अधिगम के स्तर को सुधारने और वृद्धि करने में सहायक है उन्हें अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक कहते हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविद् अधिगम को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक कारकों को महत्व देते हैं तो कुछ वातावरणीय कारकों को, कुछ विषय वस्तु, विधियों आदि को, और अन्य अधिगमकर्ता के आंतरिक एवं व्यक्तिगत कारको को।

कुछ शिक्षाविद् अध्यापक और स्कूल को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। ये कारक चाहे किसी भी श्रेणी के हो, सीखने को प्रभावित करते हैं।

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक

  1. अभिप्रेरणा
  2. उद्देश्यों का स्पष्टीकरण
  3. पुनर्बलन
  4. परिपक्वता
  5. बौद्धिक योग्यता और क्षमता
  6. विषय वस्तु की रचना, व्यवस्था और अर्थपूर्णता
  7. थकान एवं अनुपयुक्त कार्यकारी परिस्थितियां
  8. अधिगम हेतु प्रयुक्त विधियां
  9. शिक्षण के तरीके

(1) अभिप्रेरणा (Motivation)

  अभिप्रेरणा अधिगम को अत्यधिक प्रभावित करती है। अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राणी की मनोदैहिक एवं आंतरिक दशाएं हैं जो उससे इस प्रकार व्यवहार करवाती है कि लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। जो व्यवहार लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होते हैं मनुष्य उन्हें करता है जो लक्ष्य प्राप्ति में सहायक नहीं होते उन्हें त्याग देता है।

जितनी अधिक प्रेरणा होगी अधिगम प्रक्रिया उतनी ही तीव्र होगी, किंतु एक निश्चित सीमा से अधिक प्रेरित करना अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करता है। अभिप्रेरणा बाह्य एवं आंतरिक दोनों प्रकार की होती होती है।

प्रशंसा, आलोचना, पुरस्कार, दंड, प्रगति का ज्ञान आदि अभिप्रेरणा की बाह्य अभिप्रेरणा प्रविधियां हैं। आकांक्षा स्तर को ऊंचा उठाना आंतरिक अभिप्रेरणा। शिक्षक यदि छात्रों के आकांक्षा स्तर को ऊंचा उठाता है तो वह कार्य में अधिक तल्लीनता से रुचि लेंगे।

अतः अध्यापक को आवश्यकतानुसार अभिप्रेरणा की विभिन्न विधियों का प्रयोग कक्षा-कक्ष में अधिगम को बढ़ाने हेतु करना चाहिए। अभिप्रेरणा कक्षा में अधिगम को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक है।

(2) उद्देश्यो का स्पष्टीकरण

अधिगम एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। अधिगम को आसान और सार्थक बनाने के लिए अध्यापक को अधिगम के उद्देश्यों को पूर्व में निर्धारित करना चाहिए।

अधिगमकर्ता के सामने यदि यह स्पष्ट होगा कि इस विषय वस्तु को वह क्यों सीखे और इसे सीखने के बाद इसका वह विभिन्न प्रकार से उपयोग किस प्रकार कर सकेगा। इस स्थिति में उसके समस्त व्यवहार उद्देश्य केंद्रित और तीव्र होंगे।

(3) पुनर्बलन (Reinforcement)

पुनर्बलन अधिगम को प्रभावित करता है। पुनर्बलन वह प्रक्रिया है जिसमें यदि कोई उत्तेजक प्रतिक्रिया के तुरंत बाद प्रस्तुत किया जाए तो उससे प्रतिक्रिया शक्ति में वृद्धि होती है।

यदि बालक को कक्षा में सक्रिय अनुक्रिया करने पर तुरंत पुनर्बलन दिया जाए तो उसके अधिगम में वृद्धि होगी। कक्षा शिक्षण में बालक के अधिगम को शाब्दिक और अशाब्दिक पुनर्बल द्वारा प्रभावित किया जा सकता है।

(4) परिपक्वता (Maturity)

अधिगम तभी संभव होता है जब बालक उसके अनुकूल निश्चित स्तर की परिपक्वता प्राप्त कर लेता है। अगर 6 माह के बच्चे को चलना सिखाया जाए तो व्यर्थ होगा क्योंकि उसकी मांसपेशियां इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह चलाना सीख सके।

इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अधिगम तभी अधिक होगा यदि शैक्षणिक क्रियाएं बालक के विकास के अनुकूल होंगी। अध्यापक द्वारा उन माता पिता को इस सिद्धांत की जानकारी दी जानी चाहिए जो अपने ढाई या 3 वर्ष के बच्चे की शिक्षण उपलब्धि के प्रति अत्यधिक महत्वकांक्षी हो जाते हैं।

कॉलेसनिक ने उचित ही कहा है, “परिपक्वता और सीखना पृथक क्रियाएँ नहीं है, वरन् परस्पर संबद्ध और एक दूसरे पर निर्भर है।”

(5) बौद्धिक योग्यता और क्षमता

मनुष्य में अन्य निम्न श्रेणी के जीवों की तुलना में सीखने की क्षमता अधिक होती है किंतु प्रत्येक मनुष्य को सीखने की क्षमता भी अलग-अलग होती है।

टरमन और मेरील के बौद्धिक वर्गीकरण के अनुसार हम बालकों को उनकी सीखने की योग्यता के आधार पर तीन भागों में बांटा जा सकता है। (I) पिछड़े (II) सामान्य और (III) प्रतिभाशाली ।

अतः अध्यापक को बौद्धिक योग्यता के अनुसार सीखने की क्रियाएं आयोजित करनी चाहिए।

(6) विषय वस्तु की रचना, व्यवस्था और अर्थपूर्णता

विषय वस्तु की संरचना उसका कठिनाई स्तर अधिगम को प्रभावित करता है। यदि विषयवस्तु अधिगमकर्ता के स्तर के अनुकूल नहीं होगी तो सीखने की गति मंद होगी। अधिगम प्रक्रिया में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण के क्रम का भी प्रभाव पड़ता है। यदि विषय वस्तु शिक्षण सूत्रों के अनुसार व्यवस्थित की जाएगी तो अधिगम प्रक्रिया सरल होगी।

विषय वस्तु यदि अर्थपूर्ण होगी तो सीखने की गति अधिक होगी। अर्थ पूर्णता से अभिप्राय है कि जो विषय वस्तु प्रेषित की जाए उसका संबंध बालक के दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों से हो, और वह स्पष्ट अर्थ रखती हो तथा बालक के पूर्व ज्ञान से भी संबंधित हो।

अतः यदि अध्यापक विषय वस्तु को अर्थपूर्ण बनाकर प्रस्तुत करेगा तो सीखना प्रभावी होगा। विषय वस्तु की मात्रा भी बालक के स्तर के अनुसार होनी चाहिए।

(7) थकान एवं अनुपयुक्त कार्यकारी परिस्थितियां

थकान की स्थिति में व्यक्ति की कार्य क्षमता घट जाती है और कार्य की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। थकान शारीरिक या मानसिक हो सकती है।

बालक द्वारा लंबे समय तक कार्य करते रहने के बाद उसकी अधिगम की गति धीमी हो जाती है और कार्य के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। अतः बालक को बीच में विश्राम देने से वह पुनः सक्रिय हो जाता है।

कार्य की विपरीत भौतिक परिस्थितियां, जैसे-बैठने की उपयुक्त व्यवस्था ना होना, शोर, विद्यार्थियों की बहुत अधिक संख्या, कम रोशनी, अपर्याप्त हवा, आदि अधिगम की गति को कम कर देते हैं, क्योंकि ऐसी परिस्थिति में थकान भी जल्दी होती है।

अतः कक्षा के मनोवैज्ञानिक पर्यावरण के साथ-साथ भौतिक पर्यावरण भी अधिगम को प्रभावित करता है।

(8) अधिगम हेतु प्रयुक्त विधियां (Teaching Method)

अधिगम की विधियां भी सीखने को प्रभावित करती हैं। जिन विधियो में बालकों को पढ़ने से पूर्व तत्पर किया जाता है, अधिगम प्रक्रिया के दौरान विभिन्न क्रियाएं करवाई जाती हैं, बालक स्वयं के अनुभव द्वारा सक्रिय रहकर ज्ञान अर्जित करता है, उन विधियों द्वारा अधिगम शीघ्रता से व स्थाई होता है।

अतः अध्यापक को शिक्षण में ऐसी विधियों का प्रयोग करना चाहिए जिनमें अध्यापक की सक्रियता कम और विद्यार्थी की सक्रियता अधिकतम हो और विद्यार्थी को स्वयं कार्य करने का अवसर मिले।

अतः कहां जा सकता है कि अधिगम को प्रभावी बनाने में योगदान देने वाले अनेक कारक अथवा दशाएं सामूहिक रूप से सहयोगी हो सकते हैं। विद्यालय की संपूर्ण परिस्थिति बालक के अधिगम को प्रभावित करती है।

रायबर्न के शब्दों में कहा जा सकता है, “विद्यालय कि वह संपूर्ण परिस्थिति जिसमें बालक स्वयं को पता है, जीवन से जितनी अधिक संबद्ध होगी उसका अधिगम उसी मात्रा में फलदायक और स्थाई होगा।”

(9) शिक्षण के तरीके

कक्षा कक्ष में यदि शिक्षक अपने परंपरागत तरीके से शिक्षण करवाएंगे तो बच्चे सीख नहीं पाएंगे। अतः अधिगम प्रभावित होगा। शिक्षक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चे किस तरीके से अच्छा सीखते हैं।

इग्नासियो एस्ट्राडा के अनुसार, “यदि कुछ बच्चे हमारे सीखाने के तरीके से नहीं सीख सकते हैं तो शायद हमें उनके सीखने के तरीके से सिखाना चाहिए।”

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

अधिगम को प्रभावित करने वाला व्यक्तिगत कारक है

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले व्यक्तिगत कारकों में संवेदना और प्रत्यक्षीकरण, थकान और ऊबना, परिपक्वता, संवेगात्मक दशाएं, आवश्यकताएं, रुचियां, अभिप्रेरणा, अवधान, बुद्धि , अभियोग्यता, अभिवृत्ति आदि मुख्य हैं।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published.