🔆चिंतन के साधन➖
(Means of thinking)

निम्नानुसार है।
📍1 प्रति बोधन
📍2 प्रतिमान
📍3 संप्रत्यय
📍4 भाषा
📍5 संकेत एवं चिन्ह
📍6 सूत्र

🌀1 प्रतिबोधन (Enlignment)➖

▪️यदि कोई शिक्षक बच्चों को आपस में झगड़ते हुए देखता है तो उस स्थिति में शिक्षक अपने अनुभव से यह जानने की कोशिश करता है कि झगड़े का मुख्य कारण क्या है ? अर्थात वह इस झगड़े की मुख्य वजह या जड़ का पता बच्चों के व्यवहार को अवलोकन करके पता करता है और साथ ही साथ इससे यह भी मालूम चलता है कि इस वक्त लड़ाई किस प्रकार से बंद करवाई जा सकती है या उसे किस तरह से सुधारा जा सकता है।

▪️अर्थात शिक्षक समस्याओं को अवलोकन करने के बाद उसका कारण जानने के उपरांत उसमें रेक्टिफाय करते हैं।

▪️अतः इस तरह समस्या को देखकर समझ कर उसके कारणों को समझना और उसके समाधान के बारे में सोचना है चिंतन के अंदर प्रतिबोधन है।

▪️प्रतिबोधन के माध्यम से उत्तेजना मिलती है ताकि बेहतर चिंतन हो सके।

▪️जब हम किसी समस्या को केवल सुनकर उस पर चिंतन करते हैं तो वह इतना प्रभावी नहीं होता जितना कि हम उस समस्या को खुद से अनुभव करके ।खुद से देख कर ,समझ कर ,अनुभव करते हैं अर्थात जब हम उस समस्या या कार्य में शामिल होते हैं तो उस समस्या को बेहतर रूप से देख पाते हैं और उसे समझ कर उसके कारणों को जानकर एक उचित समाधान निकालने के लिए उस समस्या पर बेहतर रूप से उत्तेजित रूप से चिंतन कर पाते हैं जिसके फलस्वरूप समस्या का उचित समाधान प्राप्त हो जाता है।

🌀2 प्रतिमान (pattern)➖

▪️व्यक्ति के पूर्व अनुभव एक प्रतिमान के रूप में विद्यमान रहते हैं।

▪️यह प्रतिमान किसी चीज़ को दर्शाने वाली कोई अन्य नमूना, वस्तु, सोच, लिखाई, इत्यादि हो सकते हैं।

▪️यह प्रतिमान इतने शक्तिशाली होते हैं कि पूर्व अनुभव और प्रत्यक्ष में बहुत कम अंतर रहता है।

▪️मनोविज्ञान का पहला ऐसा मानना था कि किसी व्यक्ति के चिंतन में प्रतिमान का कोई प्रयोग नहीं किया जाता हैं।

▪️लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान में यह स्पष्ट हो चुका कि वर्तमान के चिंतन में प्रतिमान या पैटर्न है, और यही पैटर्न हमारे पूर्व अनुभव से बनते हैं जिनके आधार पर ही हम वर्तमान स्थिति पर चिंतन करते हैं।

🌀3 संप्रत्यय (Concept)➖

▪️प्रत्येक घटना या वस्तु का प्रति व्यक्ति के मन में होता है। जो चिंतन प्रक्रिया में सहायक होता है।

▪️कोई भी घटना या वस्तु हमें लंबे समय तक तब तक याद रहती है जब हम उस घटना के बेसिक फंडामेंटल या उसके मूल आधारभूत को समझ लेते हैं।

▪️चिंतन का महत्वपूर्ण साधन संप्रत्यय है जिनके द्वारा हमें संपूर्ण ज्ञान का बोध होता है। जैसे हाथी शब्द को सुनकर हमारे मस्तिष्क में हाथी से संबंधित संप्रत्यय जाग जाता है , और संपूर्ण ज्ञान का आभास होने लगता है अर्थात संप्रत्यय के माध्यम से चिंतन की प्रक्रिया सशक्त होती है।

▪️किसी भी वस्तु प्रत्यय के आधार पर हम उस वस्तु का वर्गीकरण करते हैं। यदि हमारे पास किसी वस्तु का संप्रत्यय होता है तो उसके चिंतन में कम समय लगता है।

🌀 4 भाषा (language)➖

▪️जब हम किसी भी विषय पर चिंतन करते हैं तो स्वयं से बातचीत करते हैं और इसी बातचीत में अपनी भाषा का प्रयोग करते हैं।

▪️अर्थात जब हम स्वयं से बातचीत, भाषा के माध्यम से चिंतन में मदद करता है ।चिंतन को आंतरिक भाषण भी कहते हैं।

▪️चिंतन की प्रक्रिया में व्यक्ति मन ही मन भाषा एवं प्रत्यय का प्रयोग करता है जिसके फलस्वरूप उसके कंठ में अनेक गतियां होती हैं यही आंतरिक भाषण है।

▪️भाषा के अभाव में चिंतन करना लगभग असंभव होता है क्योंकि भाषा चिंतन सामग्री को जुटाने में सहायक होता है। भाषा एक ऐसा माध्यम होता है जिसकी सहायता से व्यक्ति अपने विचारों, इच्छाओं को सामाजिक रूप से स्वीकृत मानकों के रूप में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य की अभिव्यक्ति के लिए भाषा यह शब्द का होना अति आवश्यक है।

▪️बच्चे भाषा की जगह इशारो एवं प्रतीकों का प्रयोग करना सीख जाते हैं यही कारण है कि छोटे बच्चे (नवजात शिशु) तरह-तरह ध्वनियों के माध्यम से माता पिता को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। बच्चों के द्वारा बलबलाना , छोटे शब्दों का प्रयोग करना यह स्पष्ट करता है कि भाषा ज्ञान की प्राप्ति और प्रयोग के लिए ऐसा करते हैं।

▪️कई अध्ययनो से यह ज्ञात नहीं हुआ है कि चिंतन करते वक्त व्यक्ति के जीभ और स्वर यंत्र में भी पेशीय संकुचन होता है।

🌀5 संकेत एवं चिन्ह (sign and symbol)➖

▪️प्रतीक एवं चिन्ह मूक रहते हुए भी अपना अर्थ स्पष्ट और व्यक्त करने में समर्थ होते हैं।
सड़क पर बने हुए चिन्ह या प्रतीक सही गति एवं सुरक्षा को स्पष्ट करते हैं। जिससे समय और शक्ति की बचत होती है।
बालक विद्यालय के घंटे और घंटा मे अंतर कर लेता है क्योंकि उसे सुनकर उसकी चिंतन शक्ति अर्थ लगाती है । इसी प्रकार से गणित में +,-,÷,× के चिन्ह अर्थ स्पष्ट करते है कि हमें क्या करना है?

▪️बोरिंग, लैंगफील्ड और बेल्ट ने लिखा भी है कि

▪️प्रतीक एवं चिन्ह मोहरे एवं गोटियां है जिनके द्वारा चिंतन का महान खेल खेला जाता है इनके बिना यकीन महत्वपूर्ण एवं सफल नहीं होता।

🌀6 सूत्र (formula)➖

▪️हमारी प्राचीन परंपरा रही है कि हम ज्ञान को छोटे-छोटे रूपों में एकत्रित करके संचित करते हैं।
इनमें गणित और विज्ञान के सूत्र आते है।
भारती ज्ञान संस्कृत के श्लोकों में संचित हैं जिसकी व्याख्या से अपार ज्ञान प्रकट होता है। किसी भी प्रकार की सूत्र को देखकर हमारी चिंतन शक्ति उसमें नहीं संपूर्ण ज्ञान को प्रकट करती है।

▪️अर्थात चिंतन को सूत्र के सहारे किसी भी तथ्यों को विकसित किया जा सकता है।

❇️चिंतन के लिए अनुकूल परिस्थितियां➖

▪️चिन्तन की अनुकूल परिस्थितियाँ या प्रभावित करने वाली दशाएँ। अच्छे चिन्तन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ या प्रभावित करने वाली दशाएँ निम्नलिखित हैं

⚜️(1) सबल प्रेरणा (Strong Motivation)➖

चिन्तन की प्रक्रिया को शुरू करने के लिए प्रेरणा बहुत आवश्यक है। प्रेरणा की अनुपस्थिति में दोषमुक्त एवं व्यवस्थित चिन्तन सम्भव नहीं है। वस्तुतः चिन्तन की शुरुआत किसी समस्या से होती है। यह समस्या चिन्तन के लिए स्वत: ही एक प्रेरणा का कार्य करती है। व्यक्ति का सम्बन्ध समस्या से जितना, गहरा होगा, वह उसके समाधान हेतु उतनी ही गम्भीरता से कार्य करेगा। बाहरी प्रेरणाएँ जितनी अधिक सबल होंगी, चिन्तन भी उतना ही अधिक प्रबल होगा। इस प्रकार, प्रामाणिक चिन्तन के लिए सबल प्रेरणाएँ पर्याप्त रूप से सहायक समझी जाती हैं।

⚜️(2) रुचि (Interest)➖

रुचि, चिन्तन को प्रभावित करने वाली एक मुख्य दशा है। रुचि होने पर व्यक्ति सम्बन्धित समस्या के समाधान हेतु पूर्ण मनोयोग से प्रयास करता है। अपनी आदत के मुताबिक अरोचक विषयों से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु चिन्तन करने के लिए या तो व्यक्ति प्रचेष्ट ही नहीं होगा और यदि अनमने मन से चेष्टा करेगा भी तो उसे पूर्ण नहीं करेगा।

⚜️(3) अवधान (Attention)➖

चिन्तन के पूर्व और चिन्तन की प्रक्रिया के दौरान सम्बन्धित समस्या की ओर व्यक्ति का अवधान (ध्यान) होना चाहिए। समस्या पर अवधान केन्द्रित न होने से चिन्तन करना सम्भव नहीं हो पाता।

⚜️(4) बुद्धि का विस्तृत क्षेत्र (Broad area of Intelligence)➖

चिन्तन का बुद्धि से सीधा सम्बन्ध है। चिन्तन एक बौद्धिक या मानसिक प्रक्रिया है; अतः बुद्धि का क्षेत्र या मात्रा चिन्तन में सहायक होती है। बुद्धि से सम्बन्धित तीनों पक्ष-अन्तर्दृष्टि, पूर्वदृष्टि तथा पश्चात् दृष्टि के सम्यक् एवं समन्वित प्रयोग से चिन्तन की सफलता सुनिश्चित होती है। देखने में आया है कि अधिक बुद्धिमान व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक सफल चिन्तक बन जाता है।

⚜️(5) सतर्कता (Vigilence)➖

वैध चिन्तन के लिए सतर्कता एक अनुकूल दशा है। चिन्तन के दौरान सतर्कता बरतने से भ्रान्त धारणाओं तथा गलतियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा सतर्कता नवीन उपायों तथा विधियों का भी ज्ञान कराती है, जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है।

⚜️(6) लचीलापन (Flexibility)➖

चिन्तन में लचीलापन अनिवार्य है। व्यक्ति की मनोवृत्ति में लचीलापन रहने से चिन्तन में स्वतन्त्रता आती है। रूढ़िगत एवं अन्धविश्वास से युक्त चिन्तन संकुचित एवं सीमित रह जाता है। चिन्तन में देश-काल एवं पात्रानुसार परिवर्तन आने चाहिए। स्पष्टतः यह चिन्तन में लचीलेपन के गुण से ही सम्भव है। |

⚜️(7) समय की सीमा का कठोर होना/ पर्याप्त समय (Enough Time)–

चिन्तन के लिए समय की पाबन्दी लगाना उचित नहीं है। चिन्तन करते समय चिन्तक को यह ज्ञात नहीं रहता कि उसे किसी समस्या पर विचार करने में कितना समय लगेगा। अतः चिन्तन में स्वाभाविकता लाने के लिए समय की सीमा कठोर नहीं होनी चाहिए। चिन्तन के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध रहना चाहिए।

⚜️(8) रोकना /स्थगित करना (pouse/ cance)➖

किसी भी विषय पर या समस्या पर चिंतन करने के लिए उस विषय पर कब रोकना है? या कितने विराम की आवश्यकता है ?इस बात का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है।
यदि किसी भी समस्या पर लगातार चिंतन किया जाता है तो समस्या का समाधान इतना प्रभावी नहीं होता अर्थात जब समस्या पर चिंतन किया जाता है तो बीच-बीच में विराम या रोकना भी महत्वपूर्ण होता है जिससे बेहतर रूप से समस्या का समाधान निकाला जा सके।

⚜️(9) संवेग (emotion) ➖
जब कोई भी बात हमारे इमोशन या हमारे संवेग या भाव से जुड़ी होती हैं तब उस विषय पर या उस बात पर हम बहुत ही व्यापक और गहराई से चिंतन कर पाते हैं।

अर्थात जिस भी बात में हमारे संवेग होते हैं उसमें चिंतन की प्रक्रिया बहुत प्रबल होती है।

⚜️(10)भाषा (language)➖

किसी भी समस्या पर चिंतन करने के लिए भाषा का महत्व पूर्ण योगदान होता है क्योंकि जब उस विषय पर हम चिंतन करते हैं तो अपने मन ही मन उस पर बातचीत करते हैं और यही बात चीत भाषा है जो हमारे चिंतन में मदद करती है।

⚜️(11) प्रत्यय (concept)➖

यदि कोई भी कार्य हमारे पूर्व अनुभव अर्थात हमारे प्रत्यय से जुड़ा होता है तो उस कार्य को हम बेहतर रूप से उस पर चिंतन कर उसे प्रभावी रूप से पूरा कर पाते हैं।

किसी भी वस्तु का संप्रत्य जब हमारे दिमाग में विकसित होता है तो उस वस्तु के शब्द को सुनते हैं उससे संबंधित समस्त संप्रत्य हमारे दिमाग में आ जाते हैं जिससे उस वस्तु का समस्त ज्ञान प्रकट हो जाता है।

⚜️(12) सामाजिक संपर्क (social contact)➖

व्यक्ति समाज के बीच जन्म लेता है और समाज के अन्य लोगों के साथ परस्पर क्रियाएं करता है अर्थात जब हम समाज के विभिन्न में लोगों के साथ जीवन व्यतीत करते हैं तो उनके साथ जुड़ने से कई बातों एवम उनके कई विचारों को जानते हैं तथा कई विचारों को जानने में मदद मिलती है और यही विचार हमारी चिंतन में उपयोगी होते हैं।

⚜️(13) प्रत्यक्ष अनुभव (direct experience)➖

किसी भी वस्तु या कार्य का जब हमें प्रत्यक्ष अनुभव अर्थात सामने से जो अनुभव या खुद से कर के जो अनुभव होता है तो उस वस्तु का ज्ञान या उस कार्य को हम प्रभावी रूप से पूरा कर पाते हैं क्योंकि यह कार्य हम पूर्व में कर चुके अर्थात उस कार्य के बारे में हमारे पास अनुभव जिसे हम किसी भी स्थिति में आसानी से पूरा कर सकते हैं।

✍️ Notes By "Vaishali Mishra"

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
💐 चिंतन के साधन ( Means of thinking) –

🌈 प्रति बोधन (Enlightenment) –

💐समस्या को देखकर समझ कर उसका कारण का समझना और उसके समाधान के बारे में सोचना ही चिंतन के अंदर प्रति बोधन है ।
प्रतिवेदन के माध्यम से उत्तेजना मिलती है। ताकि चिंतन बेहतर हो सके।

🌈 प्रतिमान ( pattern) –

💐 व्यक्ति की जो पूर्व अनुभव प्रतिमान रूप में विद्यमान रहते हैं। यह प्रतिमान इतने शक्तिशाली होते हैं कि इन में और प्रत्यक्ष में बहुत कम अंतर रहता है।

🌈Concept( प्रत्यय)–

💐 प्रत्येक घटना आपको या वस्तु का प्रत्यय के मान में होता है। जो चिंतन प्रक्रिया में सहायक होता है।
प्रत्यय के आधार पर वस्तुओं का वर्गीकरण करते हैं ।अगर हमारे पास प्रत्यय हैं तो चिंतन में कम समय लगेगा ।

🌲जैसे हमें विकास के बारे में चिंतन करना है तो हमें विकास का कांसेप्ट क्लियर होना यह होना चाहिए।

🌈 भाषा ( language)–

💐 स्वयं से बातचीत भाषा के माध्यम से चिंतन में मदद करते हैं।
चिंतन के आंतरिक भाषण भी कहते हैं। चिंतन करते वक्त जीभ स्वर यंत्र में भी पेशी संकुचन होता है।

🌈 संकेत एवं चिन्ह–

💐 संकेत किसी खेल या क्रियात्मक अनुक्रिया के लिए उद्दीपन का कार्य करती है।

🌈 सूत्र ( formula) –

💐 विज्ञान और गणित में चिंतन के सूत्रों के सहारे तथ्यों को विकसित किया जाता है।

🌍 चिंतन के लिए अनुकूल परिस्थिति( Eavarable situation for thinking) –

🌈 सशक्त प्रेरणा ( story motivation )–

💐 चिंतन में प्रेरणा की आवश्यकता होती है।

♦️ प्रेरणा के अभाव में व्यवस्थित और नियंत्रित चिंतन संभव नहीं है।
♦️ चिंतन समस्या का समाधान करते हैं ।
♦️समस्या समझाने की प्रेरणा जितनी प्रबल चिंतन उतना ही सशक्त होगा।

♦️ प्रेरणा से उत्साह रहता है। और थकान नहीं होती है।

🌈 धयान और रुचि–

💐 चिंतन में ध्यान का होना आवश्यक है। ध्यान अगर नहीं है तो रुचि नहीं है ।तो चिंतन नहीं हो सकता। इसलिए चिंतन के लिए ध्यान और रुचि का होना आवश्यक है।

🌈 सतर्कता और लचीलापन –

💐 अगर हम किसी चीज पर चिंतन करना चाहते हैं तो उसके प्रति सतर्क होना और लचीला होना आवश्यक है।

🌈 बुद्धि का विस्तृत क्षेत्र–

💐 चिंतन में अंतर्दृष्टि जरूरी है। व्यक्ति में लचीलापन बुद्धि से आएगा और बुद्धि अंतर्दृष्टि से आएगी । इसलिए किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए बुद्धि का विस्तृत क्षेत्र होना अति आवश्यक है।

🌈 समय की कठोर सीमा न होना–

💐 चिंतन करते समय ,समय सीमा कठोर नही होना चाहिए। कोई बांड नहीं होना चाहिए ,कि इस प्रश्न का उत्तर आपको 2 मिनट में देना है। या इस सब्जेक्ट को इतनी समय में पूरा करना है। इससे चिंतन होना संभव नहीं है।

🌈 pouse/ cancel रोकना / स्थगित करना–

💐 चिंतन में किस जगह पर रुकना है किस जगह पर चीजों को स्थगित करना है इसका भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।

🌈 संवेग ( Emotion) –

💐 संवेग का भी चिंतन में बहुत महत्व है।

🌈 भाषा( Language)–

💐 भाषा के माध्यम से भी कई प्रकार से चिंतन किया जाता है।
चिंतन में भी भाषा का उपयोग होता है।

🌈 प्रत्यय ( concept)–

💐 चिंतन के लिए प्रत्यय का होना भी आवश्यक है ।जब तक कोई प्रत्यय नहीं होगा चिंतन का होना संभव नहीं है।

🌈 सामाजिक संपर्क( social contect) –

💐 सामाजिक संपर्क का भी चिंतन में विशेष महत्व है ।समाज के लोगों से मिलना बातचीत करना के माध्यम से भी चिंतन किया जाता है।

🌈 प्रत्यक्ष अनुभव (direct obsarvation) –

💐 चिंतन में प्रत्यक्ष अनुभव का होना भी जरूरी है ।यदि प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है ।तो भी चिंतन होना संभव नहीं है।

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 Notes by poonam sharma

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