▶समाजीकरण का अर्थ (Meaning of Socialization)

सामाजीकरण का अर्थ उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से अंतः क्रिया करता हुआ सामाजिक आदतों, विश्वासों, रीति रविाजों तथा परंपराओं एवं अभिवृत्तियों को सीखता है। इस क्रिया के द्वारा व्यक्ति जन कल्याण की भावना से प्रेरित होते हुए अपने आपको अपने परिवार, पड़ोस तथा अन्य सामाजिक वर्गों के अनुकूल बनाने का प्रयास करता है जिससे वह समाज का एक श्रेष्ठ, उपयोगी तथा उत्तरदायी सदस्य बन जाए तथा उक्त सभी सामाजिक संस्थाएं तथा वर्ग उसकी प्रशंसा करते रहें

▶समाजीकरण की परिभाषा (Definition of Socialization)

प्रायः मनुष्य एक साथ अनेक समाजों के सदस्य होते हैं और उन्हें इनमें से किसी भी समाज में समायोजन करने के लिए उसकी भाषा और व्यव्हार प्रतिमानों को सीखना होता है. इस पूरी प्रक्रिया को समाजशास्त्री सामाजिकरण कहते हैं. पाश्चात्य समाजशास्त्री ड्रेवर महोदय ने इसे निम्लिखितत रूप में परिभाषित किया है-

“समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने सामाजिक पर्यावरण के साथ अनुकूलन करता है और इस प्रकार वह उस समाज का मान्य, सहयोगी और कुशल सदस्य बनता है.”

जॉनसन के मतानुसार, “समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है ।

रॉस के अनुसार, “सामाजिकरण सहयोग करने वाले व्यक्तियों में हम की भावना का विकास करता है और उनमें एक साथ कार्य करने की क्षमता और इच्छा का विकास करता है.

हमारी दृष्टि से समाजीकरण की प्रक्रिया को ने लिखित रूप में परिभाषित करना चाहिए- “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति और व्यक्ति एवं समाज के बीच अंतः क्रिया होती है और व्यक्ति समाज की भाषा, रहन-सहन, खान-पान एवं आचरण की विधियां और रीति-रिवाज सीखता है और इस प्रकार उस समाज में समायोजन करता है.”

▶समाजीकरण की प्रक्रिया (Process of Socialization)

बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया जन्म के कुछ दिन बाद से ही प्रारंभ हो जाती हैं बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार से प्रारंभ होती हैं परिवार के सदस्य के रूप में बालक परिवार के अन्य सदस्यों से अन्तः-क्रियात्मक संबंध स्थापित करता है और उनके व्यवहारों का अनुकरण करता है। इस प्रकार अनुकरण करते हुए जाने-अनजाने बालक परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिका भी अदा करने लगता है। अनुकरण के आधार पर ही वह माता-पिता, भाई-बहन आदि की भूमिकाओं को सीखता है। उसके ये व्यवहार धीरे-धीरे स्थिर हो जाते हैं। धीरे-धीरे बालक अपने तथा पिता और अपने तथा माता के मध्य के अंतर को समझने लगता है कि वह स्वयं क्या है? इस प्रकार स्वयं (Self) का विकास होता है जो समाजीकरण का एक आवश्यक तत्व है।

▶समाजीकरण के तत्व (Factors of Socialization)

समाजशास्त्रियों ने समाजीकरण की प्रक्रिया को बड़ी बारीकी से अध्ययन किया है. उनके अनुसार समाजीकरण की प्रक्रिया के चार तत्व होते हैं-

(1). मनुष्य की जैविकीय विशेषता- मनुष्य की अपनी जैविकीय विशेषता है; वह कुछ मूल प्रवृत्तियों, संवेगों, सामान्य जन्मजात प्रवृत्तियों, इंद्रियों और मस्तिष्क को लेकर जन्म लेता है. इन्हीं के आधार पर उसका सामाजिकरण होता है. इनके अभाव में हम उसका सामाजिकरण नहीं कर सकते.

(2). सामाजिक अंतः क्रियाएं- मनुष्य के समाजीकरण के लिए दूसरा आवश्यक तत्व सामाजिक अंतर क्रियाएं हैं. जब तक कोई मनुष्य दूसरे मनुष्य के संपर्क में नहीं आता और उनके बीच अन्तः क्रियाएं नहीं होती तब तक वह ना तो समाज की भाषा सीख सकता है और ना ही आचरण की विधियां. इनको सीख कर ही वह जैविक पुरानी से सामाजिक प्राणी बनता है.

(3). सामाजिक अंतः क्रियाओं के निश्चित परिणाम- सामाजिकरण के लिए यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति-व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समाज के बीच की अन्तः क्रियाओं के निश्चित परिणाम हो; निरर्थक अन्तः क्रियाओं के समाज सम्मत आचरण नहीं सीखा जा सकता.

(4). परिणामों के प्रति स्वीकृति-अस्वीकृति- जहां क्रिया होगी वहां परिणाम अवश्य होगा, चोरों के बीच रहकर बच्चा चोरी करना सीख सकता है परंतु उसे जब यह जानकारी होगी कि यह कार्य समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है और ऐसा करके वह समाज में समायोजन नहीं कर सकता तो वह उस कार्य को स्वीकार नहीं करेगा. समाज द्वारा स्वीकृत आचरण को सीखकर तदअनुकूल आचरण करना ही सामाजिकरण होता है.

▶समाजीकरण को प्रभावित करने वाले कारक (Factor affecting of Socialization)

1. पालन-पोषण (Upbringing)

बालक के समाजीकरण में पालन पोषण का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रारंभिक जीवन बालोंको को जिस प्रकार का वातावरण मिलता है, जिस प्रकार का माहौल मिलता है उसी के अनुसार बालक में भावनाएं तथा अनुभूतियां विकसित हो जाती है। एक बालक समाज विरोधी आचरण उसी समय करता है, जब वह स्वयं को समाज के साथ व्यवस्थापित नहीं कर पाता।

2. सहानुभूति (Sympathy)

सहानुभूति का भी बालक के समाजीकरण में गहरा प्रभाव पड़ता है। इसका कारण यह है कि सहानुभूति के द्वारा बालक में अपनत्व की भावना विकसित होती है। जिसके परिणाम स्वरूप वह एक दूसरे में भेदभाव करना सीख जाता है। वह उस व्यक्ति को अधिक प्यार करने लगता है जिसका व्यवहार उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण होता है।

3. सामाजिक शिक्षण (Social Learning)

सामाजिक शिक्षण का आरंभ परिवार से होता है, जहां पर बालक माता पिता, भाई-बहन तथा अन्य सदस्यों से खान-पान तथा रहन-सहन आदि से शिक्षा ग्रहण करता है।

4. पुरस्कार एवं दंड (Rewards and Punishments)

जब बालक समाज के आदर्शों तथा मान्यताओं के अनुसार व्यवहार करता है, तो लोग उसकी प्रशंसा करते हैं तथा लोग में उस कार्य के लिए पुरस्कार की देते हैं। वहीं दूसरी तरफ जब बालक कोई असामाजिक व्यवहार करता है, तो दंड दिया जाता है जिससे भयभीत होकर वह दोबारा ऐसा व्यवहार नहीं करता है।

5. वंशानुक्रम (Inheritance)

बालक ने वंशानुक्रम से प्राप्त कुछ अनुवांशिक गुण होते हैं। जैसे- मूलभाव, संवेग, सहज क्रिया तथा क्षमताए इत्यादि। इसके अतिरिक्त उनके अनुकरण एवं सहानुभूति जैसे गुणों में भी वंशानुक्रम की प्रमुख भूमिका होती है। यह सभी तत्व बालक के समाजीकरण के लिए उत्तरदाई होते हैं।

6. परिवार (Family)

बालक के समाजीकरण उसके परिवार से ही आरंभ होता है। बालक अपने परिवार के लिए लोगों के संपर्क में रहता है, तो उनसे सीखता है ।परिवार के लोगों के रहन-सहन, बात- विचार, इत्यादि का अनुकरण करने लगता है। इस प्रकार से परिवार बालक की समाजीकरण में अहम भूमिका निभाता है।

▶बालक के समाजीकरण करने वाले कारक (Socializing Factors of the Child)

बालक जन्म के समय कोरा पशु होता है। जैसे-जैसे वह समाज के अन्य व्यक्तियों तथा सामाजिक संस्थाओं के संपर्क में आकर विभिन्न प्रकार की सामाजिक क्रियाओं में भाग लेता रहता है वैसे-वैसे वह अपनी पार्श्विक प्रवृत्तियों को नियंत्रित करते हुए सामाजिक आदर्शों तथा मूल्यों को सीखता रहता है। बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। बालक के समाजीकरण में सहायक मुख्य कारक अथवा तत्व निम्नांकित हैं-

  • परिवार
  • आयु समूह
  • पड़ोस
  • नातेदारी समूह
  • स्कूल
  • खेलकूद
  • जाति
  • समाज
  • भाषा समूह
  • राजनैतिक संस्थाएं और
  • धार्मिक संस्थाएं।

▶बालक के समाजीकरण में बाधक तत्व (Elements hindering the socialization of the child)

मेरे विचारको के अनुसार बालकों के समाजीकरण में बाधा पहुंचाने वाले तत्व इस प्रकार हैं-

  • सांस्कृतिक परिस्थितियां: जैसे जाति, धर्म, वर्ग आदि से संबद्ध पूर्व धारणाएं आदि।
  • बाल्यकालीन परिस्थितियां: जैसे माता-पिता का प्यार न मिलना, माता-पिता में सदैव कलह, विधवा मां, पक्षपात, एकाकीपन तथा अनुचित दंड आदि।
  • तात्कालिक परिस्थितियां: जैसे निराशा, अपमान, अभ्यास अनियमितता, कठोरता, परिहास और भाई-बहन, मित्र, पड़ोसी आदि की ईर्ष्या।
  • अन्य परिस्थितियां: जैसे शारीरिक हीनता, निर्धनता, असफलता, शिक्षा की कमी, आत्म विश्वास का अभाव तथा आत्म-निर्भरता की कमी आदि।

▶समाजीकरण की प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका (Role of teacher in the process of socialization)

बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार के बाद स्कूल और स्कूल में विशेष रूप से शिक्षक आता है। प्रत्येक समाज के कुछ विश्वास, दृष्टिकोण, मान्यताएं, कुशलताएं और परंपराएं होती हैं। जिनको ’संस्कृति’ के नाम से पुकारा जाता है। यह संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित की जाती है और समाज के लोगों के आचरण को प्रभावित करती है। शिक्षक का सर्वश्रेष्ठ कार्य है इस संस्कृति को बालक को प्रदान करना। यदि वह यह कार्य नहीं करता है तो बालक का समाजीकरण नहीं कर सकता है। शिक्षक, माता-पिता के साथ बालक के चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करने में अति महत्वपूर्ण कार्य करता है।

कक्षा में, खेल के मैदान में, साहित्यक और सांस्कृतिक क्रियाओं में शिक्षक सामाजिक व्यवहार के आदर्श प्रस्तुत करता है। बालक अपनी अनुकरण की मूल प्रवृति के कारण शिक्षक के ढंगों, कार्यों, आदतों और नीतियों का अनुकरण करता है। अतः शिक्षक को सदैव सतर्क रहना चाहिए, उसे कोई ऐसा अनुचित कार्य या व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिसका बालक के ऊपर गलत प्रभाव पड़े। अतः बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करने के लिए शिक्षक को मुख्यतः निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(1). अभिभावक शिक्षक सहयोगः- समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करने के लिए शिक्षक का सर्वप्रथम कार्य यह है कि वह बालक के माता-पिता से संपर्क स्थापित करके उसकी रूचियों तथा मनोवृत्तियों के विषय में ज्ञान प्राप्त करे एवं उन्हीं के अनुसार उसे विकसति होने के अवसर प्रदान करे।

(2). स्वस्थ प्रतियोगिता की भावनाः- बालक के समाजीकरण में प्रतियोगिता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। पर ध्यान देने की बात है कि बालक के समाजीकरण के लिए स्वस्थ प्रतियोगिता का होना ही अच्छा है। अतः शिक्षक को बालक में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना विकसित करनी चाहिए।

(3). सामाजिक आदर्शः- शिक्षक को चाहिए कि वह कक्षा तथा खेल के मैदानों एवं सांस्कृतिक और साहित्यिक क्रियाओं में बालक के सामने सामाजिक आदर्शों को प्रस्तुत करें। इन आदर्शों का अनुकरण करके बालक का धीरे-धीरे समाजीकरण हो जाएगा।

(4). स्कूल की परंपराएं:- स्कूल की परंपराओं का बालक के समाजीकरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः शिक्षक को चाहिए कि वह बालक का स्कूल की परंपराओें में विश्वास उत्पन्न करे तथा उसे इन्हीं के अनुसार कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करे।

(5). मूहिक कार्य को प्रोत्साहनः- शिक्षक को चाहिए कि वह स्कूल में विभिन्न सामाजिक योजनाओं के द्वारा बालकों को सामूहिक क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने के अवसर प्रदान करे। इन क्रियाओं में भाग लेने से उसका समाजीकरण स्वतः ही हो जाएगा।

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि शिक्षक बालक के समाजीकरण को प्रभावित करता है। शिक्षक के स्नेह, पक्षपात, बुरे व्यवहार, दण्ड आदि का बालकों पर कुछ न कुछ प्रभाव पड़ता है और उसका सामाजिक विकास उत्तम या विकृत हो जाता है। यदि शिक्षक, मित्रता और सहयोग में विश्वास करता है तो बच्चों में भी इन गुणों का विकास होता है। यदि शिक्षक छोटी-छोटी बातों पर बच्चों को दंड देता है, तो उनके समाजीकरण में संकीर्णता आ जाती है। यदि शिक्षक अपने छात्रों के प्रति सहानुभूति रखता है, तो छात्रों का समाजीकरण सामान्य रूप से होता है।

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