केवल सहज क्रिया करते हैं।

 किसी वस्तु को मुंह में लेकर चूसने की क्रिया इस अवस्था में प्रबल होती है।

 अर्थात इस अवस्था में बच्चों का बनावट स्वरूप नहीं होता है बल्कि उनका सहज / सरल रूप होता है जैसे कि यदि उनको भूख लगी है और वह कितने ही लोगों के बीच में क्यों ना हो पर वह रोएंगे , सोना हो तब भी रोएंगे,  खेलना हो तो खेलने की कोशिश करेंगे।

सहजता में रहेंगे।

🟢प्रमुख वित्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था :- 

(1 – 4 माह )

इस अवस्था में , सहज क्रिया में अनुभूति द्वारा कुछ सीमा तक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है।

तथा कई बार सहज क्रियायें बच्चों द्वारा दोहराई भी जाती हैं।

और इस समय अनुभूति और सहज क्रिया एक दूसरे से जुड़ जाती है।

अनुक्रिया को प्रमुख इसलिए कहा जाता है क्योंकि बच्चे का शरीर मुख्य रूप से विभिन्न तरह की अनुक्रिया करता है , इसलिए इन्हें वृत्तीय अनुक्रिया कहा जाता है ।

इस अवस्था तक बच्चा अपने अनुभव को बिना भय के अभिव्यक्त करता है।

 अर्थात इस अवस्था में बच्चों में भय का ज्ञान नहीं होता है।

🟢गौण वृत्तीय अनुक्रियाओं की अवस्था :- 

 ( 4 – 8 माह )

इस अवस्था में किसी चीज को स्पर्श करना , छूना , पकड़ने की कोशिश करना आदि बच्चों को सुखद एहसास कराता है ।

जैसे- वस्तुओं को छूना , इधर-उधर रखने की कोशिश करना आदि।

🟢. गौण स्किमेटा की समन्वय की अवस्था :-

( 8 – 12 माह )

अब इस अवस्था में बच्चे उद्देश और प्राप्त करने के साधन में अंतर करने लगता है।

 अपने से बड़ों की क्रियाओं का अनुसरण करना सीखने लगते हैं ।

और बच्चों की स्कीमा ( दिमाग ) में जो रहता है उसका सामान्यीकरण करने लगते हैं।

🟢.  तृतीय तृतीय अनुक्रियाओं की अवस्था :-

( 12 – 18 माह)

इस अवस्था में बच्चे वस्तुओं के गुणों को ‘ प्रयास और त्रुटि ‘  द्वारा सीखते हैं।

 अर्थात वह कुछ भी खेलने , खाने के लिए आदि प्रयास करते हैं, गलती करते हैं और सीखते हैं।

🟢.  मानसिक सहयोग द्वारा नए साधनों की खोज की अवस्था :-

( 18 – 24 माह)

 इस अवस्था में बच्चा देखी गई वस्तु की अनुपस्थिति में भी अस्तित्व समझने लगता है ।

अतः 2 साल तक बच्चों में वस्तु स्थायित्व पूरी तरह से आ जाता है , जो कि जीवन भर चलता है अर्थात 2 साल से जीवन भर प्रदर्शित करते रहते हैं।

🟢 पूर्व / पाक् संक्रियात्मक अवस्था    ( 2 – 7 )  वर्ष

🌸भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है।

🌸अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है।

🌸वस्तुओं को पहचाने लगता है।

🌸बच्चा इस उम्र में वस्तुओं में विभेद करना सीख जाता है।

🌸5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।

इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु , समाप्त होने तक बच्चा सजीव – निर्जीव में विभेद करने लगता है।

🟢पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दोष  :-

🟢 जीववाद  :-

इसमें बच्चा निर्जीव को सजीव समझने लगता है।

🟢आत्मकेंद्रित / स्व-केंद्रित ( स्वलीनता )  :-

सिर्फ अपने विचारों / बातों को ही सत्य मानता है।

🟢 2 – 4 वर्ष की अवधि में,  बच्चों में यह दोष आने लगता है।

🌸 4 – 7  वर्ष में  चिंतन / तर्क ,  पहले ये अधिक परिपक्व हो जाता है।

 विकास भी प्रारंभ हो जाता है ।

इस अवस्था में बालक नयी सूचना और अनुभवों को ग्रहण करता है।

 वस्तु स्थायित्व का गुण विकसित हो जा जाता है।

विकास के  इस चरण के दौरान छोटे बच्चे मानसिक प्रतीकों को उपयोग करके अपने वातावरण का विश्लेषण करना शुरू करते हैं , 

इन प्रतीकों में अक्सर ‘ शब्द और चित्र ‘ शामिल होते हैं। 

इस अवस्था में बच्चे विशिष्ट संगठनात्मक कार्यों को लागू करने में सक्षम बनने लगते हैं।

🌸🌸पूर्व संक्रियात्मक अवस्था की 2 उप- अवस्थाएं :-🌸🌸🌸

🟢 पाक् / पूर्व संक्रियात्मक अवस्था :-  2 -4 वर्ष

किस अवस्था में बच्चा अपने आसपास के वातावरण , वस्तु , प्राणी , शब्द आदी में संबंध समझने लगता है। 

बच्चे अनुकरण और खेल के द्वारा सीखना शुरू कर देते हैं।

अतः इस अवस्था के तहत जीन पियाजे जी ने कहा कि-  इस अवस्था मे बच्चे सभी निर्जीव तथ्यों/ वस्तुओं को सजीव समझता है।

🌸अतः इसे जीन पियाजे ने  :-

‘ जीववाद ‘  की संज्ञा दी है ।

इस समय बच्चे अपने विचारों को सही मानते हैं।

कि दुनिया उनके इर्द-गिर्द ही घूमती है। 

     👉🏻इसलिए इसे :-

🌸’ आत्मकेंद्रित / स्व – केंद्रित

की भी संज्ञा दी गई है।

🟢.  अंतर्दशी अवस्था  :-  4 – 7 वर्ष

इस अवस्था में बच्चा भाषा सीखने लगता है।

 और अपने चिंतन / तर्क से सोचने लगता है। 

         परन्तु उनका इतना ज्ञान विकसित नहीं होता है कि –

2 × 3 = 6  प्राप्त होता है पर

3 + 3 जोड़ने पर भी6 ही आता है।

इस अवस्था के अंत तक बच्चे मूर्त प्रत्ययों के साथ-साथ अमूर्त प्रत्ययों का भी निर्माण करने लगते हैं।

🟢मूर्त संक्रियात्मक अवस्था :-  7 – 11 वर्ष

इस अवस्था में बच्चे अधिक व्यवहारवादी और यथार्थवादी बनने लगते हैं।

समस्या समाधान की क्षमता विकसित होने लगती है।

मूर्त समस्या पर तो विशेष ध्यान देने लगते हैं पर अमूर्त  समस्या पर नहीं।

वस्तुओं को पहचानना , विभेद करना , वर्गीकृत करना तथा वस्तुओं के गुणों के आधार पर बांटना  सीखने लगते हैं।

ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।

👉🏻समस्या समाधान का अमूर्त रूप विकसित नहीं होता है।

🟢मूर्त संक्रियात्मक अवस्था का दोष :-

इस अवस्था में अमूर्त सोच स्पष्ट रूप से विकसित नहीं हो पाती है तथा चिंतन में भी क्रमबद्धता नहीं आ पाती है।

🟢 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था   ( 12 – 18 ) वर्ष 

🌸 अब बच्चे का मस्तिष्क  परिपक्व होने लगता है।

🌸चिंतन लचीला और प्रभावी हो जाता है।

🌸चिंतन में वक्रमबद्धता आने लगती  है।

🌸समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर , चिंतन करके , कर सकता है।

🌸चिंतन वास्तविक हो जाता है।

🌸 अनुभव एवं समस्या समाधान सुदृढ़ होने लगता है।

🌸औपचारिक संप्रत्यय चिंतन विकसित होने लगता है।

🌸प्रतीकात्मक शब्द  रूपक , उपमान आदि में अंतर और  अर्थ समझने लगते हैं।

🌸अमूर्त समस्या समाधान विकसित हो जाता है।

🌸बालकों में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है। हालांकि यह अनुभव और शिक्षा पर निर्भर करता है।

 Notes by shikha tripathi

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