23 मार्च 2021……………शनिवार

            TODAY CLASS 

  एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत

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मन➖हमारा व्यक्तिगत सोच

समाज➖हमारे चारो ओर का वातावरण 

🙏इन दोनो का संबंध ही एक इन्सान का अस्तीत्व है🙏

➖प्रत्येक मनोवैज्ञानिक मे जिन्होने भी व्यक्तित्व के बारे मे बात की सब ने बताया। तब एरिक्सन ने बोला मानव का व्यक्तित्व एक बार में विकसित नहीं होता यह चरणों में विकसित होता है इन्होंने कुल 8 अवस्थाएं बताएं हैं

 इन  8 अवस्थाओं में अलग-अलग प्रकार से मनुष्य का व्यक्तित्व विकास होता हैजो निम्नलिखित है….

(1)➖शैशवावस्था (0 से 1वर्ष) विश्वास बनाम अविश्वास

(2)➖ प्रारंभिक बाल्यावस्था(1 से 3वर्ष) स्वायत्तता बनाम शर्म

(3)➖ खेल की अवस्था(3 से 6 वर्ष) पहलशक्ति बनाम अपराध बोध

(4)➖ स्कूल अवस्था(6 से 12 वर्ष) परिश्रम बनाम उद्यमिता/ हीनता

(5)➖ किशोरावस्था (12 से 20 वर्ष ) पहचान बनाम पहचान भ्राति /भुमिका भ्राति

(6)➖ तरूपा वयस्कता (20 से 30 वर्ष) घनिष्ठता /आत्मीयता बनाम अलगाव

(7)➖ मध्यव्यस्क्ता  (30 से 65 वर्ष) उत्यादक्ता बनाम स्थिरता

(8)➖ वृद्धावस्था/ परिपक्वता (65. से जीवन के अंत तक) संपूर्णता बनाम निराशा

🔥1️⃣ शैशवावस्था ( 0 से 1वर्ष ) विश्वास बनाम विश्वास

➖ यह प्रथम अवस्था फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत के व्यक्तित्व विकास की प्रथम अवस्था (मुख अवस्था) से समानता रखती है

➖ एरिकसन की मान्यता है कि शैशवावस्था की आयु जन्म से 1 वर्ष रहती है ।इस उम्र मे जब माँ के द्वारा बच्चे की देखभाल जब पर्याप्त मात्रा में की जाती है तो

➖एरिक्सन के अनुसार :—बच्चों में धनात्मक विकास होती है तब बच्चों को स्वयं एवं दूसरों के प्रति विश्वास, आस्था, श्रद्धा की भावना जागृत होती है इससे बच्चों का स्वस्थ्य व्यक्तित्व का विकास होता है

❎ लेकिन इनके विपरीत

➖ मां के द्वारा अगर समुचित पालन पोषण नहीं है तो मां बच्चों की तुलना में दूसरे कार्य हो और व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है तो ऐसे में बच्चों में अविश्वास हीनता डर असम का एशिया का जन्म हो जाएगा तो बच्चों के अंदर ऋणात्मक गुण आ जाता है 

➖ एरिकसन:—-

 जब शैशवावस्था में बच्चा विश्वास बना और विश्वास का द्वंद का समाधान सही ढंग से कर लेता है तो उसमें “आशा “नामक मनो सामाजिक शक्ति  विकसित होती है ये एक ऐसी समझ,शक्ति है जिसके कारण बच्चों में अपने अस्तित्व एवं उनके सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से समझने की क्षमता विकसित करता है

🔥2️⃣ प्रारंभिक बाल्यावस्था (1 से 3 वर्ष ) स्वायत्तता बनाम शर्म/ लज्जा

➖ यह फ्रायद के मनोलैंगिक विकास के ( गुदा अवस्था) से समानता रखती है

➖ माता पिता अपने नियंत्रण रखते हुए बच्चे को इच्छा अनुसार कार्य करने दे

❎लेकिन इसके विपरीत

➖माता-पिता बच्चों को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाए तो लज्जाशीलता आ जाएगी और अपने ऊपर शक होने लगेगा ,आत्म हीनता आ जाती है, जो यह स्वस्थ व्यक्तित्व की निशानी नहीं है

➖एरिक्सन के अनुसार:—

जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम  लज्जाशीलता के द्वंद को दूर कर लेता है इसमें जो मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है उसे (इच्छाशक्ति )का नाम दिया।

➖ इच्छा शक्ति से इसका आशय एक एसी शक्ति से है जिसके कारण बच्चा अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है तथा साथ ही उसमें आत्मनियंत्रण /आत्म संयम का गुण भी आता है

3️⃣खेल की अवस्था (3 से 9 वर्ष ) पहल शक्ति बनाम अपराध बोध/ दोषित 

➖ यह फ्राइड के मनो लैंगिक विकास की तीसरी अवस्था लैंगिक प्रधानाअवस्था से मिलती है

➖ इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना, खेलना, चलना ,दौड़ना, नए कार्य करना ,घर के बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नई नई जिम्मेदारी निभाने लगता है

➖ इन सब से बच्चे को खुशी मिलती है पहली बार उनको लगता है कि उनकी जिंदगी का कोई मकसद है। उन्हें उस मकसद दिया लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।

❎ लेकिन इसके विपरीत

➖ जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्य में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य के लिए अगर दंडित किया जाता है तो उसे अपराध बोध की भावना जन्म लेने लगती है

➖ इस प्रकार के बच्चों में लैंगिक नपुंसकता और निष्क्रियता की प्रवृत्ति जन्म लेती है

➖ एरिक्सन के अनुसार:—

जब बच्चा पहल सकती बनाम दोषित का सफलतापूर्वक हल कर लेता है तो उसमें “उद्देश्य “नामक नई मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है

🔥4️⃣ स्कूल अवस्था (6 से 12 वर्ष)  परिश्रम उधम बनाम हीन भावना

➖ यह फ्राइड की मनो लैंगिक विकास की अवयक्त अवस्था से जुड़ा है

➖ पहली बार बच्चे औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं आसपास के लोगों से व्यवहार सिखना ,कैसे बातचीत करना है, व्यवहार कौशल कैसा होना चाहिये, उनमें परिश्रम की भावना आती है, शिक्षक ,पास -परोस से भी परिश्रम की भावना विकसित होती है

❎ लेकिन इसके विपरीत

अगर किसी कारण बस यह नहीं हुआ तो बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है जिससे उसमें आत्म  हीनता की भावना आ जाती है, स्वस्थ्य व्यक्तित्व बाधक हो जाएगा 

➖ एरिक्सन के अनुसार:—

अगर बच्चा परिश्रम बनाम हीनता के संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो “सामर्थ्यता” नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है

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✍✍✍Notes by:— संगीता भारती✍✍ ✍

🔆 एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत

(Erickson =Psycho +Social Theory)

एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की आठ अवस्थाएं बताई गई है इन अवस्था में अलग-अलग प्रकार से मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास होता है।

🔆 मनोसामाजिक विकास की अवस्थायें-

▪️प्रत्येक मनोवैज्ञानिक ने अपने-अपने सिद्धान्त में व्यक्तित्व की विकास की कुछ अवस्थायें बतायी है, जो क्रमश: एक के बाद एक आती है और उनसे होकर मानवीय व्यक्तित्व क्रमश: विकसित होता जाता है। इसी क्रम में एरिक्सन ने भी मनोसामाजिक विकास की आठ अवस्थाये बतायी है, जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकार से मानवीय व्यक्तित्व विकसित होता है। इन अवस्थाओं का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया गया है-

📍1शैशवावस्था: विश्वास बनाम अविश्वास (infancy: trust versus mistrust) 

📍2 प्रारंभिक बाल्यावस्था: स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता/स्वतंत्रता बनाम शर्म  (Early childhood: Autonomy versus shame) 

📍3 खेल अवस्था: पहल शक्ति बनाम दोषिता/पहल बनाम अपराध बोध (play age: initiative versus guilt) 

📍4 स्कूल अवस्था: परिश्रम बनाम हीनता/उद्यम बनाम हीनता (school age: indurtriy versus injeriority)

 इनका  वर्णन निम्न अनुसार है

❇️1 शैशवावस्था: विश्वास बनाम अविश्वास-

▪️ एरिक्सन के अनुसार मनोसामाजिक विकास की यह प्रथम अवस्था है, जो क्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त की व्यक्तित्व विकास की प्रथम अवस्था मुख्यावस्था से बहुत समानता रखती है।

▪️ एरिक्सन की मान्यता है कि शैशवावस्था की आयु “जन्म से लेकर लगभग 1 साल” तक ही होती है। 

▪️इस उम्र में माँ के द्वारा जब बच्चे का पर्याप्त देखभाल की जाती है, उसे भरपूर प्यार दिया जाता है तो एरिक्सन के अनुसार बच्चे में सर्वप्रथम धनात्मक गुण विकसित होता है। यह गुण है- बच्चे का स्वयं तथा दूसरों में विश्वास तथा आस्था की भावना का विकसित होना। यह गुण आगे चलकर उस बच्चे के स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास में योगदान देता है

▪️, किन्तु इसके विपरीत यदि माँ द्वारा बच्चे का समुचित ढंग से पालन-पोषण नहीं होता है, माँ बच्चे की तुलना में दूसरे कार्यों तथा व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है तो इससे उस बच्चे में अविश्वास, हीनता, डर , आशंका, ईष्र्या इत्यादि ऋणात्मक अहं गुण विकसति हो जाते हैं, जो आगे चलकर उसके व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते है। 

▪️एरिक्सन का मत है कि जब शैशवास्था में बच्चा विश्वास बनाम अविश्वास के द्वन्द्व का समाधान ठीक-ठीक ढंग से कर लेता है तो इससे उसमें “आशा” नामक एक विशेष मनोसामाजिक शक्ति विकसित होती है। 

▪️आशा का अर्थ है-” एक ऐसी समझ या शक्ति जिसके कारण शिशु में अपने अस्तित्व एवं स्वयं के सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से समझने की क्षमता विकसित होती है। 

❇️2 प्रारंभिक बाल्यावस्था: स्वतंत्रता बनाम लज्जा शीलता-

 ▪️ मनोसामाजिक विकास की दूसरी अवस्था है, जो लगभग 2 साल से 3 साल की उम्र तक की होती है। यह फफ्रायड के मनोलैंगिक विकास की “गुदाअवस्था” से समानता रखती है। 

▪️एरिक्सन का मत है कि जब शैशवावस्था में बच्चे में विश्वास की भावना विकसित हो जाती है तो इस दूसरी अवस्था में इसके परिणामस्वरूप् स्वतंत्रता एवं आत्मनियंत्रण जैसे शीलगुण विकसित होते है। स्वतंत्रता का अर्थ यहाँ पर यह है कि माता-पिता अपना नियंत्रण रखते हुये स्वतंत्र रूप से बच्चों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने दें। जब बच्चे को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाता है तो उसमें लज्जाशीलता, व्यर्थता अपने ऊपर शक, आत्महीनता इत्यादि भाव उत्पन्न होने लगते हैं, जो स्वस्थ व्यक्तित्व की निशानी नहीं है। 

▪️एरिक्सन के अनुसार जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता के द्वन्द्व को सफलतापूर्वक दूर कर देता है तो उसमें एक विशिष्ट मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे उसने “इच्छाशक्ति (will power) नाम दिया है। 

▪️एरिक्सन के अनुसार इच्छा शक्ति से आशय एक ऐसी शक्ति से है, जिसके कारण बच्चा अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है तथा साथ ही उसमें आत्मनियंत्रण एवं आत्मसंयम का गुण भी विकसित होता जाता है। 

❇️3. खेल अवस्था:- पहलशक्ति बनाम दोषिता-

▪️ मनोसामाजिक विकास की यह तीसरी अवस्था फ्रायड के मनोलैंगिक विकास की लिंगप्रधानवस्था से मिलती है। यह स्थिति 4 से 6 साल तक की आयु की होती है। 

▪️इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना, चलना, दोड़ना इत्यादि सीख जाते है। इसलिये उन्हें खेलने-कूदने नये कार्य करने, घर से बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नयी-नयी जिम्मेदारियों को निभाने में उनकी रूचि होती है। इस प्रकार के कार्य उन्हें खुशी प्रदान करते है। और उन्हें इस स्थिति में पहली बार इस बात का अहसास होता हघ्ै कि उनकी जिन्दगी का भी कोई खास मकसद या लक्ष्य है, जिसे उन्हें प्राप्त करना ही चाहिये।

▪️ किन्तु इसके विपरीत जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्यों में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य की इच्छा व्यक्त किये जाने पर उसे दंडित किया जाता है तो इससे उसमें अपराध बोध की भावना का जन्म होने लगती है।  

▪️इस प्रकार के बच्चों में लैंगिक नपुंसकता एवं निष्क्रियता की प्रवृति भी जन्म लेने लगती है। 

▪️एरिक्सन के अनुसार जब बच्चा पहलशक्ति बनाम दोषिता के संघर्ष का सफलतापूर्वक हल खोज लेता है तो उसमें उद्देश्य नामक एक नयी मनोसामाजिक शक्ति विकसित होती है। इस शक्ति के बलबूते बच्चे में अपने जीवन का एक लक्ष्य निर्धारित करने की क्षमता तथा साथ ही उसे बिना की सी डर के प्राप्त करने की सामथ्र्य का भी विकास होता है।

❇️4. स्कूल अवस्था: परिश्रम बनाम हीनता-

 ▪️मनोसामाजिक विकास की यह चौथी अवस्था 6 साल की उम्र से आरंभ होकर लगभग 12 साल की आयु तक की होती है। यह फ्रायड के मनोलैंगिक विकास की अव्यक्तावस्था से समानता रखती है। इस अवस्था में बच्चा पहली बार स्कूल के माध्यम से औपचारिक शिक्षा ग्रहण करता है। अपने आस-पास के लोगों, साथियों से किस प्रकार का व्यवहार करना, कैसे बातचीत करनी है इत्यादि व्यावहारिक कौशलों को वह सीखता है, जिससे उसमें परिश्रम की भावना विकसित होती है। यह परिश्रम की भावना स्कूल में शिक्षकों तथा पड़ौंसियों से प्रोत्साहित होती है, 

▪️किन्तु यदि किसी कारणवश बच्चा स्वयं की क्षमता पर सन्देह करने लगता है तो इससे उसमें आत्महीनता कीभावना आ जाती है, जो उसके स्वस्थ व्यक्तित्व विकास में बाधक बनती है। किन्तु यदि बच्चा परिश्रम बनाम हीनता के संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो उसमें सामथ्र्यता नामक मनोसामाजिक  शक्ति विकसित होती है। 

▪️सामथ्र्यता का अर्थ है- किसी कार्य का पूरा करने में शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं का समुचित उपयोग करना है।

✍️

     Notes By-‘Vaishali Mishra’

*एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत* ➖

*मनोसामाजिक = मन + समाज*

(मन➖व्यक्तिगत सोच)

(समाज➖चारो ओर का वातावरण )

💐एरिक्सन ➖ मानव का व्यक्तित्व एक बार में विकसित नहीं होता यह चरणों में विकसित होता है।

 इन्होंने कुल 8 चरण बताएं हैं—

1️⃣ शैशवावस्था ( 0 से 1वर्ष )

       *विश्वास 🆚 अविश्वास*

यह अवस्था *फ्रायड के मनोलैंगिक सिद्धांत के*  _*मुखावस्था*_ से समानता रखती है।

 एरिकसन की मान्यता है कि शैशवावस्था की आयु 0 से 1 वर्ष रहती है ।

🧠एरिक्सन के अनुसार :➖

बच्चों में *धनात्मक विकास होती है तब बच्चों को स्वयं एवं दूसरों के प्रति विश्वास, आस्था, श्रद्धा की भावना जागृत होती है इससे बच्चों का स्वस्थ्य व्यक्तित्व का विकास* होता है।

 लेकिन इनके विपरीत🕳️

मां के द्वारा अगर समुचित पालन पोषण नहीं है तो *मां अगर बच्चों की तुलना में दूसरे कार्य हो और व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है, तो ऐसे में बच्चों में अविश्वास, हीनता, डर , असमंजस का जन्म हो जाएगा जिससे बच्चों के अंदर ऋणात्मक गुण* आ जाता है ।

🧠एरिकसन :➖

 जब शैशवावस्था में बच्चा विश्वास और अविश्वास के द्वंद का समाधान सही ढंग से कर लेता है, तो उसमें *”आशा” नामक मनो सामाजिक शक्ति का विकसित* होती है।

 ये एक ऐसी शक्ति है, जिसके कारण बच्चों में अपने अस्तित्व एवं उनके सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से समझने की क्षमता विकसित होती है।

 2️⃣प्रारंभिक बाल्यावस्था (1 से 3 वर्ष ) 

*स्वायत्तता 🆚शर्म/लज्जाशीलता*

 *यह फ्रायड के मनोलैंगिक विकास के ( गुदावस्था) से समानता रखती है*।

अगर माता-पिता अपना नियंत्रण रखते हुए बच्चों को स्वयं से कार्य करने की अनुमति देते हैं, तो बालक स्वतंत्र रूप से विकसित होता है तथा उसमें धनात्मक विकास होता है।

लेकिन इसके विपरीत🕳️

माता-पिता के द्वारा बच्चों को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाए तो लज्जाशीलता आ जाएगी और अपने ऊपर शक होने लगेगा ,आत्म हीनता आ जाती है, जो की स्वस्थ व्यक्तित्व की निशानी नहीं है

🧠एरिक्सन के अनुसार :➖

जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम  लज्जाशीलता के द्वंद को दूर कर लेता है, तो *उसमें जो मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है, उसे (इच्छाशक्ति )* का नाम दिया।

 इच्छा शक्ति से इसका आशय एक एसी शक्ति से है, जिसके कारण बच्चा अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है। साथ ही उसमें आत्मनियंत्रण /आत्म संयम का गुण भी आता है।

3️⃣खेल की अवस्था (3 से 9 वर्ष ) पहल शक्ति 🆚 अपराध बोध/ दोषित 

यह *फ्रायड के मनोलैंगिक विकास की  लैंगिक प्रधानाअवस्था* से मिलती है।

 इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना, खेलना, चलना ,दौड़ना, नए कार्य करना ,घर के बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नई-नई जिम्मेदारी निभाने लगता है।

 इन सब से बच्चे को खुशी मिलती है ।पहली बार उनको लगता है कि उनकी जिंदगी का कोई मकसद है। उन्हें उस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।

 लेकिन इसके विपरीत🕳️

 जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्य में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य के लिए अगर दंडित किया जाता है तो उसमें अपराध बोध की भावना जन्म लेने लगती है।

 इस प्रकार के *बच्चों में लैंगिक नपुंसकता और निष्क्रियता की प्रवृत्ति जन्म* लेती है।

🧠एरिक्सन के अनुसार :➖

जब *बच्चा पहल शक्ति बनाम अपराध बोध का सफलतापूर्वक हल कर लेता है तो उसमें “उद्देश्य “नामक नई मनोसामाजिक शक्ति का विकास* होता है।

4️⃣ स्कूल अवस्था (6 से 12 वर्ष) 

 *परिश्रम/उधम 🆚 हीन भावना*

यह *फ्रायड की मनोलैंगिक विकास की   अव्यक्तता की अवस्था* से जुड़ा है।

 पहली बार बच्चे औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। आस-पास के लोगों से व्यवहार सिखना ,कैसे बातचीत करना है, व्यवहार कौशल कैसा होना चाहिये, उनमें परिश्रम की भावना आती है, शिक्षक ,पास-पड़ोस से भी परिश्रम की भावना विकसित होती है

 लेकिन इसके विपरीत🕳️

अगर किसी कारण बस *यह नहीं हुआ तो बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है, जिससे उसमें आत्म  हीनता की भावना आ जाती है, स्वस्थ्य व्यक्तित्व बाधक* हो जाता है। 

🧠एरिक्सन के अनुसार :➖

अगर बच्चा *परिश्रम बनाम हीनता के संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो “सामर्थ्यता” नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास* होता हैं। 

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🥰🥰 Deepika Ray 🥰🥰

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🔴💐💐*एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत💐💐🌴🌸

*मनोसामाजिक = मन + समाज*

(मन – मव्यक्तिगत सोच)

(समाज-चारो ओर का वातावरण )

💐एरिक्सन÷ मानव का व्यक्तित्व एक बार में विकसित नहीं होता यह चरणों में विकसित होता है।

 इन्होंने कुल 8 चरण बताएं हैं-

1💐. शैशवावस्था ( 0 से 1वर्ष )

       *विश्वास /अविश्वास*

यह अवस्था *फ्रायड के मनोलैंगिक सिद्धांत के*  _*मुखावस्था*_ से समानता रखती है।

 एरिकसन की मान्यता है कि शैशवावस्था की आयु 0 से 1 वर्ष रहती है ।

🔴एरिक्सन के अनुसार,”

बच्चों में *धनात्मक विकास होती है तब बच्चों को स्वयं एवं दूसरों के प्रति विश्वास, आस्था, श्रद्धा की भावना जागृत होती है इससे बच्चों का स्वस्थ्य व्यक्तित्व का विकास* होता है।”

👉🏻 लेकिन इनके विपरीत

मां के द्वारा अगर समुचित पालन पोषण नहीं है तो *मां अगर बच्चों की तुलना में दूसरे कार्य हो और व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है, तो ऐसे में बच्चों में अविश्वास, हीनता, डर , असमंजस का जन्म हो जाएगा जिससे बच्चों के अंदर ऋणात्मक गुण* आ जाता है ।

🔴एरिकसन ,”

 जब शैशवावस्था में बच्चा विश्वास और अविश्वास के द्वंद का समाधान सही ढंग से कर लेता है, तो उसमें *”आशा” नामक मनो सामाजिक शक्ति का विकसित* होती है।”

 ये एक ऐसी शक्ति है, जिसके कारण बच्चों में अपने अस्तित्व एवं उनके सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से समझने की क्षमता विकसित होती है।

 🔴प्रारंभिक बाल्यावस्था (1 से 3 वर्ष ) 

*स्वायत्तता शर्म/लज्जाशीलता*

 *यह फ्रायड के मनोलैंगिक विकास के ( गुदावस्था) से समानता रखती है*।

अगर माता-पिता अपना नियंत्रण रखते हुए बच्चों को स्वयं से कार्य करने की अनुमति देते हैं, तो बालक स्वतंत्र रूप से विकसित होता है तथा उसमें धनात्मक विकास होता है।

👉🏻लेकिन इसके विपरीत

माता-पिता के द्वारा बच्चों को स्वतंत्र नहीं छोड़ा जाए तो लज्जाशीलता आ जाएगी और अपने ऊपर शक होने लगेगा ,आत्म हीनता आ जाती है, जो की स्वस्थ व्यक्तित्व की निशानी नहीं है

🔴एरिक्सन के अनुसार ,”

👼🏻जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम  लज्जाशीलता के द्वंद को दूर कर लेता है, तो *उसमें जो मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है, उसे (इच्छाशक्ति )* का नाम दिया।

 इच्छा शक्ति से इसका आशय एक एसी शक्ति से है, जिसके कारण बच्चा अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है। साथ ही उसमें आत्मनियंत्रण /आत्म संयम का गुण भी आता है।

3.💐खेल की अवस्था (3 से 9 वर्ष ) पहल शक्ति  अपराध बोध/ दोषित 

यह *फ्रायड के मनोलैंगिक विकास की  लैंगिक प्रधानाअवस्था* से मिलती है।

 इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना, खेलना, चलना ,दौड़ना, नए कार्य करना ,घर के बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नई-नई जिम्मेदारी निभाने लगता है।

 इन सब से बच्चे को खुशी मिलती है ।पहली बार उनको लगता है कि उनकी जिंदगी का कोई मकसद है। उन्हें उस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।

 लेकिन इसके विपरीत

   👉🏻  जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्य में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य के लिए अगर दंडित किया जाता है तो उसमें अपराध बोध की भावना जन्म लेने लगती है।

 इस प्रकार के *बच्चों में लैंगिक नपुंसकता और निष्क्रियता की प्रवृत्ति जन्म* लेती है।

🟢एरिक्सन के अनुसार ,”

जब *👼🏻बच्चा पहल शक्ति बनाम अपराध बोध का सफलतापूर्वक हल कर लेता है तो उसमें “उद्देश्य “नामक नई मनोसामाजिक शक्ति का विकास* होता है।

4. स्कूल अवस्था (6 से 12 वर्ष) 

 🟢*परिश्रम/उधम हीन भावना*

👉🏻यह *🧑🏻‍✈️फ्रायड की मनोलैंगिक विकास की   अव्यक्तता की अवस्था* से जुड़ा है।

   पहली बार बच्चे औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। आस-पास के लोगों से व्यवहार सिखना ,कैसे बातचीत करना है, व्यवहार कौशल कैसा होना चाहिये, उनमें परिश्रम की भावना आती है, शिक्षक ,पास-पड़ोस से भी परिश्रम की भावना विकसित होती है

 👉🏻इसके विपरीत

अगर किसी कारण बस *यह नहीं हुआ तो बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है, जिससे उसमें आत्म  हीनता की भावना आ जाती है, स्वस्थ्य व्यक्तित्व बाधक* हो जाता है। 

🔴एरिक्सन के अनुसार ,”

अगर बच्चा *परिश्रम बनाम हीनता के संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो “सामर्थ्यता” नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास* होता हैं। “

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📖🖊️💐Notes byshikha tripathi💐💐

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🈵 एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत ( Erickson’s psycho  social theory) 

एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की  8 अवस्थाएं बतायी है इन 8 अवस्थाओं में अलग-अलग प्रकार से मनुष्य का व्यक्तित्व विकास होता है |

📛  विश्वास बनाम अविश्वास  ( Trust v/s Mistrust) ➖ शैशावस्था ( जन्म से एक वर्ष) 

यह अवस्था फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत के व्यक्तित्व विकास की प्रथम अवस्था  “मुखावस्था”  से संबंध रखती है |

यदि  बच्चों की  माँ के द्वारा भरपूर देखभाल होती है तो बच्चे का धनात्मक विकास होता है जिससे बच्चों में दूसरों और स्वयं के प्रति आस्था, श्रद्धा और विश्वास की भावना जागृत होती है जिससे बच्चों का स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास होता है |

               इसके विपरीत यदि मां के द्वारा बच्चे का किसी वजह से समुचित पालन  पोषण नहीं हो पाता है मां बच्चों की तुलना में दूसरे कार्यों या व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है तो ऐसी स्थिति में बच्चे अविश्वास की भावना के शिकार हो जाते हैं उन पर आशंका ,ईर्ष्या ,हीनता  , डर, आदि ऋणात्मक गुणों का विकास होने लगता है  |

                   एरिक्सन का मत है कि जब  शैशावस्था में बच्चा विश्वास बनाम  अविश्वास के द्वन्द्व का समाधान ठीक ढंग से कर लेता है तो उसमें  ” आशा ”  नामक मनोसामाजिक शक्ति विकसित होती है |

       आशा एक ऐसी शक्ति है जिसके कारण बच्चों में अपने अस्तित्व एवं उनके सांस्कृतिक परिवेश को सार्थक ढंग से  समझने की क्षमता विकसित होती है  |

📛स्वायत्ता / स्वतंत्रता बनाम शर्म  (Autonomy v/s Shame) ➖प्रारंभिक बाल्यावस्था (Early Childhood)  (1 – 3 वर्ष) 

 यह अवस्था में फ्रायड के  मनोलैंगिक विकास की गुदा अवस्था से सामानता रखती है |

   एरिक्सन ने कहा है कि यदि माता-पिता अपना नियंत्रण रखते हुए बच्चे को अपनी इच्छाशक्ति के अनुसार कार्य करने दें ,यदि बच्चों को स्वतंत्र ना छोड़ा जाए तो उनमें लज्जाशीलता,अपने ऊपर शक ,आत्म हीनता ,आदि गुणों का विकास होता है जो कि स्वस्थ व्यक्तित्व का गुण नहीं है |

       उनके अनुसार जब बच्चा स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता के द्वन्द्व को दूर कर लेता है तो इससे सामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है उसे ” इच्छाशक्ति” का नाम दिया गया है |

इसका आशय है कि  जिसके कारण बच्चा अपनी रूचि के अनुसार स्वतंत्र होकर कार्य करता है तो उसमें आत्मनियंत्रण और आत्मविश्वास का गुण विकसित होती है |

📛 पहल / पहल शक्ति बनाम  अपराध बोध  / पोषिता  ➖  खेल अवस्था( 3 -6वर्ष  ) 

इस अवस्था को फ्रायड के मनोविश्लेषण विकास की तीसरी अवस्था के समान ”  प्रधान अवस्था”  के समान माना गया है |

    इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना ,चलना ,दौड़ना आदि शारीरिक क्रियाएं प्रारंभ कर देते हैं | खेलने कूदने में रुचि रखने लगते हैं नए कार्य करने लगते हैं और अपने साथियों के साथ मिलकर नई जिम्मेदारियों को निभाने लगता है सबसे बच्चे को खुशी मिलती है  |

       पहली बार उनको लगता है कि उनकी जिंदगी का कोई मकसद है उन्हें उस मकसद या लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए |

         लेकिन अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक  कार्य में भाग लेने में  रोका जाता है तथा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य के लिए उन्हें दंडित किया जाता है तो उन में अपराध बोध की भावना विकसित होती है |

        अगर स्कूल में बच्चे को अलग-अलग प्रकार से बच्चों में लैंगिक नपुसंकता और निष्क्रियता की प्रवृत्ति जन्म लेने लगती है  |

एरिक्सन का मत है कि जब बच्चा पहल शक्ति बनाम पोषित सफलतापूर्वक हल कर लेता है तो उसमें” उद्देश्य  “नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है |

📛 परिश्रम / उद्यम बनाम हीन भावना ➖ स्कूल अवस्था( 6 से 12 वर्ष) 

यह अवस्था फ्रायड के मनो लैंगिक विकास की अवस्था  अव्यक्तावस्था से मिलती जुलती है  |

बच्चे पहली बार  औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं  |

आसपास के लोगों से व्यवहार सीखते हैं और इससे उनका व्यवहार, उनके बात करने का तरीका आदि सभी से लोगों के व्यवहार को सीखते हैं |  तो उनमें परिश्रम की भावना आती है |

शिक्षक, पास पड़ोस से, भी परिश्रम की भावना विकसित होती है लेकिन यदि किसी  कारणवश बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है  |

       तो उसमें आत्महीनता की भावना विकसित होती है और स्वस्थ व्यक्तित्व की हानि होती है |

 अगर  बच्चा इस अवस्था के संघर्ष से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाता है तो उसमें सामर्थ्य  नामक मनोसामाजिक शक्ति का विकास होता है |

नोट्स बाय➖ रश्मि सावले

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