🔆 एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं ➖

🎯 विश्वास बनाम अविश्वास ( Trust v/s mistrust) (0-1 वर्ष) ➖शैशावस्था

इसमें बच्चा सबसे पहले सकारात्मक गुण लेकर आगे बढ़ता है बच्चे को पर्याप्त देखभाल की आवश्यकता होती है जिससे उसमें सकारात्मकता उत्पन्न होती हैं इससे वह स्वयं और दूसरों पर आस्था या विश्वास करता है और स्वास्थ्य व्यक्तित्व का विकास होता है |

यदि उसकी पर्याप्त देखभाल नहीं हुई तो उसमें अविश्वास या हीनता की भावना और आशंका उत्पन्न होने लगती है तथा उसका व्यक्तित्व विकास नहीं हो पाता है |

🎯स्वायत्तता/ स्वतंत्रता बनाम शर्म/ लज्जा (1-3 वर्ष ) ➖प्रारंभिक बाल्यावस्था

इस अवस्था में बच्चे में स्वतंत्रता की भावना विकसित होती है बच्चे पर माता-पिता नियंत्रण रखते हुए स्वतंत्र रूप से बच्चे को अपने अनुसार कार्य देते हैं |

यदि ऐसा नहीं होता है तो बच्चे में लज्जा , शक या शर्म उत्पन्न होने लगता है और वे खुद को आत्महीनता की दृष्टि से देखते हैं |

🎯 पहल बनाम अपराध बोध (3-6 वर्ष) ➖खेल अवस्था

इस अवस्था में बच्चा चलना, बोलना ,दौड़ना, खेलना, घर के बाहर जा जाकर साथियों के साथ के साथ खेलना , नई जिम्मेदारी के प्रति रुचि उत्पन्न होने लगतीं है और उसमें समूह के प्रति आकर्षण भी बढ़ने लगता है |

यदि उन्हें ये सब करने के लिए रोका गया और उसे दंड दिया गया तो वह अपनी इच्छा व्यक्त करने से डरने लगता है और जिसके कारण उसमें अपराध की भावना ,चिड़चिड़ापन आदि गुण उत्पन्न होने लगती है जो कि एक दोष है |

🎯 परिश्रम/ उद्यमिता बनाम हीनता (6-12 वर्ष) ➖स्कूल अवस्था

इस अवस्था में बच्चा व्यवहार करना सीखता है स्कूल के कार्य करता है औपचारिक शिक्षा, बातचीत कौशल,और परिश्रम की भावना विकसित होती और माता-पिता सभी से प्रेरित होता है |

यदि बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है तो उनमें आत्म हीनता की भावना विकसित होती है और व्यक्तित्व विकास में बाधक होता है |

🎯पहचान बनाम भूमिका भ्रम (12-20 वर्ष) ➖ किशोरावस्था

इस अवस्था में बच्चे समस्या समाधान करते हैं उनमें कर्तव्य निष्ठा की भावना आती है समाज के लिए अपनी विचारधारा और उसका मानक दृष्टिकोण बनाते हैं शिष्टाचार क्षमता आती है |

यदि ऐसा नहीं हुआ तो वे अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं |

🎯आत्मीयता बनाम अलगाव ( 20-30 वर्ष ) ➖तरुण वयस्कता

इस अवस्था में जीविकोपार्जन के लिए कार्य करने लगा सकते हैं समाज के सदस्यो से घनिष्ठता एवं स्वयं के साथ में घनिष्ठता करने लगते हैं |

लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है तो व्यक्ति खुद में खोए रहता है किसी से संतोषजनक संबंध नहीं रहते हैं मनोविकारी संबंध स्थापित हो जाते हैं |

🎯उत्पादकता बनाम स्थिरता (30-65 वर्ष) ➖मध्य वयस्कता

इस अवस्था में व्यक्ति भावी पीढ़ी के कल्याण की सोचता है समाज को उन्नत बनाना चाहता है ऐसा कर पाते हैं तो सबल और सृजन हो जाते है |

यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो उसमें स्थिरता आ जाती है और वह आगे नहीं बढ़ पाता है संघर्ष करने लगता है मनो सामाजिक शक्ति नष्ट हो जाती है |

🎯संपूर्णता बनाम निराशा (65- मृत्यु तक) ➖वृद्धावस्था

यदि स्वास्थ्य समाज का समायोजन अच्छा हुआ तो संपूर्णता का आभास होता है |

यदि ऐसा नहीं होता है तो निराशा उत्पन्न होती है सोच में नकारात्मकता आ जाती है |

नोट्स बाॅय➖ रश्मि सावले

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🌸Eric-Erikson’s psycho-social theory🌸
⛳psycho-social development stages⛳
( मनो-सामाजिक विकास की अवस्थाएं)
👉🏻एरिक्सन के अनुसार मनोसामाजिक विकास, मनोविज्ञान और समाज दोनों का कॉन्बिनेशन है।
यह सिद्धांत मनुष्य के जन्म से लेकर जीवन के अंत तक मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन करता है जो निम्न प्रकार है
यह अवस्थाएं निम्न प्रकार हैं—
१. विश्वास बनाम अविश्वास (Trust v/s mistrust) —
(0-1year)
★इस अवस्था का नाम प्रारंभिक बाल्यावस्था दिया हैं।
👉🏻इस सिद्धांत के अनुसार इस अवस्था में बच्चे को, मां के द्वारा देखभाल व प्यार मिलता है तथा बच्चा सकारात्मक गुण लेकर आगे बढ़ता है. पर्याप्त देखभाल होती है जिसके कारण बच्चे में धनात्मक गुणों का विकास होता है जिससे स्वयं तथा दूसरों पर आस्था व विश्वास जगती है जिसके कारण बच्चे में स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास होता है.
★दूसरी तरफ बात करें तो यह सब नहीं होने पर बच्चे में अविश्वास तथा नकारात्मकता की भावना उत्पन्न हो जाएगी।
२. स्वायत्तता बनाम शर्म/ स्वतंत्रता बनाम लज्जा ( autonomy v/s shame) —
(1-3 year)
★इस अवस्था को प्रारंभिक बाल्यावस्था कहां गया।
👉🏻 इस अवस्था में बच्चा माता-पिता के नियंत्रण में रहते हुए स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है जिससे बच्चे में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है।
★ दूसरी और अगर बच्चे को किसी कार्य को करने की स्वतंत्रता ना दी जाए या उसे किसी भी कार्य को करने की
मनाही की जाए तो बच्चे में लज्जा की भावना उत्पन्न होंगी एवं खुद पर शक करेगा तथा आत्म हीनता की भावना जन्म लेगी।
३. पहल बनाम अपराध (Initiative v/s guilt)
(3-6 year)
★ इस अवस्था को खेल की अवस्था कहां गया.
👉🏻 इस अवस्था में बच्चा बोलना, चलना, दौड़ना सीखता है और खेल में रुचि बढ़ती है तथा घर से बाहर साथियों के साथ घूमना व आनंद का अनुभव करता है नयी जिम्मेदारी के प्रति रुचि लेता है।
★ दूसरी ओर अगर ऐसा ना हो उन्हें रोका जा रहा हो तो उसमें अपराध की भावना जन्म ले लेती हैं।
४. परिश्रम बनाम हीनता/ उद्यमिता बनाम हीनता (Labor v/s inferiority)
( 6-12 year)
★ इस अवस्था को स्कूल की उम्र कहा गया है।
👉🏻 इस अवस्था में बच्चा स्कूल के कार्य करता है, औपचारिक शिक्षा ग्रहण करता है,कैसा व्यवहार करना है यह सीखता है ,बात करने का कौशल सीखता है। जिससे बच्चे में परिश्रम करने की भावना विकसित होती है यह परिश्रम की भावना माता-पिता ,मित्र ,समाज एवं विद्यालय आदि से विकसित होती है।
★दूसरे और अगर किसी कारणवश ये ना हो तो बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है तो उसमें आत्म हीनता की भावना आ जाती है तथा व्यक्तित्व विकास में बाधा आती है।
५. पहचान बनाम पहचान भ्रांति (identity v/s identity confusion)
( 12-20 year)
★ इस अवस्था को किशोरावस्था कहा गया है।
👉🏻 इस अवस्था में बच्चे मे समस्या समाधान,कर्तव्य निष्ठा,समाज के प्रति विचारधारा की भावना तथा शिष्टाचार आदि की क्षमता विकसित होती है।
★ अगर ऐसा नहीं हो पाता तो किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान को समझ नहीं पाते और उनमें कोई विचारधारा का डिवेलप नहीं हो पाता तथा नकारात्मकता आ जाती है।
६. आत्मीयता बनाम अलगाव (Affirity v/s isolation)
( 20-30 year)
★ इस अवस्था को तरुण अवस्था कहा गया है.
👉🏻 जीविकोपार्जन, समाज के सदस्य से घनिष्ठता, स्वयं के साथ घनिष्ठता आदि के लिए बच्चा काम करता है।
★ लेकिन ऐसा ना हो तो खुद में खोए रहते हैं असफलता का एहसास रहता है, किसी से संबंध नहीं बना पाते,किसी से घनिष्ठता नहीं रख पाते ऐसे लोग मनो विकारी तथा गैर सामाजिक हो जाते हैं।
७. उत्पादकता बनाम स्थिरता ( Productivity v/s sustrability)
(30-65 year)
★ इस अवस्था को मध्य अवस्था कहा गया है।
👉🏻यह अवस्था जॉब लगने से लेकर रिटायरमेंट तक होती है।
इस अवस्था में व्यक्ति अपनी भावी पीढ़ी के कल्याण के बारे में सोचता है। यह सब कर पाते हैं तो सबल और सजग होते हैं।
★ दूसरी ओर यह सब ना कर पाए तो आगे नहीं बढ़ पाते या उनकी मनोसामाजिक शक्ति आगे नहीं बढ़ती है।
८. संपूर्णता बनाम निराशा (wholeness v/s frustration)
( 60- जीवन के अंत तक)
★ इस अवस्था को वृद्धावस्था कहा गया है।
👉🏻 इस अवस्था में व्यक्ति ने स्वास्थ्य तथा समाज का समायोजन अच्छे से किया है तो संपूर्णता का अनुभव करता है।
★दूसरी ओर अगर उससे समाज तथा स्वास्थ्य का समायोजन करने मे कमी रह गयी है तो व्यक्ति मे नकारात्मकता आ जाती है

Notes by Shivee Kumari😊

एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं
psychosocial development stages

1 विश्वास बनाम अविश्वास:- शैशवावस्था 0-1 year बच्चे की पर्याप्त देखभाल होती है इसमें बच्चों में धनात्मक गुण का विकास होता है वह स्वयं दूसरों पर आस्था और विश्वास रखता है उसका व्यक्तित्व स्वस्थ्य होता है क्योंकि इस समय मां बच्चे का पूरी तरह से ध्यान रखती है तो बच्चे में किसी भी प्रकार की नकारात्मक भावना नहीं आती है

2 स्वायत्तता बनाम शर्मा /स्वतंत्रता बनाम लज्जा
autonomy v/s shame

यह अवस्था 1 से 3 वर्ष तक होती है
इसमें माता-पिता बच्चे पर नियंत्रण रखते हुए स्वतंत्र रूप से बच्चे को अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने के की स्वतंत्रता देते हैं
दूसरी और अगर यह सब स्वतंत्रता बच्चों को नहीं मिलती है तो बच्चों में लज्जा अपने ऊपर शर्म और आत्महीनता की भावना आ जाती है

3 पहल शक्ति बनाम दोष/पहल बनाम अपराध
imtiative v/s guilt
खेल की अवस्था ( play age)
यह अवस्था 3 से 6 वर्ष तक होती है
इसमें बच्चा बोलना चलना खेलना घर से बाहर साथियों के साथ नई जिम्मेदारी के प्रति रुचि लेता है और बहुत खुश रहता है
दूसरी ओर यदि बच्चे को ये सब करने से रोका जा रहा है इच्छा व्यक्त करने पर उसे दंड दिया जाता है तो बच्चे में अपराध की भावना आ जाती है

4 परिश्रम बनाम हीनता:-
यह अवस्था 6 से 12 वर्ष तक होती है
इसमें बच्चा व्यवहार करना सीखता है स्कूल के कार्य करता है और औपचारिक शिक्षा प्राप्त करता है बातचीत करना सीखता है परिश्रम की भावना विकसित होती है स्कूल शिक्षक पड़ोसी माता पिता

यदि बच्चा यह सब नहीं कर पाता है तो बच्चे में स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है आत्मीयता व्यक्तित्व के विकास में कमी आने लगती है

5 पहचान बनाम पहचान भ्रांति (भूमिका भ्रांति )
किशोरावस्था
यह अवस्था 12 से 20 ईयर तक होती है
इसमें बच्चा समस्या का समाधान कर्तव्य निष्ठा विचारधारा मानक शिष्टाचार इन सभी की क्षमता बच्चे में होती है
दूसरी ओर यदि बच्चा अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं सक्षम नहीं हो पाते हैं तो बच्चों में नकारात्मक भावना आ जाती है और वह गलत कदम उठा लेते हैं

6 आत्मीयता बनाम अलगाव :- तरुण वयस्कता
घनिष्ठता
यह अवस्था 20 से 30 वर्ष तक होती है
इसमें बच्चा जीविकोपार्जन समाज के साथ घनिष्ठता और स्वयं के साथ घनिष्ठता रखता है

दूसरी तरफ जाती है सब बच्चा नहीं कर पाता है तो वह swam में खोए रहते हैं और किसी से संतोषजनक संबंध नहीं बना पाते हैं

7 उत्पादकता बनाम स्थिरता (मध्य वयस्कता):-
यह अवस्था 30 से 65 वर्ष तक होती है
इसमें भावी पीढ़ी का कल्याण समाज को उन्नत बनाने की कोशिश और सबल जिंदगी होती है

दूसरी तरफ यह सब नहीं कर पाते आगे नहीं बढ़ पाता तो संघर्ष मनोसामाजिक शक्ति का विकास नहीं होता

8 संपूर्णता बनाम निराशा, ( परिपक्वता)
65 वर्ष से जीवन के अंत तक
वृद्धावस्था
इस अवस्था में व्यक्ति ने अपने स्वास्थ्य समाज के साथ समायोजन और अपनी अतीत में सकारात्मक कार्य किए हैं तो prassan रहता है
और यदि उसमें समाज के साथ समायोजन नहीं किया है तो वह कभी कभी निराश हो जाता है और उसमें नकारात्मक भावना आ जाती हैं

🙏🙏🙏🙏🙏 sapna sahu🙏🙏🙏🙏🙏🙏

🔥🔥मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं 🔥🔥
(Psychosocial development stages)
1. विश्वास बनाम अविश्वास ( Trust v/ s mistrust) ➖
“शैशवावस्था ”
(0 से 1 वर्ष)
यह एरिक्शन का पहला मनोसामाजिक चरण है |
जिसका जीवन पहली वर्ष में अनुभव किया जाता है इसमें पर्याप्त देखभाल और धनात्मक गुण और स्वयं दूसरों पर आत्मविश्वास स्वास्थ्य व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है अगर यह नही है तो बच्चो मे अविश्वास हीनता ईष्या आशंका डर आदि आते है |
2. स्वायत्तता बनाम शर्म / स्वतंत्रता बनाम लज्जा ( Autonomy v/s shame) ➖
” प्रारंभिक बाल्यावस्था”
(1 से 3वर्ष)
अवस्था प्रारंभिक बाल्यावस्था की होती है जो माता-पिता माता-पिता है जो माता-पिता माता-पिता बच्चो को नियंत्रण मे रखते हुए स्वतंत्र रूप से बच्चों को अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने देते हैं और बच्चों को कोई कार्य नहीं करने देते हैं तो उनके और अपने ऊपर शर्म और आत्महीनता की भावना जन्म लेगी |
3. पहल बनाम अपराध / पहल शक्ति बनाम दोष ( Initiative v/s guilt) ➖ (3 से 6 वर्ष)
यह अवस्था खेल व्यवस्था होती है|
इस अवस्था में बच्चा बोलना चलना दौड़ना स्पोर्ट्स खेलना घर के बाहर साथियों में साथ नई जिम्मेदारी के प्रति रुचि लेने लगता है |
दूसरी और अगर ऐसा ना हो तो उन्हें रोका जा रहा है इस इच्छा व्यक्त करने पर दंड और अपराध की भावना जन्म लेती है |
4. परिश्रम बनाम हीनता / उद्यमिता बनाम हीनता ( Labor v/s inferierity complex) ➖ (6 से 12 वर्ष)
यह अवस्था स्कूल की अवस्था है |
इस अवस्था में बच्चों व्यवहार करना सीखना है स्कूल के साथ कार्य करता है औपचारिक शिक्षा बातचीत कौशल की भावना विकसित होती है |
दूसरी ओर अगर किसी कारण बस यह ना हो तो बच्चा स्वयं की क्षमता पर संदेह करने लगता है आत्महीनता व्यक्तित्व विकास में बाधा आती है |
5. पहचान बनाम पहचान भ्रांति (भूमिका भ्रांति) ( Identity v/s identity confusion) ➖ (12 से 20 वर्ष)
यह अवस्था किशोरावस्था होती है |
इस अवस्था में बच्चों में समस्या समाधान कर्तव्यनिष्ठा विचारधारा निभाने में कैसे हैं शिष्टाचार आदि क्षमता किशोरावस्था में आती है |
किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान समझ नहीं पाते तो नकारात्मकता आती है |
6. आत्मीयता बनाम अलगाव (Affirity v/s isolation) ➖ (20 से 30वर्ष)
यह अवस्था तरुण वयस्कता अवस्था होती है |
जीविकोपार्जन समाज के सदस्य से घनिष्ठता तथा स्वयं के साथ घनिष्ठता आदि के लिए क्या काम करता है |
अगर समाज के ही सदस्य के प्रति घनिष्ठता नहीं बना पाते तो खुद में खोए रहते हैं किसी से संतोष जनक संबंध नहीं रखते यह मनोविकार तथा सामाजिक हो जाते हैं |
7. उत्पादकता बनाम स्थिरता (Productivity v/s sustrability) ➖ (30 से 65वर्ष)
यह अवस्था मध्यवयस्कता की अवस्था होती है |
इस अवस्था में व्यक्ति भावी पीढ़ी का कल्याण और समाज को उन्नत बनाना और सबल सजग होते है |
और अगर ऐसा ना हो तो आगे नहीं बढ़ पाते संघर्ष करता है सामाजिक शक्ति आगे नहीं बढ़ पाती है और कुछ हासिल नहीं कर पाते है |
8. संपूर्णता बनाम निराशा (Wholness v/s frustration) ➖
(60 से ……जीवन के अन्तकाल तक)
परिपक्वता ( Maturity)
अवस्था को वृद्धावस्था कहा जाता है | इसमें व्यक्ति स्वास्थ्य सामज के प्रति समायोजन करता है तो सम्पूर्णता का अनुभव करता है और अतीत सकारात्मकता आती है |
और अगर ऐसा नहीं करता तो उसमें कमी निराशा और सोच नकारात्मकता होती है |

Notes by ➖ Ranjana Sen

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