☘️ किशोरावस्था☘️

पहचान बनाम पहचान भ्रांति 

अंह पहचान बनाम भूमिका भ्रांति 

(Ego identity vs role confusion)

Age➖12-20 वर्ष

🟣 किशोरों में सामाजिकता के विभिन्न पहलुओं विकसित होते हैं जिससे वह अपनी एक सुदृढ़ पहचान बनाने में सक्षम होते हैं।

एरिक्सन का कहना है कि किशोर अपनी पहचान बना लेते हैं या भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होने वाले अपनी समस्या का समाधान कर लेते हैं तो उसमें “कर्तव्यनिष्ठा” नामक सामाजिक शक्ति आती है।

“कर्तव्यनिष्ठता”

    किशोरों में समाज की विचारधारा मानक शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता

एरिक्सन के अनुसार किशोरों में कर्तव्यनिष्ठ था उनके व्यक्तित्व विकास को इंगित करता है।

☘️ 6-तरुण वयस्कता 

आत्मीयता बनाम अलगाव, घनिष्ठता बनाम ,विलगन

(Intimacy vs isolation)

Age➖20-30 वर्ष

🟣 इस उम्र में व्यक्ति विवाह के प्रारंभिक पारंपरिक जीवन में प्रवेश जीवन करते है।

इस अवस्था में व्यक्ति स्वतंत्र रूप से जीवन शुरू कर देता है समाज के सदस्य भाई-बहन अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

  व्यक्ति स्वयं के साथ भी घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

  अगर व्यक्ति इन सभी कार्यों में सक्षम नहीं हो पाता है तो व्यक्ति अपने आप में खोया रहता है और दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाता है इसे अलगाव या विलगन कहा जाता है।

   विलयन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनो विकारी और गैर सामाजिक हो जाता है।

☘️ मध्य वयस्कता

उत्पादकता बनाम स्थिरता,जननात्मकता,बनाम स्थिरता

(Productivity vs sustainability)

Age ➖ 30-65 वर्ष

इसमें व्यक्ति में उत्पादकता की भावना आ जाती है वह भावी पीढ़ी के कल्याण के बारे में सोचता है।

समाज को उन्नत बनाने की कोशिश करता है तथा स्वयं/ परिवार की सुख सुविधा का ध्यान रखता है। और अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है

मनोसामाजिक शक्ति- “देखभाल”

  व्यक्ति दूसरों की सुख- सुविधा और कल्याण के बारे में भी सोचता है।

☘️ परिपक्वता (Matwity)

संपूर्ण बनाम निराशा

(Integrity vs Despair)

Age➖65 से जीवन की अंतिम अवस्था तक

🟣 इसमें व्यक्ति स्वास्थ्य ,परिवार एवं समाज के साथ समायोजन अपनी उम्र के लोगों के साथ व्यवहारिक संबंध स्थापित करते हैं।

  अनेक चुनौतियों का सामना करते हैं व्यक्ति भविष्य की ओर ध्यान न देकर अतीत की सफलता /असफलता का मूल्यांकन करता है।

 एरिक्सन  कहते हैं कि कोई भी मनो सामाजिक संस्कृतिक उत्पन्न नहीं होती है।

वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख मनोसामाजिक शक्ति है अब वास्तव में आप परिपक्व होते हैं।

  कुछ व्यक्ति जो जिंदगी में असफल होते हैं वह इस अवस्था में उस चिंता के कारण निराश ग्रस्त रहते हैं अपने जीवन को भार समझते हैं निराशा दुश्चिंता बनी रहती है मानसिक विषाद से ग्रस्त होते हैं।

📚📚✍🏻 Notes by…. Sakshi Sharma📚📚✍🏻

मनोसामाजिक विकास की अवस्थायें- 

📍5 किशोरवास्था: अहं पहचान बनाम भूमिका संभ्रान्ति/  पहचान बनाम पहचान भ्रांति

(Adolescence: Ego identity versus role canfusion)  

📍6 तरूण वयस्कावस्था: आत्मीयताबनाम अलगाव /घनिष्ठ बनाम विलगन (Early adulthood: intimacy versus isolation)

📍7 मध्यवयस्कावस्था: जननात्मक्ता बनाम स्थिरता/उत्पादकता बनाम स्थिरता (middle adulthood: Productivity versus Sustabilitiy) 

📍8 परिपक्वता  सम्पूर्णता बनाम निराशा (maturity: Integlity versus despair) 

❇️5. किशोरावस्था : अहं पहचान बनाम भूमिका भ्रान्ति-

 ▪️किशोरों में सामाजिकता की विभिन्नता की समझ विकसित होती है जिससे वह अपनी एक सुदृढ़ पहचान बनाने में सक्षम होते है।

▪️ एरिक्सन के अनुसार किशोरावस्था 12 वर्ष से लगभग 20 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में किशोरों में दो प्रकार के मनोसामाजिक पहलू विकसित होते है। प्रथम है- अहं पहचान नामक धनात्मक पहलू तथा द्वितीय है- भूमिका भ्रन्ति 

▪️एरिक्सन का मत है कि जब किशोर अहं पहचान बनाम भूमिका संभ्रान्ति से उत्पन्न होने वाली समस्या का समाधान कर लेता है तो उसमें कर्तव्यनिष्ठता नामक विशिष्ट मनोसामाजिक शक्ति (pyychosocial strength) का विकास होता है। यहाँ कर्तव्यनिष्ठता का आशय है- किशोरों में समाज में प्रचलित विचारधाराओं, मानकों एवं शिष्टाचारों के अनुरूप् व्यवहार करने की क्षमता। एरिक्सन के अनुसार किशोरों में कर्त्तव्यनिष्ठता की भावना का उदय होना उनके व्यक्तित्व विकास को इंगित करता है।

❇️6. तरूण वयास्कावस्था: घनिष्ठ बनाम विकृति-

▪️ मनोसामाजिक विकास की इस छठी अवस्था में व्यक्ति विवाह का आरंभिक पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है। यह अवस्था 20 से 30 वर्ष तक की होती है। इस अवस्था में व्यक्ति स्वतंत्र रूप से जीविकोपार्जन प्रारंभ कर देता है तथा समाज के सदस्यों, अपने माता-पिता, भाई-बहनों तथा अन्य संबंधियों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है। इसके साथ ही वह स्वयं के साथ भी एक घनिष्ठ संबंध स्थापित करता हैं, किन्तु इस अवस्था का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि जब व्यक्ति अपने आप में ही खोये रहने के कारण अथवा अन्य किन्हीं कारणों से दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाता है तो इसे बिलगन कहा जाता है। विलगन (isolation) की मात्रा अधिक हो जाने पर व्यक्ति का व्यवहार मनोविकारी या गैर सामाजिक हो जाता है। 

❇️7. मध्य वयास्कावस्था: जननात्मका बनाम स्थिरता-

▪️ मनोसामाजिक विकास की यह सातवीं अवस्था है, जो 30 से 65 वर्ष की मानी गई है। एरिक्सन का मत है कि इस स्थिति में प्राणी में जननात्मकता की भावना विकसित होती है,

 ▪️जिसका तात्पर्य है व्यक्ति द्वारा अपनी भावी पीढ़ी के कल्याण के बारे में सोचना और उस समाज को उन्नत बनाने का प्रयास करना जिसमें वे लोग (भावी पीढ़ी के लोग) रहेंगे।

▪️ व्यक्ति में जननात्मक्ता का भाव उत्पन्न न होने पर स्थिरता उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है, जिसमें व्यिक्त् अपनी स्वयं की सुख-सुविधाओं एवं आवश्यकताओं को ही सर्वाधिक प्राथमिका देता है। 

▪️जब व्यक्ति जननात्मकता एवं स्थिरता से उत्पन्न संघर्ष का सफलतापूर्वक समाधान कर लेता है तो इससे व्यक्ति में देखभाल नामक एक विशेष मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है। देखभाल का गुणविकसित होने पर व्यक्ति दूसरों की सुख-सुविधाओं एवं कल्याण के बारे में सोचता है। 

❇️8. परिपक्वता: अहं सम्पूर्णता बनाम निराशा-

 ▪️मनोसामाजिक विकास की यह अंतिम अवस्था है। यह अवस्था 65 वर्ष तथा उससे अधिक उम्र तक की अवधि अर्थात् मृत्यु तक की अवधि को अपने में शामिल करती है। सामान्यत: इस अवस्था को वृद्धावस्था माना जाता है, जिसमें व्यिक्त् को अपने स्वास्थ्य, समाज एवं परिवार के साथ समयोजन, अपनी उम्र के लोगों के साथ संबंध स्थापित करना इत्यादि अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस अवस्था में व्यक्ति भविष्य की ओर ध्यान न देकर अपने अतीत की सफलताओं एवं असफलताओं का स्मरण एवं मूल्यांकन करता है। 

▪️एरिक्सन के अनुसार इस स्थिति में किसी नयी मनोसामाजिक शक्ति की उत्पत्ति नहीं होती है। एरिक्सन के मतानुसार परिपक्वता ही इस अवस्था की प्रमुख मनोसामाजिक शक्ति है। इस अवस्था में व्यक्ति वास्तविक अर्थों में परिपक्व होता है, किन्तु कुछ व्यक्ति जो अपनी जिन्दगी में असफल रहते है। वे इस अवस्था में चिन्तित रहने के कारण निराशाग्रस्त रहते हैं तथा अपने जीवन को भारस्वरूप समझने लगते हैं। यदि यह निराशा और दुश्चिन्ता लगातार बनी रहती है तो वे मानसिक विषाद से ग्रस्त हो जाते है। 

▪️इस प्रकार स्पष्ट है कि एरिक्सन के अनुसार मनोसामाजिक विकास की आठ अवस्थायें है जिनसे होते हुये क्रमश: मानव का व्यक्तित्व विकसित होता है। 

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    Notes By-‘Vaishali Mishra’

☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️ किशोरावस्था(Adolescence)  पहचान बनाम पहचान  भ्रांति /अहम पहचान बनाम भूमिका   भ्रांति (Ego identity vs Role confusion 12 to 20 y)–

 🌍 किशोरों में सामाजिकता के  विभिन्न पहलू विकसित होते हैं। जिससे वह अपनी एक समृद्ध पहचान बनाने में सक्षम  होते हैं। एरिक्सन का कहना है कि जब किशोर अपनी पहचान बना लेता है ।यह भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होनेवाले समस्या का समाधान कर लेता है। तो उसमें कर्तव्यनिष्ठा नामक सामाजिक शक्ति आ जाती है ।

“कर्तव्यनिष्ठ”

 किशोरों में समाज की विचारधारा मानक शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता ।

💥एरिक्सन के अनुसार– जो किशोरों में कर्तव्यनिष्ठ पता होती है ।यह उनके व्यक्तित्व के विकास को इंगित करता है  ।

➡️तरुण वयस्कता Early adulthood /आत्मीयता बनाम अलगाव/ घनिष्ट  बनाम विलगन (20 to 30 )

इस उम्र में व्यक्ति विवाह के प्रारंभिक  पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है इस अवस्था में व्यक्ति स्वतंत्र रूप से अपना जीविकोपार्जन शुरू कर देता है। समाज के सदस्य भाई-बहन अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ  संबंध स्थापित करता है ।स्वयं के साथ भी घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

 अगर व्यक्ति इन सभी कार्यों में सक्षम नहीं हो पाता तो व्यक्ति अपने आप में ही हुए रहता है। दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर  सकता है।  इसे अलगाव या विलन कहा जाता है।

🌲 विलगन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनोविकार और गैर सामाजिक हो जाता है।

 ➡️मध्य वयस्कता / उत्पादकता बनाम स्थिरता /जनन आत्मक बनाम स्थिरता (productive vs sustainability 30 to 65 y)

💥इस समय पर लोगों में उत्पादकता की भावना आ जाती है भावी पीढ़ी के कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं समाज को उन्नत बनाने की की कोशिश करते हैं ।

इस अवस्था में व्यक्ति स्वयं के तथा परिवार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखता है और अपनी आवश्यकता के बारे में ही सोचता है ।

💥मनोसामाजिक–  शक्ति देखभाल जिससे दूसरे की सुख सुविधा के बारे में सोचने लगता है ।

🌲अगर 30 65 में उत्पादक  ना हो तो स्थिरता आ जाती है। स्थिरता यह जीवन में संघर्ष करने के लिए मजबूर कर देता है।

➡️ परिपक्वता( maturity) संपूर्णता बनाम निराशा ( Identity vs despair 65 से जीवन की अंतिम अवस्था तक/ वृद्धावस्था) 

🌲व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य समाज परिवार के साथ संयोजन करना पड़ता है। और अपने उम्र के लोगों के साथ व्यवहारिक संबंध स्थापित करते हैं ।

💥इस उम्र में अनेक चुनौतियां का सामना भी करना पड़ता है ।

💥इस अवस्था में व्यक्ति भविष्य के बारे में ना सोच कर वहां भूतकाल अतीत से प्राप्त सफलताओं तथा असफलताओं को स्मरण करता है ।और उनका मूल्यांकन करता है ।

🌍एरिकसन कहते हैं ।कि कोई मनोसामाजिक संस्कृति उत्पन्न नहीं होती ।

वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख मनोसामाजिक  शक्ति है अब वास्तव में आप परिपक्व होते हैं। कुछ व्यक्तिगत जिंदगी में असफल होते हैं।  इस अवस्था में उस चिंता के कारण  निराशा ग्रस्त रहते हैं। वह अपने जीवन को बाहर समझने लगते हैं और

 निराशा दुश्चिंता बनी रहती है। 

🌲मानसिक विषाद से  ग्रस्त होते हैं।

☘️☘️🌴🌴🌻🌻🦚🦚🌺🌺🌲🌲💥♦️♦️📚Notes by poonam sharma

🌸🔅एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत🔅🌸➖️➖️➖️➖️➖️

🌸एरिक्सन के अनुसार मनोसामाजिक सिद्धात कई चरणों में होते हैं मनोसामाजिक से आशय

  🔅मन +समाज➖️

🔅मन – व्यक्तिगत सोच

🔅समाज -चारों ओर का वातावरण

🌲एरिक्सन के अनुसार मन का व्यक्तित्व एक बार में नहीं होता यह चरणों में होता है इसके 8 चरण होते हैं➖️

🌲शैशवावस्था

(0से 1 वर्ष) विश्वास अविश्वास

🌲प्रारंभिक बाल्यावस्था( 1 से 3 वर्ष

)स्वायत्तता बनाम शर्म लज्जा सिलता

🌲खेल की अवस्था (3 से 6 वर्ष)

 पहल शक्ति बनाम अपराध बोध

पहल शक्ति वनाम दोषिता 

 🌲स्कूल अवस्था (6 से 12 वर्ष )

परिश्रम उधम बनाम हीनता भावना

 🌲किशोरावस्था  -( 12 से 20 )

पहचान बनाम पहचान भ्रांति अहं पहचान बनाम भूमिका भ्रांति

🌲तरुण व्यस्तता  – आत्मीयता बनाम अलगाव

घनिष्टता बनाम विलगन( 20 से 30 वर्ष)

🌲मध्य व्यस्तता- उत्पादकता बनाम स्थिरता,जनन आत्मक बनाम स्थिरता (30 से 65 वर्ष)

🌲परिपक्वता -संपूर्णता बनाम निराशा (65 – जीवन की अंतिम अवस्था)

🌲शैशवावस्था( 0 से 1 बार )

विश्वास बनाम अविश्वास

यह अवस्था  फ्राइडे के मनो लैंगिक सिद्धांत के मुखावस्था से समानता रखती है

✏️एरिक्शन का मानना है कि इस व्यवस्था जीरो से 1 वर्ष रहती है परीक्षण के अनुसार बच्चे में धनात्मक विकास होता है बच्चों को स्वयं एवं दूसरों के प्रति विश्वास आस्था श्रद्धा की भावना जागृत होती है इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य व्यक्तित्व का विकास होता है

अगर मां के द्वारा समुचित पालन पोषण नहीं बुआ और मां बच्चों की तुलना में दूसरे कार्यों में व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है तो बच्चों में  हीनता ,अविश्वास, डर,आशंका ,ऋणात्मक, गुण विकसित होने लगते हैं

फिर उन्होंने कहा कि जब शेष अवस्था में बच्चा विश्वास बना अविश्वास के द्वंद का ठीक-ठीक सही ढंग से विकास कर लेता है तो उसमें आशा नामक मनोसामाजिक शक्ति विकसित होती है

आशा का मतलब यह एक ऐसी शक्ति है जिसके कारण बच्चों में अपने अस्तित्व या जो उसका सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से समझने की क्षमता विकसित करता है

🌲प्रारंभिक बाल्यावस्था (1-3year)

स्वायत्तता बनाम शर्मा

लज्जा शीलता➖️

✏️यह फ्रॉयड के मनौलैंगिक विकास के गुदावश्था से समानता रखते हैं

अगर माता-पिता अपना नियंत्रण रखते हुए स्वयं से कार्य करने की अनुमति देते हैं तो बालक स्वतंत्र रूप से विकसित होता है तथा धनात्मक विकास होता है

माता-पिता अपना नियंत्रण रखकर इच्छा अनुसार कार्य करने दे बालकों को

 अगर माता-पिता बच्चों को स्वतंत्र रूप से नहीं छोड़ेंगे तो बच्चों में लज्जा शीलता आ जाती है और उसको अपने ऊपर शक हो जाता है आत्म हीनता अपने ऊपर शक करने लगता है यह स्वस्थ व्यक्तित्व की निशानी नहीं है

✏️एरिक्शन के अनुसार जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम लज्जा शीलता के द्वंद को दूर कर लेता है तो उसमें जो शक्ति उत्पन्न होता है जो मनौ सामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है उसे इच्छाशक्ति का नाम दिया गया

 इच्छा शक्ति    इसका आशय ऐसी शक्ति से है जिसके कारण बच्चे अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है तथा साथ ही उसमें आत्म नियंत्रण, आत्म संयम, का गुण भी आता है

🌲खेल अवस्था पहल बनाम अपराध बोध पहल शक्ति बनाम दोशिता (3-6year)➖️

इस उम्र में  बच्चा ठीक ढंग से बोलना, चलना,दौड़ना,खेलना,कूदने,नए कार्य करना, घर से बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नई नई जिम्मेदारी निभाने लगता है

 इन सब से बच्चों को खुशी मिलती है

इस उम्र में बच्चे को पहली बार यह लगने लगता है कि कोई जिंदगी का  मकसद है उस मकसद या लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है

 लेकिन इसके विपरीत जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्य में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य के लिए इन कार्य के लिए उन्हें दंडित किया जाता है तो बच्चों में अपराध की भावना जागृत होने लगती है

इस प्रकार के बच्चों में लैंगिक नपुंसकता और निष्क्रियता की प्रकृति जन्म लेती है

✏️एरिक्शन के अनुसार जब बच्चा पहलशक्ति बनाम        दोषिता का सफलतापूर्वक कर लेता है

तो उसमें “उद्देश्य “नामक नई मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है

 🌲स्कूल अवस्था परिश्रम बनाम हीनता भावना➖️

✏️यह फ्रॉयड की मनोलेंगिक विकास की अवस्था वेयश्कता की अवस्था है इसमें पहली बार औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं आसपास के लोगों के व्यवहार कैसे बातचीत करना है

व्यावहार कौशल सीखते हैं उनमें परिश्रम की भावना आती है

उनमें शिक्षक पास पड़ोस से भी परिश्रम की भावना विकसित होती है

लेकिन अगर यह नहीं हुआ किसी कारणवश तो स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगते हैं

आत्म हीनता की भावना

अगर परिश्रम बनाम हीनता में संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो  “समर्थता “नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है

🌲किशोरावस्था   (12-20)

पहचान बनाम पहचान

अहं पहचान बना भूमिका भ्रान्ति➖️

किशोरावस्था में सामाजिकता में विभिन्न पहलू विकसित होते हैं जिसमें वह अपनी एक सूद्रढ पहचान बनाने में सक्षम होते हैं

✏️एरिक्सन का कहना है   कि जब किशोरावस्था  अपनी पहचान बना लेता है या भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होने वाले समस्या को समाधान कर लेता है

तो उसमें “कर्तव्यनिष्ठा” नामक सामाजिक शक्ति आती है

कर्तव्यनिष्ठा मतलब    -किशोरों में समाज की विचारधारा मानक शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता को कहते हैं

✏️एरिक्सन कहते है किशोरों में कर्तव्यनिष्ठा उनके व्यक्तित्व का विकास को इंगित करता है

🌲तरुण आवश्यकता(20-30) आत्मीयता बनाम अलगाव घनिष्ठता बनाम बिलगन

 ➖️इस उम्र में व्यक्ति विवाह की प्रारंभिक पारिवारिक जीवन में प्रवेश  करते हैं इस अवस्था में स्वतंत्र रूप से जीविकोपार्जन शुरू कर देते हैं

 समाज के सदस्य, भाई-बहन,अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है इसके साथ साथ व्यक्ति स्वयं के साथ भी घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है

अगर व्यक्ति इन कार्यों में समझ नहीं हो पाती है तो व्यक्ति अपने आपको में खोए रहते हैं दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाते हैं इसे अलगाव या बलगन कहा जाता है

 अगर बिलगन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनो विकारी और गैर सामाजिक हो जाता है

🌲मध्यव्यश्कता (30-65)

उत्पादकता बनाम स्थिरता जननात्मक बनाम स्थिरता ➖️इस उम्र में बच्चों में उत्पादकता की भावना

 भावी पीढ़ी के लिए कल्याण समाज को उन्नत बनाने की कोशिश

स्वयं परिवार की सुरक्षा सुविधा अपनी आवश्यकता आदि का विकास होने लगता है

मनोसामाजिक शक्ति “देखभाल” नामक शक्ति का विकास होता है

व्यक्ति दूसरों की खुशी सुख सुविधा और कल्याण के बारे में सोचता है अगर 30 से 65 में उत्पादक ना हो तो उसमें स्थिरता आ जाती है जीवन से संघर्ष करने पर मजबूर कर देता है

🌲परिपक्वता( 65-जीवन पर्यन्त)➖️

 संपूर्णता बनाम निराशा

➖️ इस अवस्था  को वृद्धावस्था भी बोलते हैं

यह जीवन की अंतिम अवस्था होती है

इसमें स्वास्थ्य परिवार समाज के साथ समायोजन करना है इस उम्र में अपनी उम्र के लोगों के साथ व्यावहारिक संबंध स्थापित करते हैं

 उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है

 इस अवस्था में व्यक्ति भविष्य की ओर ध्यान ना देकर अतीत की अवस्थाओं पर याद करते हैं

✏️एरिक्सन कहते हैं➖️ कि कोई मनोसामाजिक संस्कृति उत्पन्न नहीं होती है वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख मनोसामाजिक सकती है वास्तविक वास्तव में आप ही परिपक्व होते हैं कुछ व्यक्ति जो जिंदगी में असफल होते हैं इन अवस्था चिंता के कारण निराश ग्रस्त रहते हैं अपने जीवन को भार समझते हैं निराशा दुश्चिंता बनी रहती है मानसिक विषाद से ग्रस्त होते हैं

Notes by sapna yadav📝📝📝📝📝📝📝

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🈵 एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत➖ 

एरिक्सन ने मनोसामाजिक विकास की 8 अवस्थाएं बताई हैं इन 8 अवस्थाओं में अलग-अलग प्रकार से मनुष्य का व्यक्तित्व विकास होता है जो कि निम्न प्रकार से है ➖

1) विश्वास बनाम अविश्वास (शैशावस्था) ➖0-1 वर्ष 

2)  स्वतंत्रता बनाम शर्म ( प्रारंभिक बाल्यावस्था) ➖1 – 3 वर्ष 

3) पहल शक्ति बनाम अपराध बोध (खेल अवस्था ) ➖3 – 6 वर्ष

4)  परिश्रम बनाम हीन भावना (स्कूल अवस्था) ➖ 6 – 12 वर्ष 

5) पहचान बनाम  भूमिका भ्रांति (किशोरावस्था ) ➖12 – 20 वर्ष 

6) आत्मीयता बनाम अलगाव (तरुण वयस्कता) ➖ 20 – 30 वर्ष 

7) उत्पादकता बनाम स्थिरता( मध्य व्यस्कता)  ➖ 30 – 65 वर्ष

 8) संपूर्णता बनाम निराशा ( परिपक्वता) ➖ 65 से जीवन की अंतिम अवस्था तक 

📛 पहचान बनाम पहचान भ्रांति / अहम् पहचान बनाम भूमिका भ्रांति ( Ego identity vs role confusion

किशोरावस्था( Adolescence) ➖ 12 – 20 वर्ष

किशोरों में सामाजिकता के विभिन्न पहलू विकसित होते हैं जिससे वह अपनी एक सुदृढ़ पहचान बनाने में सक्षम होते हैं |

      एरिक्सन का कहना है कि जब किशोर अपनी पहचान बना लेता है या भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होने वाली समस्या का समाधान कर लेता हैं तो उसमें “कर्तव्यनिष्ठता” नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है  |

       “कर्तव्यनिष्ठाता ” किशोरों में समाज की विचारधारा, मानक, शिष्टाचार के अनुरूप कार्य करने की क्षमता के अनुसार होती है |

    एरिक्सन कहते हैं कि किशोरों में कर्तव्यनिष्ठाता उनके व्यक्तित्व विकास को इंगित करता है |

📛 आत्मीयता बनाम अलगाव/  घनिष्ठता बनाम विलगन (Intimacy vs isolation)

तरुण वयस्कता Early adulthood) ➖ 20 -30 वर्ष 

इस उम्र में  व्यक्ति विवाह के प्रारंभिक पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है इस अवस्था में व्यक्ति स्वतंत्र रूप से जीविकोपार्जन शुरू कर देता है और उसके साथ-साथ समाज के सदस्य भाई-बहन एवं अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है तथा व्यक्ति स्वयं  के साथ भी घनिष्ट संबंध स्थापित कर लेता है |

        अगर व्यक्ति इन कार्यों में सक्षम नहीं हो पाता है तो वह अपने आप मेंही खोए  रहता है एकाकीपन में चला जाता है खुद को अकेला महसूस करता है तथा दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाता है इसे अलगाव या विलगन कहा जाता है |

             विलगन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनोविकारी और गैर सामाजिक हो जाता है  |

📛 उत्पादकता बनाम स्थिरता/  जननात्मकता बनाम स्थिरता ( Productivity vs sustainability) 

मध्यवयस्कता  ( Middle adulthood)➖ 

30 – 65 वर्ष

इस उम्र में व्यक्ति उत्पादकता की भावना में रहता है भाभी पीढ़ी के कल्याण के बारे में सोचता है समाज को उन्नत बनाने की कोशिश करता है और  परिवार एवं स्वयं की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की कोशिश करता है |

       एरिक्सन कहते हैं कि यहां  “देखभाल” नामक मनोसामाजिक शक्ति का जन्म होता है  जिसके कारण व्यक्ति दूसरों के सुख सुविधा और कल्याण के बारे में सोचता है |

    एरिक्सन कहते हैं कि यदि इसके विपरीत उत्पादकता ना हो तो इस उम्र में स्थिरता आ जाती है जो संघर्ष करने पर मजबूर कर देता है |

 📛 संपूर्णता बनाम निराशा 

 परिपक्वता (Maturity) ➖65 से जीवन की अंतिम अवस्था तक

इस अवस्था में व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य, परिवार और समाज के साथ समायोजन करना पड़ता है |

     अपनी उम्र के लोगों के साथ पारिवारिक संबंध स्थापित करते हैं उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है तथा व्यक्ति भविष्य की ओर ध्यान ना देकर अतीत की सफलता और असफलता का मूल्यांकन करता है  |

          एरिक्सन कहते हैं कि  इस अवस्था में कोई मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न नहीं होती है वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख शक्ति है |अब वास्तव में व्यक्ति परिपक्व होता है |

         इसके  विपरीत कुछ व्यक्ति जो जिंदगी में असफल होते हैं तो भी इस अवस्था में चिंता के कारण निराशाग्रस्त रहते हैं वे उनके जीवन  को भार समझते हैं उनमें सदैव निराशा और दुश्चिंता बनी रहती है तथा मानसिक विषाद से ग्रस्त होते हैं  |

नोट्स बाय  ” रश्मि सावले “

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एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत

एरिक्सन ने अपने मनोसामाजिक सिद्धांत मे व्यक्ति की आठ अवस्थाओं का वर्णन किया है

1. शैशवावस्था -जन्म से लेकर 1 वर्ष तक

विश्वास बनाम अविश्वास

2. प्रारंभिक बाल्यावस्था -1 वर्ष से 3 वर्ष तक

स्वतंत्रता बनाम शर्म

3. खेल अवस्था- 3 से लेकर 6 वर्ष तक

पहल शक्ति बनाम दोषिता

4.  स्कूल अवस्था- 6 वर्ष से लेकर 12 वर्ष तक

परिश्रम बनाम हीनता

5. किशोरावस्था- 12 से 20 वर्ष तक

पहचान बनाम पहचान भ्रांति

अहं पहचान बनाम भूमिका भ्रांति

Ego identity Vs role confusion

इस अवस्था में किशोरों में सामाजिकता के विभिन्न पहलु विकसित होते हैं। जिससे वह अपनी एक सुदृढ़ पहचान बनाने में सक्षम होते हैं

एरिक्सन का कहना है कि जब किशोर अपनी पहचान बना लेता है या भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होने वाली समस्या का समाधान कर लेता है तो उसमें *कर्तव्यनिष्ठता* नामक मनोसामाजिक शक्ति आती है।

कर्त्तव्यनिष्ठता –  किशोरों में समाज की विचारधारा ,मानक, शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता

एरिक्सन के अनुसार, किशोरो में कर्तव्यनिष्ठता उनके व्यक्तित्व विकास को इंगित करती है।

6. तरुण वयस्कता -20 से 30 वर्ष तक

आत्मीयता बनाम अलगाव

घनिष्ठता बनाम विलगन/अकेलापन

इस उम्र में व्यक्ति विवाह के प्रारंभिक पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है।

इस अवस्था में स्वतंत्र रूप से जीविकापार्जन शुरू कर देते हैं।

समाज के सदस्य ,भाई-बहन ,अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

व्यक्ति स्वयं के साथ भी घनिष्ठ  संबंध स्थापित करता है।

अगर

व्यक्ति इन कार्यों को करने में सक्षम नहीं हो पाता है।

तो व्यक्ति अपने आप में खोया रहता है।

दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाता है।

इसे ही अलगाव या विलगन कहा जाता है।

विलगन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनोविकारी और गैर सामाजिक हो जाता है।

7. मध्यवयस्कता -30 से 65 साल तक

उत्पादकता बनाम स्थिरता

जननात्मकता बनाम स्थिरता

इस उम्र में व्यक्ति में

उत्पादकता की भावना

भावी पीढ़ी के कल्याण की सोच

समाज को उन्नत बनाने की कोशिश करना

स्वयं और  परिवार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखना

अपनी आवश्यकता को पूरा करने की कोशिश करता है।

अगर 

व्यक्ति 30 से 65 साल की उम्र में उत्पादक ना हो तो उसके जीवन में स्थिरता आ जाती हैं जो व्यक्ति को जीवन से संघर्ष करने पर मजबूर कर देती है।

एरिक्सन का कहना है कि जब व्यक्ति उत्पादक बन जाता है तब उसमें *देखभाल* की मनोसामाजिक शक्ति आती है।

देखभाल -व्यक्ति दूसरों की सुख सुविधाओं और कल्याण के बारे में  सोचता है।

8.  परिपक्वता या वृद्धावस्था – 65 वर्ष से जीवन की अंतिम अवस्था तक

संपूर्णता बनाम निराशा

इस अवस्था में व्यक्ति

अपने स्वास्थ्य, परिवार एवं समाज के साथ समायोजन 

करता है

अपनी उम्र के लोगों के साथ व्यावहारिक संबंध स्थापित करते हैं।

अनेक चुनौती का सामना करता है।

व्यक्ति अपने भविष्य की ओर ध्यान न देकर अतीत की सफलता असफलता का मूल्यांकन करता है।

एरिक्सन कहते हैं कि इस अवस्था में कोई मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न नहीं होती है

वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख मनोसामाजिक शक्ति हैं अब वास्तव में आप परिपक्व होते हैं।

कुछ व्यक्ति जो जिंदगी में असफल होते हैं वह इस अवस्था में उस चिंता के कारण निराशाग्रस्त हो जाते हैं

अपने जीवन को भार समझते हैं

निराशा और दुश्चिंता बनी रहती है

मानसिक विषाद से ग्रस्त होते हैं।

Notes by Ravi Kushwah

🌼🌸 Erik Erikson 🌸🌼

🌼🌸 एरिक एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत 🌸🌼

✳️ शैशवास्था

विश्वास बनाम अविश्वास

जन्म से 1 वर्ष

✳️ प्रारंभिक बाल्यावस्था

     स्वायत्तता बनाम शर्म

     1-3 वर्ष

✳️ खेल अवस्था

     पहल बनाम अपराध बोध।    

     3-6 वर्ष     

✳️ स्कूल अवस्था

     परिश्रम /उद्यम बनाम हीन भावना

     6-12 वर्ष

✳️ किशोरावस्था adolescence

पहचान बनाम पहचान भ्रांति  

अहं पहचान बनाम भूमिका भ्रांति

Ego Identity versus role confusion

Age 12-20 years

🔺 किशोरों में सामाजिकता के विभिन्न पहलु विकसित होते हैं जिससे वह अपनी एक सुदृढ़ पहचान बनाने में सक्षम होते हैं।

एरिक्सन का कहना है कि जब किशोर अपनी पहचान बना लेता है या भूमिका भ्रांति से उत्पन्न होने वाले समस्या का समाधान कर लेता है तो उसमें कर्तव्यनिष्ठता नामक मनोसामाजिक शक्ति आती है ।

कर्तव्यनिष्ठता

 किशोरों में समाज की विचारधारा, मानक, शिष्टाचार के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता।

 एरिक्सन के अनुसार किशोरों में कर्तव्यनिष्ठता उनके व्यक्तित्व विकास को इंगित करता है।

✳️ तरूण व्यस्क था early adulthood

आत्मीयता बनाम अलगाव घनिष्ठता बनाम विलगन 

Intimacy vs isolation

 20-30  वर्ष

इस उम्र में व्यक्ति विवाह के प्रारंभिक पारिवारिक जीवन में प्रवेश करते हैं।

इस अवस्था में व्यक्ति स्वतंत्र रूप से अपना जीवकोपार्जन शुरू कर देते हैं।

समाज के सदस्य भाई-बहन अन्य संबंधी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

व्यक्ति स्वयं के साथ भी घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है।

 अगर व्यक्ति में इन सभी कार्यों में सक्षम नहीं हो पाता तो व्यक्ति अपने आप में खोया रहता है।

 दूसरे के साथ संतोषजनक संबंध कायम नहीं कर पाता इसे अलगाव या विलगन कहा जाता है।

विलगन की मात्रा अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार मनोविकारी और गैर समाजिक हो जाता है।

✳️ मध्य व्यस्कता  middle adulthood

उत्पादकता बनाम स्थिरता 

जननात्मकथा बनाम स्थिरता

30-65 वर्ष

– उत्पादकता की भावना होती है।

 – अपनी भावी पीढ़ी के कल्याण की सोचती है ।

– समाज को उन्नत बनाने की कोशिश करते हैं ।

– स्वयं परिवार की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हैं।

– अपने समाज को उन्नत बनाते हैं । 

अगर इन सभी कार्यों में सक्षम हो जाता है तो उसके अंदर “देखभाल “नामक समाजिक शक्ति का सृजन होता है ।

देखभाल — व्यक्ति दूसरों की सुख सुविधा और कल्याण के बारे में सोचता है।

अगर 30 से 65 वर्ष में उत्पादकता बाद ना हो तो स्थिरता जाती है स्थिरता जीवन में संघर्ष करने पर मजबूर कर देता है।

✳️ वृद्धावस्था /परिपक्वता maturity

 संपूर्णता बनाम निराशा

Integrity vs despair

65 से जीवन की अंतिम अवस्था तक 

-इस उम्र में व्यक्ति स्वास्थ्य, परिवार एवं समाज के साथ फिर से समायोजन करने लगता है।

– अपने उम्र के लोगों के साथ व्यवहारिक संबंध स्थापित करते हैं।

– अनेक चुनौती का सामना करना।

– व्यक्ति भविष्य की ओर ध्यान न देकर अतीत की सफलता असफलता का मूल्यांकन करता

 है।

– इस उम्र में अतीत के बारे में चर्चा करना सुखद होता है अगर साकारात्मक जीवन रहा है तो अपनी सारी बातों को लोगों से साझा करता है।

एरिक्सन के अनुसार इस समय उन्में कोई मनोसामाजिक संस्कृति  उत्पन्न नहीं होती।

 वास्तव में परिपक्वता ही प्रमुख मनोसामाजिक शक्ति है अब वास्तव में आप परिपक्व होते हैं।

 कुछ व्यक्ति जो जिंदगी में असफल होते हैं वे इस अवस्था  में उस चिंता के कारण निराशाग्रस्त रहते है।

अपने जीवन को भार समझने लगते हैं।

 निराशा , दुश्चिंता बनी रहती है।

 मानसिक  निषाद से ग्रस्त होते हैं।

 धन्यवाद 

वन्दना शुक्ला 🌺

By admin

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