🔆 चिंतन के प्रकार (types of thinking)

❇️ तार्किक चिंतन (logical thinking)➖

🔸यह सर्वोच्च प्रकार का चिंतन है क्योंकि इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति अलग-अलग विचारों का प्रयोग करके अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर कार्य करता है।
🔸तर्क लगाने के लिए व्यक्ति अलग अलग प्रकार के चिंतन के तथ्य पर सोचता है किसी एक प्रकार के तथ्य पर नहीं।

🔸अर्थात इस चिंतन में कोई व्यक्ति विभिन्न विचारों का प्रयोग किसी विशेष से लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है।

🔸मनुष्य इस प्रकार के चिंतन में एक-दूसरे वस्तु या घटना के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है।

🔸व्यक्ति किसी वस्तु या घटना या विषय के पक्ष और विपक्ष में तर्क करते हुए एक परिणाम तक पहुंचता है।
🔹जैसे यदि यह मान लिया जाए कि कोई छात्र एक कमरे में टेबल लैंप की रोशनी में पड़ रहा है और अचानक रोशनी बुझ जाती है अब छात्र के सामने समस्या खड़ी हो जाती है कि रोशनी कहां से आए वह पढ़ाई को जारी रख पाए छात्र अपने मन में कई तरह के तर्क करते हुए चिंतन कर सकता है यह सोच सकता है कि बिजली मीटर के बगल का फ्यूज तार जल गया हो या ऐसा भी हो सकता है कि बगल के कमरे का बल्ब जल रहा है तो लैंप फ्यूज हो गया हो।

🔹अत: छात्र बल्ब की जांच करेगा और यह ठीक पाता है कि बल्ब भी ठीक है तो स्पष्टत: वहनिष्कर्ष में पहुंचेगा कि लैंप का होल्डर जिसमें बल्ब लगा है वहीं कुछ खराबी होगी।

🔸इस उदाहरण से तर्कना की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि छात्र किस प्रकार से एक क्रमबद्ध रूप में तर्क करते हुए एक खास परिणाम पर पहुंचता है।

❇️निर्देशित चिंतन (directive thinking)➖

🔸इससे अभिप्राय व्यक्ति की किसी विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किए जाने वाला चिंतन है।

🔸अर्थात इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति का व्यवहार उसकी जीवन की ज्ञात लक्ष्य स्पष्ट लक्ष्य द्वारा निर्देशित होता है।

🔸इस प्रकार के चिंतन दिवास्वपन ,स्वतंत्र ,साहचर्य और कल्पना की उड़ान जैसी अनिर्देशित घटना से परिचालित होते हैं।

❇️परावर्तित चिंतन (reflective thinking)➖

🔸मनुष्य जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनमें किए जाने वाले व्यवहार प्रति मानव को सार्थक बनाने के लिए चिंतन करता है।

🔸इस चिंतन के द्वारा जटिल समस्या का समाधान आसानी से होता है क्योंकि पूर्व अनुभव का प्रयोग करते हुए नए ढंग से आने वाली समस्या का समाधान किया जाता है।

✨जिम्बार्डो एवम रुक के अनुसार चिंतन दो प्रकार के होते हैं।
📍1. स्वली चिंतन [autistic thinking]
📍2 यथार्थवादी चिंतन [realistic thinking]

⚜️1 स्वली चिंतन [autistic thinking]➖

🔸यह चिंतन कल्पनात्मक विचार और दिवास्वपन पर आधारित होता है।

🔸स्वली चिंतन वैसे चिंतन को कहा जाता है। जिसमे व्यक्ति अपनी कल्पनाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है।जैसे यदि कोई छात्र यह कल्पना करता है कि पढाई खत्म हो जाने के बाद वह बड़ा अफसर बनेगा । उसके पास एक सुंदर बंगला होगा । चमचमाती कार होगी । तो यह स्वली चिंतन का उदाहरण है। इसके अंदर किसी समस्याकासमाधान नहीं होता है।

🔸स्वली चिंतन को हम अपने जीवन के अंदर सबसे ज्यादा बार प्रयोग करते हैं। हम अपने जीवन के अंदर जितनी भी कल्पना करते हैं। वह स्वली चिंतन कहलाता है। मतलब की यह एक कल्पना का नाम है। जैसे आप कल्पना करते हैं कि आप कल अपनी पत्नी को घूमाने के लिए लेकर जाएंगे और वहां पर उनके साथ मजे करेंगे । इसके अलावा आप सोचते हैं कि एक दिन आपके पास बहुत सारा धन होगा और आपके पास कई गाड़ियां होगी यह सब स्वली चिंतना के उदाहरण हैं। मतलब कल्पना जिसका तर्क से नहीं है। वह स्वली चिंतन का ही उदाहरण है।

⚜️यर्थाथवादी चिंतन/वास्तविक चिंतन [realistic thinking]➖

🔸इस प्रकार के चिंतन का संबंध वास्तविक परिस्थितियां घटना से होता है जिसकी सहायता से व्यक्ति किसी समस्या का समाधान करता है।

🔸यह वैसा चिंतन है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है। इसके द्वारा किसी समस्या का समाधान किया जाता है। जैसे कोई व्यक्तिकार के अंदर बैठ कर सफर कर रहा है। अचानक उसकी कार रूक जाती है तो उसके दिमाग के अंदर पहला प्रश्न आता है कार कैसे रूकी । फिर वह इस समस्याकेसमाधान के लिए चिंतन करता है। यह चिंतन तीन प्रकार का होता है। यर्थाथवादी चिंतन एक ऐसा चिंतन है जब हमे हमारे दिमाग को किसी एक दिशा के अंदर सोचने के लिए विवश करना पड़ता है। किसी भी तरीके की समस्या यदि हमारी जिंदगी के अंदर आ जाती है।

🔸और उसका हम समाधान करना चाहते हैं तो हमे यर्थाथवादी चिंतन करना होता है। जैसे पीछले दिनों मेरा कम्पयूटर खराब हो गया था तो उसके बाद मैं यह सोचने लगा कि इसको कैसे ठीक किया जा सकता है। और अंत मे वह ठीक नहीं हुआ तो उसके बाद मैं उसे रिपेयर के पास लेकर गया । मतलब आपके जीवन के अंदर जब जब कोई भी समस्या आएगी तब तब यही चिंतना होगा आप भले ही करना ना चाहो लेकिन उसके बाद हो जाएगा ।

▪️यथार्थवादी चिंतन तीन प्रकार के होते हैं।

📍1. अभिसारी चिंतन [convergent thinking]

📍2. सर्जनात्मक चिंतन [creative thinking]

📍3. आलोचनात्मक चिंतन [evaluating thinking]

🌺1. अभिसारी चिंतन [convergent thinking]

किसी दी गई परिस्थिति यह विषय वस्तु में तथ्यों के आधार पर समस्या का समाधान निकालते हैं।

इसी निगमनात्मक चिंतन भी बोला जाता है।

इसमें समस्या का निश्चित समाधान निकल जाता है।

अभिसारी चिंतन को इस उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
🔹उदाहरण — जब शिक्षक बालक से प्रश्न करता है कि बताओ उत्तर प्रदेश की राजधानी क्या है??
तो बालक उत्तर देता है कि लखनऊ।
इस प्रश्न का उत्तर एक ही बिंदु पर केंद्रित है, की उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ही है, कोई और नहीं ।
अतः यहाँ पर बालक अभिसारी चिंतन का प्रयोग कर के प्रश्न का उत्तर देता है।

🌺2.सर्जनात्मक चिंतन/अपसारी चिंतन/आगमनात्मक चिंतन [creative thinking]

🔸 इस चिंतन के अंदर व्यक्ति को कुछ तथ्य तो दिए होते हैं उनमे अपनी और से एक तथ्य जोड़कर निष्कर्स निकाला जाता है। जैसे किसी व्यक्ति को कलम का असाधारण प्रयोग करने को कहा जाए । तब व्यक्ति को इसमे अपनी ओर से कुछ जोड़ना होता है।

🔸सर्जनात्मक चिंतन का मतलब आप जानते ही हैं। कुछ नया करना अब कुछ नया करने के अंदर कई चीजे आती हैं। जैसे जेम्स वॉट को भाप इंजन के बारे मे बहुत कुछ पता चल गया था और उसके बाद उसने इंजन के अंदर सुधार करते हुए । एक चलने वाला इंजन तैयार कर दिया ।

🔸अपसारी चिंतन को इस उदाहरण से भी आसानी से समझा जा सकता है।
🔹उदाहरण – जब कक्षा में एक शिक्षक किसी विद्यार्थी से प्रश्न करता है कि यदि तुम्हारे पंख लगे होते तो तुम क्या करते ??
इस प्रश्न का कोई सटीक उत्तर नहीं है अतः ऐसी स्थिति में बालक इसके बारे में कल्पना करेगा और फिर अपने विचार कुछ इस तरह से प्रस्तुत करेगा—

  1. मुझे घूमना बहुत पसंद है अगर मेरे पंख होते तो मैं पूरी दुनियां को सैर करता।
  2. मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त था अब वो विदेश पढ़ने चला गया, अगर मेरे पंख होते तो जब भी मेरा मन होता मैं उससे मिलने चला जाता ।
  3. अगर मेरे पंख होते तो मैं आसमान में पक्षियों के साथ उड़ने की रेस लगाता।
    अतः यहाँ पर बालक ने अपसारी चिंतन का प्रयोग कर के प्रश्न का उत्तर दिया है।

🌺3.आलोचनात्मक चिंतन [evaluating thinking]

🔸किसी घटना को आलोचना की दृष्टि से देखना।
अर्थात घटना की वास्तविकता की जांच पड़ताल करके ही उसके गलत सही को स्वीकार करते हैं ।

🔸किसी वस्तु या तथ्य की सचाई को स्वीकार करने से पहले उसके गुण व दोष को पूरी तरह से परख लेना ही आलोचनात्मक चिंतन का उदाहरण है। हमारे समाज के अंदर कुछ व्यक्ति तो ऐसे हैं जो किसी भी बात को बिना सोचे समझे ही स्वीकार कर लेते हैं। तब यह कहा जा सकता है कि उनमे आलोचनात्मक चिंतन power कमजोर है।

✍️ Notes By-'Vaishali Mishra'

चिंतन के प्रकार (type of thinking)
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तार्किक चिंतन (logical thinking)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

▪️ यह सर्वोच्च प्रकार का चिंतन है। इस चिंतन में कोई व्यक्ति विभिन्न विचारों का प्रयोग किसी विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है।

▪️ मनुष्य इस प्रकार की चिंतन में एक दूसरी वस्तु या घटना के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है।

जैसे-

हम किसी वस्तु को कहीं रखकर भूल जाते हैं तो हम विचार करते हैं कि हमने उस वस्तु को आखिरी बार कहां रखा। हम पूरे दिन भर कहां- कहां गए, किस स्थान पर बैठे, इत्यादि तर्क लगाते हैं और निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमने उस वस्तु को अपने कार्यालय में मेज पर छोड़ा है और वह वस्तु वहां जाने पर मिल जाती है। इस प्रकार समस्या का समाधान हो जाता है।
अतः हम कह सकते हैं कि अपनी खोई हुई वस्तु को प्राप्त करने के लिए जो चिंतन का प्रयोग किए, तार्किक चिंतन कहलाता है।

निर्देशित चिंतन (directive thinking)
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▪️ इससे अभिप्राय व्यक्ति के द्वारा किसी विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला चिंतन है।

▪️ इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति का व्यवहार उसकी जीवन के ज्ञात लक्ष्य या स्पष्ट लक्ष्य द्वारा निर्देशित होता है।

अनिर्देशित चिंतन ( undirective thinking)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

▪️ मनुष्य किसी स्पष्ट उद्देश्य और लक्ष्य के बिना ही निर्देशित हुए चिंतन प्रक्रिया को जारी रखते हैं।

▪️ इस प्रकार के चिंतन प्राय: दिवास्वप्न, स्वतंत्र साहचर्य और कल्पना की उड़ान जैसे अनिर्देशित घटना से परिचित होते हैं।

परावर्तित चिंतन (reflective thinking)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

▪️ मनुष्य जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनमें किए जाने वाले व्यवहार प्रतिमान को सार्थक बनाने के लिए चिंतन करता है।

▪️ इस चिंतन के द्वारा जटिल समस्या का समाधान आसानी से हो जाता है क्योंकि पूर्व अनुभव का प्रयोग करते हुए नए ढंग से आने वाली समस्या का समाधान किया जाता है।

जिंबार्डो एवम् रुक के अनुसार चिंतन दो प्रकार का होता है………

(1) स्वली चिंतने (autistic thinking)

(2) यथार्थवादी चिंतन (realistic thinking)

(1). स्वली चिंतन (self thinking/autistic thinking)
✨✨✨✨✨✨✨✨

▪️ यह चिंतन कल्पनात्मक विचार और दिवास्वप्न पर आधारित होता है इससे किसी समस्या का समाधान नहीं होता।

▪️ इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति या बच्चा अपनी कल्पनाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति करता है।

उदाहरण,
विद्यार्थी सोचता है कि एक दिन हमारी शिक्षा पूरी होगी और हम अच्छी नौकरी करेंगे, उससे नई गाड़ी लेंगे, नया घर लेंगे, शादी करेंगे इत्यादि ‌।

(2). यथार्थवादी चिंतन (realistic thinking)
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▪️ इस प्रकार के चिंतन का संबंध वास्तविक परिस्थिति या घटना से होता है जिसकी सहायता से व्यक्ति समस्या का समाधान करता है। जैसे- कोई व्यक्ति कार से सफर कर रहा है और कार रास्ते में अचानक रुक जाती है। तब व्यक्ति के दिमाग में पहला प्रश्न आता है कि कार कैसे रुकी फिर वह इस समस्या के समाधान के लिए चिंतन करता है।

यह तीन प्रकार का होता है……..

(1). अभिसारी चिंतन (convergent thinking)

(2). सृजनात्मक चिंतन (creative thinking)

(3). आलोचनात्मक चिंतन (evaluating thinking)

(1). अभिसारी चिंतन (convergent thinking)
✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨

▪️ किसी दी गई परिस्थिति या विषय वस्तु में तथ्यों के आधार पर समस्या का समाधान निकलता है इसे निगमनात्मक चिंतन भी कहते हैं। इससे समस्या का निश्चित समाधान निकलता है।

जैसे- कक्षा 3 के बच्चे से बोला जाए कि 4 और 3 कितना होता है इस समस्या का समाधान बच्चा अभिसारी चिंतन के प्रयोग से कर लेता है।

(2). सृजनात्मक चिंतन/अपसारी चिंतन/आगमनात्मक चिंतन (creative thinking/divergent thinking)
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▪️ परिस्थिति के तथ्य के साथ नए तथ्यों विचारों को जोड़कर समस्या समाधान करते हैं।

▪️ इसमें नए तथ्यों का सृजन किया जाता है। जैसे –

कोई कवि, किसी कविता का निर्माण करता है। कोई लेखक, किसी नई बुक को लिखता है। डॉक्टर, सर्जरी करता है। चित्रकार, चित्रकारी करता है। इन सभी में सृजनात्मक चिंतन का प्रयोग किया जाता है।

(3). आलोचनात्मक चिंतन (evaluating thinking)
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▪️ किसी वस्तु या तथ्य की सच्चाई को स्वीकार करने से पहले उसके गुण व दोष को पूरी तरह से परख लेना ही आलोचनात्मक चिंतन का उदाहरण है। हमारे समाज के अंदर कुछ व्यक्ति ऐसे हैं जो किसी भी बात को बिना सोचे समझे ही स्वीकार कर लेते हैं तब यह कहा जा सकता है कि उनमें आलोचनात्मक चिंतन शक्ति कमजोर है।

▪️ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है राजनीति। इसमें आलोचनात्मक चिंतन का प्रयोग सबसे अधिक होता है।
एक पार्टी दूसरी पार्टी की बुराई करने के लिए आलोचनात्मक चिंतन का प्रयोग करता है।

Notes by Shreya Rai………..✍️🙏

Batch-Complete Course On Child Development and Pedagogy
Date-5/05/2021
Time-8:00am
Topic-. Different types of Thinking तार्किक चिंतन

तार्किक चिंतन सर्वोच्च प्रकार का चिंतन होता है अर्थात या उच्च स्तरीय चिंतन है।

इस प्रकार के चिंतन में कोई व्यक्ति विभिन्न विचारों का प्रयोग किसी विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर करता है अर्थात व्यक्ति इस प्रकार के चिंतन का प्रयोग लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के गतिविधियों, क्रिया कलापों इत्यादि का समावेशन करके करता है।

मनुष्य इस प्रकार के चिंतन में एक दूसरी वस्तु या घटना के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है।

जैसे÷कक्षा 2 के विद्यार्थी का 2 अंक व 3 अंकों का जोड़ घटाना सीख लेता है अब वो जब परीक्षा देकर अगली कक्षा में जाएगा तो वह जिस प्रकार से पिछली कक्षा में दो व तीन अंकों का जोड़ घटाना करता था ठीक उसी प्रकार व चार या पांच अंकों का जोड़ घटाना सीखने लगता है ,और करना शुरू कर देता है।
अर्थात व्यक्ति के जीवन में घटित हुई किसी भी घटना का भविष्य में होने वाली घटना से संबंध स्थापित करके उसका निष्कर्ष खोज लेता है। निर्देशित चिंतन

इस प्रकार के चिंतन से अभिप्राय व्यक्ति के द्वारा किसी विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला चिंतन है इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति का व्यवहार उसके जीवन के स्पष्ट लक्ष्य द्वारा निर्देशित होता है।

व्यक्ति के सामने एक लक्ष्य निर्धारित होता है और वह उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वयं को उसके अनुकूल बनाने की कोशिश करता है इसके लिए वह अपने दैनिक जीवन में भी ऐसे क्रियाकलापों को अपना आता है जिसके द्वारा वह लक्ष्य के धीरे-धीरे करीब पहुंचता जाता है,

जैसे÷ कोई विद्यार्थी अपने कक्षा में उच्चतम स्थान प्राप्त करना चाहता है इसके लिए वह सर्वप्रथम एक रणनीति तैयार करता है कि वह किस प्रकार से अध्ययन करें कि उस को उच्चतम स्थान प्राप्त हो और फिर उसी रणनीतियां टाइम टेबल के द्वारा वर्ष भर मेहनत करके तैयारी करता है और परीक्षा में उच्चतम स्थान प्राप्त करता है। अनिर्देशित चिंतन

मनुष्य किसी स्पष्ट उद्देश्य लक्ष्य के बिना ही निर्देशित हुए चिंतन प्रक्रिया को जारी रखते हैं।
इस प्रकार के चिंतन पर्याय दिवास्वप्न, साहचर्य और कल्पना की उड़ान भरता हैं।
अर्थात इस प्रकार के चिंतन में लक्ष्य की प्राप्ति का होना सुनिश्चित नहीं होता है ना ही उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कोई गतिविधि या कार्य किया जाता है जिसके द्वारा लक्ष्य की प्राप्ति हो किंतु व्यक्ति क्षणिक आत्म संतुष्टि के लिए इस प्रकार का चिंतन करता है। परावर्ती चिंतन

पूर्व अनुभव किए गए चीजों को नए अनुभव उपयोग किया जाता है।
मनुष्य जीवन के विभिन्न पहलुओं और उन में किए जाने वाले व्यवहार के प्रतिमान को सार्थक बनाने के लिए चिंतन करता है।
चिंतन के द्वारा जटिल समस्या का समाधान आसानी से किया जाता है, क्योंकि पूर्व अनुभव का प्रयोग करते हुए नए ढंग से आने वाली समस्या का समाधान किया जाता है।

जिम्बार्डो एवं रुक ने चिंतन के निम्नलिखित प्रकार बताए हैं÷

१-स्वली चिंतन
यह चिंतन कल्पनात्मक विचार और दिवास्वपन पर आधारित होता है, इससे किसी समस्या का समाधान नहीं होता है।
२-यथार्थवादी
इस प्रकार के चिंतन का संबंध वास्तविक परिस्थिति या घटना से होता है। जिसकी सहायता से किसी का या परिस्थिति का समाधान करता है।

२-यथार्थवादी चिंतन को ३ भागों में विभाजित किया गया है जो निम्नलिखित है÷
२क-अभिसारी÷
किसी दी गई परिस्थिति या विषय वस्तु में तथ्यों के आधार पर समस्या का समाधान निकलता है।
इसे निगमनात्मक चिंतन भी बोलते हैं।
इसमें समस्या का उचित एवं निश्चित समाधान निकल जाता है।

२ख÷सृजनात्मक÷
परिस्थिति के तथ्यों के साथ नए तथ्यों विचारों को जोड़कर समस्या समाधान करते हैं।
इसमें नए तथ्यों का सृजन किया जाता है।
इस प्रकार के चिंतन में व्यक्ति किसी एक समस्या पर अपनी सूझबूझ के द्वारा किसी एक समस्या का अपनी सूझबूझ द्वारा हल निकालने की कोशिश में अनेक प्रकार की खोज व प्रयोग विश्लेषण तार्किक चिंतन इत्यादि विचारों का समाधान बेहतर ढ़ंग से खोज लेता है।

२ग÷आलोचनात्मक
किसी घटना को आलोचना की दृष्टि से देखते हैं।
घटना की वास्तविकता की जांच पड़ताल करके सही गलत को स्वीकार करता है।
इसमें वास्तु घटना या तत्व के गुण दोष की परख की जाती है।
अर्थात इसमें किसी वस्तु के गुण वा दोष दोनों को एक साथ विश्लेषण करके उस पर कोई निष्कर्ष निकाला जाता है जिसके द्वारा यह देखा जाता है कि वह वस्तु मूल्यांकन की दृष्टि से कितने प्रतिशत अपने जगह पर सही है।

written by Shikhar Pandey 🙏

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