☘️🌼 अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक व दशाएं🌼☘️

🟣 वातावरण
🟣 परिपक्वता
🟣 बच्चों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य
🟣 विषय सामग्री का स्वरूप
🟣 सीखने का समय /थकान
🟣 प्रेरणा
🟣 सीखने की इच्छा
🟣 अध्यापक और सिखाने की प्रक्रिया
🟣 सिखाने / सिखाने की विधि
🟣 संपूर्ण परिस्थिति

🟣 वातावरण➖ भौतिक एवं सामाजिक वातावरण दोनों ही शिक्षण अधिगम को प्रभावित करता है शुद्ध वायु, उचित प्रकाश, शांत वातावरण एवं मौसम की अनुकूलता के बीच बच्चे सीख सकते हैं इसके अभाव में सीख थक जाते हैं।

🟣 परिपक्वता➖ अधिगम की प्रक्रिया को बालक की शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वता अधिक प्रभावित बनाती है छोटे कक्षा में बच्चों की मांसपेशियों को सुंदर बनाने की ओर ध्यान दिया जाता है ताकि वह कलम, किताब आदि को पकड़ना सीख जाए।

🟣 बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य➖ और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ होते हैं वह सीखने में अधिक नीचे देते हैं सीखने से पहले बालक का शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी नितान्त आवश्यक है।

🟣 विषय सामग्री का स्वरूप➖ एक स्तर के छात्रों के लिए उनकी बुद्धि ,रुचि एवं अभिक्षमता के अनुरूप पाठ्यवस्तु सरल रोचक एवं अर्थ पूर्ण होने पर छात्र उन्हें उचित पूर्ण एवं शीघ्रता से सीखते हैं।

🟣 सीखने का समय /थकान➖ छात्र समय तक किसी क्रिया को करता रहता है तो थकने का अनुभव करने लगता है और थकान अनुभव होने से अधिगम प्रक्रिया में शीथिलता उत्पन्न हो जाती है।

🟣 प्रेरणा➖ सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान है सीखने की प्रक्रिया में प्रेरकों का स्थान सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है प्रेरणा से सीखने की इच्छा प्रबल हो जाती है।

🟣 सीखने की इच्छा➖ बालकों को नए ज्ञान देने से पूर्व यह नितांत आवश्यक है कि उसमें सीखने के प्रति तत्परता उत्पन्न की जाए क्योंकि ऐसे होने पर विद्यार्थी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसी बात को सीखने में सफल हो जाते हैं।

🟣 अध्यापक और सिखाने की प्रक्रिया➖ शिक्षक का व्यवहार छात्रों के सीखने को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है शिक्षण विधि का सीधा संबंध सीखने की प्रक्रिया से होता है साथ ही प्रत्येक शिक्षक के पढ़ाने का तरीका भी भिन्न होता है अतः सभी छात्र एक ही विधि से नहीं सीख पाते हैं शिक्षण की विधि जितनी अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावशाली होगी उतनी ही सीखने की प्रक्रिया सरल और लाभप्रद होगी।

🟣 सीखने/ सिखाने की विधि➖ सीखने के लिए अधिगमकर्ता ने किस विधि का प्रयोग किया है? किस पर सीखना निर्भर करता है सीखने की अनेक विधियां हैं जैसे संपूर्ण विषय वस्तु एक बार में सीखना संपूर्ण विषय वस्तु को अंशो में विभाजित कर सीखना, विषय वस्तु को रटकर सीखना, अथवा समझकर सीखना।

🟣 संपूर्ण परिस्थिति➖ बालक के प्रभावी अधिगम की दृष्टि से यह अत्यंत आवश्यक है कि उसे एक ऐसी समुचित संपूर्ण परिस्थिति प्रदान की जाए जिसमें सीखने के सभी तत्व एवं दशाएं विद्वान हो।

🔸🤵🏻 रायबर्न के अनुसार➖ यदि शिक्षण विधियों में इन नियमों का सिद्धांत का अनुसरण किया जाता है तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है।

🔸 थार्नडाइक के सीखने के नियम➖ थार्नडाइक ने कुल 8 नियम बताए हैं जिसमें 3 प्रमुख नियम और 5 गौण नियम दिए हैं।

🌼 मुख्य नियम➖

🟣 तत्परता का नियम➖ किसी भी कार्य में अगर हम तत्पर होते हैं तो उस कार्य को हम आसानी से कर लेते हैं।

🟣 अभ्यास का नियम➖ बार-बार अभ्यास से जल्दी सीखते हैं अभ्यास के नियम को दो भागों में विभक्त किया गया है।

1-उपयोग का नियम➖ यह नियम इस बात पर बल देता है कि मनुष्य जिस कार्य को बार-बार दोहराता है उसे शीघ्र ही सीख जाता है।

2-अनुपयोग का नियम➖ जब हम किसी पाठ या विषय को दोहराना बंद कर देते हैं तो हम उसे धीरे-धीरे भूलते चले जाते हैं इसे ही अनुप्रयोग का नियम कहा जाता हैं।

📚📚✍🏻 Notes by….. Sakshi Sharma ✍🏻📚📚

🔆 अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक और दशाएं :-

🌀1 वातावरण :-

अधिगम और वातावरण दोनों का निकट संबंध है बालक का परिवार समुदाय कक्षा तथा विद्यालय सभी अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं यदि विद्यालय कक्षा कक्ष तथा परिवार का वातावरण शांतिपूर्ण तथा रुचिकर होता है तो बालक सुचारू सीख लेता है इसके विपरीत यदि परिवार तथा विद्यालय का वातावरण दूषित होता है जैसे विद्यालय में खेलने कूदने की समुचित व्यवस्था नहीं होती तो बालक की सीखने में बाधा उत्पन्न हो जाती हैं।
कार्य को विपरीत भौतिक परिस्थितियां, जैसे-बैठने की उपयुक्त व्यवस्था ना होना, शोर, विद्यार्थियों की बहुत अधिक संख्या, कम रोशनी, अपर्याप्त हवा, उचित समय का चयन ना करना आदि अधिगम की गति को कम कर देते हैं।। अतः कक्षा के मनोवैज्ञानिक पर्यावरण के साथ-साथ भौतिक पर्यावरण भी अधिगम को प्रभावित करता है।

🌀2 परिपक्वता :-

🔹अधिगम तभी संभव होता है जब बालक उसके अनुकूल निश्चित स्तर की परिपक्वता प्राप्त कर लेता है।अगर 6 माह के बच्चे को चलना सिखाया जाए तो व्यर्थ होगा क्योंकि उसकी मांसपेशियां इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह चलाना सीख सके। इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अधिगम तभी अधिक होगा यदि शैक्षणिक क्रियाएं बालक के विकास के अनुकूल होंगी। अध्यापक द्वारा उन माता पिता को इस सिद्धांत की जानकारी दी जानी चाहिए जो अपने ढाई या 3 वर्ष के बच्चे की शिक्षण उपलब्धि के प्रति अत्यधिक महत्वकांक्षी हो जाते हैं।

🌀 3 बच्चे का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य

🔹शारीरिक स्वास्थ्य
एक अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य का तात्पर्य कि हमारे शरीर का प्रत्येक अंग उचित रूप से कार्य कर रहा है जिससे कि सामान्यत:किसी कार्य करने की आशा बढ़ जाती है यह हमारे अंगों और प्रणालियों की तंदुरुस्ती को भी प्रदर्शित करता है ।शारीरिक स्वास्थ्य यदि कुछ अस्स्वथ रहता है तो हमारी अन्य दूसरी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। यदि हमारी शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होगा तो किसी भी कार्य में को हम प्रभावी रूप से कर पाएंगे।

🔹मानसिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य तंदुरुस्ती की एक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी योग्यताओं को कार्यान्वित करता है जीवन के कई तत्वों से लड़ सकता है और कई उत्पादक और फलदाई कार्य कर सकता है। यदि व्यक्ति मानसिक रूप से भी अस्वस्थ है तो वह किसी भी अधिगम प्रक्रिया में अपना लगाव या उसमें पूर्ण रूप से अपनी भागीदारी के साथ रुचि पूर्ण अधिगम कभी नही कर पायेगा।

🌀4 विषय सामग्री का स्वरूप :-

🔹विषय वस्तु की संरचना उसका कठिनाई स्तर अधिगम को प्रभावित करता है। यदि विषयवस्तु अधिगमकर्ता के स्तर के अनुकूल नहीं होगी तो सीखने की गति मंद होगी।
🔹अधिगम प्रक्रिया में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण के क्रम का भी प्रभाव पड़ता है।यदि विषय वस्तु शिक्षण सूत्रों के अनुसार व्यवस्थित की जाएगी तो अधिगम प्रक्रिया सरल होगी।

🔹विषय वस्तु यदि अर्थपूर्ण होगी तो सीखने की गति अधिक होगी। अर्थ पूर्णता से अभिप्राय है कि जो विषय वस्तु प्रेषित की जाए उसका संबंध बालक के दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों से हो, और वह स्पष्ट अर्थ रखती हो तथा बालक के पूर्व ज्ञान से भी संबंधित हो।अतः यदि अध्यापक विषय वस्तु को अर्थपूर्ण बनाकर प्रस्तुत करेगा तो सीखना प्रभावी होगा।विषय वस्तु की मात्रा भी बालक के स्तर के अनुसार होनी चाहिए।

🌀5 सीखने का समय एवम् थकान :-

🔹थकान की स्थिति में व्यक्ति की कार्य क्षमता घट जाती है और कार्य की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। थकान शारीरिक या मानसिक हो सकती है। बालक द्वारा लंबे समय तक कार्य करते रहने के बाद उसकी अधिगम की गति धीमी हो जाती है और कार्य के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। अतः बालक को बीच में विश्राम देने से वह पुनः सक्रिय हो जाता है।

🌀6 अभिप्रेरणा (Motivation)

🔹अभिप्रेरणा अधिगम को अत्यधिक प्रभावित करती है। अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राणी की मनोदैहिक एवं आंतरिक दशाएं हैं जो उससे इस प्रकार व्यवहार करवाती है कि लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। जो व्यवहार लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होते हैं मनुष्य उन्हें करता है जो लक्ष्य प्राप्ति में सहायक नहीं होते उन्हें त्याग देता है।
🔹जितनी अधिक प्रेरणा होगी अधिगम प्रक्रिया उतनी ही तीव्र होगी, किंतु एक निश्चित सीमा से अधिक प्रेरित करना अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है।अभिप्रेरणा बाह्य एवं आंतरिक दोनों प्रकार की होती होती है। 🔹प्रशंसा,आलोचना,पुरस्कार,दंड,प्रगति का ज्ञान आदि अभिप्रेरणा की बाह्य अभिप्रेरणा प्रविधियां हैं।आकांक्षा स्तर को ऊंचा उठाना आंतरिक अभिप्रेरणा । शिक्षक यदि छात्रों के आकांक्षा स्तर को ऊंचा उठाता है तो वह कार्य में अधिक तल्लीनता से रुचि लेंगे। अतः अध्यापक को आवश्यकतानुसार अभिप्रेरणा की विभिन्न विधियों का प्रयोग कक्षा कक्ष में अधिगम को बढ़ाने हेतु करना चाहिए। अभिप्रेरणा कक्षा में अधिगम को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक है।

🌀7 सीखने की इच्छा :-
बच्चे में अभिप्रेरणा से सीखने की इच्छा प्रबल हो जाती है अभि प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि बालक को उसका लक्ष्य स्पष्ट कर दिया जाए यदि अध्यापक ऐसा चाहता है कि उसके छात्र नए पाठ को सीखे तो वह प्रशंसा ,प्रोत्साहन ,प्रतिद्वंदिता आदि विधियों का प्रयोग करके उनको प्रेरित कर सकता है।

🌀8 अध्यापक और सिखाने की प्रक्रिया :-

🔹कक्षा कक्ष में यदि शिक्षक अपने परंपरागत तरीके से शिक्षण करवाएंगे तो बच्चे सीख नहीं पाएंगे। अतः अधिगम प्रभावित होगा। शिक्षक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चे किस तरीके से अच्छा सीखते हैं।
🔹”यदि कुछ बच्चे हमारे सीखाने के तरीके से नहीं सीख सकते हैं तो शायद हमें उनके सीखने के तरीके से सिखाना चाहिए”

🌀 9 सीखने सिखाने की विधि:-

बच्चे की समस्या को देखकर कौन सी विधि प्रयुक्त की जाए या कौन सी विधि उपयुक्त होगी जिससे बच्चों को बेहतर समझ आए इसका चयन कई विधियों के द्वारा किया जा सकता है।

🌀10 संपूर्ण परिस्थिति :-

🔹अधिगम व्यक्ति की संपूर्ण परिस्थिति के साथ परस्पर संक्रिया का फल है कोई छात्र किसी एकाकी उद्दीपन के संदर्भ की अपेक्षा संपूर्ण अधिगम में परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया द्वारा सीखता है। इसके अतिरिक्त अधिगम में छात्र के व्यक्तित्व के सभी तीनों पक्ष शारीरिक, मानसिक व संवेगात्मक प्रभावित होते हैं।

✨रायबर्न के अनुसार

यदि शिक्षण विधियां में नियम व सिद्धांतों का अनुसरण किया जाता है तो सीखने का कार्य अधिक संतोषजनक होता है।

✨थोर्नडायक ने सीखने के नियम के कुल 8 नियम दिए
जिसमें से 📍3 मुख्य नियम
और 📍5 गौण नियम है।
मुख्य नियम प्राथमिक नियम होते हैं जो कि एक बड़े स्तर पर सीखने को प्रभावित करते हैं अर्थात इनकी प्रायिकता और महत्व अधिक होता है।

जबकि गौण द्वितीयक होते हैं जिनकी प्रायिकता कम होती हैं अर्थात इनका मुख्य नियम की अपेक्षा कम महत्व होता है। और यह मुख्य नियम के बाद आते हैं।

तीन मुख्य नियम निम्नानुसार है।

⚜️1 तत्परता का नियम
⚜️2 अभ्यास का नियम
⚜️3 प्रभाव का नियम या संतोष /असंतोष का नियम

उपरोक्त तीनों ही मुख्य नियमों का वर्णन निम्नानुसार है।

❇️1 तत्परता का नियम :-
यह नियम कार्य करने से पूर्व तत्पर या तैयार किए जाने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य को सीखने के लिए तत्पर या तैयार होता है, तो उसे शीघ्र ही सीख लेता है। तत्परता में कार्य करने की इच्छा निहित होती है। ध्यान केंद्रित करने मेँ भी तत्परता सहायता करती है।

❇️2 अभ्यास का नियम :-

🔸i उपयोग का नियम :- यदि कोई कार्य पूर्व में किया गया है और उसे दोबारा किया जाता है तो वह हमारे मस्तिष्क में आ जाता है अर्थात वह हमारे मस्तिष्क में स्थाई रूप से सुदृढ़ हो जाता है।

🔸ii अनुप्रयोग का नियम :- यदि हम कार्य को पुनः नहीं करते या नहीं दोहराते हैं तो हमारा मस्तिष्क उन बातों को भूल जाता है अर्थात वह कार्य हमारे मस्तिष्क में अस्थाई हो जाता है।

अर्थात
यह नियम किसी कार्य या सीखी गई विषय वस्तु के बार-बार अभ्यास करने पर बल देता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते है, तो उसे सरलतापूर्वक करना सीख जाते है। यदि हम सीखे हुए कार्य का अभ्यास नही करते है, तो उसको भूल जाते है।

❇️3 प्रभाव (परिणाम) का नियम :-
इस नियम को सन्तोष तथा असन्तोष का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख व सन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह बार-बार करना चाहता है और इसके विपरीत जिस कार्य को करने से दुःख या असन्तोष मिलता है, उस कार्य को वह दोबारा नही करना चाहता है।

किसी भी कार्य को करने के दौरान यदि कार्य के छोटे-छोटे अंतराल या समय या छोटे-छोटे अभ्यास के पश्चात भी यदि कार्य को करने में संतुष्टि मिलती है तो हम अभ्यास को जारी रख कर कार्य को सफल रूप से पूरा करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि यह आवश्यक नहीं है कि कार्य जब संपूर्ण रूप से संपन्न होगा तभी हमें संतुष्टि प्राप्त होगी।

✍️ Notes By-'Vaishali Mishra'

By admin

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