Date-14/05/2021
batch-Full batch course on CDP
Topic-चिंतन प्रक्रिया के सोपान

चिंतन की प्रक्रिया में निम्नलिखित चार प्रकार के सोपान हैं÷
१-किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होना(अर्थात किसी लक्ष्य की तरह कार्य करना) जब भी कोई समस्या उत्पन्न होती है तो समस्या समाधान के लिए आगे बढ़ते हैं;
और इस समस्या समाधान में चिंतन का लक्ष्य समस्या को दूर करना होता है।

२-लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रयास करना, चिंतन में व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है, का प्रयास होता है कि शीघ्र ही लक्ष्य की प्राप्ति हो जाए वा समस्या का समाधान हो जाए।

३-पूर्व अनुभवों का स्मरण करना, चिंतन में कपूर अनुभव पुनः स्मरण करता है; जिससे उनके आधार पर वर्तमान समस्या का समाधान करने में समर्थ हो सके

४-और अनुभव को वर्तमान समस्या में संयोजित करना।
अर्थात जो व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव के आधार पर वर्तमान समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करता है तब उसके सामने समस्या के अनेक संभावित समाधान उपस्थित होने लगते हैं।

?बच्चे कैसे सीखते हैं और बच्चे कैसे सोचते हैं?

यदि एक शिक्षक या बाजार लेगी उसके विद्यालय के विद्यार्थी कैसा होता है और वह अपनी सोच या चिंतन के अनुसार कैसे सीखे तो शिक्षक उस विद्यार्थी के मानसिक बौद्धिक विकास को प्रबुद्ध करने में सरलता होगी।

छात्रों के स्मृति करण के स्थान पर संप्रत्यय निर्माण, सामान्यीकरण, समस्या समाधान कौशल, इत्यादि उपलब्ध कराना ताकि उनके विस्तृत बौद्धिक विकास के लिए उचित हो।

छात्र ज्ञान का सुरक्षित भंडारण कर सकें, आवश्यकतानुसार उसका स्मरण कर सकें, एवं परिस्थिति के अनुसार उसका उपयोग कर सकें।

यदि छात्र गीत ज्ञान का प्रयोग नहीं पर स्थिति में कर सकते हैं तो यह उत्तम अधिगम है।

मनोवैज्ञानिकों ने समय-समय पर अलग-अलग प्रयोग वा अलग-अलग अनुभवो से यह जानने का प्रयास किया है कि छात्र कैसे सीखता है,
उसके लिए कुछ सिद्धांत विकसित किए हैं जो निम्नलिखित हैं÷
१- ज्ञान का संरचनावाद या निर्मित वाद

२-अनुभाविक अधिगम

३-संकल्पना मानचित्र

४-समस्या समाधान

५-खोज

१-निर्मित वाद या ज्ञान का संरचनावाद
निर्मित वाद की उत्पत्ति संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक क्षेत्र से हुई है;
निर्मित वाद प्रतिमान-जीन पियाजे वाइगोत्सकी वा जीरोम ब्रूनर
हावर्ड गार्डनर अन्य लोगों के कार्यों पर आधारित है।

जान डीवी÷जॉन डीवी के अनुभव और चिंतन का महत्व और शिक्षा की आवश्यकता से संबंधित विचारों का भी निर्मितवाद पर प्रभाव है।

निर्मित वाद में व्यवस्था का रूपांतरण इसलिए होता है कि अपरिवर्तनीय प्रभाव तथ्य को सुधार सकें।

निर्मित वाद में प्रत्येक छात्र की सक्रियता से पूर्व ज्ञान और नये ज्ञान की अंत: क्रिया से ज्ञान की संरचना होती है।

निर्मित वाद का अर्थ
ज्ञान सिर्फ संज्ञानी प्राणी में होता है उसके बाहर ज्ञान का अस्तित्व नहीं रहता है।

ज्ञान वास्तविकता या यथार्थ की संरचना है।

ज्ञान, सीखने वाले छात्र के द्वारा मन ही मन संरचित किया जाता है किन्तु यह दिखाई नहीं देता है।

सीखने वाला छात्र जब किसी ने स्थिति के संपर्क में आता है तो पूर्व अनुभव के आधार पर नए ज्ञान की संरचना एकीकृत हो जाती है।

निर्मित वाद, पूर्व अधिगम एवं नए अधिगम प्रक्रिया की अंत: क्रिया के माध्यम से प्रत्येक छात्र के द्वारा ज्ञान की संरचना को बता देता है।

handwritten by-Shikhar Pandey🙏

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