🌀 पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत 🌀 पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में निम्नलिखित चार अवस्थाएं हैं – 1) इंद्रिय जनित गामक अवस्था (0-2) साल 2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था 2 से 7 वर्ष 3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 7 से 11 वर्ष 4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था 11 से 18 वर्ष 1️⃣ *इंद्रिय जनित गामक अवस्था ( संवेदी पेशीय / संवेदी गामक अवस्था ) 0 – 2 वर्ष*➖ ★ *इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है* 👉 शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना 👉 अपने भाव को रोकर व्यक्त करता है 👉 किसी चीज को पकड़ने लगता है 👉 जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है 👉 शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है 👉 धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति होने तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं यही “वस्तु स्थायित्व” है ★ चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है तीन चार महीने तक कोई वस्तु सामने से हटने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है *वस्तु का सामने ना होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है इसे ही वस्तु स्थायित्व कहते हैं* 2️⃣ *पूर्व संक्रियात्मक अवस्था 2 से 7 वर्ष*➖ 👉 भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है 👉 अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है 👉 वस्तुओं को पहचानने लगता है 👉 5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है 👉 इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है …….. ☑️ *इस उम्र के 2 दोस हैं* 1) जीववाद :- निर्जीव को सजीव समझने लगता है 2) आत्मकेंद्रित( स्वलीनता ) :- सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानता है यह 2 से 4 साल तक की अवधि है 4 से 7 साल चिंतन / तर्क पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है अर्थात जीववाद या स्वलीनता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है 3️⃣ *मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 7 से 11 वर्ष* ➖ 👉 ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है 👉 वस्तु को पहचानना ,विभेद करना, वर्गीकृत करना इत्यादि 👉 समस्या समाधान का अमूर्त रूप विकसित नहीं होता है 👉 (सोच) स्थूल या मूर्त होती है 👉 *दोष*➖ अमूर्त (सोच) विकसित नहीं होती है 👉 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होता है 4️⃣ *अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था 12 से 18 वर्ष*➖ 👉 चिंतन लचीला प्रभावी हो जाता है 👉 चिंतन क्रमबद्ध होता है 👉 समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोच चिंतन कर सकते हैं 👉 चिंतन वास्तविक होता है 👉 बालक में विकेंद्रण विकसित हो जाता है धन्यवाद नोट्स बाय प्रज्ञा शुक्ला

🏵️पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत🏵️
1️⃣ इंद्रिय जनित गामक अवस्था (sensory motor stage) 0-2 years
2️⃣ पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre operational stage) 2-7 years
3️⃣ मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (concrete operational stage) 7-11 years
4️⃣ अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (formal operational stage) 11-18 years
1️⃣ इंद्रिय जनित गामक अवस्था (0-2 years)
👉 संवेदी पेशीय/संवेदी गामक अवस्था
👉 इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करते हैं।
👉 शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना।
👉 बच्चे चीजों को पकड़ने लगते हैं।
👉 बच्चा अपने भाव को रो कर व्यक्त करता है।
👉 बच्चे को जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है।
👉 शुरुआत मैं बच्चे के लिए उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होती है। धीरे धीरे 2 वर्ष की आयु समाप्त होने तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही होती हैं।
👉 चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है 3 से 4 महीने तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
👉 वस्तु का सामने ना होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है इसी वस्तु स्थायित्व कहते हैं।
2️⃣ पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7 years)
👉 बच्चे के अंदर भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है।
👉 अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है।
👉 बच्चा वस्तुओं को पहचानने लगता है।
👉 बच्चा इसी उम्र में वस्तु में विभेद करना सीख जाता है।
👉 5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।
👉 इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते-होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है।
👉 इसी उम्र में बच्चा जीव बाद, और आत्म केंद्रित होता है।
🔹 जीव बाद:- बच्चा निर्जीव को सजीव समझने लगता है।
🔸 आत्म केंद्रित:- बच्चा सिर्फ अपने विचार को सत्य मानता है।
⬆️2-4 वर्ष की अवधि में यह सब होता है।
➡️4-7 वर्ष में बच्चा चिंतन, तर्क से पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है।
3️⃣ मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 years)
👉 ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।
👉 वस्तु को पहचानना, विभेद करना, वर्गीकृत करना
👉 समस्या समाधान का अमूर्त रूप से विकसित ना होना।
👉 स्थूल या मूर्त होती हैं।
▪️दोष:—
👉 अमूर्त विकसित नहीं होती है।
👉 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होती है।
4️⃣ अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (11-18 years)
👉 चिंतन बहुत ही लचीला, प्रभावी हो जाता है।
👉 चिंतन क्रमबद्ध होता है।
👉 समस्या का समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर चिंतन कर सकते हैं।
👉 चिंतन वास्तविक होता है।
👉 बालक में विकेंद्रित पूर्णता विकसित हो जाता है।
🔸🔹🔸
🏵️🏵️🏵️✍️ Notes by~Vinay Singh Thakur🏵️🏵️🏵️

🏵️ पियाजे का संज्ञानात्मक विकास🏵️
🌸( Piaget cognitive development)🌸

1️⃣➡️इंद्रिय जनित गामक अवस्था (संवेदी पेशी अवस्था)
(Sensorimotor stage) (0- 2 year)

2️⃣➡️पूर्व -संक्रियात्मक अवस्था(Preoperational stage) (2-7 year)

3️⃣➡️मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete operational stage)7-11year

4️⃣➡️अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(formal operational stage)(11-18 year)

1️⃣➡️🏵️इंद्रिय जनित गामक अवस्था🏵️ (
संवेदी पेशी/संवेदी गामक अवस्था (इसमें बच्चा अपनी इंद्रियों का प्रयोग करता है)

✍️इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है।

✍️शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर मुड़ -मुड़कर देखना।
✍️अपने भाव को रो-रोकर व्यक्त करता है।

✍️2 साल के करीब -इस समय बालक को जो चीज चाहिए होती है उसकी तरफ इशारा दिखाकर लेने की चाहत को प्रकट करता है।

✍️शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उन वस्तुओं का अस्तित्व होता है जो उनके सामने होती हैं।

2️⃣➡️ 🏵️पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(Pre operational stage)🏵️

✍️भाषा का विकास ठीक ढंग से प्रारंभ हो जाता है
अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती इशारों की जगह पर अब वह भाषा का इस्तेमाल करके जिस चीज की चाह होती है बता देता है।

✍️वस्तुओं को पहचानने लगता है।

✍️बच्चा इसी उम्र वस्तुओं में विभेद करना शुरू कर देता है।

✍️5 वर्ष तक या प्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।

✍️इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते-होते वा सजीव; निर्जीव (निर्मित) में विभेद करना लगता है।

🌸जीववाद

✍️निर्जीव वस्तुओं को सजीव समझ कर उनके साथ वार्ता करने लगता है।

🌸आत्मकेंद्रित

✍️सिर्फ अपने विचार को ही सत्य मानता है।

✍️2-4 वर्ष की अवधि में जीवादन केंद्रित पाया जाता हैl

✍️4-7 वर्ष की अवधि में चिंतन तर्क से पहले से ही अधिक परिपक्व हो जाता है।

3️⃣➡️🏵️मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Concrete operational stage)(7-11 year)🏵️

✍️ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।
वस्तु को पहचानना विभेद करना वर्गीकृत करना सीख जाता है।

✍️समस्या समाधान का अमूर्त रूप विकसित नहीं होता हैl

✍️चिंतन पूरी तरह से विकसित नहीं होता है (आपसारी चिंतन नहीं कर सकता)।

✍️यह अवस्था बच्चे की प्रारंभिक विद्यालय में अध्ययन करने की अवस्था है।

4️⃣➡️🏵️ अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Formal opertaional stage)(12-18year)🏵️

✍️चिंतन लचीला प्रभावी हो जाता है।

✍️चिंतन क्रमबद्ध होता है।

✍️समस्या का समाधान करने के लिए काल्पनिक रूप से ।सोच कर चिंतन कर सकते हैं(अपसारी चिंतन करता है)।

✍️चिंतन वास्तविक होता है।

✍️बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णता विकसित हो जाता है।

Written by-$hikhar pandey

🌳पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत:—

(1) इंद्रियाजनित गामक अवस्था (sensory motar stage):—(0–2)

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(pre operational stage):—(2—7)

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(concrete operational stage):—(7—11)

(4) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(formal operational stage):—(11—18)

🌹1) इंद्रियाजनित गामक अवस्था (sensory motar stage):—(0–2)
🌻संवेदी पेशियों संवेदी गामक अवस्था
🌻इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है
🌻 शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना
🌻 किसी चीज को पकड़ने लगता है 🌻अपने भाव को रो कर व्यक्त करता है
🌻 जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता
🌻शुरुआत में बच्चे के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही है
🌻 चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है
🌻3 से 4 महीने तक कोई वस्तु सामने से हटाए जाने पर उसका अस्तित्व समाप्त होने लगता है
🌻वस्तु का सामने ना होने पर भी अस्तित्व बना रहता है इसे वस्तु स्थायित्व बोलते हैं

🌹2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(pre operational stage):—(2—7)

🌻 भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है
🌻 अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाता है
🌻वस्तुओं को पहचाने लगता है
🌻बच्चा इस उम्र में वस्तु में विभेद करना सीख जाता है
🌻 5 वर्ष तक यह संप्रदाय निर्माण अधूरा रहता है
🌻इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते होते वह सजीव निर्जीव में भेद करना सीख जाता है

🎄🦋🎄 इसके दो दोष हैं:—
(1) जीव वाद:— निर्जीव को सजीव समझना

(2) आत्म केंद्रित:— सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानना

👉जीव बाद और आत्म केंद्र
:—2—4 साल की अवधि
:—4—7 चिंतन / तर्क से पहले से अधिक परिपक्व हो जाते हैं

🌹3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(concrete operational stage):—(7—11)

🌻ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है
🌻 वस्तु को पहचानना विभेद करना वर्गीकृत करना
🌻 समस्या समाधान का अमूर्त रूप
🌻 स्थूल या मूर्त होती है

👉 दोष:—

👉अमूर्त विकसित नहीं होती है 👉👉चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होती है

🌹4) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(formal operational stage):—(11—18)

🌻 चिंतन लचीला प्रभावी हो जाता है 🌻चिंतन क्रमबद्ध होती है
🌻समस्या का समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर चिंतन कर सकते हैं
🌻 चिंतन वास्तविक होती है
🌻बालक में विकेंद्रीकरण विकसित हो जाता है

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻Notes by:—sangita bharti🙏

🌼🌹पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत 🌹🌼

🐥इन्द्रियजनित गामक अवस्था (Sensory motor Stage)
_ ० से २ बर्ष तक

🍀 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre – Operational Stage )
– 2 से 7बर्ष तक

🐤मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( Concrete Operational Stage)
-7 से 11बर्ष तक

🎃 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( Formal Operational Stage)
– 11 से 18 बर्ष तक

🍂🌻इन्द्रिय जनित गामक अवस्था/ संवेदी पेशिय / संवेदी गामक अवस्था (0-2बर्ष)

🌷 इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इन्द्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है।

🌲 शारीरिक रूप से चीजों को इधर उधर देखना, किसी चीज को पकड़ने लगता है।

🌹 अपने भाव को रोकर व्यक्त करता है।

🌾जो चाहिए , उसे दिखाकर अपनी बात को चाहता है। शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं देता है।

🐥 बच्चों में वस्तु स्थायित्व का गुण भी पाया जाता है।

🌼🍂 चिंतन धीरे धीरे वास्तविक होने लगता है,3-4 महीने तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

🌾 वस्तु का सामने न होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है, इसे वस्तु स्थायित्व कहा जाता है।

🐣☃️🍃 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( 2-7 बर्ष)

🌼 भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है

🐥 अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है।

🍀 वस्तुओं को पहचानने लगते हैं।

🎃 बच्चा किस उम्र में वस्तु में विभेद करना सीख जाता है।

🐦5बर्ष तक यह सम्प्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।

🌹 इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं, परन्तु समाप्त होते-होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है।

🐦 इसमें दो प्रकार के दोष पाये जाते हैं जो निम्न प्रकार से है÷

🌿जीववाद 🌿
🍁 निर्जीव को सजीव समझता है।

🍂आत्मकेंद्रित (स्वालीनता)🍂
🌾 सिर्फ अपने विचार को सत्य मानता है।

🕊️🦋 जीववाद/ आत्मकेंद्रित 🦋🕊️

🌹 4 साल की अवधि में पाये जाते हैं।

🌺 4 – 7 चिंतन/तर्क से पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है।

🌾🍂🌿मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 – 11बर्ष )

🐥ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।

🎃 वस्तु को पहचानना, विभेद करना, वर्गीकृत करना सीख जाता है।

☃️ समस्या समाधान का अमूर्त स्वयं करता है।

🐦 स्थूल या मूर्त होती है।

🌹 दोष 🌹

🌾 अमूर्त विकसित नहीं होती है।

🍃 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होती है।

💫🌺 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 12 -18 बर्ष )

🍁 चिंतन लचीला, प्रभावी हो जाता है।

🌾 चिंतन क्रमवध्द होती है।

🍂 समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर, चिंतन कर सकते हैं।

🐤 चिंतन वास्तविक होती है।

🌿बालक में विकेन्द्रण पूर्णतः विकसित हो जाता है।

🌹🌹🌹 Notes by. ÷. Babita yadav

🌼🌼🌼पियाजे के संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत🌼🌼🌼🌼
🌼1. -इंद्रिय जनित गामक अवस्था
(Sensory motor stage) (0-2year)
🌼2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (pre-operational stage) (2-7year)
🌼3.मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(concrete operational stage) ( 7-11year)
🌼4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (formal operational stage) (11-18year)

🌼🌼1.इंद्रिय जनित गामक अवस्था /संवेदी पेशीय/ संवेदी गामक अवस्था (0-2year) –🌼इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनत गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है
🌼शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना , फेंकना इत्यादि किसी चीज को पकड़ने लगता है
🌼अपने भाव को रोकर व्यक्त करता है
🌼 जो चाहिए उससे दिखाकर अपनी बात कहना चाहता है
🌼🌼🌼शुरुआत में बच्चे के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं उनके अंदर वस्तु स्थायित्व का गुण आ जाता है
🌼🌼चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है तीन चार महीने तक कोई वस्तु के सामने से हटने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है वस्तु का सामने ना होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है इसे वस्तु स्थायित्व कहते हैं

🌼🌼2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7year)–
🌼 भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है
🌼अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है
🌼 वस्तुओं को पहचाने लगता है
🌼 बच्चा इस उम्र में वस्तु में विभेद करने लगता है
🌼5 वर्ष तक संप्रत्य निर्माण अधूरा रहता है
🌼 इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते होते वह होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है
🌼🌼जीवबाद
🌼🌼आत्म केंद्रित
🌼जीववाद -निर्जीव को सजीव समझने लगता है
🌼आत्म केंद्रित -सिर्फ अपने विचारों को ही सत्य मानता है

🌼🌼3 . मूर्त संक्रियात्मक अवस्था(7-11year)
🌼 ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है
🌼 वस्तु को पहचाना,विभेद करना ,वर्गीकरण करना
🌼समस्या समाधान का मूर्त रूप विकसित नही जाता है
🌼स्थूल या मूर्त होती है

🌼🌼दोष🌼🌼—-

🌼अमूर्त चिंतन विकसित नहीं होता है
🌼 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होती है

🌼 🌼🌼अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (11-18)
🌼चिंतन ,लचीला ,प्रभावी हो जाता है
🌼 चिंतन क्रमबंद होती है
🌼समस्या का समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर चिंतन कर सकते हैं
🌼चिंतन वास्तविक होती है
🌼बालक में विकेंद्रित करण पूर्णता विकसित हो जाता है

By manjari soni🌼

🔆 पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत➖

पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक विकास में 4 अवस्थाओं का वर्णन किया है जो कि निम्न है ➖

1) इन्द्रिय जनित गामक अवस्था ➖ ( 0-2 ) वर्ष

2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ➖ (2 – 7 ) वर्ष

3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ➖

(7 – 11) वर्ष

4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था➖ ( 12 -18 ) वर्ष

🎯 इइन्द्रियजनित गामक अवस्था (0-2 वर्ष) ➖

1) इस अवस्था को संवेदी पेशीय अवस्था और संवेदी गामक अवस्था भी कहा जाता है |

2) शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना और किसी चीज को पकड़ने लगता है |

3) इस अवस्था में बच्चा अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप प्रकट करता है |

4))इस अवस्था में बच्चे अपने भाव को व्यक्त करते हैं जब बच्चा लगभग 2 वर्ष का होने लगता है तो उसे उस चीज को जो उसे चाहिए उस चीज को दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट करता है |

5) शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसे के सामने होता है धीरे धीरे उम्र के साथ-साथ 2 वर्ष की समाप्ति तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति अनुक्रिया करने लगता है |

6) जो दिखाई नहीं दे रहा हैं बच्चों का चिंतन धीरे-धीरे होने लगता है वह तीन चार महीने तक कोईवस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है |

7) वस्तु का सामने ना होने पर उसका अस्तित्व बना रहना ही वस्तु स्थायित्व कहलाता है |

🎯 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2 – 7 ) वर्ष ➖

1) इस अवस्था में बच्चे की भाषा का विकास प्रारंभ हो जाता है |

2) बच्चे की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है वह इंद्रियों से नहीं बल्कि अपनी भाषा से विचार व्यक्त करने लगता है |

3) वस्तुओं को पहचाने लगता है वह यह समझने लगता है कि यह गिलास है चम्मच है थाली आदि है|

4) इस उम्र में वस्तुओं में विभेद करना सीख जाता है |

5) 5 वर्ष तक संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है |

6) इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होने पर सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है|

7) इस अवस्था में बच्चा जीव वाद और आत्मकेंद्रित होता है |

जीववाद ➖जीववाद चिंतन में पाए जाने वाला एक दोष होता है जिसमें बच्चा निर्जीव को भी सजीव समझने लगता है |

आत्म केंद्रित ➖यह भी एक प्रकार का दोष होता है क्योंकि सिर्फ अपने विचार को सत्य मानना ही आत्म केंद्रित है जो कि बच्चे को एक दोष है |
जो कि आगे बढ़कर बड़ा रूप ले लेता है इसे स्वलीनता भी कहा जाता है |

7) जीव बाद एवं आत्म केंद्रित 2 – 4 वर्ष की अवधि में पाए जाते हैं |

8) 4 – 7 वर्ष में बच्चा का चिंतन/ तर्क तरीके से अधिक परिपक्व हो जाता है |

🎯 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 7 – 11) वर्ष ➖

1) इस अवस्था में बच्चा ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया करता है |

2) वस्तु को पहचानने लगता है उसमें विभेदीकरण करना और उनको वर्गीकृत करना सीख जाता है |

3)इस अवस्था में समस्या समाधान का मूर्त रूप निर्मित नहीं हो पाता है |

4) उनकी सोच स्थूल और मूर्त होती है |

5) इस अवस्था के दोष में अमूर्त चिंतन विकसित नहीं हो पाता है चिंतन पूरी तरह से विकसित नहीं होता है |

🎯 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (2 से 18 ) वर्ष➖

1) वर्ष इस अवस्था में चिंतन लचीला तथा प्रभावी हो जाता है |

2) चिंतन क्रमबद्ध होती है किसी भी चीज को क्रम बद्धता के साथ समझकर करने लगता है |

3) इस अवस्था में बच्चा समस्या का समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर करता है और उसका
समाधान प्राप्त कर सकता है |

4) इसमें चिंतन वास्तविक होता है |

5) बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है |

अर्थात किसी भी चीज को उचित ढंग से सोचने की क्षमता विकसित हो जाती है |

𝙉𝙤𝙩𝙚𝙨 𝙗𝙮➖ 𝙍𝙖𝙨𝙝𝙢𝙞 𝙎𝙖𝙫𝙡𝙚

🌻🌼🍀🌸🌺🌻🌼🍀🌸🌺🌻🌼🍀🌸🌺🌻🌼🍀🌸🌺

“जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत”

जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार भागों में विभाजित किया है
1 इंद्रिय जनित गामक अवस्था(sunsary motor stage ) 0 se 2 year

2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(pre opretional stage 2. se 7 year )

3 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (concreate operational stage 7 se 11year)

4 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था( formal opratnal stage ). 11 se 18

“इंद्रिय जनित गामक अवस्था”

इसे संवेदी पेशीय अवस्था और संवेदी गामक अवस्था भी कहते हैं

इस अवस्था में बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रिय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है

शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना किसी चीज को पकड़ने लगता है

अपने भाव को रोककर व्यक्त करता है

जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है

शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है धीरे धीरे जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती जाती है 2 वर्ष की समाप्ति होने तक उन वस्तुओं के प्रति भी अनुप्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं

चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है 3 से 4 महीने तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है

वस्तु स्थायित्व
वस्तु का सामने ना होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है इसे वस्तु स्थायित्व कहते हैं

” पूर्व संक्रियात्मक अवस्था”
यह अवस्था 2 से 7 वर्ष तक होती हैं
भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है

वस्तुओं को पहचानने लगता है

इस उम्र में बच्चा वस्तुओं में विभेद सीख जाता है

5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है

इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है

जीववाद :- बच्चे निर्जीव को सजीव समझते हैं 2 से 4 साल की अवधि में
आत्म केंद्रित:- इसमें बच्चा सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानता है 2 से 7 वर्ष में चिंतन तर्क से पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है

” मूर्त संक्रियात्मक अवस्था”
7se 11

यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होती हैं
इसमें वस्तु को पहचानना विविध करना वर्गीकरण करना बच्चा सीख जाता है

इस अवस्था में ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है

समस्या समाधान का अमूर्त रूप है
स्थूल या मूर्ति होती है

दोस :- 1 अमूर्त विकसित नहीं होती
2 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होता है

” अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ”
12 से 18
यह अवस्था 12 से 18 वर्ष तक होती है
इस अवस्था में चिंतन लचीलापन प्रभावी हो जाता है
चिंतन क्रम बद्ध होता है
इस अवस्था में समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर चिंतन कर सकते हैं
चिंतन वास्तविक होती है
बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णता विकसित हो जाता है

🙏🙏🙏🙏 Sapana sahu 🙏🙏🙏🙏

🌹 जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत🌹

1. इंद्रियजनित गामक अवस्था Sensory motar stage ( 0 -2) ) वर्ष

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था Pre – Operational stage ( 2 – 7 ) वर्ष

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था Concrate Operational stage ( 7 -11 ) वर्ष

4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था Formal Operational ( 11 – 18 ) वर्ष

जीन पियाजे ने अपने संज्ञानात्मक विकास जे सिद्धांत को निम्नलिखित 4 अवस्थाओं में वर्गीकृत किया है, जैसे :-

1.🌺 इन्द्रियजनित गामक अवस्था / संवेदी पेशीय अवस्था / संवेदी गामक अवस्था ( 0 – 2 ) वर्ष

👉इसमें बच्चे मानसिक क्रियाओं को इंद्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करते हैं।

👉शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना एवं किसी चीज को पकड़ने लगता है।

👉अपने भाव को रोकर व्यक्त करता है।

👉जो चाहिए उसे दिखाकर अपनी बात कहना चाहता है।

👉शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उन वस्तुओं का अस्तित्व होता है जो उनके सामने होतीं हैं , धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति होने तक बच्चा उन बच्चों के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं।
[ अतः इसी समय बच्चों में वस्तु स्थायित्व Object permanence का गुण आने लगता है। ]

👉चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है।
3 – 4 माह तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
वस्तु का सामने न होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है , इसे ही वस्तु स्थायित्व कहते हैं।

2.🌺 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( 2 – 7 ) वर्ष

👉भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है।

👉अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है।

👉वस्तुओं को पहचाने लगता है।

👉बच्चा इस उम्र में वस्तुओं में विभेद करना सीख जाता है।

👉5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।

👉इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु , समाप्त होने तक बच्चा सजीव – निर्जीव में विभेद करने लगता है।

🍁 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दोष :-

1.🌲 जीववाद :-

इसमें बच्चा निर्जीव को सजीव समझने लगता है।

2.🌲 आत्मकेंद्रित ( स्वलीनता ) :-

सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानता है।

🍁 2 – 4 वर्ष की अवधि में, बच्चों में यह दोष आने लगता है।
🍁 4 – 7 वर्ष में चिंतन / तर्क , पहले ये अधिक परिपक्व हो जाता है।

3.🌺 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 7 – 11 ) वर्ष

👉ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है।

👉वस्तु को पहचानना , विभेद करना , वर्गीकृत करना सही ढंग से सीख जाता है।

👉समस्या समाधान का अमूर्त रूप विकसित नहीं हो पाता है।

👉सोच स्थूल या सूक्ष्म होती है।

👉मूर्त संक्रियात्मक अवस्था के दोष :-

👉अमूर्त सोच विकसित नहीं होती है।
चिंतन पूरी तरह से विकसित नहीं होता है।

4.🌺 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 11 – 18 ) वर्ष

👉चिंतन लचीला और प्रभावी हो जाता है।

👉चिंतन क्रमबद्ध हो जाता है।

👉समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर , चिंतन करके , कर सकता है।

👉चिंतन वास्तविक हो जाता है।

👉बालकों में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है।

🌻✒️ Notes by – जूही श्रीवास्तव ✒️🌻

🎯पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत🎯

🌼प्याजे ने संज्ञानात्मक विकास में 4 अवस्थाओं का वर्णन किया है जो कि नीचे दिया गया है……..

(1) इंद्रिजनित गामक अवस्था (sensory motor stage):- 0-2 year

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (pre-operational stage):-> 2-7 year

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था concrete operational stage:-> (7-11year)

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (formal operational stage):- (11-18 year)

💫इंद्रियजनित गामक अवस्था/ संवेदी पेशीय /संवेदी गामक अवस्था ……..

☘️इसमें बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को केंद्रीय जनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है
☁️शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना ,किसी चीज को पकड़ने लगना लगता है

🌹 अपने भाव को रोककर व्यक्त करता है ।

🍂जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है ।

🌴शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है धीरे-धीरे 2 वर्ष की समाप्ति तक बच्चा उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही है इसी को (object permanence) वस्तु स्थायित्व कहते हैं।

💫पूर्व संक्रियात्मक अवस्था :- (2-7year)

☘️भाषा का विकास ठीक से आरंभ हो जाता है
🌾अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा बन जाती है

🌻 वस्तुओं को पहचानने लगता है।

🌹 बच्चा इस उम्र में वस्तु में विभेद करना सीख जाता है ।
5 वर्ष तक संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।
-> इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परन्तु समाप्त होते-होते वह सजीव निर्जीव में भेद करने लगता है

🍁जीववाद :- इसमें बच्चा निर्जीव को सचिव और सचिव को निर्जीव मान लेते हैं।

🍂आत्म केंद्रित :- इसमें सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानते हैं।

🌾जीववाद एवं आत्मकेंद्रित बच्चों में 2 से 4 साल की अवधि में पाया जाता है।

💮4-7 साल में बच्चा चिंतन/ तर्क करने लगता है और पहले से अधिक परिपक्व हो जाते हैं।

🏵️मूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( 7-11) :-

🌟ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया चलती है।

⭐वस्तु को पहचान , विभेद करना, वर्गीकृत करना सीख जाता है।

⭐समस्या समाधान का अमृत रूप विकसित नहीं हो पाता है।

⚡दोष:-अमूर्त सोच विकसित नहीं होती है ।
🌖चिंतन पूरी तरह से विकसित नहीं होती है।

⭐अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (12-18year):-

🌾इस अवस्था में बच्चों में चिंतन बहुत ही लचीला एवं प्रभावी हो जाता है।
🌼 चिंतन क्रमबद्ध होती है।

☘️ समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर ,चिंतन कर, कर देता है ।

💫चिंतन वास्तविक होने लगता है।
💐बालक में विकेन्दरण पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है।

🌻🌹🍁🍂💮💮🙏Notes by-SRIRAM PANJIYARA 🌈🌸💥🌺🙏

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं

जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार भागों में विभाजित किया है
1 इंद्रिय जनित गामक अवस्था(sunsary motor stage ) 0-2
2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(pre opretional stage ) 2-7
3 मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (concreate operational stage )7-11
4 अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था( formal opratnal stage ). 11 – 18

1.इंद्रिय जनित गामक अवस्था-
इसे संवेदी पेशीय अवस्था और संवेदी गामक अवस्था भी कहते हैं
इस अवस्था में बच्चे अपने मानसिक क्रियाओं को इंद्रियजनित गामक क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है
शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर देखना किसी चीज को पकड़ने लगता है
अपने भाव को रोककर व्यक्त करता है।

इशारों के द्वारा किसी वस्तु को लेने के लिए रोता है अर्थात्
जो चाहिए उसे दिखा कर अपनी बात कहना चाहता है।

शुरुआत में बच्चों के लिए सिर्फ उस वस्तु का अस्तित्व होता है जो उसके सामने होता है धीरे धीरे जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती जाती है 2 वर्ष की समाप्ति होने तक उन वस्तुओं के प्रति भी अनुक्रिया करने लगता है जो दिखाई नहीं दे रही हैं

चिंतन धीरे-धीरे वास्तविक होने लगता है 3 से 4 महीने तक कोई वस्तु सामने से हटाने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है

वस्तु स्थायित्व-वस्तु के सामने न होने पर भी उसका अस्तित्व बना रहता है इसे वस्तु स्थायित्व कहते हैं

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था-

इस अवस्था में भाषा का विकास ठीक से प्रारंभ हो जाता है
वस्तुओं को पहचानने लगता है।अर्थोत् वस्तु स्थायित्व का प्रर्दशन करने लगता है।
इस उम्र में बच्चा वस्तुओं में विभेद या अंतर करना सीख जाता है
5 वर्ष तक यह संप्रत्यय निर्माण अधूरा रहता है।
इस अवस्था के प्रारंभ में तो नहीं परंतु समाप्त होते -होते वह सजीव- निर्जीव में भेद करने लगता है

जीववाद – बच्चे निर्जीव को सजीव समझते हैं (2 से 4 साल की अवधि में)

आत्म केंद्रित- इसमें बच्चा सिर्फ अपने विचारों को सत्य मानता है इसे बाद में स्वालीनता भी बोलते हैं।
जैसे बच्चे का अकेले में गेंद को दीवार से मारकर खेलना किसी के साथ नहीं खेलना।

2 से 7 वर्ष में चिंतन तर्क से पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है।

3.मूर्त संक्रियात्मक अवस्था-

इसमें वस्तु को पहचानना ,विवेद करना ,वर्गीकरण करना बच्चा सीख जाता है
इस अवस्था में ठोस वस्तु के आधार पर मानसिक क्रिया होती है
समस्या समाधान का अमूर्त रूप है

दोष-
1 अमूर्त सोच विकसित नहीं होती है।
2 चिंतन पूरी तरह विकसित नहीं होता है

4.अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था-
इस अवस्था में चिंतन लचीला,प्रभावी हो जाता है।
चिंतन क्रम बद्ध होता है।
इस अवस्था में समस्या समाधान काल्पनिक रूप से सोच कर चिंतन कर सकते हैं
चिंतन वास्तविक होती है
बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णता विकसित हो जाता है।

Notes by Ravi kushwah

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