*🌸वृद्धि एवं विकास🌸*

 *🌸Growth and Development🌸*

*01 march 2021*

👉 व्यक्ति हर पल कुछ ना कुछ सोचते/ करते रहता है या उसमें बदलाव होते रहते हैं, जो हर व्यक्ति में अलग-अलग होते हैं और यह बदलाव व्यक्ति की आवश्यकता, प्रेरणा तथा वातावरण पर निर्भर करते हैं। 

हर व्यक्ति में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक इत्यादि के परिपेक्ष में पल-पल बदलाव आता है।  और वह हमेशा अपने काम व अन्य सभी क्षेत्रों में ऊपर उठते जाता है।  व्यक्ति में आने वाले पल-पल के इन बदलावों को ही वृद्धि एवं विकास कहा जाता है। 

👉 प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध या नासमझ कहलाता है,फिर उम्र के अनुसार धीरे-धीरे बच्चा शरारती हो जाता है, फिर वह गंभीर होने लगता है और फिर एक उम्र के बाद विद्वान एवं ज्ञानी आदि विशेषताएं बच्चे में विकसित होती जाती है। 

बच्चे के विकास का यह क्रम चलना जरूरी होता है जिससे यह निश्चित होता है कि बच्चे में वृद्धि एवं विकास हो रहा है। 

👉 आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक, मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है, इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है। 

👉 बालक की योग्यता, क्षमता में वृद्धि, व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है, इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक है।  ताकि बच्चों की मानसिकता को आसानी से समझा जा सके और उनकी विशिष्टताओं के आधार पर उन्हें शिक्षा दी जा सके। 

👉 बालक की आयु के साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, नैतिक आदि पक्षों का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाता है। 

👉 व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास वृद्धि या अभिवृद्धि तथा विकास से मिलकर होता है। 

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*🌸 अभिवृद्धि/वृद्धि ( Growth) 🌸*

👉 अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है- *”आगे बढ़ना”*। 

 बालक की अभिवृद्धि के संबंध में जिसके अंतर्गत लंबाई, भार या कार्यक्षमता, मोटाई तथा अंगों का विकास आता है इस प्रकार  के आंतरिक एवं बाहरी, शारीरिक परिवर्तन वृद्धि के अंतर्गत  आते हैं। 

👉 मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक ही होती है, इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती अर्थात इस आयु में व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है। 

इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है। इसका मापन भी किया जा सकता है। 

🌸 *मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार*- ” अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है जैसे- लंबाई और भार में वृद्धि।” 

🌸 *लाल और जोशी के अनुसार*- ” मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार,भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली उस वृद्धि है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है। “

Notes by Shivee Kumari

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🔆 वृद्धि एवं विकास 🔆

            (Growth and Development)

▪️हर व्यक्ति में शारीरिक ,मानसिक, भावनात्मक ,सामाजिक इत्यादि परिप्रेक्ष्य में पल पल बदलाव आता है।

▪️व्यक्ति में समय के साथ यह बदलाव निरंतर हर क्षण या बिना रुके हुए चलता रहता है और कुछ ना कुछ वृद्धि और विकास होता  रहता है।

▪️हालांकि प्रत्येक व्यक्ति में यह वृद्धि और विकास अलग अलग होगा यह किसी व्यक्ति में कितनी मात्रा में व किस दिशा में होगा यह उस व्यक्ति की प्रेरणा, आवश्यकता या उसके वातावरण पर निर्भर करेगा।

▪️प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध/नासमझ कहलाता है।

▪️ बच्चे में  शुरुआती समय में शरारती – आगे बढ़कर –  गंभीर –  विद्वान और धीरे-धीरे – ज्ञानी जैसी यह सभी विशेषताएं आने लगती है।

▪️बच्चे की आयु में वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक योग्यता, और क्षमता में भी वृद्धि होती है जिससे उसके के व्यक्तित्व में भी परिवर्तन दिखाई देने लगता है।

▪️बच्चे में जो भी परिवर्तन जिन कारणों से हो रहे हैं उन कारणों का अध्ययन करना बहुत ही आवश्यक है।

▪️अर्थात बालक की योग्यता क्षमताओं में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन भी कारणों से हो रहा है उनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए अत्यंत आवश्यक   और महत्वपूर्ण है।

▪️जब तक शैक्षिक क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति या कार्यकर्ता को यह नहीं पता होगा कि बच्चे की उम्र व वातावरण के अनुसार  वृद्धि कैसे हो रही है, विकास किस गति में हो रहा है, किस वजह या कारण से बच्चे के व्यवहार एवं व्यक्तित्व में परिवर्तन आया है इन सभी बातों का ज्ञान नहीं होगा तब तक वह बच्चे की अंदर किसी भी तरह का बदलाव या सुधार नहीं कर पाएगा।

▪️जैसा कि हम जानते हैं कि हर प्राणी की क्षमता, योग्यता ,व्यवहार ,व्यक्तित्व ,विचार अलग-अलग होता है अर्थात हर इंसान में व्यक्तिक भिन्नता निश्चित ही होती है इन सभी को ध्यान में रखते हुए या इन्हे जानकर हम पता कर सकते हैं कि बच्चे का वातावरण या माहौल या स्थिति किस प्रकार की होगी।

▪️इसीलिए प्रत्येक शिक्षक को इस बात का ज्ञान अवश्य होना चाहिए जिससे कि वह बच्चे की जरूरत ,समझ व वातावरण के हिसाब से शिक्षण कार्य का क्रियान्वयन सुचारू रूप से कर पाए ।

▪️बालक की आयु के साथ साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, नैतिक आदि अनेक पक्षों का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को दर्शाता है।

इस “संपूर्ण विकास” को दो भागों में बांटा गया है।

🔹1 वृद्धि /अभिवृद्धि

🔹2 विकास

🔅 1 वृद्धि / अभिवृद्धि (Growth) ➖

🔸वृद्धि का सामान्य अर्थ होता  है “आगे बढ़ना”

🔸व्यक्ति में किसी न किसी रूप में हर पल या हर क्षण बदलाव आता होता ही रहता  है।

🔸बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ  में शरीर के आंतरिक और बाह्य अंग के आकार, भार और कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है।

🔸सामान्यत: मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक हो जाती है।

लड़कियों की वृद्धि लडको की अपेक्षा दो वर्ष पूर्व ही हो जाती है।

 इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है। इस आयु का व्यक्ति पूर्ण रूप से वयस्क हो जाता है।

🔸इस वृद्धि को देखा व परखा  जा सकता है और इसका मापन भी किया जा सकता है। अर्थात वृद्धि मात्रात्मक होती हैं।

    “वृद्धि के संदर्भ में कुछ मनोवैज्ञानिको के कथन”

❇️ फ्रेंक के अनुसार – “अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाले वृद्धि से ही है।

 जैसे – लंबाई और भार में वृद्धि।”

❇️ लाल व जोशी के अनुसार – “मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य व्यक्ति के शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार ,भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली उस विधि से है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।”

        ✍️     

              Notes By – ‘Vaishali Mishra’

वृद्धि और विकास

  (Growth and Development)

हर एक व्यक्ति में शारीरिक,मानसिक ,नैतिक ,सांस्कृतिक सामाजिक,धार्मिक, भावनात्मक इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में पल-पल बदलाव आता है अर्थात प्रत्येक क्षण में कुछ ना कुछ बदलाव होता है फिर वह अंतरिक हो या बाहरी रूप से देखें जाने वाला हो,

विकास की प्रक्रिया हर किसी में निरंतर चलती रहती है लेकिन उसकी दशा और दिशा उस व्यक्ति के आचरण विचार,अभिप्रेरणा, रुचि व उसके वातावरण पर निर्भर करती है,

प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता है अर्थात वह नासमझ होता है उसे सही गलत ईमानदारी- बेईमानी व अन्य विषयों के बारे में ज्ञान नहीं रहता है,

बच्चे की उम्र धीरे-धीरे बढ़ने के साथ-साथ उसमें अनैतिक व नैतिक गुण आने लगते हैं जैसे बच्चा पहले अबोध था अब वह धीरे धीरे उम्र बढ़ने के साथ-साथ गंभीर होगा फिर वह आगे समझदार विद्वान,ज्ञानी ,दानी ,अहिंसावादी वा इत्यादि विशेषताएं आने लगती हैं।

प्रत्येक व्यक्ति में आयु की वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है।

बालक की योग्यता क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है उनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक है अर्थात्  शिक्षक को यह  ज्ञान अवश्य होना चाहिए कि उसके छात्र में शारीरिक, मानसिक,वा व्यहारात्मक वा अन्य  में जो भी परिवर्तन हो रहे हैं उसके क्या कारण है वह उनको और अधिक सुलभ व सुचारू रूप से किस प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है।

विकास संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को दर्शाता है।

संपूर्ण विकास को दो भागों में विभाजित किया गया है

1-वृद्धि (अभिवृद्धि)

 २- विकास

१- अभिवृद्धि (वृद्धि ) वृद्धि का समान अर्थ है “आगे बढ़ना”

 (To growth To nourish)

बालक की वृद्धि के संदर्भ में उसके शरीर के आंतरिक एवं बाह्य अंग के आकार,भार,कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है। (जैसे शैशवास्था में बच्चे का मस्तिष्क भार वा  उसके शरीर के भार की तुलना, बाल्यावस्था के बालक के मस्तिष्क के भार व उसके शरीर की तुलना करने पर दोनों में ही अंतर स्पष्ट दिखेगा।)

प्रत्येक व्यक्ति में वृद्धि की शुरुआत गर्भावस्था से हो जाती है और यह किशोरावस्था की अंतिम अवस्था तक पूर्ण हो जाती है एवं रुक जाती है

(जैसे÷बालक की लंबाई का बढ़ना जो कि एक निश्चित समय किशोरावस्था की अवस्था के बाद रुक जाना)

मानव शरीर में वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक की होती है।

(लड़कों की तुलना में लड़कियों में वृद्धि २ वर्ष पूर्व हो जाती है) इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है।

                                                     इसका अर्थ है कि इस आयु का व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है।

इसका मापन किया जा सकता है अर्थात या मात्रात्मक होती है।

मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार ÷”अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली विद्धि से है”

मनोवैज्ञानिक लाल व जोशी के अनुसार÷मानव वृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार, भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली उस वृद्धि से है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।

🥀Written by÷ shikhar pandey 🥀

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 Growth and development  (वृद्धि और विकास)- 

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💥🌈  वृद्धि और विकास के द्वारा बालक का सम्पूर्ण विकास होता है।

         हर व्यक्ति में शरीरिक, मानसिक,भावात्मक, सामाजिक,इत्यादि परिप्रेक्ष्य में हर समय बदलाव आता है।

💥🌈 प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता है,मतलब उसे बाहरी किसी भी चीज़ का बोध नही होता है वह अपरिचित होता है वास्तविकता से।

🌈💥 उसके बाद थोड़ा शरारती होता है बच्चे का शरारती होना भी जरूरी होता है। जिससे वह अन्तःक्रिया कर पाता है। उसके बाद वह गंभीर, विद्वान, ज्ञानी आदि विशेषताएं आने लगती हैं।

💥🌈 बच्चे की आयु में वृद्धि के साथ साथ शारीरिक ,मानसिक योग्यता और क्षमता में भी वृद्धि होने लागती है।

🌈💥इससे व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है।

🌈💥बालक की योग्यता और क्षमता में वृध्दि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है उनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्य कर्ता या अध्यापक को करना आवश्यक है। जिससे बालको का सम्पूर्ण विकास अच्छे से हो पायेगा। 

💥🌈 बालक की आयु के साथ शारीरिक ,मानसिक,सामाजिक,संवेगात्मक ,नैतिक आदि पक्षो के सम्पूर्ण विकास को दर्शाता है।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻वृद्धि + विकास= सम्पूर्ण विकास

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🌈💥 अभिवृद्धि(वृध्दि)-

👉 अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है “आगे बढ़ना” 

  बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में शरीर के आंतरिक व बाह्य अंग के आकार ,भार या कार्य क्षमता में होने वाले वृध्दि के रूप में देखा जाता है।

💥 मानव शरीर में यह वृध्दि 18 से 20 तक होती है।💥

👉इसके बाद अंगों में बृद्धि नही होती है। इस आयु का व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है। इस वृद्धि को देख औऱ परखा जा सकता है। इसका मापन भी किया जा सकता है

👨‍✈️ मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार –  अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृध्दि से है जैसे – लंबाई, भार इत्यादि।

👨‍✈️लाल और जोशी के अनुसार- 

       मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के आंतरिक व बाहरी अंगों के आकार,भार, एवं क्षमता में होने वाले उस वृद्धि से है जो गर्भावस्था से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।

🌺🌺 Notes by POONAM SHARMA

🌨️वृद्धि और विकास (Growth and development)🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️🌨️01Mar21🌨️🌨️

↪️ हर व्यक्ति में शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सामाजिक इत्यादि परिप्रेक्ष्य में पल-पल बदलाव आता है। इन सभी बदलावों का मुख्य कारण प्रत्येक बच्चे की अलग-अलग शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, सामाजिक क्षमता एवं वातावरण का प्रभाव पड़ता है। कुल मिलाकर यदि हम कहे तो बालक के वैयक्तिक विभिन्नता का प्रभाव पड़ता है।

↪️ प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता है : इसका प्रमुख कारण यह है कि बच्चा सब कुछ पहले से सीख कर के तो नहीं जन्म लेता है वह जो भी सीखता है जन्म के पश्चात ही सीखता है और सीखने में उसे कुछ समय लगता है। अतः बालक प्रारंभिक अवस्था में अनजान/नासमझ/अनुभवहीन होता है। इस संबंध में प्लेटो ने कहा है कि “बालक का *मस्तिष्क* कोरा *स्लेट* होता है।” बालक के मस्तिष्क से संबंधित जॉन लॉक महोदय ने बताया कि “बालक का मस्तिष्क कोरा *कागज* होता है।” तथा रूसो ने बालक के मन के संबंध में कहा है कि “बालक का *मन* कोरा कागज होता है।”

↪️ जब चीजों को सीखने लगता है तब होगा धीरे-धीरे शरारती, गंभीर, विद्वान, ज्ञान आदि विशेषताएं आने लगती है।

↪️ आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक, मानसिक योग्यता और क्षमता की वृद्धि होती है। इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है।

↪️ बालक की योग्यता क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन किन कारणों से होता है इसका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक है।

↪️ बालक की आयु के साथ शारीरिक मानसिक सामाजिक संवेगात्मक नैतिक आदि पक्षों में विकास संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को दर्शाता है।

वृद्धि (अभिवृद्धि) + विकास = संपूर्ण विकास

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🏂 अभिवृद्धि (वृद्धि) Growth ⤵️

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↪️ अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है ‘आगे बढ़ना’। बालक की अभिवृद्धि के संबंध में उसके शरीर के *आंतरिक एवं बाह्य* अंग आकार, भार तथा कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि के साथ में देखा जाता है।

↪️ मानव शरीर में यह वृद्धि 18-20 वर्ष तक ही होता है। इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है। इस आयु का व्यक्ति वयस्क हो जाता है। इस वृद्धि को *देखा और परखा* जा सकता है तथा इसका *मापन (Measurement)* भी किया जा सकता है।

👤मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार, “अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है; जैसे लंबाई और भार में वृद्धि।”

👥लाल और जोशी के अनुसार, “मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि से है जो उसके गर्भ के समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।”🔚

🙏

📝 By – Awadhesh Kumar 🇮🇳🇮🇳🥀

🔥 वृद्धि और विकास🔥

✍🏻 हर व्यक्ति में शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, सामाजिक इत्यादि परिपेक्ष्य में पल- पल बदलाव आता है।

✍🏻 प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध (नासमझ) कहलाता है लेकिन बाद में शरारती, गंभीर, विद्वान, ज्ञानी आदि विशेषताएं आने लगती हैं।

✍🏻 बच्चे की आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक मानसिक योग्यता और क्षमता में भी वृद्धि होती है।

✍🏻 जब किसी  बच्चे  या व्यक्ति का  विकास और वृद्धि होती है तो उसके व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है।

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बालाजी योग्यता क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को करना आवश्यक है, जिससे बालक के संपूर्ण विकास किया जा सके।

✍🏻 बालक की आयु के साथ शारीरिक, सामाजिक, मानसिक ,संवेगात्मक नैतिक आदि पक्षों का विकास संपूर्ण विकास को दर्शाता है।

🎋 संपूर्ण विकास को दो भागों में बांटा गया है।

             🔸 वृद्धि (अभिवृद्धि)

             🔸 विकास

🔸 अभिवृद्धि (वृद्धि) 

🌈  वृद्धि का सामान्य अर्थ होता है      “आगे बढ़ना”।

बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में शरीर के आंतरिक व बाह्य अंग के आकार भार या कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है।

✍🏻 मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक की होती है इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है इस आयु का व्यक्ति पूर्ण रूप से वयस्क हो जाता है

 इस वृद्धि के देखा और परखा जा सकता है और इसका मापन भी किया जा सकता है।

🌻 “मनोवैज्ञानिक फ्रैंक”= अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है।

🌻 “लाल और जोशी”– मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली इस वृद्धि से है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।

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Notes by– Shashi chaudhary

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💥वृद्धि और विकास💥 

 🌲हर व्यक्ति में शारीरिक मानसिक भावात्मक सामाजिक इत्यादि परिप्रेक्ष्य मैं पल पल बदलाव होता है

🌲प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता है अबोध का मतलब ना समझ होता है लेकिन बाद में बच्चा गंभीर विद्वान ज्ञानी और शरारती सभी प्रकार का हो जाता है

🌲बच्चे की आयु में वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक मानसिक योग्यता में वृद्धि होती है

योग्यताओं में वृद्धि होने से व्यक्ति को व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन आता है

🌲बालक की योग्यताओं क्षमता वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन किन कारणों से होता है उसका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को करना आवश्यक है मतलब जो शिक्षक पढ़ा रहा है उसको करना आवश्यक है 

🌲बालक की आयु के साथ-साथ शारीरिक मानसिक सामाजिक संवेगात्मक नेता दीपक शाह का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाता है

🍥 अभिवृद्धि और विकास

संपूर्ण विकास के अंतर्गत अभिवृद्धि और विकास दोनों ही आते हैं इसमें दोनों का ही अलग-अलग अंतर होता है 🍥🌲अभिवृद्धि अभिवृद्धि का सामान अर्थ है आगे बढ़ना है मतलब इसमें शारीरिक अंगों में वृद्धि कहना है बालक की अभिवृद्धि के संबंध में उनके आंतरिक और बाह्य अंगों के शरीर के आकार भार कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है🌲 मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक ही होती है इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है रुक जाते हैं 🌲इस आयु का व्यक्ति संपूर्ण हो जाता है इस वृद्धि को देखा परखा और उसे मापा भी जा सकता है🖊 मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार यह कहते हैं ↔️कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि होने से है

🖊 इसी प्रकार और लाल जोशी और जोशी कहते हैं ↔️मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उनके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों में वृद्धि आकर भार कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि से है जो गर्म समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है

📝 notes by sapna yadav

🔆 वृद्धि और विकास(Groth And Development) ➖

🍀 हर व्यक्ति के शारीरिक,, मानसिक,, भावनात्मक,,  और सामाजिक इत्यादि परिपेक्ष्य में पल-पल बदलाव आता है चाहे वह आंतरिक हो या बाहरी हो, लेकिन परिवर्तन प्रत्येक क्षण  होते रहता है हालांकि कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते हैं सिर्फ महसूस किए जा सकते हैं |

चाहे परिवर्तन दिखाई दे या ना दे लेकिन परिवर्तन अवश्य होते हैं जो विकास की गति को दर्शाते हैं |

🍀 प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता  है अर्थात जिसको किसी चीज की समझ ना हो या हम कह सकते हैं ” अज्ञानी” |

 फिर बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता है तो वह शरारती, फिर गंभीर और फिर विद्वान तथा फिर ज्ञानी आदि इस प्रकार की विशेषताएं बच्चे में आने लगती हैं |

आयु  में वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक , मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है इसमें  व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है |

🍀 प्रत्येक बच्चे की अपनी अपनी विशेषताएं होती हैं चाहे वह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक जा आयु समूह के हो | 

वृद्धि और विकास एक दूसरे के पर्याय या पूरक हैं जो एक दूसरे से संबंधित है तथा एक दूसरे पर निर्भर करते हैं यदि व्यवहारिक दृष्टिकोण देखा जाए तो वृद्धि विकास का ही एक भाग जो कि  कुछ समय के पश्चात रुक जाती है और विकास निरंतर चलते रहता है अर्थात विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसका वृद्धि एक भाग है जो किशोरावस्था  तक पूरा हो जाता है जिसे परिपक्वता की अवस्था कहा जाता है |

🍀 बालक की योग्यता और क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक है बालक की आयु के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक ,और नैतिक आदि पक्षों का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को दर्शाता है |

 संपूर्ण विकास को दो भागों में बांटा गया है ➖

1) अभिवृद्धि (वृद्धि ) 

2) विकास 

🎯 अभिवृद्धि ( Groth) 

🍀 अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है “आगे बढ़ना” |

 बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में शरीर के आंतरिक और बाह्य अंगों के आकार भार या कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है | 

🍀 वृद्धि सीमित समय के लिए होती है जो कुछ समय के पश्चात रुक जाती है अर्थात वृद्धि संपूर्ण विकास की प्रक्रिया का एक चरण है जिसका संबंध परिपक्वता के साथ खत्म हो जाता है अर्थात वृद्धि निश्चित समय के लिए होती है जो कि गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था तक पूरी हो जाती है |

🍀 वृद्धि में होने वाले परिवर्तन को देखा जा सकता है अर्थात वृद्धि का संबंध मात्रात्मक विकास से होता है जिसे मापा जा सकता है |

🍀 मानव शरीर में यह वृद्धि 18 – 20 वर्ष तक ही होता है इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है इस आयु का व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है और इसका मापन भी किया जा सकता है |

🍀 अभिवृद्धि के संबंध में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने अपने कथन निम्नानुसार स्पष्ट किए हैं जो कि निम्न है ➖

🎯 मनोवैज्ञानिक फ्रेंक के अनुसार ➖

वृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है जैसे “लंबाई और धार” |

🎯  मनोवैज्ञानिक लाल और जोशी के अनुसार ➖

मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक  अंगों के आकार एवं भात के आधार पर उनकी कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि से है जो उसके गर्भ के समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती रहती है | 

🎯  सोरेन्सन  के अनुसार ➖

 अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग शरीर और उसके अंगों के भार और आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है जब भी हम वृद्धि की बात करते हैं उसमें शरीर के पूरे आकार में वृद्धि होती है |

नोट्स बाय➖ रश्मि सावले

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💥🔅Growth & Development🔅💥

            💫(वृद्धि और विकास)💫

हर व्यक्ति में शारीरिक , मानसिक , भावनात्मक , सामाजिक इत्यादि परिपेक्ष्य में पल-पल बदलाव आता है और उनके वृद्धि और विकास के साथ-साथ बुनियादी सिद्धांतो को समझना चाहिए जिससे बच्चा के सामंजस्य पूर्ण विकास के लिए प्रभावी मार्गदर्शन प्रदान कर सके बच्चे अपने आसपास के वातावरण से काफी प्रभावित होता है और निरंतर बदलाव होता रहता है उसी प्रकार बच्चो में उनका भविष्य और अनुभव उनके वर्तमान और साथ में हो रहे परिवर्तन पर निर्भर करता है | जैसै-जैसे बच्चे बडे़ होते है उनमें भावनात्मक , सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन साथ-साथ चलता है |

प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध (ना समझ) कहलाता है |

 बच्चे में फिर शरारती , गंभीर , विद्वान , ज्ञानी आदि विशेषताएं आने लगती है |

बच्चो की आयु में वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक ,मानसिक , योग्यता , और क्षमता में वृद्धि होती है |

   इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है और बालक की योग्यता , क्षमता , में वृद्धि व्यक्तित्व एंव व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणो से होता है  |इनका  अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक है |

    बालक की आयु के साथ शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , संवेगात्मक नैतिक आदि पक्षों का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाता है |

व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास वृद्धि (अभिवृद्धि) और विकास में समाहित है |

वृद्धि (अभिवृद्धि) +विकास = सम्पूर्ण विकास

अभिवृद्धि (वृद्धि) Growth ➖ 

अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है ” आगे बढ़ना “

बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में उसके शरीर के आंतरिक एंव बाह्य अंगो के आकार , भार या कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है |

   मानव शरीर में यह वृद्धि 18-20 वर्ष तक ही होता है इसके बाद अंगो में वृद्धि नही होती है इस आयु का व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है | इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है |

इसका मापन भी किया जा सकता है |

 कुछ मनोवैज्ञानिक के अनुसार कथन दिए गए है जो निम्न है :- 

◼मनोवैज्ञानिक फ्रैंक के अनुसार – ” अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओ में होने वाली वृद्धि से ही जैसे , लंबाई और भार में वृद्धि ” |

◼लाल और जोशी के अनुसार ➖ ” मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगो के आकार , भार , एंव कार्यक्षमता में होने वाली उस वृद्धि से है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है ” | 

✍️✍️ Notes by➖Ranjana Sen

हर व्यक्ति में शारीरिक ,मानसिक, भावनात्मक ,सामाजिक इत्यादि परिप्रेक्ष्य में पल पल बदलाव आता है।

प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अबोध कहलाता है।

फिर शरारती, गंभीर ,विद्वान, ज्ञानी आदि विशेषताएं आने लगते हैं।

आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक ,मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती हैं इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है।

बालक की योग्यता ,क्षमता में वृद्धि ,व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को करना आवश्यक है क्योंकि अगर व्यक्ति बालक के इन कारणों को नहीं जानेगा तो वह बालक के व्यवहार को नहीं समझ पाएगा। और वह बालकों को सिखाने में असफल हो जाएगा।

बालक की आयु के साथ शारीरिक, मानसिक, सामाजिक संवेगात्मक ,नैतिक आदि पक्षों का विकास संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को दर्शाता है।

संपूर्ण विकास = वृद्धि या अभिवृद्धि+विकास

अभिवृद्धि या वृद्धि

अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है 

आगे बढ़ना

बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में उसके शरीर के आंतरिक एवं बाह्य अंग के आकार ,भार या कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है।

मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक ही होती है इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है इस आयु का व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है।

इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है

इसका मापन भी किया जा सकता है

फ्रैंक-अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है जैसे लंबाई और भार में वृद्धि।

लाल और जोशी- मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार ,भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली उस वृद्धि से है जो उसके गर्भ समय से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।

Notes by Ravi kushwah

वृद्धि और विकास

Growth & Development

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1 March 2021

👉  प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक , मानसिक , भावनात्मक ,  सामाजिक इत्यादि परिपेक्ष में पल-पल बदलाव आता है।

👉 प्रारंभिक अवस्था में बच्चा अवबोध कहलाता है ।

अतः फिर शरारती,,  फिर गंभीर , फिर विद्वान और फिर ज्ञानी आदि विशेषताएं बच्चों में आने लगती हैं।

👉 आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक , मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है , इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है।

👉 बालक की योग्यता , क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है, इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता को करना आवश्यक होता है।

🌺  संपूर्ण विकास को दो भागों में बांटा गया है  :-

1. वृद्धि (अभिवृद्धि)

2. विकास

 *वृद्धि (अभिवृद्धि) , विकास  =  सम्पूर्ण विकास* 

 🌸🌸 वृद्धि अभिवृद्धि  Growth 🌸🌸

👉 वृद्धि का सामान्य अर्थ होता है : –   आगे बढ़ना

👉 बालक की अभिवृद्धि के संदर्भ में उनके शरीर के आंतरिक एवं बाह्य अंग के आकार , भार,  कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि  के रूप में देखा जाता है ।

👉 मानव शरीर में यह वृद्धि 18 – 20 वर्ष तक होती है।

और लड़कियों में 16 – 18 वर्ष तक होती है।

             क्योंकि वृद्धि गर्भकाल से एक निश्चित समय सीमा अर्थात् किशोरावस्था तक होती है।

अतः लड़कियों की वृद्धि और विकास लड़कों की अपेक्षा दो वर्ष पूर्व होता है तो लड़कियों की वृद्धि लगभग 16 -18 वर्ष तक पूरी हो जाती है वहीं लड़कों की वृद्धि 18 – 20 वर्ष तक पूरी होती है।

👉 इसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती है , और इस आयु के बाद व्यक्ति पूर्ण वयस्कता की ओर रुख करता है।

👉 अतः  वृद्धि को देखा या परखा जा सकता है।

👉 वृद्धि का मापन भी किया जा सकता है ।

👉 अर्थात वृद्धि मात्रात्मक होती है।

वृद्धि के संदर्भ में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने अपने कथन निम्न प्रकार दिए हैं  :-

🌺  ” मनोवैज्ञानिक फ्रैंक ”  के अनुसार :-

अभिवृद्धि से तात्पर्य कोशिकाओं में होने वाली वृद्धि से है जैसे :- लंबाई , भार वृद्धि।

🌺  ” लाल और जोशी ”  के अनुसार  :-

मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार , भार एवं कार्यक्षमता में होने वाली उस वृद्धि से है जो उसके गर्भकाल से परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।

✍️Notes by –  जूही श्रीवास्तव✍️

🌠 वृद्धि और विकास 🌠

🌈हर व्यक्ति में शारीरिक मानसिक भावात्मक सामाजिक इत्यादि परिपेक्ष में पल-पल बदलाव आता है।

🌈प्रारंभिक अवस्था में बच्चा और अवबोध रहता है फिर शरारती गंभीर विद्वान ज्ञानी हो जाता है आदी  विशेषताएं आने लगती हैं।

🌠बच्चे की आयु में वृद्धि के साथ शारीरिक मानसिक योग्यता और क्षमता में वृद्धि होती है।

🌠बालाजी योग्यता क्षमता में वृद्धि व्यक्तित्व एवं व्यवहार में परिवर्तन जिन कारणों से होता है इनका अध्ययन शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने और कार्यों को करना आवश्यक है जिससे बालक के संपूर्ण विकास किया जा सके।

🌠बालक की आयु के साथ शारीरिक सामाजिक मानसिक , संवेगात्मक नैतिक आदि पक्षों का विकास  संपूर्ण विकास को दर्शाता है।

संपूर्ण विकास को दो भागों में बांटा गया है।

                ⭐वृद्धि/ अभिवृद्धि

               ⭐  विकास

✨अभिवृद्धि/ वृद्धि

🌠वृद्धि का सामान्य अर्थ होता है आगे बढ़ना बालक की वृधि से के संदर्भ में शारीरिक के आंतरिक एवं बाय आकार भार या कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है।

✨मानव शरीर में यह वृद्धि 18 से 20 वर्ष तक की होती है इसके बाद रंगों में वृद्धि नहीं होती इस आयु का व्यक्ति संपूर्ण रूप में व्यस्क हो जाता है।

🌠इस वृद्धि को देखा और परखा जा सकता है और मापा भी जा सकता है।

✍️बालाजी और जोशी के अनुसार-

                                          मानव वृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाहरी और आंतरिक अंगों के आकार एवं कार्य क्षमता होने वाला इस परिवर्तन  से है जो उसके गर्भावस्था से परिपक्वता  अवस्था प्राप्त करने तक चलती है।

🙏🙏✍️ Notes by Laki 🙏✍️✍️

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