✍🏻Menka patel ✍🏻
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🌈🌈 एरिक्सन 🌈

⭐ व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत
जो अपने मन का विश्लेषण है

मनोविश्लेषण संरचना का निर्माण विस्तार हुआ
मनोविश्लेषण उम्र के हिसाब से भी बदलता है जैविक कारक और सामाजिक कारक के बीच अंतर क्रिया होती है उसे व्यक्तित्व विकास कहते हैं

☄ एरिक्सन ने इसे कुछ अवस्था में विभाजित किया है जो
निम्नलिखित हैं

✍🏻 विश्वास बनाम अविश्वास ( जन्म से 1 वर्ष) – यह सबसे पहली अवस्था है इसमें बच्चा अपनी क्रियाओं के प्रति विश्वास और अविश्वास की भावना होती है अगर बच्चे को नींद आती है तो वह दैनिक कार्य अपने हिसाब से करता है जो इंद्रियों का अनुभव करता है इससे लोगों के प्रति सकारात्मक क्रिया होती है तो विश्वास की भावना होती है इसमें धीरे धीरे पहचानने की क्षमता भी आ जाती है इस अवस्था के अंतर्गत निरंतरता एकरूपता या स्थिरता होती है तो वह में विश्वास करना सीख जाता है अगर बच्चे के अनुरूप व्यवहार ना हो तो बच्चे में अविश्वास की भावना उत्पन्न होने लगती है बच्चे अपने अविश्वास को शारीरिक क्रिया द्वारा दिखाएगा जैसे रोना चिड़चिड़ा ना आदि|

✍🏻 स्वतंत्रता बनाम शर्म(1-3 की अवस्था) –
इस अवस्था में बालक सीखता है कि उस से क्या अपेक्षा है उससे क्या उम्मीद है बच्चा अपने कर्तव्य अधिकार और सीमा को समझता है तथा बच्चा नए-नए प्रयास करता है किसी चीज को तोड़ना तथा सहयोग की भावना आने लगती है और बच्चे स्व नियंत्रण की भावना या जाती है अगर बच्चे को स्वतंत्रता और स्व नियंत्रण नहीं होता तो उसमें संदेह की भावना बढ़ जाती है इस अवस्था में इच्छा शक्ति आती है अगर बच्चे को संदेह हुआ तो वह नए-नए प्रयास नहीं करेगा इससे शर्म की भावना आ जाती है

✍🏻 पहल बनाम अपराध (3-6 की अवस्था) – यह अवस्था स्कूल जाने की अवस्था होती है जीवन की जो चुनौतियां होती हैं उससे निपटने के लिए सीखने लगता है और वह रिश्ते सामान्य नहीं लगता है संबंधों में अनुमोदन मतलब संबंधों को समझ रहा है इस अवस्था में गति कौशल का विकास होता है अपने बराबर के लड़कों के साथ गति कौशल करने लगते हैं इस अवस्था में लड़के लड़कियों में अंतर करने लगते हैं और पहल करने लगता है उत्तरदायित्व ग्रहण करने लगते हैं जैसे किसी को बुलाना खिलौनों को संभालना आदि अगर बच्चे निर्धारण नहीं कर पाते हैं और उनमें सकारात्मक सोच नहीं आती है तो बोध की भावना आने लगती है 4-6 की अवस्था में बालक की सर्वाधिक गतिविधि इसी अवस्था में होती है खोज प्रवृत्ति कार्य करता है इस समय में हताश भी होता है और प्रयोग करता है
✍🏻 परिश्रम /उधमिता बनाम हीन भावना (6-11 कीअवस्था) — बच्चों के अंदर औपचारिक शिक्षा इस समय में होती है अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग की भावना आ जाती है तथा तर्कशक्ति में वृद्धि होती है स्वा अनुशासन होने लगता है और खुद की चीजें कैसे किया जाए निर्णय के हिसाब से व्यवहार करने लगते हैं इस अवस्था में संस्कृति के तकनीकी पक्षों को समझता है जिससे उसमें उधमिता परिश्रम की सोच आ जाती है उत्तर दायित्व ग्रहण करने लगते हैं मानवीय कुशलता लगते हैं संगीत भी सीखने लगते हैं लेकिन जब बच्चा अगर इन चीजों को नहीं कर पाते हैं तो उनमें हीन भावना आने लगती है हीनता से अक्षमता का शिकार हो जाता है यही इस अवस्था का दुष्परिणाम है और सबसे बड़ा गुण क्षमता का विकास होता है कार्य के प्रति समर्पित रहते हैं
✍🏻 पहचान बनाम भूमिका भ्रम (12-20 की अवस्था) — इस अवस्था के अंतर्गत वयस्कता की चुनौतियों का सामना करने के लिए उनकी अपनी पसंद ना पसंद होती है भविष्य के जो पूर्व अनुमानित लक्ष्य के प्रति जागरूक होने लगता है भविष्य पर जो नियंत्रण की शक्ति है इस शक्ति की पहचान होने लगती है इस अवस्था में यह बताता है कि वह वर्तमान मैं क्या है भविष्य में क्या बनना चाहता है यह पहचान निर्माण की अवस्था है अगर भूमिका निर्वाहन में भ्रम होता है बड़ा बदलाव होता है वह नकारात्मक सोच आने लगती है इस अवस्था में घृणात्मक पहचान बनने लगती है इस अवस्था में कर्तव्य का विकास होता है लैंगिक रूप से परिपक्व और जिम्मेदार भी होते हैं बड़ों के जैसे व्यवहार की उम्मीद करते हैं लेकिन बड़ों जैसी लैंगिक स्वतंत्रता नहीं देते हैं और आंतरिक ज्ञान में खोजने की कोशिश करते हैं

✍🏻 आत्मीयता बनाम एकाकीपन (20-24 की अवस्था) – इस अवस्था में विवाह के संबंध में बनने लगते हैं प्रारंभिक जीवन की शुरुआत करने का सही समय है सामाजिक आत्मीयता आने रखती है और लैंगिक आत्मीयता होने लगती है अच्छा बुरा समझने लगते हैं विश्वास के साथ संबंध बनाते हैं अगर यह संबंध नहीं होता तो अलगाव होने लगता है वह संबंधों से दूर रहना आत्मीयता मैं नहीं आना समझौता नहीं करना
✍🏻 जननात्मक बनाम स्थिरता/ उत्पादकता बनाम स्थिरता /प्रजनन बनाम निश्चिता(24-65 की अवस्था) – इस अवस्था मेआने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचने लगते हैं समाज के बारे में सोचना जहां उनकी भावी पीढ़ी जीवन बताएगी इस अवस्था में जिम्मेदारी निभाने लगते हैं उत्पादकता करते हैं और विचार करते हैं की आगे के लिए जब उत्पादकता नहीं करते और ना ही विचार करते हैं तो स्थिरता आ जाती है इस अवस्था में जो भी करना है वह 35 वर्ष तक कर लेना चाहिए
✍🏻 संपूर्ण बनाम निराशा (65 से आगे की अवस्था) – सफलता असफलता के समायोजन पर पहुंचने की क्या किया क्या नहीं किया इस अवस्था में भूतकाल के बारे में सोचते हैं इस समय व्यक्ति अपने आप अनेक चीजों से गिरा पाता है शारीरिक क्षमता गिर जाती है और आय में कमी आ जाती है

“यह उम्र मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओं का संकलन समेकन और मूल्यांकन है”
जो करना चाहते थे वह मिला संपूर्ण और अगर कुछ करने में बहुत समय लग गया तो निराशा का भाव आ जाता है इस अवस्था में लोगों को मृत्यु का भय होने लगता है इस अवस्था मैं आज सफलता होती है तो इसे आ परिवर्तना सफलता कहते हैं
” वृद्धा अवस्था में ही सच्ची परिपक्वता विकास होता है”
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व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत

प्रवर्तक – ऐरिक्सन

मनोविश्लेषण के साथ जो सामाजिकता होती हैं उसे मनोसामाजिकता हैं।
मनोसामाजिकता उम्र के हिसाब से बदलती जाती है।

पहले देख के छुपते थे अब छुप के देखते हैं वह दौर था बचपन का यह दौर है जवानी का
जैविक कारक – बचपन
सामाजिक कारक – जवानी या किशोरावस्था

जैविक कारक और सामाजिक कारक के बीच अंतः क्रिया ही व्यक्तित्त्व विकास है।

एरिक्सन ने व्यक्तित्व विकास को 8 चरणो मे विभाजित किया है –

1) विश्वास बनाम अविश्वास (0-1) trust vs mistrust

इसमें बच्चा मे अपनी क्रियाओं के प्रति या स्थिति के प्रति विश्वास या विश्वास की भावना उत्पन्न होती है ।
अगर बच्चे को अच्छी नींद आती है
दैनिक कार्य ठीक से होते हैं
इंद्रियों का अनुभव ठीक से करता है
लोगों के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है
पहचानने की क्षमता में वृद्धि होती हैं तो बच्चे में मूल विश्वास की भावना की स्थापना होती है।
निरंतरता ,एकरूपता, स्थिरता से अन्य लोगों में विश्वास करना सीख जाता है जैसे मां पिता दादी आदि पर

यदि यह सभी क्रियाएं उसके व्यवहार के अनुरूप नहीं होने पर उस में अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है। जैसे रोना चिल्लाना आदि

2) स्वतंत्रता ( स्वायत्तता) बनाम शर्म (1-3 वर्ष) antonomy VS shame –

इस अवस्था में बालक यह सीखता या समझता है कि उस से क्या अपेक्षा है
उस के क्या अधिकार हैं
उसके क्या कर्तव्य हैं
क्या सीमाएं है
नये नये प्रयास करता है
इच्छा शक्ति आ जाती है।
बालक में स्वनियंत्रण का विचार आने पर वह स्वतंत्रता का अनुभव करता है
बालक में स्वनियंत्रण का विचार नहीं आने पर संदेह की भावना या शर्म की भावना आ जाती है।

3) पहल बनाम अपराध (4-6) या नर्सरी एज या आयु initiative VS guilt –

इस अवस्था में बालक चुनौतियों से निपटने के तरीके सीखता है संबंधों में अनुमोदन करना सीखता हैं अतः लोगों से संबंधों को समझने लगता है
अपने बराबर या बड़े बच्चों के साथ गतिक कौशल करने लगता है
इस अवस्था में बच्चा लड़के और लड़के में अंतर समझने लगता है अनुकरण और पहल करने लगता है
उत्तरदायित्व को समझने लगता है
उद्देश्य और लक्ष्य निर्धारित या नियोजित करके कार्य करता है
यह सभी कार्य नहीं होने पर बालक में अपराध या अपराध बोध की भावना या गुण आ जाते हैं
बालक की सर्वाधिक गतिविधि इसी अवस्था में होती है इस अवस्था में बालक में खोज प्रवृत्ति होती है अलग-अलग कार्य करता है हताश भी होता है और प्रयोग भी करता है

4) परिश्रम ( उद्यमिता) बनाम हीनता (6-11 वर्ष) industry VS inferiority –

इस अवस्था में बालक औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यालय जाता है
अन्य व्यक्ति के साथ सहयोग करता है
तर्कशक्ति में वृद्धि होती हैं
स्व अनुशासन आता है
नियमों के हिसाब से व्यवहार करता है
संस्कृति के तकनीकी पक्षों को समझता है
उद्यमिता या परिश्रम की सोच आती है
स्कूल घर पर काम करता है उत्तरदायित्व लेता है
संगीत में रुचि लेता है
मानवीय कुशलता आती हैं

यदि बालक यह सभी बातें नहीं कर पाता है तो उसमें हीनता की भावना आ जाती है

हीनता से अ अक्षमता का शिकार हो जाता है यह इसका दुष्परिणाम है
क्षमता का विकास करने के लिए कार्य के लिए समर्पित होना पड़ता है।

5) पहचान बनाम भूमिका भ्रम ( 12-20 वर्ष) identity VS role confusion –

सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण अवस्था है
बचपन ( बाल्यावस्था) और वयस्क के बीच का समय किशोर / वयसंधि / वयस्कसंधि कहलाती है।

इस अवस्था में बालक यह समझता है कि समाज की उस से क्या मांग है
समाज में उसकी क्या भूमिका है इस इस अवस्था में बालक वयस्कता की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक परिवर्तनों का सामना करता है अपनी पसंद नापसंद को चुनता है भविष्य के पूर्व अनुमानित लक्ष्य के अनुसार काम या जागरूक होने लगता है
भविष्य पर नियंत्रण की शक्ति की पहचान हो जाती है
वर्तमान में क्या है और भविष्य में क्या बनना चाहता है
पहचान की निर्माण की अवस्था भूमिका निर्माण की अवस्था

नकारात्मक तथ्य
भूमिका निर्वहन में भ्रम महत्वपूर्ण कारक है
अकेलापन ,खाली , चिंतित और अनिश्चित होना
निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जा रहा हूं ऐसा भ्रम होता है विरोधी बन जाता है
अवस्थित अवस्था होती है
घृणात्मक पहचान( स्वयं को अयोग्य मानने लगता है

वयसंधि (12-16)

कर्तव्य ईमानदारी का विकास होता है।
लैंगिक रुप से परिपक्व या जिम्मेदार होता है लेकिन वयस्क के समान संतान उत्पत्ति नहीं कर सकता है।
वयस्को जैसा व्यवहार करने की उम्मीद करते हैं लेकिन वयस्को जैसी लैंगिक स्वतंत्रता नहीं होते हैं।
आंतरिक ज्ञान से नहीं समझ को खोजने की कोशिश करता है

6) आत्मीयता बनाम एकाकीपन (20-24 वर्ष)affinity VS isolation –

इस अवस्था में
भविष्य की जिम्मेदारियों पर ध्यान
विवाह के बंधन में बंधना प्रारंभिक पारिवारिक जीवन सामाजिक आत्मीयता आने लगती हैं
लैंगिक आत्मीयता आने लगते हैं अपने जीवन और कैरियर के प्रति स्थायित्व आता है
जिनके साथ विश्वास होता है उन से जुड़ते है
यह सब नहीं होने पर अलगाव, एकाकीपन ,संबंधों से दूर रहने की भावना आती हैं
आत्मीयता से समझौता नहीं करता है।

7) जननात्मक / प्रजनन / उत्पादकता बनाम स्थिरता / निश्चिंतता ( 24-65 वर्ष) productivity VS stability –

इस अवस्था में
आने वाली पीढ़ियों के विषय में चिंतित होते हैं
समाज के बारे में सोचता है जहां भावी पीढ़ी जीवन बताएगी जिम्मेदार होता है
इस समय उत्पादकता के साथ विचार भी करते हैं
इस अवस्था मे 25-35 की उम्र महत्वपूर्ण होती है
इस समय एक पहलू अपनी शारीरिक सुन्दरता, व्यक्तित्व, अच्छे कपडे, बहुत अच्छा बोलने का होता है। यह समय(25-35 )सीमित होता है। या कुछ निश्चित समय तक ही रह पाती है बाद में बचे हुए जीवन मे बहुत कम काम आती है।
दूसरा पहलू अपनी आन्तरिक / आत्मा / मन की सुन्दरता का होता है यह बचे हुए जीवन भर साथ देती है।

35- 40 की उम्र मे जो काम कर रहे हैं उसे स्थिर करने का प्रयास करते है।
दूसरो के प्रति चिंतित होते हैं जैसे अपने बच्चो के बारे में

8) संपूर्णता बनाम निराशा (65 से जीवन के अंतिम क्षण तक) wholeness VS frustration –

यह मानव जीवन की अंतिम अवस्था होती है इसमे व्यक्ति भविष्य के बारे में न सोच कर अपने बीते हुए जीवन के बारे मे सोचता है ।
इसमें सफलता और असफलता के समायोजन पर पहुंचते हैं
यहां भूतकाल के बारे में सोचते हैं पीछे की जिंदगी को देखते हैं
शारीरिक क्षमता गिर जाती हैं आय में कमी हो जाती हैं
🌞🌞🌞यह अवस्था मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओं का संकलन समेकन और मूल्यांकन है🌞🌞🌞

वर्तमान ( अंतिम क्षण) 🤔🤔🤔 👉👉 भूतकाल (बिताया हुआ जीवन)

जो कार्य आप करना चाहते थे वह पूरा होने पर संपूर्णता और पूरा नहीं होने पर निराशा आ जाती है
मृत्यु का भय होता है अपरिवर्तनीय असफलता होते हैं

🌞🌞🌞एरिक्सन यह विश्वास करते हैं कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता है

Notes by – Ravi kushwah


✍🏻 Notes By-Vaishali Mishra

एरिक्सन का व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत

*इसमें मानसिक विश्लेषण का निर्माण व विस्तार हुआ ।

*हमारे मन का जो विश्लेषण है उससे बीते समय की आधुनिकता और आज के समय की आधुनिकता को भी समझते है।हमारी जो मनो संरचना है उसका निर्माण व विस्तार हम खुद से करते है।

*एरिक्सन ने बताया कि जो हम अपने मन में दुनिया की समझ लाते है और समय के हिसाब से उस दुनिया की समझ को भी सुधारने या बदलने की कोशिश करते है।यही बात मनोसामाजिक कही जाती हैं।
समाज बदलता है तो मन में जो मनोविश्लेषण की संरचना है वो भी बदल जाती हैं।

*बीते समय की आधुनिकता में मनो विश्लेषण संरचना के निर्माण या विस्तार से हम नए समय की आधुनिकता में मनोविश्लेषण संरचना का निर्माण और विस्तार करते है।

*समय के साथ साथ हमारी मनोसामाजिक बदल जाती है।

*उम्र के बदलने या बढ़ने से भी हमारी मनोसमाजिक्ता बदल जाती है या जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है वैसे वैसे ही हम समाज को देखते है या समझते है या यह भी कह सकते है कि उम्र के साथ हमारा मन का विश्लेषण या नजरिया समाज के प्रति भी बदलता जाता है।

कई जैविक कारकों के बदल जाने पर सामाजिक कारक भी बदल जाते है और यही हमारा व्यक्तित्व विकास कहलाता है अर्थात व्यक्तित्व विकास का मनोसामाजिक सिद्धांत कहलाता है।

एरिक्सन ने आठ प्रकार की मनोसामाजिक अवस्थाएं दी है।

➡️1 विश्वास बनाम अविश्वास*
(Trust vs Mistrust) (0से 1 वर्ष) ➡️2 स्वतंत्रता बनाम शर्म
*(Autonomy Vs Shame)
*(2 से 3 वर्ष)
➡️3 पहल बनाम अपराध
(Initiative Vs Guilt)
(3 से 6 वर्ष)
➡️4 उधमिता (परिश्रम) बनाम हीनता ( Industry Vs Inferiority) (6 से 11 वर्ष)
➡️5 पहचान बनाम भूमिका भ्रम (Identity Vs Confusion) (12 से 20 वर्ष)
➡️6 आत्मीयता बनाम एकाकीपन (Affinity Vs Isolation)* *( 20 से 24 वर्ष)
➡️7 उत्पादकता बनाम स्थिरता /जन्नात्मक बनाम स्थिरता /प्रजनन बनाम स्थिरता (Productivity Vs Stability) (24 से 65 वर्ष)

➡️8संपूर्णता बनाम निराशा (wholeness Vs Frustration)
65 से जीवन के अंत तक
जिनका विवरण निम्न प्रकार है।

1️⃣
विश्वास बनाम अविश्वास
(Trust vs Mistrust) (0से 1 वर्ष)

*इस अवस्था में बच्चो में अपनी क्रियाओं के प्रति,काम के प्रति ,अपनी स्थिति के प्रति विश्वास या अविश्वास की भावना होती है।
जैसे यदि बच्चा अच्छे से सोता है या पूरी नीद लेता है तो उसके अंदर मूल विश्वास की स्थापना होती है।
बच्चा अपनी इन्द्रियों से सकारात्मक क्रियाओं को अनुभव करता है और उनको पहचानने की क्षमता रखता है।
और उन क्रियाओं के प्रति विश्वास बना लेता है।
*बच्चे के जो दैनिक कार्य(रोना,हंसना,सोना आदि) को अपने हिसाब से करता है जिसमे बच्चे की इंद्रिया उसकी मदद करती है या इंद्रियो के अनुभव से दूसरों के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है।

  • बच्चा स्थिरता, निरंतरता और एकरूपता की वजह से अन्य लोगो के साथ विश्वास करना सीख जाता है।

*लेकिन दूसरी स्थिति में यदि अन्य लोगो के द्वारा बच्चो के प्रति अनुरूप व्यवहार ना किया जाए तो बच्चो में अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है यह अविश्वास वह कई रूप से दिखाता है जैसे रोककर,चिड़चिड़ाहट, शरीर स्थिर न रखकर,परेशान होकर कई तरीको से।

*यही विश्वास और अविश्वास के बीच का संघर्ष है।
जैसे ही एक साल में किसी बच्चे के अंदर विश्वास या अविश्वास की भावना होती रहती है तो वह अलग अलग रूप से दिखाई देने लगती हैं।

2️⃣
स्वतंत्रता बनाम शर्म
(Autonomy Vs Shame)
(2 से 3 वर्ष)
*इस अवस्था में बालक यह सीखता है कि उससे क्या उपेक्षाएं है या क्या उम्मीदें , कर्तव्य,अधिकार , सीमाएं रखी जा रही है।

*किसी अन्य व्यक्ति की अनुक्रिया से ही बच्चा यह सीखता है कि उससे क्या उपेक्षाएं रखी जाती है।

▪️जब बच्चा कुछ करना चाहता है तो उस कार्य को करने में बच्चे की इच्छा शक्ति होती है जिससे उसमे स्व नियंत्रण काफी ज्यादा बढ़ जाता है या स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता या कार्य को करने की स्वतंत्रता आ जाती है।

▪️लेकिन जब बच्चे यदि काम में कुछ संदेह होता है तो इससे उनकी इच्छा शक्ति में भी कमी आती है जिससे बच्चा नए प्रयास ,अधिकार या कर्तव्य पर जोर नहीं देता है।और इस स्थिति में बच्चो में शर्म की भावना उत्पन्न हो जाती है कि वह उन उपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाया ।

3️⃣ पहल बनाम अपराध
(Initiative Vs Guilt)
(3 से 6 वर्ष)

  • जिंदगी में जो भी चुनौतियां आती है उससे निपटने के तरीके इस अवस्था में सीखते है। या उन चुनौतियों से निपटने के लिए कई रूप में पहल करता है।

*सम्बन्धों में अनुमोदन (अंत क्रिया)
बच्चे के लोगो (माता,पिता,भाई बहन आदि) के साथ जो सम्बन्ध है वो उन्हें समझने लगता है। अथवा बच्चा अपने गति संवेदी कौशल क्रिया अपनी उम्र के साथियों या अपने से बड़े उम्र के लोगो के साथ करने लगता है।

*बच्चे इस उम्र में लड़के और लड़की में अंतर करने लगते है या उन्हें समझने लगते है।

  • इस अवस्था में बच्चो में उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित होने लगती है।जैसे बच्चा अपने खिलौनों कि संभालना जैसे कई कार्यों के प्रति जिम्मेदार हो जाता है।
  • अपने उद्देश्य और लक्ष्य को निर्धारित या नियोपित करने लगता है उनका यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है।

यदि बच्चो में पहल करने की भावना विकसित नहीं हो पाती है तो उनमें अपराध की भावना आ जाती है या वह किसी भी स्थिति के अनुसार नकारात्मक क्रियाएं करने लगता है।

बच्चे के सर्वाधिक गतिविधियां भी इसी अवस्था में होती है।

खोज प्रवृत्ति,अलग अलग तरह के कार्य ,कभी हताश होता है ,प्रयोग करता है ।
यह बच्चो के खेल की भी अवस्था होत

पहल और अपराध की मात्रा वातावरण। पर निर्भर करती हैं।
बच्चे को जैसा वातावरण दिया जाता है वह वैसी ही पहल और अपराध करने लगते हैं।

4️⃣ उधमिता (परिश्रम) बनाम हीनता ( Industry Vs Inferiority) (6 से 11 वर्ष)

*बच्चो में औपचारिक शिक्षा का विकास होता है अर्थात वह नियमो के अनुसार व्यवहार करने लगते है।

*अन्यव्यक्तियो के साथ सहयोग करने लगता है ।

  • बच्चो की तर्क शक्ति में वृद्धि होने लगती है।
    बच्चो में अनुशासन आता है।

बच्चे अपनी संस्कृति के तकनीकी पक्षों को समझता है।इससे उनमें उधमिता या परिश्रम की सोच आती है।जैसे वे स्कूल या घर के कामों में उत्तरदायित्व ग्रहण करने लगते है ।

बच्चे इन सभी मानवीय कुशलता को नहीं कर पाते है तो उनके अंदर हीनता की भावना आ जाती है कि वो इस कार्य को नहीं कर सकते है।
हीनता से बच्चे अक्षमता का शिकार हो जाते हैं जो की दुष्परिणाम है।

इस अवस्था का सबसे बड़ा गुण क्षमता का विकास होना है।इस अवस्था में किसी भी कार्य को करने के लिए उसमे समर्पित रहना पड़ता है।

5️⃣ पहचान बनाम भूमिका भ्रम (Identity Vs Confusion) (12 से 20 वर्ष)
यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है ।
इसमें ना तो बचपन होता है ना ही वयस्क बल्कि यह किशोर होता है।

*इसमें किशोर के अंदर उसकी समाज की मांग और समाज में भूमिका देना चाहते है

किशोर को कई परिवर्तनों या चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
उनकी अपनी पसंद या नापसंद होती है।

  • किशोर के जो भी भविष्य के पूर्व अनुमानित लक्ष्य है उनके हिसाब से अपने आप को जागरूक करने लगता है। या भविष्य पर जो नियंत्रण की शक्ति है,उनकी पहचान करने लगता है या उनके लिए जागरूक होने लगता है।

बचपन से वयस्कता के बीच के समय को बचपन से वयस्कता का वय:संधि काल कहलाता है।

इसमें किशोर एक निर्माण की अवस्था में होता है जिससे किशोर की समाज में पहचान बनती है इसलिए यह पहचान निर्माण की अवस्था कहलाती है।
जब पहचान बन जाती है तो समाज में अपनी भूमिका का निर्माण करने लगता है।
भूमिका निर्वहन में यदि कोई भ्रम आता है तो वह बहुत ज्यादा प्रभावित होता है जिससे नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
। भूमिका निर्वहन में यह भ्रम बहुत प्रभाव शील होता है जैसे वह अकेलापन या खाली पन महसूस करता है ,चिंतित रहता है या अनिश्चित रहता है या किसी कार्य को करने या ना करने में निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे
भ्रम में कई गलत कदम उठा लेता है ।

भ्रम में बच्चे विरोधी बन जाते है।
किशोर अव्यवस्थित अवस्था में चले जाते है
इस समय में किशोर में कुछ घृणात्मक पहचान भी जन्म लेती है जिसमे वह यह मानने लगते हैं कि वह खुद में अयोग्य है।

*इस अवस्था में किशोर के अंदर कर्तव्य ,ईमानदारी का भी विकास होता है।
*वे लैंगिक रूप से परिपक्व या जिम्मेदार होने लगते है लेकिन वह संतान उत्पत्ति के लिए पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते है।

*कई बार लोग किशोरों के साथ वयस्क जैसा व्यवहार करने की उम्मीद रखते है लेकिन वयस्कों की जी लैंगिक स्वतंत्रता है वो नहीं देते है।

  • इस अवस्था में किशोर नई समझ को खोजने की कोशिश करता है।

6️⃣ आत्मीयता बनाम एकाकीपन (Affinity Vs Isolation) ( 20 से 24 वर्ष)

*इस अवस्था में भविष्य की जिम्मेदरियो पर ध्यान केंद्रित रहता है।

  • विवाह के बंधन में बंधने के लिए तैयार हों जाते हैं।या प्रारम्भिक पारिवारिक जीवन की शुरआत होने लगती है।
  • सामाजिक आत्मीयता आने लगती है।
    *लैंगिक आत्मीयता के बारे में भी सोचने लगते है ।
    *अपने कामों में स्थिरता को खोजने लगते है
    *जिन लोगो पर विश्वास करते है उनके साथ जुड़ने की कोशिश करते हैं।

यदि यह सब नहीं कर पाते या नहीं हो पाता है तो एकाकीपन महसूस होता है या अलगाव, सम्बन्धों से दूर रहना,किसी को भी स्वीकार ना करना , ऐसी कई चीजों में बाधा आने लगती हैं।

7️⃣ उत्पादकता बनाम स्थिरता /जन्नात्मक बनाम स्थिरता /प्रजनन बनाम स्थिरता (Productivity Vs Stability) (24 से 65 वर्ष)

*इस अवस्था में अपनी आने वाली पीढ़ियों या *उत्पादकों * के विषय में चिंतित होते है।

  • उस समाज के बारे में सोचने लगते है जहां उनकी भावी पीढ़ियां जीवन बिताएंगी।
  • अपने लक्ष्य या जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद स्थिर होना चाहते है ।
  • दिमाग में कई तरह के विचार आते है और एक समय बाद इन विचारो में स्थिरता आने लगती है।
  • इस अवस्था में 25 से 35 वर्ष के बीच कई तरह की चीजों जैसे व्यक्तित्व बोलने,या पहनावे को ज्यादा महत्व देते है। अर्थात बाह्य रूप से
    जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है तो लोगो में मन की सुंदरता को देखने लगते है।
    अर्थात आंतरिक रूप से
    *दूसरों के प्रति ज्यादा चिंतित होने लगते है।

8️⃣ संपूर्णता बनाम निराशा (wholeness Vs Frustration)
(65 से जीवन के अंत तक)

  • इस अवस्था में जीवन की सफलता या असफलता के समायोजन (संपूर्णता) पर पहुंचते है।
  • भूत काल के बारे में सोचते है।
    *शारीरिक क्षमता गिर जाती है।
    *आय में कमी आ जाती है।
  • अपने उम्र के लोगो के साथ जुड़ने लगते है।
    *मृत्यु का भय या या अपरिवर्तनीय असफलता आ जाती है ।

“यह उम्र मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओं का संकलन,समेकन और मूल्यांकन है।
यदि कोई कार्य नहीं कर पाते है और उस कार्य के बारे में सोचते है की काश यह कर पाते तो ऐसी स्थिति में निराशा आने लगती हैं।और इस बात का अहसास होने लगता है कुछ नया काम करने की संभावना नहीं है जो है बस उसी के साथ चलते है।

“एरिक्सन यह विश्वास करते है कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता हैं।”


🌺🌺एरिक्सन🌺🌺

व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत

🖊️ उम्र के बदलने या बढ़ने से हमारी मनोसामाजिकता भी बदलती है जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है वैसे वैसे हम समाज को देखकर ,समझकर अपने मन को और नज़रिये को भी समाज के लिए बदलता है।
🔸एरिक्सन व्यक्तित्व विकास को 8
अवस्थाओं में विभाजित किया है।
(1)- विश्वास बनाम अविश्वास
( Trust VS Mistrust)
( 0 से 1 वर्ष)
🌈इस स्तर पर बालक अपनी क्रियाओं के प्रति ,दैनिक कार्य के प्रति विश्वास या अविश्वास की भावना रखते है।
यदि बच्चे को नींद आ रही है तो उसे सोने दिया जाया तो उसके मन मे विश्वास की स्थापना होगी वह अपनी इन्द्रियों से सकारात्मक अनुभव करता है और उनको पहचानने की क्षमता रखता है।
यदि उसके दैनिक कार्य हंसना, रोना, सोना आदि उसके इन्द्रियों के हिसाब से ना हो तो उसमे अविश्वास की भावना उत्पन्न होती है।

🌺स्वतंत्रता बनाम शर्म
(Autonomy Vs Shame)
(2 से 3 वर्ष )

🌺पहल बनाम अपराध
(Initiative Vs Guilt)
(3 से 6 वर्ष)

🌺 उद्यमिता बनाम हीनता
(Industry Vs inferiority)
(6 से 11 वर्ष)

🌺पहचान बनाम भूमिका भ्रम
(Identity Vs Confusion)
(12 से 20 वर्ष)

🌺आत्मीयता बनाम एकाकीपन
(Affinity Vs Isolation)
(20 से 24 वर्ष )

🌺उत्पादकता बनाम स्थिरता
(Productivity Vs Stability)
(24से 65 वर्ष)
अन्य नाम- जन्नात्मक बनाम स्थिरता
प्रजनन बनाम स्थिरता

🌺संपूर्णता बनाम निराशा
(Wholeness Vs Frustration)
(65 से जीवन के अंत तक)

नोट :- “एरिक्सन यह विश्वास करते है कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता है।”

🌺 By Shashi choudhary🌺


✨✨Notes by :- Neha Kumari 😊

🌸🌸 एरिक एरिक्सन – व्यक्तित्व का मनो – सामाजिक सिद्धांत🌸🌸

🌟मनो – विश्लेषण के साथ जो समजिकता होती है उसे,मनो – सामाजिकता कहते हैं।

🌟ये हमारे,अपने खुद के मन का विश्लेषण है।जो, बीते समय ओर आज के दौर की आधुनिकता को भी समझते हैं।अत: ये हमारी मनो – संरचना है।

🌟जैविक कारक और सामाजिक कारक के बीच परस्पर अंत: क्रिया ही व्यक्तित्व का विकास है।

🌟 समय के साथ -२,उम्र बढ़ने के साथ -२ हमारी मानसिक,शारीरिक,मानसिक व सामाजिक आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही हैं उसके अनुसार खुद को उन परिस्थितियों में ढालना,उस स्थिति के अनुसार खुद में सामंजस्य करना तथा कुछ अलग सोचना – समझना,सुधार करना इत्यादि भी मनो – सामाजिक प्रक्रिया के अंतर्गत आती है।

🌟एरिक्सन जी ने इसे ८ अवस्थाओं में विभाजित किया है :-

1️⃣विश्वास बनाम अविश्वास(०-२)
2️⃣स्वतंत्रता बनाम शर्म(२-४)
3️⃣पहल बनाम अपराध(४-६)
4️⃣परिश्रम बनाम हीनता(६-११)
उद्यमिता बनाम हीनता
5️⃣पहचान बनाम भूमिका भ्रम (१२-१०)
6️⃣ आत्मीयता बनाम एकाकीपन(२०-२५)
7️⃣उत्पादकता बनाम स्थिरता(२४-६५)
जन्नात्मक बनाम स्थिरता
प्रजनन बनाम स्थिरता
8️⃣संपूर्णता बनाम निराशा(६५ से लेकर मरणोपरांत)

📚इन सभी ८ स्तरों को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है :-

1️⃣विश्वास बनाम अविश्वास :-
🌟इस अवस्था में बच्चे अपनी क्रिया – प्रतिक्रिया सारी चीजें इन्द्रियों की सहायता से करते हैं। इन्द्रियां सकारात्मक भूमिका निभाती है।उसके द्वारा है अपनी भावनाओं को प्रकट कर पाते हैं।जैसे कि :- रोना,हंसना,सोना,हाथ – पैर पटकना,आंखे घूमाना, सर हिलाना इत्यादि।

🌟इस अवस्था में बच्चे को अपनी क्रियाओं,काम और अपनी स्थिति के प्रति विश्वास या अविश्वास की भावना होती है।
▪️जैसे कि :- अगर बच्चा सो रहा होता है तो उसे हम छेड़छाड़ नहीं करते,उसे उसके इच्छानुसार पूरी नींद लेने देंगे तो उनमें उस व्यक्ति और कार्य के प्रति सकारात्मकता आ जाएगी और उनमें विश्वास की भावना उत्पन्न होगी।

▪️लेकिन, वहीं दूसरी तरफ हम बच्चे की उसके इच्छानुसार कार्य ना करें तथा उसे परेशान करते रहे तो उनमें नकारात्मकता और अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है।तथा ये कई रूपों में बाहर भी आने लगती है।जैसे कि :- बच्चे का रोना,चिड़चिड़ापन होना,इसकी वजह से शरीर स्थिर ना रहना,परेशान होना इत्यादि। कई तरीकों से दिखता है।

2️⃣स्वतंत्रता बनाम शर्म :- ,
🌟इस अवस्था में बालक अपने कर्तव्य,अधिकार,अपेक्षाएं,उम्मीद आदि की सीमाओं के बारे में सीखता है।
▪️ये सारी चीजें बड़ों का अवलोकन करके सीखता है कि,उससे क्या अपेक्षाएं की जा रही है।

🌟इस अवस्था में जब बच्चा कुछ करना चाहता/करता है तो उस वस्तु,कार्य विशेष के प्रति उसका लगाव बढ़ जाता है।तथा वो स्वतंत्रतापूर्वक बिना किसी रोक – टोक के,स्वतंत्र रूप उनकी इच्छानुसार से कार्य करना चाहते हैं।जिससे उनमें स्व – नियंत्रण और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता काफी हद तक बढ़ जाती है।जिससे उनमें स्वतंत्रता की भावना प्रबल हो जाती है।ये बच्चे में सकारात्मकता लाती है।
▪️लेकिन उसी परिस्थिति में जब बच्चे को उस कार्य,कर्तव्य,अधिकार,अपेक्षा आदि के प्रति कुछ संदेह उत्पन्न होता है,जिससे वो नए -२ कार्यों में रुचि नहीं ले पाता तथा सामंजस्य नहीं कर पाता है।तब उनमें शर्म कि भावना विकसित होने लगती है।जो कि उनके अंदर नकारात्मकता भावना विकसित के जाती है,कि वो काम हमने पूरा नहीं किया।

3️⃣पहल बनाम अपराध :-
🌟ये बच्चे के स्कूली अवस्था है।
▪️इस अवस्था में बच्चे नए -२ चुनौतियों को स्वीकार करने लगते हैं।तथा उनसे निपटने का तरीका भी सीखने लगते हैं।
सामाजिक अंत: क्रिया करने लगते हैं।

▪️ संबंधों में अनुमोदन :-
इसमें बच्चा अपने घर – परिवार,माता – पिता,भाई – बहन,आस – पड़ोस इन सबसे परिचित होने लगता है।तथा समझने और अपने से बड़े – छोटे, सगे – संबंधियों से, सबके साथ अंत: क्रिया भी करने लगता है।

▪️बच्चे इस उम्र में लड़का – लड़की में अंतर भी समझने लगता है।
▪️इस उम्र में उनमें अपने कार्यों,वस्तुओं के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होने लगती है कि हमें अपने खिलौने को कैसे और कहां रखना है।कार्यों के प्रति जिम्मेदार होने लगता है।

🌟यदि बच्चों में पहल करने की भावना विकसित नहीं हो पाती तो उनमें अपराध कि भावना आ जाती है।जिससे उनमें नकारात्मकता उत्पन्न हो जाती है।

4️⃣उद्यमिता (परिश्रम)बनाम हीनता :-
🌟इस अवस्था में बच्चा औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने लायक हो जाता गई और विद्यालय भी जाने लगता है।तथा उसके तर्कशक्ति में भी वृद्धि होने लगती है।

▪️ उसमें स्व – अनुशासन और स्व – नियंत्रण की अभिवृति का भी विकास हो जाता है।
▪️नियमों के अनुसार व्यवहार करता है।
▪️सभ्यता और संस्कृति को समझने लगता है।
▪️अपने उत्तरदायित्वों कि बखूबी निभा ने लगता है।
▪️मानवीय कुशलता आ जाती है तथा संगीत में भी रुचि लेने लगता है।

🌟वहीं,दूसरी तरफ अगर हम बच्चे को इसके लिए अभिप्रेरित ना करके उससे बातें ना के पाएं या उनकी अवधारणों को समझ ना सकें तो उनमें हीनता की भावना आ जाती हैं।

5️⃣पहचान बनाम भूमिका भ्रम :-
🌟🌟सबसे महत्वपूर्ण :- ये अवस्था सबसे महत्वूर्ण है।
▪️ इस अवस्था को वय: संधि काल भी कहा जाता है।क्योंकि,ये बाल्यावस्था और किशोरावस्था के बीच का समय है।जो दोनों में संधि करती हैं।

🌟इस अवस्था में बालक समाज की भूमिकाओं,नियम,तौर – तरीकों आदि को समझने लगता है।तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर हो जाता है।

▪️अपनी पसंद – नापसंद के आधार पर भी कार्य करने लगता है।तथा भविष्य के अनुमानित लक्ष्यों के लिए भी सजग होकर कार्य करने लगता है।

▪️भविष्य के कार्यों पर नियंत्रण और उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए भविष्य,वर्तमान का विभेदीकरण कर पहचान निर्माण करने लगता है।

🌟वहीं अगर दूसरी तरफ उसके भावनाओं को स्थान ना दिए जाने के कारण उनमें,तनाव,अकेलापन,खालीपन,चिंता,भ्रम,अनिश्चितता और निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जाना ही आगे चलकर विरोधी बन जाता है।

6️⃣आत्मीयता बनाम एकाकीपन :-
🌟इस अवस्था में व्यक्ति भविष्य की जिम्मेदारियों के प्रति सजग होने लगता है।

▪️विवाह बंधन में बंधना,पारिवारिक,सामाजिक जीवन में आगे बढ़ना आदि के भाव विकसित होने लगते हैं।

▪️अपने कैरियर और जीवन के प्रति जिम्मेदारियों का निर्वाह करने लगते हैं।तथा जिनके साथ विश्वास जुड़ा होता है उनसे जुड़ने लगते हैं।

7️⃣उत्पादकता बनाम स्थिरता :-

🌟इस अवस्था में आनेवाली पीढ़ियों के बारे में चिंतित होने लगता है।

▪️समाज में भावी- पीढ़ी के लिए चिंतित होने लगता है।जहां उनकी आनेवाली पीढ़ी जीवन बिताएंगी।उनका भविष्य उज्ज्वल करने के लिए भी क्रियाशील होने लगते हैं।

▪️अपने लक्ष्य को पूरी होने के बाद स्थिरता की भी उम्मीद करते हैं।

▪️इस अवस्था में कई प्रकार के विचार आते हैं।एक समय के बाद उनकी विचारों में स्थिरता आने लगती है।

▪️इस अवस्था में लोग अपने व्यक्तित्व,बोलने,पहनने – ओढ़ने की शैली को भी महत्व देने लगते हैं।मतलब,बाह्य रूप से अभिप्रेरित होते हैं।

🌟अंत: जैसे -२ उम्र बढ़ने लगती है अपने मन की सुंदरता को देखने लगते हैं।और दूसरों के प्रति ज्यादा चिंतित होने लगते हैं।

8️⃣संपूर्णता बनाम निराशा :-

🌟इस अवस्था में व्यक्ति जीवन की सफलता/असफलता का समायोजन कर संपूर्णता पर पहुंचते हैं।
▪️भूतकाल के बारे में सोचते हैं।
▪️शारीरिक क्षमता गिरने लगती है।
▪️मृत्यु का भय तथा अपरिवर्तनीय सफलता आ जाती है।
▪️अपने उम्र के लोगों के साथ जुड़ने लगते हैं।
▪️आय में कमी आ जाती है।
▪️ये इस व्यक्तित्व के मनो – सामाजिक पहलू का आखिरी स्तर है।

🌟🌟ये अवस्था मानव जीवन के विकास की वो अवस्था है,जो पिछली सभी अवस्थाओं का आकलन और मूल्यांकन है।🌟🌟

📚 अगर जो कार्य हम करना चाहते हैं,वो सम्पूर्ण हो जाए तो ठीक। वरना पूर्ण ना हो तो,निराशा होने लगती है।मृत्यु और अन्य दुष्परिणामों का भय होने लगता है। तथा अपरिवर्तनीय सफलता होने लगते हैं।

🌳एरिक्सन जी,यह विश्वास रखते हैं कि” वृद्धावस्था ही सच्ची परिपक्वता की अवस्था होती है।”

🌸🌸 धन्यवाद्🌸🌸


Notes by ➖Rashmi Savle

एरिक्सन का व्यक्तित्व का
मनोसामाजिक सिद्धांत
Psychological theory of personality

एरिक्सन के अनुसार
समाज और मन के विश्लेषण द्वारा आधुनिक दुनिया को समझना सुधारना या फिर बदलाव करना |
मनोविश्लेषण का निर्माण या विस्तार करना ही आधुनिक है समाज उम्र के अनुसार भी बदलता है जब भी मन के विश्लेषण की बात करें तो जो क्रमिक विकास है वह बहुत से कारणों पर निर्भर करता है और मन का विश्लेषण समय के अनुसार परिवर्तित होना चाहिए |
इसमें समय के अनुसार जैविक और सामाजिक कारकों के बीच जो अन्त: क्रिया होती है वही से व्यक्तित्व का विकास होता है जिसका व्यक्तित्व विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है |

एरिक्सन ने अपने सिद्धांत के आठ चरण बताये हैं➖

1⃣ विश्वास बनाम अविश्वास ( 0-1 वर्ष )
Trust vs Mistrust (0-1year) ➖

बच्चे को अपने क्रियाओं के प्रति किसी के ऊपर विश्वास और अविश्वास की भावना को विकसित करता है जैसे
बच्चा अच्छी नींद लेता है तो वह खुद को परिस्थिति में समायोजित करता हैउसके अन्दर मूल विश्वास उत्पन्न होता है |
वह अपनी क्रियाओं को इन्द्रियों के द्वारा पहचान कर विश्वास विकसित करता है|
इन्द्रियों का अनुभव करता है और लोगों के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है |
उसके अंदर लोगों को पहचानने की क्षमता का विकास होता है |
निरंतरता, एकरूपता, स्थिरता के कारण लोगों पर विश्वास करना सीख जाता है |
इसके विपरीत यदि उसके विपरीत या अनुरूप व्यवहार नहीं किया जाये तो बच्चे में अविश्वास की भावना विकसित होती है |

2⃣ स्वतंत्रता बनाम शर्म ( 1 – 3 वर्ष)
Autonomy vs Shame ( 1-3 years)

इस अवस्था में बच्चे में शर्म और स्वतंत्रता की भावना विकसित होती है |
इस अवस्था में बच्चा सीखता है कि उससे क्या उपेक्षाएं है |
वह अपने कर्त्तव्य, अधिकार, सीमाएँ आदि की पहचान कर उन पर कार्य करता है |
बच्चा नये नये प्रयास करता है उसमें स्वनियंत्रण की भावना का विकास होता है |
इसके विपरीत यदि बच्चा स्वंय को स्वतंत्र अनुभव नहीं करता है तो उसमें संदेह की भावना उत्पन्न होने लगती है |
बच्चे में ईच्छाशक्ति का विकास होता है यदि ऐसा नहीं होता है तो उसके अंदर शर्म की भावना विकसित होने लगती है |

3⃣ पहल बनाम अपराध (3-6 वर्ष)
Initiative vs Guilty (3-6 years)

इस अवस्था में बच्चा लाइफ की चुनोतियों से निपटने के तरीकों को सीखता है |
यह अवस्था स्कूल जाने से पहले की अवस्था है इस अवस्था में वह परिवार से ही अनुकरण करता है |
बच्चा अपने संबधियों से अनुमोदन करता है उनकी अन्त: क्रियाओं से सीखता है यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें बच्चा गतिक कौशल करता है |
वह अपने बराबर या बड़े लड़कों के साथ गतिक कौशल करता है |
इस उम्र में बच्चा लड़का या लड़की में अन्तर समझने लगता है |
वह अनुकरण या पहल करना सीख जाता है |
इस अवस्था में बच्चा ज्ञान प्राप्त करके अपने उत्तरदायित्व को समझकर ग्रहण करने लगता है |
वह अपने उद्देश्य या लक्ष्य को को प्राप्त करने के लिए नियोजन करने लगता है उनके प्रति संकल्पित हो जाता है |
यदि बच्चे में positive गुण नहीं आतें है तो उसमें अपराध के गुण विकसित होने लगते हैं |
इस अवस्था में बालक सर्वाधिक गतिविधि करता है |
इस अवस्था में खोज प्रवृत्ति, कार्य, हताश प्रयोग, कल्पनाशीलता आदि सभी गुणों की प्रवृत्ति बच्चे में इसी अवस्था में आती है इस अवस्था को खेल की अवस्था भी कहा जाता है क्योंकि बच्चा गतिक कौशल करने लगता है |
यदि इसके विपरीत पर्यावरण मिला तो उसमें अपराध के गुण विकसित हो जातें हैं |

4⃣ उद्यमिता बनाम हीनता (6-11 वर्ष)
Industry vs Inteiroty ( 6-11years)

इस अवस्था में बालक के अन्दर औपचारिक शिक्षा प्रारंभ होती है यह स्कूल जाने की अवस्था है |
इति अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग की भावना भी इसी अवस्था मे होती है उसके अंदर तर्क शक्ति में वृद्धि होने लगती है |
स्वअनुशासन आता है और नियमों के हिसाब से लहर दूसरों के प्रति व्यवहार को समझने लगता है कि किससे कैसे व्यवहार करना है |
संस्कृति के तकनीकी पक्षों को समझने लगता है जिससे उसमें परिश्रम की सोच आती है |
वह स्कूल जाने लगता है घर के काम करने लगता हैं उत्तरदायित्व का विकास, संगीत सीखना, मानवीय कुशलताओं को सीखने लगता है |

यदि बच्चा इन सब क्रियाओं को करना चाहते हैं और नहीं कर पाते हैं तो उनके अंदर हीनता की भावना आ जाती है और अक्षमता का शिकार हो जाता है और यही इस अवस्था का दुष्परिणाम है और यदि हीनता की भावना विकसित हो गयी तो सब बेकार है |

5⃣ पहचान बनाम भूमिका भ्रम (12-20 वर्ष)

इस अवस्था में बच्चा स्वयं को खोजने की कोशिश में रहता है वह समाज के साथ अपनी समझ को विकसित करता है |

वह पूर्व अनुमानित लक्ष्य के लिए जागरूक होता है उसको अपनी पसंद नापसंद का भी ख्याल आने लगता है |
यह जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है क्योंकि इसमें भविष्य को नियंत्रण की शक्ति की पहचान होने लगती है उसकी समझ आने लगती है |

वर्तमान में वह क्या है और उसे क्या बनना है उसकी समझ विकसित होने लगती है |

” बचपन से वयस्कता के बीच के समय को बचपन से वयस्क का वयसंधि काल या वयस्क संधि काल कहते हैं “|

ये पहचान के निर्माण की अवस्था है भूमिका का निर्माण भी इसी अवस्था में होता है यदि उसके अनुसार काम नहीं होता है तो वह बहुत खतरनाक होता है और हीन भावना आ जाती है |

भूमिका निर्वाहन में भ्रम ➖

  • यदि भूमिका निर्वाहन में भ्रम उत्पन्न हो जाता है तो बच्चा अपने आपको गलत ,खाली, अकेला, चिंतित, और अनिश्चित महसूस करता है जो कि बहुत खतरनाक है और बच्चे ये सोचने लगते हैं कि उनको निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है |
  • वे विरोधी प्रवृत्ति के हो जातें हैं और अव्यवस्थित की अवस्था में चले जाते है और उनके अंदर स्वयं के प्रति घृणात्मक पहचान बनती है और स्वयं को आयोग्य समझने लगते हैं |

पहचान और भूमिका की बराबरी की सहभागिता रहती है जैसे ➖

  • इसी उम्र में कर्त्तव्य और ईमानदारी का विकास होता है |
  • लैगिक रूप से जिम्मेदार और परिपक्व हो जाता है उसके अंदर समझदारी विकसित हो जाती है लेकिन लैगिकता की समझ नहीं आ पाती है |
  • वयस्कों जैसी उम्मीदें लैगिक स्वतंत्रता न होने के कारण बच्चा खुद अपने से सोचता है और अपनी स्वयं की धारणा बनाकर गलत और सही राह बनाकर चलने लगता है |
  • इस अवस्था में बच्चा आंतरिक ज्ञान को खुद से खोजने की कोशिश करते हैं और उसके अनुसार उनकी पहचान बनती है और वह उसी रूप में आगे बढ़ता है |
  • वयस्कता की चुनौतियों के लिए यह आवश्यक है कि बच्चे को इस अवस्था में सही मार्गदर्शन मिले तभी उससे कोई उम्मीद की जा सकती है |

6⃣ आत्मीयता या अल्पवयस्कता बनाम एकाकीपन (20-24 वर्ष)

इस अवस्था में भविष्य की जिम्मेदारी पर ध्यान आकर्षित होने लगता है इस अवस्था में वैवाहिक जीवन की शुरुआत होने लगती है |

प्रारंभिक पारिवारिक जीवन की शुरुआत की सही उम्र माना जाता है |

इस अवस्था में सामाजिक आत्मीयता आने लगती है सामाजिक रूप से लोगों से जुडा़व होने लगता है |

लैंगिक रूप से भी परिपक्वता आ जाती है और Stability खोजने लगते हैं और अलग अलग क्षेत्र में लोगों को पहचानने लगते हैं |

इस अवस्था में लोग उन्ही के साथ जुड़ते है जिनसे विश्वसनीय संबंध होता है जैसे जीवन साथी |

यदि इसके विपरीत ये सब नहीं होता है तो वे अलगाव एकाकीपन में रहते हैं और संबंधो से दूर रहने की कोशिश करते हैं अपनी आत्मीयता में किसी को नहीं आने देतें हैं वे अपनी आत्मीयता से समझौता नहीं करते हैं और ये सब परिस्थिति पर निर्भर करता है कि उनकी शुरुआत कैसी हुई है |

7⃣ उत्पादकता बनाम स्थिरता , जननात्मक बनाम स्थिरता, प्रजनन बनाम निश्चितता (24-65 वर्ष)

इस अवस्था में व्यक्ति आने वाली पीढ़ी के लिए चिंतित होता है वह सोचता है कि जिम्मेदारी का निर्वाहन कैसे किया जाए |

व्यक्ति उस समाज के बारे में भी सोचता है जहाँ उनकी भावी पीढ़ी समय बितायेगी | वह चिंतित रहता है कि उसको कैसे स्वीकार करेगी |

उसको जिम्मेदारी का अनुभव होने लगता है कि जैसे स्वयं का घर ,जमीन, कार, बाईक आदि |

इस अवस्था में उत्पादकता के साथ साथ विचार करना भी जरूरी है कि कैसे अपने भविष्य को संवारा जाये |

इस अवस्था में व्यक्ति कुछ भी कर सकता है इसी अवस्था में व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए दो तरीके के इम्प्रेशन बना सकता है
🔹 एक अपने शारीरिक रूप को निखार सकता है जैसे अच्छे कपड़े, अच्छी बोली, Style Beauty personality आदि
🔹 और दूसरी आंतरिक सुंदरता या मन की सुंदरता यदि मन की सुंदरता है तो व्यक्ति अपने जीवन को अच्छा बना सकता है |

इस अवस्था में व्यक्ति दूसरों के प्रति भी चिंतित रहता है जैसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता |

8⃣ संपूर्णता बनाम निराशा (65 – मृत्यु तक)
Wholeness vs Frustration

यदि इस अवस्था से पहले व्यक्ति ने कुछ अच्छा कर लिया तो उसके मन में संपूर्णता का भाव होता है अन्यथा निराशा उत्पन्न हो जाती है अर्थात

सफलता या असफलता के समायोजन में व्यक्ति अपने भूतकाल के बारे में सोचता है व्यक्ति अपने को अनगिनत चीजों से घिरा हुआ पाता है उसकी

🔹 शारीरिक क्षमता में कमी हो जाती है वह जिदंगी के अंतिम पड़ाव में होता है |
🔹उसकी आय में कमी हो जाती है अपनी उम्र के लोगों के साथ जुडा़व होता है |

यह अवस्था मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओं का संकलन, समायोजन, और मूल्यांकन है | कि आखिरकार हमने किया क्या है |
इस अवस्था में पूरे तरीके से जो करना चाहते थे और वो मिला तो संपूर्णता और नहीं मिला तो निराशा |

इस उम्र में लोगों को भूतकाल के साथ साथ मृत्यु का भी भय होता है और अपरिवर्तनीय अवस्था का अहसास होता है |

एरिक्सन ये विश्वास करते हैं कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता है क्योंकि उस समय जब आप कुछ नहीं कर सकते तब आप सोचते हैं |

इस प्रकार यदि व्यक्ति कुछ अच्छा कर लेता है तो संपूर्णता और नहीं कर पाते हैं तो निराशा का भाव उत्पन्न हो जाता है |

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✍🏻Notes by➖Puja Kumari🖋️

🔅 एरिक्शन : व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धान्त

एरिक्सन के अनुसार समाज और मन का विश्लेषण के सिद्धांत का निर्माण या विस्तार किया। इसके द्वारा दुनिया को समझ कर अपने मानसिक विश्लेषण के संरचना पर खुद में परिवर्तन करते है।
★जैसेकि 10 साल पहले के युग मे तभी के आधुनिक सामाजिक पहलू या स्थिति के अनुसार था लेकिन अभी 10 साल बाद यानि अभी के सामाजिक स्थिति के अनुसार खुद में परिवर्तन लाये।
★ उम्र के हिसाब से मनोविश्लेषण या मनोसामाजिक➖इनके अनुसार समय के साथ अलग – अलग प्रतिक्रिया करते है। उम्र के अनुसार हमारी समझ भी बढ़ती है। जैसे- कोई बच्चा जब छोटा होता है, तभी की समझदारी और बड़े होने के बाद कि समझदारी दोनों अलग-अलग होती है। इसलिए मन के साथ समझ का विश्लेषण भी बढ़ता है।
★ उम्र के साथ – साथ जैविक कारक और सामाजिक कारक के बीच अन्तःक्रिया होती है। जैसे बचपन मे हम लोगो को देखके छीप जाते थे लेकिन अभी बड़े होकर छुपकर लोगो को देखते है।इसलिए कहा जाता है- वो दौर था बचपन का ( जैविक कारक ), यह दौर जवानी का ( समाजिक कारक )। यही व्यक्तित्व विकास है।
★ उम्र के साथ या समय के अनुसार हमारी मनोविश्लेषण या मनोसामाजिक को देखने का नजरिया भी बदलता है। वह नजरिया समाज को सुधारने या बदलने की हो,यहि personality development है।

🌸 एरिक्सन ने अपने सिद्धान्त में 8 प्रकार की अवस्थाओ पर बात की है,जो निम्न है

1️⃣ विश्वास बनाम अविश्वास (Trust vs Mistrust )【0 – 1year】

★बच्चे अपनी क्रियाओ के प्रति, काम के प्रति, अपनी स्थिति के प्रति विश्वास या अविश्वास की भावना का विकास होता है। जैसे- कोई बच्चा जब सोता है, तो उसके अंदर मूलविश्वाश की स्थापना होती है। उसकी अच्छी नींद में सोने की क्षमता से हम समझ सकते है कि वह अपने इंद्रियों से सकारात्मक चीजो को अनुभव करता है और उसको पहचान कर विश्वास या अविश्वास करता है।
★ बच्चे अपने शरीर के साथ 3 से 6 महीने में वातावरण के अनुकूल हो जाता है और खुद को उस वातावरण में समायोजित करने लग जाता है।
★ बच्चे अपने दैनिक कार्य को स्थिति अनुसार करते है।जैसे- हँसना, रोना, चिल्लाना, भूख लगना इन सभी कार्य को अपने इंद्रियों से अनुभव करता है और विश्वास करता है।
★ बच्चा दूसरे के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है। बच्चे में लोगो को पहचानने की क्षमता आ जाती है। जिसके कारण निरंतरता या एकरूपता या स्थिरता उत्पन्न होती है और विश्वास करना सीखने लगता है।
★ Neg. Factor ➖यदि इसके अनुरूप behave नही करते है तो बच्चे में अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है। जैसे बच्चे का रोना, चिल्लाना, चिड़चिड़ापन, ये सारी क्रियायें उसके activity से पता चलता है। बच्चे का अपनी माँ के गोद से दूसरे के गोद मे न जाना ये अविश्वास के कारण होती है।

2️⃣ स्वतंत्रता बनाम शर्म ( Autonomy vs Shame )【1 to 3 year】

★बच्चा इस अवस्था मे स्वतंत्रता और शर्म की भावना का विकास हो होता है।
★बालक सीखता हैं कि उससे क्या अपेक्षा या उम्मीद है। बालक अपने कर्तव्य, अधिकार की सीमायें को feel करने लगता है।
★ इस अवस्था मे नई नई चीजों पर क्रिया करने लगता है,क्योंकि उससे रिलेटेड कार्य को देखता है और सीखता है फिर उस काम को खुद से करने लगता है।
★ इससे बच्चा के अंदर स्वनियंत्रण की भावना का विकास होता है। लेकिन यदि बच्चें को स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न नही हुई तो उसमें संदेह की भावना आने लगती है।
★ इस अवस्था मे इच्छा शक्ति का भी विकास होता है इससे स्वनियंत्रण की भावना और भी बढ़ जाती है। यदि बच्चे में अपने काम को लेकर कोई भी संदेह रहता है तो इससे बच्चे की इच्छा शक्ति में कमी आने लगती है और स्वनियंत्रण की भावना नही रह पाती है, जिससे कि शर्म की भावना भी उत्पन्न होने लगती है।और बच्चा अपना कार्य पूरा नही कर पाता है।

3️⃣ पहल बनाम अपराध/ अपराध बोध ( Initictive vs Guilt )【 3 to 6 years 】

★ इस stag में बच्चे अपने चुनौतियो से निपटने के तरीके को सीखने लगता है।
★ बच्चे का जो संबंध होता है उसे समझने लगता है।जैसे दादा-दादी, मामा-मामी, भाई-बहन, मौसा-मौसी, नाना-नानी आदि।
★इस उम्र में बच्चे का लगाव जिसके साथ ज्यादा होता है उसके साथ comfertable feel करता है। जिसको नही पहचानता है उसके साथ uncomfertable feel करने लगता है। इसलिए बच्चों में संबंधो में अनुमोदन / लगाव/ अन्तःक्रिया होने लगता है।
★इसी अवस्था मे बच्चे अपने उम्र या अपने से बड़े उम्र वाले लोगो के साथ गतिविधि करने लगता है। जैसे एक बच्चा जब mirror को देखता है,तो उसे लगता है कि कोई दूसरा बच्चा मेरा नकल है।इससे बच्चे में सोचने और समझने की कौशल का विकास होता है।
★ इस अवस्था मे बच्चे में लैंगिकता समझ भी आ जाती है जिससे वो बता पाता है कि वो लड़का है या लड़की है।
★ इसमें बच्चा अनुकरण / पहल करने है, दूसरे के किये हुए चीज को दुहराने लगता है। इसमें छोटे बच्चे जल्दी अनुकरण करने लगते है।
★ इस अवस्था मे बच्चे ज्ञान प्राप्त करने लगते है और अपने उत्तरदायित्व को समझने लगते है।जैसे- अपनी खिलौने को संभाल कर रखना, किसी की बात को सुनके उस काम को पूरा करना आदि ।
★ इस उम्र में बच्चे अपनी उद्देश्यों या लक्ष्य के प्रति गुणवत्ता को समझने लगते है। और नियोजन निर्धारित करके काम करने लगता है। जैसे बच्चे अपने दौड़ को लक्ष्य बना लेते है या किसी बच्चे को कोई game खेलने में अपना लक्ष्य बना लेते है।
★ यदि बच्चे में इनसब के प्रति सकारात्मक गुण नही आती है तो बच्चा में अपराधबोध गुण आने लगते है।
★ हर बच्चे में या बड़े में पहल और अपराध दोनो ही गुण होते है, इसमें जिसका लक्षण ज्यादा होगा। उसके आधार पर उसमे पहल या अपराध का बोध होगा।
★ बच्चे में पहल या अपराध उसके environment पर भी निर्भर करता है।
★4से6 साल में बच्चे की सर्वाधिक गतिविधि होती है इस समय मे बच्चा खेल -खेल में अपना कार्य पूरा कर लेते है।
★ यदि ये सब नही हुई तो बच्चे इसका उल्टा काम करने लगते है जिसे अपराध कहा जाता है।

4️⃣ उद्दीमता / परिश्रम बनाम हीनता ( Indisting / Infeirorty )【6 to 11 years】

एरिक्सन का ये चौथा अवस्था है।
★ इस अवस्था मे बच्चे का औपचारिक शिक्षा शुरू हो जाती है। जैसे स्कूल जाना, पढ़ना, लिखना।
★ अन्य व्यक्ति के साथ सहयोग की भावना आ जाती है, दुसरो की मदद करने लगते है।
★ तर्क शक्ति में वृद्धि होने लगती है।किसी भी समस्या में सोचने लगते है और अपना तर्क देते है।
★ स्वअनुशासन करने लगते है। कहाँ पर कैसे व्यवहार करना है।और अपने नियमो के हिसाब से व्यवहार करने लगते है।
★ संस्कृति के पक्षो को समझने लगता है, जिससे कि उद्दीमता या परिश्रम की सोच आती है। इस अवस्था मे बच्चे अपने रुचि के अनुसार aim बना लेते हैं मुझे आगे क्या बनना है।इंजीनियर, डॉक्टर, संगीतकार,लेखक ,कवि etc
★ यदि ये सारी क्रियायें करना चाहते है, और नही कर पाते है तो हीनता की भावना आ जाती है। जिससे कि अक्षमता का शिकार हो जाते है और दुष्परिणाम दिखने लगता है।

5️⃣ पहचान बनाम भूमिका भ्रम /भ्रांति ( Identity vs Role confusion ) 【12 to 20 years 】

★ इस stag में न तो बच्चा होता है न तो वयस्क रहता है। इस अवस्था को किशोर कहा जाता है। इस उम्र को transition fej भी कहा जाता है। ये सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इसी उम्र में समाज की मांग और भूमिका में कई परिवर्तन का सामना करना पड़ता है। क्योंकि ये परिवर्तन हमारे वयस्क की चुनौतियों का सामना करने के जरूरी / आवश्यक होती है।
★ इस उम्र में अपना पसंद ,नापसंद होने लगती है।
★भविष्य के प्रति पूर्वानुमानित लक्ष्य पर जागरूक होने लगते है।
★इस समय भविष्य पर नियंत्रण की शक्ति और उद्देश्य का पता रहता है। जिससे कि present में क्या है? भविष्य में क्या कर सकते है? इस बात को जानने लगता है।
★बचपन के बाद ( बाल्यावस्था ) और वयस्कता से पहले ( किशोरावस्था ) के काल को संधिकाल या वयस्कसंधि कहते है। इस काल का उम्र 12 से 16 तक माना गया है।
★ इस अवस्था मे हमारी पहचान का निर्माण होता है और भूमिका का भी निर्माण होता है।
★ इसके negative factor➖यदि बच्चे अपने रुचि के अनुसार कुछ बनना चाहते है और नही बन पाते हैं तो बच्चे के अंदर भ्रम उत्पन्न होना लगती है। जो भूमिका निर्वहन में बहुत Impactfull होता है। जिससे बच्चा के अंदर अकेलापन/खाली/ चिंतित/अनिश्चितता महसूस करने लगता है और निर्णय लेने पर मजबूर हो जाते है। और ऐसा feel करता है जिससे कि बच्चा बहुत विरोधी बन जाता है।और अब वह अव्यवस्थित अवस्था मे चले जाते है।
★इस समय बच्चे में घृणात्मक पहचान बनने लगती है, जिससे कि खुद को अयोग्य मानने लगता है।
★ 12 से 20 की उम्र में कर्तव्य और ईमानदारी का विकास होता है।
★इसी उम्र में लैंगिक रूप से परिपक्व या जिम्मेदार हो जाते है।इस उम्र में बच्चे में muture हो जाते है और इससे व्यस्को जैसा व्यवहार की उम्मीदे की जाती है, लेकिन लैंगिक स्वतंत्रता नही दी जाती है। जिससे कि बच्चे अपने घर परिवार से बाहर निकलकर आंतरिक ज्ञान को खोजने की कोशिश करते है।

6️⃣ आत्मीयता बनाम एकाकीपन / अलगाव ( Intimacy / Isolation ) 【20 to 24 years】

★इस उम्र को अल्प वयस्क भी कहा जाता है। इस अवस्था मे भविष्य के प्रति जिम्मेदार हो जाती है।
★ इस उम्र में विवाह के बंधन में बंध जाते है।और वैवाहिक जीवन की शुरूआत करते करते है।
★ प्रारंभिक पारिवारिक जीवन की शुरुआत होने का यह सही समय माना जाता है।
★ इस अवस्था मे सामाजिक आत्मीयता आने लगती है। सामाजिक रूप से लोगो से जुड़ने लगते है।
★इस अवस्था मे लैंगिक परिपक्वता आ जाती है, और stability
★इस अवस्था मे उन्ही लोगो से जुड़े रहते हैं जिनपर उसका विश्वास रहता है। जैसे – lifepartner
★इसके Neg. Factor भी होते है➖अगर ये सब नही होता है तो अकेलापन, एकाकीपन आ जाता है। वह किसी के संबंधों में नही आने लगता है और संबधो से दूर रहने लगता है। अब आत्मीयता से समझौता नही करना चाहते है। किसी पर विश्वास नही रहता है खुद में अकेले रहने की आदत बन जाती है।

7️⃣ जननात्मक / उत्पादक / प्रजनन बनाम स्थिरता / निश्चितता ( Productivity vs Stabality ) 【24 to 65years】

★ इस अवस्था मे जो व्यक्ति होते है, वो अपने आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचने लगते है।
★ इस उम्र में समाज के बारे में चिंतित रहता है,कहाँ उसकी भावी पीढ़ी जीवन बिता पायगी। कैसे समाज मे वो अपना सामंजस्य स्थापित कर पायेगे।
★ उसे उसके सारी जिम्मेदारी का अनुभव होने लगता है। वो सोचने लगते है कि एक अपना घर हो, जमीन जायदाद हो।
★इस उम्र में उत्पादकता के साथ-साथ विचार करना भी जरूरी होता है। कि कैसे भविष्य को सवारा जाय।
★इसी उम्र में व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए दो तरह का धारणा या impression बना सकते है। जैसे कि कोई व्यक्ति अपनी शरीरिक रूप से खुद को निखरता है – बाहरी सुंदरता, अच्छा कपड़ा, अच्छा बंगलागाड़ी इत्यादि। और दूसरा व्यक्ति आंतरिक मन की सुंदरता को निखरता है।
★ इसी अवस्था मे व्यक्ति दूसरे के प्रति और अपने बच्चों के भविष्य के प्रति ज्यादा चिंतित होते हैं।

8️⃣ सम्पूर्णता बनाम निराशा ( Wholeness vs Frustration ) 【65years से मृत्यु तक 】

★इसमें सिर्फ सफलता या असफलता के बारे में सोचता है यदि अपनी past में कुछ अच्छा किया तो सफलता महसूस करता है, यदि past में कुछ अच्छा नही किया रहता है तो असफलता महसूस करता है।
★ इस उम्र में शरीरिक क्षमता में कमी आ जाती है।
★ उसकी आय में भी कमी आ जाती है। अपनी उम्र के लोगो के साथ जुड़े रहते है।
★ मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओ का संकलन, समायोजन, समेकन और मूल्यांकन करने लगते है।
★ इस पूरे जीवन मे कुछ अच्छा काम किया तो सम्पूर्णता का एहसास होता है, अगर वैसा नही हुआ तो निराशा होने लगती है।
★ मृत्यु का भय भी होने लगता है। ये अपरिवर्तनीय असफलता हो जाती है। इस समय को कोई नही बदल सकता है।
★ एरिक्सन का ये मानना है कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता है। क्योंकि इस समय मे व्यक्ति खुद से कुछ नही कर सकता है तो पूर्व जीवनकाल के बारे में सोचते रहता है।
★ इस अवस्था मे यदि व्यक्ति कुछ अच्छा करता है तो उसके भाव मे संपूर्णता होती है, यदि कुछ नहीं कर पाता है तो निराशा की भावना आती है।

🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅 Thank you🙏🏻


By Vandana Shukla

🌸🌸 व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत🌸🌸
🌸 Psycho social theory of personality🌸

यह सिद्धांत एरिक एरिकसन द्वारा प्रतिपादित किया गया था

यह सिद्धांतअलग-अलग समय /स्तर में बच्चे की जो पर्सनालिटी को और बिहेवियर को डिफाइन करता है बताता है।

उनके सामाजिक पक्षों पर ध्यान दिया, उनकी सोच पर ध्यान दिया

यह जो समाज है और मन है
इनको कैसे नियोजित होता है इस पर बात किया हूं
मानसिक विश्लेषण का सिद्धांत का निर्माण किया।
जो मनोविश्लेषण संरचना है उसका निर्माण और विस्तार आप खुद करते हैं और वह दुनिया की समझ लाते हैं। अपने मन में और समय के हिसाब से उस दुनिया के समझ को सुधारते हैं और उसके अनुसार स्वयं में परिवर्तन करते हैं।
समय के अनुसार मनोविश्लेषण का और संरचना का निर्माण या विस्तार होता है और यह निर्माण विस्तार जरूरी भी है मनोविश्लेषण के साथ जो सामाजिकता होती है उसी को मनोसामाजिक सिद्धांत कहते हैं।

जैविक कारक +सामाजिक कारक के बीच जो अंत:क्रिया है वही व्यक्तित्व विकास है।

इन्होंने 8 मनोसामाजिक अवस्थाएं दी है।

1️⃣ विश्वास बनाम विश्वास
Trust vs mistrust
0-1

नींद, अच्छी नींद आना, अगर बच्चा अच्छी नहीं लेता है तो उसमें मूल विश्वास की भावना का जन्म होता है अच्छी नींद मूल विश्वास की स्थापना करती हैं
बच्चों में समझदारी नहीं है लेकिन वह अपनी इंद्रियों से अनुभव करता है ,अपनी इंद्रियों से वह सकारात्मकता का अनुभव करता है और उसको पहचानने की क्षमता रखता है।

3 से 6 महीने तक में बच्चा वातावरण में समायोजन करने लगता है , अपने मूल अंग में सामंजस (coordination)करने लगता है।
(बच्चा समय पर सोना दूध पीना रोना नहीं सारी क्रियाएं करने लगता है)
दैनिक कार्य सिस्टमैटिकली करता है और जब सिस्टमैटिकली करने लग जाता है तो उसकी इंद्रियां वह अनुभव करती हैं और धीरे-धीरे वह विश्वास करने लगता है लोगों के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है और अगर वह यह सब कार्य नहीं किया अच्छी नींद नहीं ली दूध नहीं पिया दैनिक कार्य नहीं किया अनुभव नहीं किया तो अविश्वास पैदा होगा और नकारात्मक क्रिया करेगा।

बच्चे में पहचानने की क्षमता विकसित हो जाती है जैसे बच्चा मां को सबसे पहले पहचानता है फिर पिता को और बाद में बाकी परिवार के सदस्य को वह जिन लोगों को देखता है उन्हें पहचानने लगता है उन पर विश्वास करने लगता है जैसे बच्चा यदि रो रहा है और अगर उसकी मां आ जाती है तो बच्चा रोना बंद कर देता है या उसका विश्वास है कि मां आ गई और सब दुख दूर हो गए, रोना बंद कर देता है निरंतरता, एकरूपता, स्थिरता इनकी वजह से वह अन्य लोगों में विश्वास करना सीख जाता है लेकिन अगर परिवार के सदस्यों द्वारा बच्चे को आरामदायक स्थिति ना दी जाए अनुरूप व्यवहार ना दिया जाए तो बच्चे में अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है और अविश्वास उसके शरीर द्वारा प्रदर्शित होगा जैसे बच्चा रोने लगेगा चिड़चिड़ा ने लगेगा और उसका शरीर का अस्थिर हो जाएगा।

2️⃣ स्वतंत्रता बनाम शर्म
Autonomy vs shame
1-3 year

इस उम्र में बच्चा यह सीखता है कि उस से क्या अपेक्षाएं हैं जैसे आप बच्चों को कहते हो कि ऐसा नहीं करते ऐसा नहीं बोलते या यह काम करो यह मत करो या यह बोलो यह नहीं बोलो। बच्चे को उसकी लिमिटेशंस बताते हैं। पर जब बच्चा यह सब नहीं जानता लेकिन हमारी प्रतिक्रिया से उसके अंदर व्यवहार आते जाते हैं ।भाव क्या होता है यह बच्चा नहीं जानता ,भाव ,कर्तव्य, अधिकार, सीमाएं इसको बच्चा नहीं जानता लेकिन प्रदर्शित करता है उसको भाव आते हैं ।
वह नए नए प्रयास करता है और उन प्रयास के द्वारा स्व नियंत्रण की भावना उत्पन्न होती है स्व नियंत्रण करने लगता है तब स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न होने लगती है और अगर स्वतंत्रता की भावना या स्वनियंत्रण की भावना उत्पन्न नहीं होगी तो संदेह आता है और बच्चा झिझकने लगता है या शर्माने लगता है ।
स्व नियंत्रण के द्वारा बच्चा छोटे-छोटे कार्य करने लगता है

बच्चों में इच्छाशक्ति इसी उम्र में आती है ,जैसे इच्छा शक्ति से ही बच्चों में किसी बात को मनवाने की जिद पैदा होती है कि हमें यह चाहिए मुझे खाना नहीं खाना मुझे मोबाइल चाहिए। इच्छाशक्ति से ही स्व नियंत्रण उत्पन्न होता है और बच्चा निर्णय भी लेता है।

3️⃣ पहल बनाम अपराध
Initiative vs guilt
4-6
चुनौतियों से निपटने के तरीके।
बच्चा अपनी छोटी-छोटी परेशानियों , अपनी समस्या को खुद सुलझाने में सक्षम हो जाते हैं।
संबंधों में अनुमोदन अपने। बराबर या बड़े लड़कों के साथ गतिक कौशल -बच्चा अपने बड़े हम उम्र के बच्चों के साथ खेलने में बात करने में सहज महसूस करने लगते हैं उनसे अपनी परेशानियां बताते हैं।
लड़के लड़की में अंतर समझने लगते है -इस उम्र में बच्चे अपने सामान लिंग वाले बच्चों के साथ खेलना पसंद करते हैं वह जानते हैं कि यह लड़की है या लड़का ।
अनुकरण/ पहल ।
उत्तरदायित्व ग्रहण करने लगते है।
उद्देश्य /लक्ष्य की गुणवत्ता को समझता है ।
नियोजित होकर कार्य करता है।
अगर बच्चे में पॉजिटिव गुण नहीं हुए तो उसका उसके बदले में अपराध के गुण आ जाएंगे ।
जैसे जैसे वातावरण बदलता है वह उसके अनुसार प्रतिक्रिया करता है ।
बालक की सर्वाधिक गतिविधि इसी अवस्था में होती है।
खोज प्रवृत्ति ,अलग-अलग प्रकार के कार्य करता है।
बच्चा इस अवस्था में हताश भी होता है प्रयोग भी करता है लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए खेल लिए तत्पर रहता है।
खेल की अवस्था बच्चे के अंदर अपराध की भावना रहती है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप में।

4️⃣ उद्यमिता बनाम हीनता
या परिश्रम बनाम हीनता
Industry vs inferiorty
6-11

औपचारिक शिक्षा ।
अन्य व्यक्ति के साथ सहयोग ।
तर्क शक्ति में वृद्धि ।
स्वानुशासन आता है।
नियमों के हिसाब से कार्य व्यवहार।
संस्कृति के तकनीकी पक्षों को समझता है जिससे उसमें उद्यमिता/ परिश्रम की सोच आती है ।
स्कूल जाने लगते हैं, घर पर काम में हाथ बंटाते हैं।
उत्तर दायित्व निभाते हैं ,संगीत सीखना शुरू कर देते हैं ।
मानवीय कुशलता आती है।
अगर यह सारे काम यह बच्चे नहीं कर पाते या यह काम यह काम आप करना चाहते हैं और नहीं कर पाते तो हीनता की भावना आ जाती है।
हीनता – अक्षमता का शिकार सबसे बड़ा दुष्परिणाम है।
क्षमता का विकास कार्य के लिए समर्पित।

5️⃣ पहचान बनाम भूमिका भ्रम
Identity vs role confusion
12-20
यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है।
ना तो बचपन ना ही व्यस्क। बचपन -किशोर – व्यस्क
-इस अवस्था में बच्चों को बहुत सारे परिवर्तन का सामना करना पड़ता है। समाज की मांग के अनुसार अपने आपको डालना पड़ता है।
भूमिका- समाज में अपनी भूमिका अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद रहती है।
-व्यस्कता की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है।

  • अपना पसंद नापसंद (अपने लिए चॉइस करने लगते हैं)।
  • पूर्व अनुमानित लक्ष्य के लिए कार्य करने लगते हैं, जागरूक हो जाते हैं ।भविष्य पर नियंत्रण की शक्ति इसी अवस्था में डिफाइन करता है कि वह वर्तमान में क्या और भविष्य में क्या बनना चाहता है।
    बचपन से व्यस्कता के बीच काल के समय को व्यसंधि काल कहा जाता है। बच्चे का ऐसा विकास हो रहा है जिससे बच्चे की पहचान हो रही है, पहचान का निर्माण ।
    अगर पहचान में कोई भ्रम होता है तो नेगेटिव सोच का जन्म होता है।
    भूमिका निर्वहन में भ्रम- यह भ्रम बहुत इंपैक्टफुल होता है तो बच्चा अपने आप को अकेला महसूस करता है खाली ,चिंतित ,अनिश्चित।
    यह सोचता है कि उनको निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है । और वह बहुत अधिक विरोधी बन जाते हैं।
    अव्यवस्थित अवस्था में आ जाते हैं धनात्मक पहचान भी बनती है उसे लगता है कि वह अयोग्य है।
    इस स्टेज में बच्चों को उनके कर्तव्यों का पता चलता है।
    फंस ईमानदारी का विकास होता है लैंगिक रूप से जिम्मेदार होते हैं।
    अभिभावक वयस्को जैसा व्यवहार की उम्मीद करते हैं लेकिन वयस्को जैसी लैंगिक स्वतंत्रता नहीं देते।

6️⃣

आत्मीयता बनाम एकांकीपन
Affinity vs isolation
20-24

-अल्प व्यस्कता
-फ्यूचर रिस्पांसिबिलिटी

  • विवाह के बंधन में बनने लगते हैं -प्रारंभिक परिवारिक जीवन -सामाजिक आत्मीयता
  • लैंगिक आत्मीयता
    -स्टेबिलिटी ,विश्वास
  • बाधा- अगर यह सब नहीं होता तो अलगाव फील होता है, अकेला रहना पसंद करते हैं, संबंधों से दूर रहते हैं, आत्मीयता से समझौता नहीं करना।

7️⃣ उत्पादकता बनाम स्थिरता productivity vs stability
25-65
-आने आने वाली पीढ़ियों के विषय में चिंतित होते हैं।
समाज के बारे में सोचना की भावी पीढ़ी अपना जीवन कैसे बिताएगी ।

(पहले जो पैरंट्स अपने बच्चों के लिए सोचते थे आज वह बच्चा अपने बच्चों के बारे में सोचता है।)

जिम्मेदारी ,उत्पादकता विचार।
जो लोग यह नहीं कर पाते उनमें स्थिरता आ जाती है निराशा आ जाती है।
इस अवस्था की पिक स्टेज पर -25 से 35 वर्ष सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है यह जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
25 से 35 वर्ष में दो चीजें आती हैं 1 beauty ,personality , dressing sense बोलना आपकी परफॉर्मेंस यह सब आते हैं 25 -35 वर्ष तक रहेंगे उसके बाद नश्वर हो जाते हैं
2मन की सुंदरता , आंतरिक सुंदरता होती यह आपके मृत्यु अंत तक आपके साथ रहती है। यह नश्वर नहीं होती।

आप इस उम्र में दूसरों के प्रति चिंतित रहते हैं।
35वर्ष तक जॉब शुरू कर देते हैं जो 65 वर्ष तक रहती है ।और जब आप कुछ नया करना बंद कर देते हैं या यह सोचते हैं कि आपने संपूर्णता पाली। या जो आप करना चाहते थे आप वहां तक पहुंच गए हैं तब आप में स्थिरता आ जाती है ।या आप जो भी पाना चाहते हैं अगर वह नहीं पाते या यह सोचने लगते हैं कि यह अब मुझसे नहीं हो पाएगा मैं इस चीज को नहीं प्राप्त कर सकता तो भी आप में स्थिरता की भावना आ जाती है।

8️⃣ संपूर्णता बनाम निराशा
Polis vs firstration integrity vs disappear
65 – Above

सफलता /असफलता के समायोजन पर पहुंचते हैं ।
यहां हम पास्ट के बारे में सोचते हैं यह सोचते हैं कि हमने अभी तक क्या किया।
अपने आप को अन्य चीजों से गिरा हुआ पाते हैं ।
शारीरिक क्षमता गिर जाती है।
आय में कमी आ जाती है।
या अवस्था मानव विकास की पिछली सभी अवस्थाओं का संकलन , समीकन और मूल्यांकन है। आखिरकार हमने क्या किया क्यों हुआ, जो करना चाहते थे वह मिला तो संपूर्णता और अगर नहीं नहीं मिल पाता या नहीं प्राप्त किया तो निराशा कि काश उस समय हमने यह कर लिया होता तो यह हो जाता ।
Now it’s not the time to start something new.

मृत्यु का भय ।
अपरिवर्तनीय असफलता।

एरिकसन यह विश्वास करते थे कि वृद्धावस्था में ही सच्ची परिपक्वता का विकास होता हैं।

धन्यवाद🔆


Erik erikson’s psychosocial development theory
Ericsson ne fried ke manoranjak Siddhant mein sudhar karke manosamajik Siddhant Diya
एरिक्सन ने अपने सिद्धांत में साइकोसोशल क्राइसिस बताएं
एरिक्सन ने अपने सिद्धांत में 8 stages बताई है
1☑️ infancy stage
0-1 yrs trust vs mistrust
विश्वास बनाम और विश्वास
इसमें बच्चों में दुनिया के प्रति एक विश्वास उत्पन्न होता है जैसे कि अगर उनकी केयर अच्छे से की जाए उनकी feeding अच्छे से हो तो उनमें एक trust create हो जाता है
बच्चा अपनी मां को पहचानने लगता है उनके प्रति बच्चे का लगाव बढ़ता है

2☑️ pre childhood age
1-3 yrs autonomy vs shame
स्वतंत्रता बनाम संदेह
जैसे इस एज में अगर बच्चों को टॉयलेट ट्रेनिंग ढंग से दी जाए या ऐसा कोई भी काम जिससे बच्चे बच्चे का शर्म ना आए बच्चे की संदेह दूर हो तो उनमें किसी भी काम को करने की इच्छा जागरुक होती है बच्चा शर्म आता नहीं है और अपनी इच्छा से काम करता है
3☑️ play age
3-6 initiation vs guilt
पहल बनाम अपराध
इस आयु में बच्चा अपने आसपास की चीजों को explore करना सीखता है इससे उसका एक purpose बनता है , उद्देश्य स्थापित होता है
4☑️ school age
6-12 industry vs inferiority
उद्यमिता बनाम हीनता
ise mein baccha school activities may involve hona shuru kar deta hai jaise ki homework karna sports main part Lena CCE activities main part lena tu ine sab se bacche ke andar competence ki Bhavna aati hai baccha involve hona shuru kar deta hai
5☑️ adoloscence
12-20 yrs identity vs role confusion
पहचान बनाम भूमि का भ्रमण
इस अवस्था में बच्चा सोशल रिलेशनशिप्स डिवेलप करता है जीवन के प्रति बच्चे में निष्ठा उत्पन्न होती है और अगर बच्चा इस में नाकामयाब रहता है तो उससे रोल कन्फ्यूजन होता है उसे अपनी भूमिका समझ में नहीं आती है कि वह क्या करना चाहता है
6☑️ early adulthood
Intimacy vs isolation
आत्मीयता बनाम एकाकीपन
इस अवस्था में बच्चा permanent रिलेशनशिप डिवेलप करने के बारे में सोचता है
ऐसे व्यक्ति के साथ रहने के बारे में सोचता है जिसके साथ वह अपने आने वाली जिंदगी गुजार सकें
अगर बच्चा इस में नाकामयाब रहता है तो वह अकेला अकेला रहने लग जाता है
7☑️ mid adulthood
Generativity vs stagnation
उत्पादकता बनाम स्थिरता
Is stage mein main baccha vah Apne kam ke prati सजग रहता है दूसरों की केयर करता है और अपना पैरंट होने का दायित्व अच्छे से निभाता है
8☑️ late adulthood
65 – end. Ego integrity vs despair
संपूर्णता बनाम निराशा
Is avastha mein vyakti apni Puri jindagi ke upar uh ek jhalak dalta hai hai aur dekhta hai hai ki usne aakhir Puri zindagi mein kya Kiya hai hai agar sab kuchh Sahi Raha to vyakti mein main ego integrity aati hai hai vah wisdom ki tarah kam Karta hai per dusron ko advice deta hai hai aur yadi यदि अंत में व्यक्ति को निराशा हाथ लगी तो वह चाह कर भी अब कोई बदलाव नहीं कर पाता क्योंकि उसका पूरा जीवन समाप्ति पर है

Chahita acharya


✍🏻 मनीषा गुप्ता✍🏻

🌈एरिक्सन का व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धांत➖

🍁एरिक्सन के अनुसार जो हमारे मन में विश्लेषण होता है उसमें बीते समय की आधुनिकता को अपने मन में विश्लेषण करके ऐसे डिजाइन किया जाता है कि उसका निर्माण और विस्तार और उसे समझ कर आज की आधुनिकता को समझने का प्रयास किया जा सके।

🍁एरिक्सन के अनुसार बीते हुए समय के अनुसार ही हम मानसिक क्रिया मनोविश्लेषण की संरचना के आधार पर आज के समय को समझने का प्रयास करते हैं।

🍁जैविक कारक और सामाजिक कारक के मध्य जो लेनदेन यह अंतर क्रिया होता है यही व्यक्तित्व विकास है।

🍁उम्र के अनुसार ही हमारी मनोविश्लेषण यमन की सामाजिकता भी परिवर्तित होती है उम्र के अनुसार ही बच्चे समाज को देखते और समझने का प्रयास करते हैं उम्र के आधार पर ही समाज को देखने का नजरिया भी बदल जाता है।

🍁जैसे बचपन में छोटे बच्चे शिक्षक को देखकर शुभ जाते थे लेकिन बड़े होने के बाद शिक्षक को चुप चुप कर देखते हैं कहने का सामान्य अर्थ यह है कि जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं वैसे वैसे उनकी सोच मन में विश्लेषण नजरिया भी समाज के प्रति परिवर्तित हो जाता है।

🍁परीक्षण के अनुसार कोई भी समस्या संकट नहीं होती है बल्कि सामर्थ्य को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण बिंदु होता है समस्या का व्यक्ति जितनी सफलता के साथ समाधान करता है उतना ही अधिक उस व्यक्ति का विकास होता है।

🌸 एरिक्सन के अनुसार व्यक्ति का व्यक्तित्व विकास 8 चरणों से होकर गुजरता है➖

1️⃣ विश्वास बनाम अविश्वास➖(trust v/s mistrust)[0-1 year]
🌸यह परीक्षण का प्रथम मनोसामाजिक चरण है इसके अंतर्गत बच्चों को अपने अनुप्रिया ओं के प्रति विश्वास या अविश्वास की भावना आती है जैसे बच्चा अच्छे से नींद लेता है या भविष्य के प्रति चिंता कम करता है तो विश्वास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

🌸 इस अवस्था में बच्चा दैनिक कार्य करता है इंद्रियों के द्वारा अनुभव करता है लोगों के प्रति सकारात्मक क्रिया करता है और आसपास के लोगों को पहचानने की क्षमता रखता है इन सब चीजों के प्रति बच्चे में विश्वास की स्थिति आ जाती है।

🌸बच्चा निरंतरता, एकरूपता ,स्थिरता के कारण अन्य लोगों के प्रति भी विश्वास करना सीख जाता है।

🌈लेकिन अविश्वास की स्थिति में यदि बच्चे के अनुरूप व्यवहार नहीं किया जाता तो बच्चे के मन में अविश्वास पैदा होता है और यदि बच्चे के अनुरूप कार्य नहीं किया जाता तो वह बच्चा रोने लगता है बच्चा अविश्वास की स्थिति में विभिन्न क्रियाएं करके दिखाता है जैसे रो कर ,चिड़चिड़ा कर ,परेशान होकर आदि।

2️⃣ स्वतंत्रता बनाम शर्म (autonomy v/s shame)[1-3year]➖ एरिक्सन का यह द्वितीय मनोसामाजिक चरण है इसमें बच्चा 1 से 3 वर्ष के बीच में होता है इस चरण में बच्चे को अन्य लोगों के प्रति विश्वास हो जाने के बाद बच्चा यह समझ लेता है कि वह अपने आप में स्वतंत्र है इस अवस्था में बालक यह सीखता है कि उस से क्या अपेक्षाएं हैं क्या उम्मीद है क्या कर्तव्य है क्या अधिकार है और क्या सीमाएं उसके लिए रखी जा रही हैं।

🍁 वह बालक ने नए प्रयास करने की कोशिश करने लगता है बच्चा अपनी इच्छा शक्ति के अनुसार ही स्वयं में स्व नियंत्रण करना भी सीख जाता है।

🌈ठीक इसके विपरीत यदि बालक को काम में संदेह रहता है तो उसकी इच्छा शक्ति में कमी आ जाती है और स्वयं में स्व नियंत्रण भी नहीं रख पाता और नए नए प्रयास भी नहीं कर पाता है जिससे बच्चे में शर्म की भावना उत्पन्न हो जाती है कि वह अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाया।

3️⃣ पहल बनाम अपराध(initiative v/sguilt)[4-6]➖ यह अवस्था विद्यालय जाने की अवस्था है इस अवस्था में बच्चा जिंदगी की चुनौतियों से निपटने के तरीके सीखता है।

🍁जैसे कोई भी चीज करना है तो क्या करना है यह कोई भी चीज नहीं करना है तो क्या नहीं करना है बच्चा विभिन्न चुनौतियों से निकलने के लिए तैयार हो जाता है या सीखने लगता है।

🍁 वह बच्चा लोगों से उसका क्या संबंध है समझने लगता है अर्थात वह लोगों से संबंध स्थापित करने लगता है और इनके संबंधों में अनुमोदन दिखाई देने लगता है।

🍁 इस अवस्था में बच्चा गतिक कौशल करता है अपनी उम्र के बराबर या बड़े लड़कों के साथ कुछ कुछ गतिविधियां करने लगता है।

🍁 इस अवस्था में बच्चे नहीं सोच कल्पना करना भी प्रारंभ हो जाता है चाहे वह कुछ भी देख रहे हो वैसा कुछ भी ना हो जो वह देखता है उसी के आधार पर कल्पना करना प्रारंभ कर देता है।

🍁इस अवस्था में बच्चा लड़के और लड़कियों में भी अंतर करने लगता है वह यह समझ जाता है कि मैं लड़का हूं या लड़की। बच्चा अनुकरण या पहल भी करने लगता है।

🍁 इस आयु में बच्चे ज्ञान प्राप्त करना और उत्तरदायित्व ग्रहण करने लगता है [जैसे अपने खिलौना संभालना]।

🍁 बच्चा लक्ष्य की गुणवत्ता को समझने लगता है वह बच्चा लक्ष्य व उद्देश्य के प्रति दृढ़ संकल्पित हो जाता है और लक्ष्य को निर्धारित करके पूर्ण नियोजन से काम और उस काम को क्रमबद्ध रूप से करने लगता है।

🍁 यदि बच्चे में लक्ष्य या उद्देश्य के प्रति सकारात्मक गुण नहीं आता है तो हो सकता है कि बच्चों में अपराध की भावना विकसित हो जाए अगर बच्चे कोई लक्ष्य के प्रति क्रमबद्ध रूप से पूर्ण नियोजन करने में उससे सकारात्मक गुण ना हो तो उस बच्चे में अपराध का गुण भी विकसित हो जाता है अर्थात बच्चे इस स्तर का भी कार्य करने लगते हैं जो बच्चे के लिए सही नहीं है। बच्चे में अपराध बोध की भावना भी आ जाती है और यह अपराध बोध भी वातावरण पर निर्भर करता है।बच्चे के अंदर अपराध की भावना का भी स्तर अलग अलग होता है।

🍁 बालक की सर्वाधिक गतिविधि इसी अवस्था में होती है। जैसे खोज प्रवृत्ति, कार्य, प्रयोग ,हताश आदि।

4️⃣ परिश्रम बनाम हीनता(industry v/s inferiority)[6-11]➖ . इस अवस्था में औपचारिक शिक्षा प्रारंभ हो जाती है बच्चे में अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग करने की भावना भी विकसित हो जाती है इस अवस्था में बच्चे में तर्क करने की शक्ति में वृद्धि,स्व अनुशासन ,नियमों के हिसाब से व्यवहार करने लगता है।

🍁 इस अवस्था में बच्चे संस्कृति के तकनीकी पक्षों को भी समझने लगता है बच्चे में परिश्रम /उद्यमिता की सोच भी आ जाती है।

🍁 इस उम्र के बच्चे स्कूल जाने लगते हैं और घर में भी कुछ काम करने लगते हैं बच्चे में कुछ उत्तरदायित्व भी संभालने का गुण आ जाता है बच्चे संगीत भी सीखने लगते हैं और बच्चे में मानवीय कुशलता भी आ जाती है।

🌈 इसके विपरीत यदि बच्चे में उत्तरदायित्व या या अन्य लोगों के साथ सहयोग या अंतः क्रिया नहीं कर पाते हैं तो बच्चे में हीनता की भावना आ जाती है। चिंता से बच्चे अक्षमता के शिकार हो जाते हैं यही इस अवस्था का बहुत बड़ा दुष्परिणाम है।

🌈 इस अवस्था का सबसे बड़ा गुण है कि बच्चे की क्षमता का विकास करना और बच्चे में कार्य के प्रति समर्पित होने का गुण विकसित करना। और यदि बच्चे में हीन भावना आ जाती है तो बच्चा कुछ नहीं कर सकता और वह यह सोचने लगता है कि मुझसे कुछ नहीं हो पाएगा।

5️⃣ पहचान बनाम भूमिका भ्रम(identity v/s role confusion)[12-20 year]➖ यह बच्चे की सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इस अवस्था में बच्चा बचपन और व्यस्क के बीच की अवस्था अर्थात किशोरावस्था में रहते हैं।

🍁 इस आयु के बच्चों में समाज के मांग के आधार पर अलग-अलग रोल को निभाने के लिए खुद में परिवर्तन लाना पड़ता है और समाज में हो रहे परिवर्तन का सामना करना पड़ता है।

🍁 इस अवस्था में लोगों को उस बच्चे से उम्मीद बढ़ जाती है इस अवस्था में बच्चे को वयस्क अवस्था के चुनौती को पार करने के लिए तैयार किया जाता है यह अवस्था व्यस्कता की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है।

🍁 इस अवस्था में बच्चे में पसंद या नापसंद का गुण भी आ जाता है और वह पूर्व अनुमानित लक्ष्य के प्रति जागरूक होने लगता है।

🍁 इस आयु के बच्चे भविष्य पर नियंत्रण की शक्ति को पहचान करने लगते हैं या भविष्य के प्रति जागरूक होने लगते हैं कि मुझे क्या करना है मैं actually में क्या कर सकता हूं।

🍁बचपन से व्यस्कता के बीच के इस समय को व्यस्कता का संधि काल या वय संधि काल कहा जाता है। बाल्यावस्था से वयस्क अवस्था के बीच की अवस्था को ही वय संधि काल कहते हैं।

🍁 इस अवस्था में बच्चे की अपनी पहचान का निर्माण होता है और भूमिका का भी निर्माण होता है कि बच्चा किस स्तर पर है।

🌈 इसके ठीक विपरीत यदि बच्चे में भूमिका निर्वाहन का काल या पहचान में कोई भ्रम होता है तो वह बहुत ज्यादा नकारात्मक सोच या प्रभावित हो जाता है। 🍁भूमिका निर्वाहन में भ्रम

भूमिका निर्वहन में भ्रम हो जाता है तब बच्चा अपने आप को अकेला, खाली ,चिंतित ,अनिश्चित निर्णय लेने के लिए मजबूर या विरोधी बन जाता है और बच्चा अव्यवस्थित अवस्था में चला जाता है ।

🍁 इसी अवस्था में बच्चे में कर्तव्य, ईमानदारी का विकास विकसित होता है इस आयु में बालक लैंगिक रूप से परिपक्व हो जाता है।

🍁 इस अवस्था में हम बालक से यह उम्मीद करते हैं कि वह वयस्कों की तरह व्यवहार करें लेकिन वयस्कों जैसी लैंगिक स्वतंत्रता नहीं देना चाहते हैं।

🍁 इसी अवस्था में बच्चे में आंतरिक ज्ञान में नयी समझ को खोजने की कोशिश करने लगता है।

6️⃣ आत्मीयता बनाम एकाकीपन(affinity v/s isolation)➖[20-24year] इस अवस्था में बच्चे में भविष्य के प्रति जिम्मेदारी आती है वह बालक विवाह के बंधन में बंधने के लिए तैयार हो जाता है प्रारंभिक पारिवारिक जीवन की शुरुआत हो जाती है।

🍁 इस आयु के बालक में सामाजिक आत्मीयता भी आने लगती है और वह बालक लैंगिक आत्मीयता के लिए भी तैयार हो जाता है और इसी अवस्था में बालक जिंदगी में स्थिरता खोजने लगते हैं।

🍁 इस आयु के बालक में विश्वास जिनके साथ होता है उन्हीं के साथ जुड़ना चाहते हैं।

🌈 और यदि बालक में भविष्य के प्रति जिम्मेदारियां नहीं आती है तो वह बालक एकाकीपन या अलगाव का एहसास करने लगता है उसमें विश्वास की भावना नहीं रहती है।

🍁 इस परिस्थिति में वह संबंधों से दूर रहना, आत्मीयता में किसी को ना आने देना ,समझौता नहीं करना ,स्वावलंबी में नकारात्मकता आ जाती है‌।

7️⃣ उत्पादकता बनाम स्थिरता /जननात्मक बनाम स्थिरता /प्रजनन बनाम स्थिरता(productivity v/s stability)[24-65]➖ इस अवस्था में बच्चे अपने काम के प्रति सजग हो जाते हैं और अपना दायित्व भी अच्छे से निभाते हैं और इस अवस्था में बालक अपने आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी चिंतित होने लगते है। कि वह भावी पीढ़ी अपना जीवन कैसे व्यतीत करेगा।

🍁 जिम्मेदारी ,उत्तरदायित्व, विचार यदि वह बालक यह नहीं कर पाता है तो उनमें स्थिरता की भावना आ जाती है। यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है।

🍁 यदि वह बालक जो भी पाना चाहता है अगर नहीं पाता है तो वह सोचने लगता है कि अब मैं कुछ नहीं कर सकूंगा, मुझसे कुछ नहीं हो पाएगा तो उसमें स्थिरता की भावना आ जाती है।

8️⃣ संपूर्णता बनाम निराशा(ego integrity v/s despair)[65 above]➖ इस आयु में व्यक्ति सफलता/ असफलता के समायोजन पर पहुंच जाते हैं। वह व्यक्ति अपने बीते हुए कल के बारे में सोचने लगता है की उसने अभी तक क्या किया है तो वह स्वयं को अन्य लोगों से निम्न स्थिति में देखने लगता है।

🍁 इस अवस्था में व्यक्ति की शारीरिक क्षमता भी कम हो जाती है और आय में भी कमी आ जाती है।

🌈 ठीक इसके विपरीत यदि व्यक्ति अपने बीते हुए कल के बारे में सोच कर यह अनुभव करता है कि वह अभी तक कुछ नहीं कर पाया है जो करना चाहता था वह भी नहीं कर पाया और मिला भी नहीं तो वह निराशा की स्थिति में आ जाता है और यदि जो वह पाना चाहता था या करना चाहता था उसे मिल जाता है तो संपूर्णता की स्थिति आ जाती है।

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