आकलन एवं मूल्यांकन

आकलन एवं मूल्यांकन दो अलग-अलग पद हैं एवं इन दोनों के अर्थ में भिनता है । आकलन को जहां एक संवादात्मक तथा रचनात्मक प्रक्रिया माना जाता है, जिसके द्वारा शिक्षक को यह ज्ञात होता है कि विद्यार्थी का उचित अधिगम हो रहा है अथवा नहीं ।
वही मूल्यांकन को योगात्मक प्रक्रिया माना जाता है जिसके द्वारा किसी पूर्व निर्मित शैक्षिक कार्यक्रम अथवा पाठ्यक्रम की समाप्ति पर छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि ज्ञात की जाती है ।

आकलन :–का उद्देश्य निदानात्मक होता है । अर्थात शिक्षण अधिगम कार्यक्रम में सुधार करना, छात्रों व अध्यापकों को पृष्ठपोषण प्रदान करना तथा छात्रों की अधिगम संबंधी कठिनाइयों को ज्ञात करना आदि ।
मूल्यांकन:–का उद्देश्य मूल्य निर्धारण करना होता है । यथा निर्धारित पाठ्यक्रम की समाप्ति पर विद्यार्थियों की उपलब्धि को ग्रेड अथवा अंक के माध्यम से प्रदर्शित करना है ।

इस प्रकार, आकलन एवं मूल्यांकन दोनों भिन्न-भिन्न उद्देश्य से भिन्न-भिन्न समय पर विद्यार्थियों की उपलब्धि का अनुमान लगाने की प्रक्रिया है ।

भाषा शिक्षण में आकलन एवं मूल्यांकन

–भाषा शिक्षण में आकलन एवं मूल्यांकन का आशय उन प्रक्रियाओं से हैं जिनकी सहायता से एक शिक्षक विद्यार्थियों के भाषा संबंधी समस्त कौशलों के संबंध में शिक्षण अवधि के दौरान एवं पाठ्यक्रम की समाप्ति पर निर्णय करता है ।

आइए अब हम जानते हैं की जब एक भाषा शिक्षक आकलन करता है तब वह अपने विद्यार्थियों में क्या देखता है? –

*–विद्यार्थी कितना पढ़ पाता है?
*– कैसे पढ़ पाता है ?
*–रुक रुक कर पढ़ता है या धारा-प्रवाह पढ़ता है ।
*–ठीक से नहीं पढ़ पा रहा है तो उसका क्या कारण है ? जैसे एक डॉक्टर बिना मरीज के रोग को जाने वह उस रोग का कैसे इलाज करेगा?
*–क्या वह अक्षरों को पहचान नहीं पा रहा है या शब्दों को एक इकाई के रूप में पढ़ने का अभ्यस्त नहीं है ?

*–भाषा को सुनकर कितना समझ पाता है ?
*–कितने आत्मविश्वास से वह स्वयं को अभिव्यक्त कर पाता है?

आइए अब हम जानते हैं भाषा में आकलन एवं मूल्यांकन के बिंदु कौन-कौन से हैं ?

*सबसे पहले जब हम प्राथमिक स्तर की बात करते हैं जब विद्यार्थी भाषा सीखने की शुरुआत करता है तो उस अस्तर पर हम सबसे पहले विद्यार्थी की प्रवाहिता की जांच करते हैं ।

  • फिर हम प्राथमिक स्तर पर शुद्धता की बात करते हैं कि विद्यार्थी कितना शुद्ध बोल रहा है ? कितना शुद्ध लिख रहा है ? कितना किसी की बातों को सुनकर शुद्ध समझ रहा है ?

अतः सबसे पहले हमें प्रवाहिता पर बल देना चाहिए इसके बाद ही हमें उसके बोलने की शुद्धता पर बल देना चाहिए ।

  • हमें यह देखना चाहिए कि विद्यार्थी की प्रवाहिता तथा शुद्धता दोनों का तालमेल बना रहे । इसके बाद ही भाषाई कौशलों का आकलन होती है ।
  • भाषाई कौशलों का आकलन के अंतर्गत चार प्रमुख कौशल है जो निम्नलिखित है ।
  1. श्रवण कौशल ।
  2. भाषण कौशल ।
  3. पठन कौशल तथा
  4. लेखन कौशल ।

आप तो जानते हैं कि मूल्यांकन की प्रक्रिया निरंतर चलती है परंतु किन तरीकों से चलती है यह जानना बहुत जरूरी है ।

आइए हम जानते हैं अपने विद्यालय में एक शिक्षक के द्वारा भाषा में आकलन एवं मूल्यांकन के तरीके कौन-कौन से है ? –
सामान्यता दो तरीकों का प्रयोग किया जाता है :–

  1. लिखित परीक्षा एवं ।
  2. मौखिक परीक्षा ।
    इसके लिए बनाए गए प्रश्न पत्र पाठ्यपुस्तकों पर आधारित होते हैं जो भाषाई ज्ञान का आकलन कम एवं विद्यार्थी के स्मरण शक्ति का आकलन अधिक करते हैं ।

लिखित परीक्षा में विद्यार्थी को प्रश्न पत्र दे दिया जाता है जो उसके पाठ्यपुस्तकों पर आधारित होते हैं । अगर विद्यार्थी उन प्रश्न पत्रों का संतुष्टि तक उत्तर दे दिया तो वह उत्तीर्ण हो जाता है । नहीं तो उसे अनुत्तीर्ण कर दिया जाता है ।

क्या इससे विद्यार्थी का भाषा कौशल का मूल्यांकन हुआ नहीं न? चुकी लिखित परीक्षा से हम विद्यार्थी का केवल स्मरण शक्ति का ही मूल्यांकन कर सकते हैं । जो हमारे लिए उद्देश्यहीन मूल्यांकन है ।

आइए अब हम जानते हैं मूल्यांकन का सही तरीका

भाषा में आकलन एवं मूल्यांकन की निम्नलिखित तरीकों को अपनाया जाना चाहिए ।

  1. मौखिक परीक्षण जो औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों हो सकते हैं ।
    यहां अनौपचारिक का मतलब है कक्षा में पढ़ाते-पढ़ाते किसी विद्यार्थियों से कोई प्रश्न पूछ दिया या किसी शब्द का अर्थ बताने को पूछ दिया ।
    1) प्रश्न-उत्तर का सत्र चलाया जाए
    2) कहानी कथन का सत्र चलवाया जाए ।
    3) विद्यार्थी को बोल बोलकर पढ़ाया जाए । ऐसा करवाने से विद्यार्थी द्वारा किया गया शुद्ध या अशुद्ध उच्चारण शिक्षक के साथ-साथ सभी विद्यार्थियों तक पहुंचता है तथा एक दूसरे को अपनी त्रुटियों से अवगत कराते हैं
    4) विद्यार्थी द्वारा देखी या सुनी बात का वर्णन करवाया जाए । जैसे कि विद्यार्थी से पूछा जाए कि जब आप स्कूल आ रहे थे तो आपने रास्ते में क्या देखा क्या सुना कृपया बताइए । यहां हम उसकी स्मरण क्षमता का मूल्यांकन नहीं करते हैं । यहां हम उसके अभिव्यक्ति का मूल्यांकन करते हैं उसके विचारों का मूल्यांकन करते हैं कि वह कैसे अपने बातों को व्यक्त करता है ?
  2. लिखित परीक्षा –
    लिखित परीक्षा में सिर्फ प्रश्नों का उत्तर ले लेना ही पर्याप्त नहीं है । इसके लिए हमें निम्नलिखित युक्तियों का प्रयोग करना चाहिए ।
    जैसे 1. श्रुतलेख :–इसमें एक व्यक्ति बोलता है तो दूसरा व्यक्ति सुनकर लिखता है। ऐसा करने से हम विद्यार्थी के श्रवण तथा लेखन क्षमता का आकलन कर लेते हैं ।
  3. आपूर्ति परीक्षण:- जिसे हम अंग्रेजी में क्लोज टेस्ट कहते हैं इसमें हम किसी कहानी या निबंध से कोई अनुच्छेद ले लेते हैं फिर उन अनुच्छेदों में से कुछ–कुछ शब्द निकालकर विद्यार्थियों के सामने रखते है फिर विद्यार्थियों को भरने के लिए कहां जाता है कि उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति करें । ऐसा करने से हम विद्यार्थी के व्याकरण क्षमता, शब्द भंडार,पढ़कर समझने की क्षमता का आकलन कर लेते हैं ।
  4. कहानी का अपनी मातृभाषा में पुनर्लेखन : इसमें हम विद्यार्थी द्वारा पहले से पढ़ा गया पाठ को हम उनकी मातृभाषा में पुनर्लेखन को कहते हैं यहां हम उनकी लेखन क्षमता की जांच कर लेते हैं । साथ ही साथ हम एक भाषा से दूसरी भाषा में उनके द्वारा अनुवाद करने का क्षमता का भी आकलन कर लेते हैं ।
  5. कहानी का शीर्षक लिखना : इसमें हम विद्यार्थी को किसी निबंध,उपन्यास तथा अनुच्छेद का शीर्षक लिखने को कह कर हम उनके पठन की समझ क्षमता का आकलन कर लेते हैं ।
  6. कहानी से प्रश्न बनाना: ऐसा करने से हम विद्यार्थी के प्रश्न बनाने की क्षमता का आकलन कर लेते हैं ।
  7. नाटक का मंचन एवं संवाद लेखन : ऐसा करने से हम पाते हैं कि विद्यार्थी को कहां तक समझ आया कि वह किस अभिनय कर्ता को किस समय पर क्या प्रस्तुत करना है नाटक का मंच कैसा हो ? आदि के बारे में आकलन कर लेते हैं
  8. कविता की व्याख्या या उसका भावार्थ लेखन आदि ।

अतः मूल्यांकन का आकलन करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसा कि मैंने पहले भी ऊपर में बताया है कि परीक्षण विद्यार्थी की भाषा ज्ञान एवं क्षमता का आकलन एवं मूल्यांकन करने वाला होना चाहिए ना कि उनकी स्मरण शक्ति का ।
दूसरी बात आकलन करते समय हमें विद्यार्थी के मात्र कमजोर पक्षों को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि उनकी कारण को भी ढूंढना चाहिए जिनके कारण विद्यार्थी की आपेक्षित पहलू कमजोर है ।

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