Parallel Alternative Group One education

दल शिक्षण पद्धति द्वारा सामान्यतः व्यवहार में आने वाली समावेशी प्रथाएँ

एक शिक्षा, एक सहयोग—इस मॉडल में एक शिक्षक शिक्षा देता है और दूसरा प्रशिक्षित शिक्षक विशेष छात्र की आवश्यकताओं को और कक्षा को सुव्यवस्थित रखने में सहयोग करता है।

  1. एक शिक्षा एक निरीक्षण – एक शिक्षा देता है दूसरा छात्रों का निरीक्षण करता है।
  2. स्थिर और घूर्णन शिक्षा — इसमें कक्षा को अनेक भागों में बाँटा जाता है। मुख्य शिक्षक शिक्षण कार्य करता है दूसरा विशेष शिक्षक दूसरे दलों पर इसी की जाँच करता है।
  3. समान्तर शिक्षा – इसमें आधी कक्षा को मुख्य शिक्षक तथा आधी को विशिष्ट शिक्षा प्राप्त शिक्षक शिक्षा देता है। दोनों समूहों को एक जैसा पाठ पढ़ाया जाता है।
  4. वैकल्पिक शिक्षा – मुख्य शिक्षक अधिक छात्रों को पाठ पढ़ाता है जबकि विशिष्ट शिक्षक छोटे समूह को दूसरा पाठ पढ़ाता है।
  5. समूह शिक्षा – यह पारंपरिक शिक्षा पद्धति है। दोनों शिक्षक योजना बनाकर शिक्षा देते हैं। यह काफ़ी सफल शिक्षण पद्धति है।

Inclusive practices commonly practiced by team teaching method

One education, one collaboration – In this model, a teacher teaches and the other trained teacher contributes to the needs of the particular student and to keep the classroom organized.

  1. One education is an observation – one teaches and the other observes the students.
  2. Static and rotational learning – In this, the class is divided into several parts. The head teacher does the teaching work. The second special teacher examines the same on other teams.
  3. Parallel education – In this, half the class is given the head teacher and half the teacher with special education. Both groups are taught the same lesson.
  4. Alternative Education – The head teacher teaches the lesson to more students while the specific teacher teaches the second lesson to the small group.
  5. Group education – This is the traditional education method. Both teachers teach through planning. This is a very successful teaching method.

MacDougall Emotion and Basic Nature

मैक्डूगल के अनुसार-‘संवेग उत्पन्न होने पर जो क्रिया होती है उसे मूल प्रवृत्ति कहलाती है’

प्रत्येक मूल प्रवृत्ति के साथ एक संवेग जुड़ा रहता है।

मूल प्रवृत्ति—-संवेग

1.पलायन – भय

2. युयुत्सा – क्रोध

3.निवृत्ति – घृणा

4.पुत्रकामना – वात्सल्य

5.शरणागत – करूणा

6.काम प्रवृत्ति – कामुकता

7.जिज्ञासा – आश्चर्य

8.दीनता – आत्महीनता

9.आत्मगौरव – आत्माभिमान

10.सामूहिकता – अकेलापन

11.भोजनान्वेषण – भूख

12.संग्रह – अधिकार

13.रचना – कृति

14. हास्य – मनोविनोद

15. प्रिय देखभाल- प्रेम

According to MacDougall – ‘The action that occurs when a momentum is generated is called the root tendency’.

There is a momentum associated with each core tendency.

Core tendency —- Emotion

  1. 1.Escape – Fear
  2. 2. Combat and Pugnacity- Anger
  3. 3. Repulsion- Disgust
  4. 4.Putnamna – Lust
  5.  Curiosity – Wonder
  6. Submission- Negative Self feeling
  7. Food Seeking- Appetite
  8. Sextuality- Lust
  9. Parental care- love
  10. Gregariousness – Loneliness
  11. Appeal- Distress
  12. Self Assertion- Positive self feeling
  13. Constructiveness-Feeling of creativeness
  14. Acquisitiveness – Feeling of Ownership
  15. Laughter-Amusement

Guilford’s three-dimensional theory

त्रिआयामी सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की मानसिक योग्यता को तीन आयामों में वर्गीकृत किया गया है 

1. संक्रिया(operations)

2. विषय वस्तु(content)

3. उत्पाद(product)

संक्रिया में छह प्रमुख बुद्धि की योग्यताओं को देखा गया है- 1. संज्ञान  2.स्मृति अभिलेखन 3.  स्मृति धारणा 3.अपसारी चितंन 4.अभिसारी चिंतन 5.मूल्यांकन

विषयवस्तु के 5 आधार हैं- 1. दृष्टि  विषयवस्तु  2. श्रवण  विषयवस्तु 3. सांकेतिक विषयवस्तु   4.शाब्दिक विषयवस्तु 5. व्यवहारात्माक विषयवस्तु 

किसी भी बौद्धिक क्रिया में छह प्रकार के उत्पाद सम्मिलित रहते हैं-1. इकाई  2. वर्ग 3. संबंध  4. रूपांतरण 5. आशय 6. पद्धति

गिलफोर्ड के अनुसार यह तीनों आयाम-  1.संक्रिया(6), 2.विषय वस्तु(5) और 3.उत्पाद(6) कुल मिलकर 6*5*6=180  उप  जाते तत्व बनहैं। 

Three dimensional theory – According to this theory, the mental ability of a person is classified into three dimensions.

1. Operations

2. Content

3. Product

Six major intelligence abilities have been seen in the operation- 1. Cognition 2. Memory Reading 3. Memory Relation 4-Divergent thinking 5. Convergent thinking 6. Evaluation

Five major intelligence abilities have been seen in the Content- 1. Visual  2. Auditing 3. Symbolic 4. Semantic 5. Behavioral.

Six types of products are included in any intellectual activity – 1. Unit 2. Classes 3. 3-Relation 4. System 5. Transformations 6.Implications.

According to Gilford, these three dimensions – 1. Operation (6)   2. Content (5) and 3. Product (6) together become 180 sub elements.

Rorschach inkblot test

रोर्शा स्याही धब्ब परीक्षण (Rorschach test), जिसका प्रतिपादन स्विट्जरलैण्‍ड के मनोवैज्ञानिक

हरमन रॉर्शोक ने सन् 1921 में किया।

1. इस परीक्षण में 10 कार्ड पर स्याही के धब्बे बने होते है।

2. 7 कार्डों पर काले व सफेद तथा बाकी 3 कार्डों पर विभिन्न रंगों के धब्बे बने होते है।

3. हरमन रॉर्शोक ने कार्डों पर चित्रों का वर्णन इस प्रकार किया है—5 कार्ड बिल्कुल काले, 2 कार्ड काले + सफेद, 3 कार्ड अनेक रंगों के।

4. यह परीक्षण व्यक्तिगत रूप से किसी भी आयु वर्ग पर प्रयोग किया जा सकता है। 

रॉर्शोक स्याही धब्बा परीक्षण पर दी गई अनुक्रियाओं का विश्‍लेषण →

W अनुक्रिया → तीव्र बुद्धि तथा अमूर्त चिन्‍तन का बोध

D अनुक्रिया → स्‍पष्‍ट रूप से देखने व समझने की क्षमता का बोध 

S अनुक्रिया → नकारात्‍मक प्रवृत्ति तथा आत्‍म-हठधर्मी का बोध

F अनुक्रिया → चिन्‍तन के समय एकाग्रता का बोध

A अनुक्रिया → बौद्धिक संकीर्णन तथा सांवेगिक असंतुलन का बोध

P अनुक्रिया → रूढिगत चिन्‍तन एवं सृजनात्‍मकता का बोध

Z अनुक्रिया → उच्‍च बुद्धि, सृजनात्‍मकता तथा निपुणता का बोध

The Rorschach test, which was presented in 1921 by psychologist  Hermann Rorschach of Switzerland.

1. In this test, ink spots are made on 10 cards.

2. Black and white are made on 7 cards and different color spots are made on the remaining 3 cards.

3.H. Rorschach  has described the pictures on the cards in this way – 5 cards absolutely black, 2 cards black + white, 3 cards of multi colors.  

4. This test can be used individually on any age group.

Analysis of responses given on Rorschach inkblot test →

W Response → Sharp intelligence and sense of abstract thinking

D Response → Realization of the ability to see and understand clearly

S Response → Negative tendency and sense of self-belief

F Response → Realization of concentration at the time of thinking

A Response → Intellectual narrowing and sense of emotional imbalance

P Response → Conformed Thinking and Creativity

Athelatic, Aesthemic, Pyknic, Displastic

क्रेचमर के अनुसार शारीरिक प्रारूप के आधार पर आयताकार की व्याख्या नहीं की है इसकी व्याख्या शेल्डन के अनुसार की गई है।

1925 में क्रैचमर‌ ने शारीरिक प्रारूप के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया जिसके अंतर्गत व्यक्तित्व के चार प्रकार व्याख्या की है

1. सुडौलकाय-शारीरिक रूप से सुदृढ़,अधिक कार्यक्षमता स्वयं से संतुष्ट,कम शिकायतें करना,इच्छा अनुसार समायोजन इनकी विशेषताएं हैं।

2. लम्बकाय-दुबले,लंबे,शारीरिक रूप से कम सुदृढ़ 

कम कार्यक्षमता,स्वयं से संतुष्ट परनिंदा करना,स्वयं के प्रति सजग रहना इनकी विशेषताएं हैं।

3. गोलकाय-विनोदप्रिय,समाज कार्यों में रुचि,लोकप्रिय दूसरों के साथ समायोजन,कोई विशेष योग्यता नहीं यह इनकी विशेषताएं हैं।

4.डायसप्लास्टिक-कोई विशेष गुण नहीं सामान्य व्यक्तित्व इनकी विशेषताएं हैं।

शारीरिक प्रारूप के आधार पर शेल्डन ने 1930 में व्यक्तित्व  वर्गीकरण किया इन्होंने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताएं

1. कोमल एवं गोलाकार

2. आयताकार

3. लम्बाकार

According to Krechmer, the rectangle is not interpreted on the basis of anatomical design, according to Sheldon.

In 1925, Kretschmer classified personality on the basis of physical form, under which four types of personality are explained:-

1.Athelatic- physically stronger, more self-satisfied, less complaining, willful adjustments are their characteristics.

2.Aesthemic-lean, tall, physically less strong Golfer-humor dear, interest in social work, popular adjustment with others, no special abilities.These are their characteristics. 

3.Pyknic-Humorous,interest in social work, popular adjustment with others,no special abilities.These are his characteristics.

4.Displastic-no special qualities.General personality are their characteristics.

Sheldon made a personality classification in 1930 based on anatomical model, he described three types of personality:-

1.Endomorphic

2.Mesomorphic

3.Ectomorphic

Bloom Taxonomy

ब्लूम का वर्गीकरण Bloom Taxonomy बेंजामिन ब्लूम (1913-1999) एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे,जिन्होंने 1956 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Taxonomy of Educational Objectives में इस वर्गीकरण को दर्शाया। जो Bloom Taxonomy के नाम से प्रचलित हुई। वर्तमान की शिक्षा ब्लूम के वर्गीकरण पर ही आधारित हैं, जैसे एक अध्यापक पढ़ाने से पहले उस प्रकरण से जुड़े ज्ञानात्मक,बोधात्मक एवं क्रियात्मक उद्देश्यों का चयन करता है यह सब ब्लूम के वर्गीकरण की ही देन हैं।

ब्लूम टैक्सोनोमी 1956 में प्रकाशित हुई। इसका निर्माण कार्य ब्लूम द्वारा हुआ, इसलिये यह bloom taxonomy के नाम से प्रचलित हुई । ब्लूम के वर्गीकरण को “शिक्षा के उद्देश्यों” के नाम से भी जाना जाता हैं अतः शिक्षण प्रक्रिया का निर्माण इस तरीके से किया जाता हैं ताकि इन उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकें।

ब्लूम का वर्गीकरण |Bloom Taxonomy in Hindi

ब्लूम के वर्गीकरण के आधार पर ही कई मनोवैज्ञानिकों ने अपने परीक्षण किए और वह अपने परीक्षणों में सफल भी हुए। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि ब्लूम का यह सिद्धांत काफी हद तक सही हैं। बेंजामिन ब्लूम के वर्गीकरण (bloom taxonomy) में संज्ञानात्मक उद्देश्य, भावात्मक उद्देश्य, मनोशारीरिक उद्देश्य समाहित हैं। सर्वप्रथम हम संज्ञानात्मक उद्देश्य (Cognitive Domain) की प्राप्ति के लिए निम्न बिंदुओं को जानिंगे –

संज्ञानात्मक उद्देश्य Cognitive Domain

1. ज्ञान (Knowledge) – ज्ञान को ब्लूम ने प्रथम स्थान दिया क्योंकि बिना ज्ञान के बाकी बिंदुओं की कल्पना करना असंभव हैं। जब तक किसी वस्तु के बारे में ज्ञान (knowledge) नही होगा तब तक उसके बारे में चिंतन करना असंभव है और अगर संभव हो भी जाये तो उसको सही दिशा नही मिल पाती। इसी कारण ब्लूम के वर्गीकरण में इसकी महत्ता को प्रथम स्थान दिया गया।

2. बोध (Comprehensive) – ज्ञान को समझना उसके सभी पहलुओं से परिचित होना एवं उसके गुण-दोषों के सम्बंध में ज्ञान अर्जित करना।

3. अनुप्रयोग (Application) – ज्ञान को क्रियान्वित (Practical) रूप देना अनुप्रयोग कहलाता हैं प्राप्त किये गए ज्ञान की आवश्यकता पड़ने पर उसका सही तरीके से अपनी जिंदगी में उसे लागू करना एवं उस समस्या के समाधान निकालने प्राप्त किये गए ज्ञान के द्वारा। यह ज्ञान को कौशल (Skill) में परिवर्तित कर देता है यही मार्ग छात्रों को अनुभव प्रदान करने में उनकी सहायता भी करता हैं।

4. विश्लेषण (Analysis) – विश्लेषण से ब्लूम का तात्पर्य था तोड़ना अर्थात किसी बड़े प्रकरण (Topic) को समझने के लिए उसे छोटे-छोटे भागों में विभक्त करना एवं नवीन ज्ञान का निर्माण करना तथा नवीन विचारों की खोज करना। यह ब्लूम का विचार समस्या-समाधान में भी सहायक हैं।

5. संश्लेषण (Sysnthesis) – प्राप्त किये गए नवीन विचारो या नवीन ज्ञान को जोड़ना उन्हें एकत्रित करना अर्थात उसको जोड़कर एक नवीन ज्ञान का निर्माण करना संश्लेषण कहलाता हैं।

6. मूल्यांकन (Evaluation) – सब करने के पश्चात उस नवीन ज्ञान का मूल्यांकन करना कि यह सभी क्षेत्रों में लाभदायक है कि नहीं। कहने का तात्पर्य है कि वह वैध (Validity) एवं विश्वशनीय (Reliability) हैं या नहीं। जिस उद्देश्य से वह ज्ञान छात्रों को प्रदान किया गया वह उस उद्देश्य की प्राप्ति करने में सक्षम हैं कि नही यह मूल्यांकन द्वारा पता लगाया जा सकता हैं।

2001 रिवाइज्ड ब्लूम वर्गीकरण |Revised Bloom Taxonomy

ब्लूम के वर्गीकरण (Bloom Taxonomy) में संशोधित रूप एंडरसन और कृतवोल ने दिया। इन्होंने वर्तमान की आवश्यकताओं को देखते हुए उसमे कुछ प्रमुख परिवर्तन किये। जिसे रिवाइज्ड ब्लूम वर्गीकरण (Revised bloom taxonomy) के नाम से जाना जाता हैं।

1. स्मरण (Remembering)  प्राप्त किये गये ज्ञान को अधिक समय तक अपनी बुद्धि (Mind) में संचित रख पाना एवं समय आने पर उसको पुनः स्मरण (recall) कर पाना स्मरण शक्ति का गुण हैं।

2. समझना (Understanding) – प्राप्त किया गया ज्ञान का उपयोग कब, कहा और कैसे करना है यह किसी व्यक्ति के लिए तभी सम्भव हैं जब वह प्राप्त किये ज्ञान को सही तरीके से समझे।

3. लागू करना (Apply) – जब वह ज्ञान समझ में आ जाये जब पता चल जाये कि इस ज्ञान का प्रयोग कब,कहा और कैसे करना हैं तो उस ज्ञान को सही तरीके से सही समय आने पर उसको लागू करना।

4. विश्लेषण (Analysis) – उस ज्ञान को लागू करने के पश्चात उसका विश्लेषण करना अर्थात उसको तोड़ना उसको छोटे-छोटे भागों में विभक्त करना।

5. मूल्यांकन (Evaluate) – विश्लेषण करने के पश्चात उसका मूल्यांकन करना कि जिस उद्देश्य से उसकी प्राप्ति की गयी है वह उस उद्देश्य की प्राप्ति कर रहा हैं या नहीं इसका पता हम उसका मूल्यांकन करके कर सकते हैं।

6. रचना (Creating) – मूल्यांकन करने के पश्चात उस स्मरण में एक नयी विचार का निर्माण होता हैं जिससे एक नवीन विचार की रचना होती हैं।

भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain)

Bloom taxonomy के अंतर्गत भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain)का निर्माण क्रयवाल एवं मारिया ने 1964 में किया। इन्होंने छात्रों के भावात्मक पक्ष पर ध्यान देते हुए कुछ प्रमुख बिंदुओं को हमारे सम्मुख रखा। भावात्मक पक्ष से तात्पर्य हैं कि उस प्रत्यय (Topic) के प्रति छात्रों के भावात्मक (गुस्सा,प्यार,चिढ़ना, उत्तेजित होना, रोना आदि) रूप का विकास करना।

1. अनुकरण (Receiving) – भावात्मक उद्देश्य (Affective Domain) की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम बालको को अनुकरण (नकल) के माध्यम से ज्ञान प्रदान करना चाहिए। एक अध्यापक को छात्रों को पढ़ाने के समय उस प्रकरण का भावात्मक पक्ष को महसूस कर उसको क्रियान्वित रूप देना चाहिये जिससे छात्र उसका अनुकरण कर उसको महसूस कर सकें।

2. अनुक्रिया (Responding) – तत्पश्चात अनुकरण कर उस अनुकरण के द्वारा क्रिया करना अनुक्रिया कहलाता हैं।

3. अनुमूल्यन (Valuing) – उस अनुक्रिया के पश्चात हम उसका मूल्यांकन करते है कि वह सफल सिध्द हुआ कि नहीं।

4. संप्रत्यय (Conceptualization) – हम उसके सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करते हैं।

5. संगठन (Organization) – उस प्रकरण को एक स्थान में रखकर उसके बारे में चिंतन करते हैं उसमें विचार करना शुरू करते हैं।

6. चारित्रीकरण (Characterisation) – तत्पश्चात हम उस पात्र का एक चरित्र निर्माण करते हैं जिससे हमारे भीतर उसके प्रति एक भाव उत्त्पन्न होता हैं जैसे गुंडो के प्रति गुस्से का भाव हीरो के प्रति सहानुभूति वाला भाव आदि।

मनोशारीरिक उद्देश्य (Psychomotor Domain)

Bloom taxonomy के अंतर्गत मनोशारीरिक उद्देश्य का निर्माण सिम्पसन ने 1969 में किया। इन्होंने ज्ञान के क्रियात्मक पक्ष पर बल देते हुए निन्म बिंदुओं को प्रकाशित किया।

1. उद्दीपन (Stimulation) – उद्दीपन से आशय कुछ ऐसी वस्तु जो हमे अपनी ओर आकर्षित करती हैं तत्पश्चात हम उसे देखकर अनुक्रिया करतें हैं जैसे भूख लगने पर खाने की तरफ क्रिया करते हैं इस उदाहरण में भूख उद्दीपन हुई जो हमें क्रिया करने के लिये उत्तेजित कर रहीं हैं।

2. कार्य करना (Manipulation) – उस उद्दीपन के प्रति क्रिया हमको कार्य करने पर मजबूर करती हैं।

3. नियंत्रण (Control)  उस क्रिया पर हम नियंत्रण रखने का प्रयास करते हैं।

4. समन्वय (Coordination) – उसमें नियंत्रण रखने के लिए हम उद्दीपन ओर क्रिया के मध्य समन्वय स्थापित करते हैं।

5. स्वाभाविक (Naturalization) – वह समन्वय करते करते एक समय ऐसा आता हैं कि उनमें समन्वय स्थापित करना हमारे लिए सहज हो जाता हैं हम आसानी के साथ हर परिस्थिति में उनमें समन्वय स्थापित कर पाते हैं वह हमारा स्वभाव बन जाता हैं।

6. आदत ( Habit formation) – वह स्वभाव में आने के पशचात हमारी आदत बन जाता है। ऐसी परिस्थिति दुबारा आने के पश्चात हम वही क्रिया एवं प्रतिक्रिया हमेशा करते रहते हैं जिससे हमारे अंदर नयी आदतों का निर्माण होता हैं।

निष्कर्ष Conclusion –

ब्लूम के वर्गीकरण में ब्लूम ने छात्रों के ज्ञान एवं बौद्धिक पक्ष पर पूरा ध्यान केंद्रित किया हैं। वह छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिये बौद्धिक विकास पर अध्यधिक बल देते हैं। उनका यह वर्गीकरण छात्रों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने हेतु काफी उपयोगी सिद्ध हुआ हैं। ब्लूम के वर्गीकरण के माध्यम से चलकर ही हम शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकतें हैं।

Syllabus and Curriculum

पाठ्यक्रम(Syllabus) और पाठ्यचर्या(Curriculum) में अंतर 

पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या में निम्न अंतर है– 

1. पाठ्यक्रम वह मार्ग है जिस पर चलकर लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है, जबकि पाठ्यचर्या लक्ष्य पर पहुंचने का स्थान है। 

2. पाठ्यक्रम का अध्ययन क्षेत्र संकुचित होता है– जिसमे मात्र इस बात का ज्ञान होता है कि विविध स्तरों पर बालकों को विभिन्न विषयों का लगभग कितना ज्ञान प्राप्त हुआ। जबकि पाठ्यचर्या का क्षेत्र पाठ्यक्रम की तुलना मे अत्यन्त व्यापक होता है जो छात्र के जीवन के लगभग सभी पक्षों से संबंधित होता है।

3. पाठ्यक्रम में पाठ्यवस्तु का व्यवस्थित स्वरूप है जो कई विद्वानों के सहयोग से निर्मित होता है, जबकि पाठ्यचर्या गन्तव्य स्थान तक पहुंचने तक की प्रक्रिया का विषय ज्ञान है। 

4. पाठ्यक्रम में रटने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करके परीक्षा में सफल होना ही मुख्य लक्ष्य माना जाता है। पाठ्यवस्तु में छात्रों की तात्कालिक क्रियाओं को महत्व दिया जाता है। पाठ्यचर्या तथ्यों को रटने की उपेक्षा करता है एवं बालक के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देता है।

5. पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम मे एक अंतर यह भी है कि पाठ्यक्रम की प्रकृति पाठ्यक्रम आधारित होती है। जबकि पाठ्यचर्या की प्रकृति परिस्थिति, आवश्यकताएं एवं समस्याओं पर आधारित है। 

6. पाठ्यक्रम का विकास एवं प्रबंधन, शिक्षक एवं उसकी योग्यता तथा छात्रों की आवश्यकताओं द्वारा होता है। पाठ्यचर्या का विकास सामाजिक एवं वातावरणजन्य, परिस्थितियाँ, शैक्षिक व्यवस्था, शैक्षिक प्रणाली, परिषदें, समितियों के सदस्य करते है।

7. पाठ्यक्रम के द्वारा तात्कालिक गुणों मे परिवर्तन की संभावना होती है। पाठ्यचर्या द्वारा सामाजिक परिवर्तन एवं स्थायी परिवर्तन होने की संभावना होती है।

8. पाठ्यक्रम के उद्देश्यों को कक्षा में या सीमित क्षेत्रों मे रहकर प्राप्त किया जाता है। जबकि पाठ्यचर्या के उद्देश्यों को असीमित क्षेत्रों में जाकर प्राप्त किया जा सकता है।

9. पाठ्यक्रम के अनुसार केवल कक्षागत बदलाव भी सदैव जरूरी नही होते है। पाठ्यचर्या के अनुसार विद्यालय प्रबन्धन के अंतर्गत बदलाव किए जाते है।

10. पाठ्यक्रम मे शिक्षा के व्यावहारिक पक्ष पर अधिक विचार किया जाता है जिससे छात्रों को व्यावसारिक ज्ञान प्रदान किया जा सके। पाठ्यचर्या शिक्षा के सैद्धान्तिक पक्ष को महत्वपूर्ण मानता है क्योंकि वह ज्ञान प्रदान करने का आवश्यक आधार है।

11. पाठ्यक्रम का प्रारूप छात्रों की रूचियों एवं योग्यताओं पर आधारित होकर बनाया जाता है, जबकि पाठ्यचर्या का प्रारूप सामाजिक एवं तात्कालिक आवश्यकताओं, मूल्यों, राष्ट्रीय विकास, मानवीय गुणों पर आधारित होकर बनाया जाता है।

12. पाठ्यक्रम विस्तृत पाठ्यक्रम का एक आंशिक भाग होता है। पाठ्यचर्या अपने आप में विभिन्न तत्वों के संगठन से निर्मित होता है।

13. पाठ्यक्रम में उन सभी क्रियाओं, विषय वस्तु तथा जरूरी बातों का समावेश होता है जिसे एक स्तर पर अध्ययन-अध्यापन को क्रमबद्ध बनाने के लिए संगठित किया जाता है। यह शिक्षण के विषयों को व्यवस्थित रूप में प्रदर्शित करता है। जबकि कंनिधम के शब्दों मे,” पाठ्यचर्या एक कलाकार (अध्यापक) के हाथों में यंत्र (साधन) है जिससे वह अपनी वस्तु (विद्यार्थी) को अपने कक्षा-कक्ष (स्कूल) में अपने आदर्शों (उद्देश्यो) के अनुसार बनाता है।”

Integrated Education and Inclusive Education difference

एकीकृत शिक्षा और समावेशी शिक्षा में अंतर (Integrated Education and Inclusive Education difference in Hindi)

  1. एकीकृत शिक्षा में विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को सिर्फ सामान्य छात्रों के साथ पढ़ने-लिखने की अनुमति दी जाती है। जबकि समावेशी शिक्षा में आपस में पढ़ने की अनुमति के साथ-साथ विशेष सुविधाएं भी मुहैया करवाई जाती हैं।
  2. एकीकृत शिक्षा प्रणाली में विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया जाता। वहीं समावेशी शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाता है, जिससे विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को तो मदद मिले ही, साथ ही सामान्य छात्रों को भी कोई नुकसान न हो।
  3. जहां एकीकृत शिक्षा, शिक्षक केंद्रित होती है। वही समावेशी शिक्षा छात्र केंद्रित होती है।
  4. एकीकृत शिक्षा में विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक नहीं होते, बल्कि वहां के शिक्षकों को ऊपरी तौर पर प्रशिक्षित करके विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को पढ़ाने के लिए कहा जाता है। लेकिन समावेशी शिक्षा में विशेष शिक्षा प्राप्त प्रशिक्षित अध्यापकों की व्यवस्था की जाती है।
  5. एकीकृत शिक्षा के तहत विश्वविद्यालयों की बनावट और आधारभूत संरचना विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के अनुकूल नहीं होती। लेकिन समावेशी शिक्षा में विद्यालय की बनावट और आधारभूत संरचना को विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के मुताबिक बनाया जाता है।
  6. एकीकृत शिक्षा में डॉक्टर व मनोवैज्ञानिक की व्यवस्था नहीं होती लेकिन समावेशी शिक्षा में होती है।
  7. विशेष आवश्यकता वाले छात्रों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है। लेकिन एकीकृत शिक्षा व्यवस्था में उनके लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की जाती। परंतु समावेशी शिक्षा प्रणाली में छात्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है।
  8. एकीकृत शिक्षा व्यवस्था में प्रशिक्षित शिक्षक न होने की वजह से छात्र प्रभावी शिक्षा हासिल नहीं कर पाते। लेकिन समावेशी शिक्षा में प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा उन्हें प्रभावी शिक्षा दी जाती है।
  9. एकीकृत शिक्षा का प्रावधान करने वाले स्कूलों में स्कूल की बनावट छात्रों के अनुकूल नहीं होती जिससे उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन समावेशी शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों में इन छात्रों के अनुकूल व्यवस्था की जाती है।
  10. एकीकृत शिक्षा में ज्यादा लागत नहीं लगती। लेकिन समावेशी शिक्षा में प्रशिक्षित शिक्षकों, डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, स्कूल की बनावट आदि पर काफी पैसा लगता है।

Problem Solving Method

समस्या समाधान विधि – Problem Solving Method 

समस्या समाधान विधि ( problem solving method )

समस्या समाधान विधि (Problem Solving Method) इस विधि के जनक प्राचीन काल के अनुसार सुकरात व सेंट थॉमस तथा आधुनिक समय के अनुसार जॉन डीवी है। समस्या उस समय प्रकट होता है, जब लक्ष्य की प्राप्ति में किसी प्रकार की बाधा आती है। यदि लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग सीधा और आसान हो तो समस्या आती ही नहीं है।समस्या-समाधान विधि मनोविज्ञान के कोहलर अंतर्दृष्टि सिद्धांत पर आधारित है।

समस्या समाधान का अर्थ ( Meaning of problem resolution )

विद्यार्थियों को शिक्षण काल में अनेक समस्याओं या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जिनका समाधान उसे स्वयं करना पड़ता है। समस्या समाधान का अर्थ है लक्ष्य को प्राप्त करने आने समस्याओं का समाधान  इसको समस्या हल करने की विधि भी कहते हैं।

व्याख्यान प्रदर्शन विध

व्याख्यान विधि

समस्या समाधान विधि परिभाषा ( Problem Resolution Method Definition )

वुडवर्थ (Woodworth) “समस्या-समाधान उस समय प्रकट होता है जब उद्देश्य की प्राप्ति में किसी प्रकार की बाधा पड़ती है। यदि लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग सीधा और आसन हों तो समस्या आती ही नहीं।”

स्किनर (Skinner) “समस्या-समाधान एक ऐसी रूपरेखा है जिसमें सर्जनात्मक चिंतन तथा तर्क दोनों होते हैं।”

यदि हम किसी निश्चित लक्ष्य पर पहुँचना चाहते हैं, पर किसी कठिनाई के कारण नहीं पहुँच पाते हैं, तब हमारे समक्ष एक समस्या उपस्थित हो जाती है। यदि हम इस कंठिनाई पर विजय प्राप्त करके अपने लक्ष्य पर पहुँच जाते हैं, तो हमें अपनी समस्या का समाधान कर लेते हैं। इस प्रकार, समस्या समाधान का अर्थ है-कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करके लक्ष्य को प्राप्त करना।

स्किनर के अनुसार- “समस्या समाधान किसी लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा डालती प्रतीत होती कठिनाइयों पर विजय पाने की प्रक्रिया है। यह बाधाओं के बावजूद सामंजस्य करने की विधि है।”

“Problem-solving is a process of overcoming difficulties that appear to interfere with the attainment of a goal. It is a procedure of making adjustments in spite of interferences.” -Skinner

समस्या समाधान के स्तर (Levels of Problem-Solving)

तर्क, समस्या के समाधान का आवश्यक अंग है। समस्या का समाधान, चिन्तन तथा तर्क का उद्देश्य है। स्टेर्नले ग्रे के अनुसार- “समस्या समाधान वह प्रतिमान है, जिसमें तार्किक चिन्तन निहित होता है।” समस्या समाधान के अनेक स्तर हैं। कुछ समस्यायें बहुत सरल होती हैं, जिनको हम बिना किसी कठिनाई के हल कर सकते हैं, जैसे—पानी पीने की इच्छा । हम इस इच्छा को निकट की प्याऊ पर जाकर तृप्त कर सकते हैं। इसके विपरीत, कुछ समस्यायें बहुत जटिल होती हैं, जिनको हल करने में हमें अत्यधिक कठिनाई होती है; उदाहरण के लिये रेगिस्तान में किसी विशेष स्थान पर जल-प्रणाली स्थापित करने की इच्छा है। इस समस्या का समाधान करने के लिये अनेक उपाय किये जाने आवश्यक हैं; जैसे-पानी कहाँ से प्राप्त किया जाये ? उसे उस विशेष स्थान कैसे पहुँचाया जाये ? उसके लिये धन किस प्रकार प्राप्त किया जाये ? इत्यादि। इन समस्याओं को हल करने के बाद ही पानी की मुख्य इच्छा पूरी की जा सकती है।

समस्या समाधान की विधियाँ (Methods of Problem-solving)

स्किनर (Skinner) ने समस्या समाधान’ की निम्नलिखित विधियाँ बताई हैं-

1. प्रयास एवं त्रुटि विधि (Trial & Error Method) – इस विधि का प्रयोग निम्न और उच्च कोटि के प्राणियों द्वारा किया जाता है। इस सम्बन्ध में थार्नडाइक (Thorndike) का बिल्ली पर किया जाने वाला प्रयोग उल्लेखनीय है। बिल्ली अनेक गलतियाँ करके अन्त में पिंजड़े से बाहर निकलना सीख गई।

2. वाक्यात्मक भाषा विधि (Sentence Language Method)- इस विधि का प्रयोग मनुष्य के द्वारा बहुत लम्बे समय से किया जा रहा है। वह पूरे वाक्य बोलकर अपनी अनेक समस्याओं का समाधान करता है और फलस्वरूप प्रगति करता चला आ रहा है। इसलिये, वाक्यात्मक भाषा को सारी सभ्यता का आधार माना जाता है।

3. अनसीखी विधि (Unlearned Method) – इस विधि का प्रयोग निम्न कोटि के प्राणियों द्वारा किया जाता है। उदाहरणार्थ, मधुमक्खियों की भोजन की इच्छा, फूलों का रस चूसने से और खतरे से बचने की इच्छा, शत्रु को डंक मारने से पूरी हो जाती है।

4. वैज्ञानिक विधि (Scientific Method) – आज का प्रगतिशील मानव अपनी समस्या का समाधान करने के लिये वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करता है। हम इसका विस्तृत वर्णन कर रहे है।

5. अन्तर्दृष्टि विधि (Insight Method)- इस विधि का प्रयोग उच्च कोटि के प्राणियों द्वारा किया जाता है। इस सम्बन्ध में कोहलर (Kohler) का वनमानुषों पर किया जाने वाला प्रयोग उल्लेखनीय है।

समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि (Scientific Method of Problem-Solving)

स्किनर (Skinner) के अनुसार, समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि में निम्नलिखित छः सोपानों (Steps) का अनुकरण किया जाता है—

1. समस्या को समझना (Understanding the Problem) – इस सोपान में व्यक्ति यह समझने का प्रयास करता है कि समस्या क्या है, उसके समाधान में क्या कठिनाइयाँ हैं या हो सकती हैं तथा उनका समाधान किस प्रकार किया जा सकता है ?

2. जानकारी का संग्रह (Collecting Information)- इस सोपान में व्यक्ति समस्या से सम्बन्धित जानकारी का संग्रह करता है। हो सकता है कि उससे पहले कोई और व्यक्ति उस समस्या को हल कर चुका हो। अतः वह अपने समय की बचत करने के लिये उस व्यक्ति द्वारा संग्रह किये गये तथ्यों की जानकारी प्राप्त करता है।

3. सम्भावित समाधानों का निर्माण- (Formulating Possible Solutions) – इस सोपान में व्यक्ति, संग्रह की गई जानकारी की सहायता से समस्या का समाधान करने के लिये कुछ विधियों को निर्धारित करता है। वह जितना अधिक बुद्धिमान होता है, उतनी ही अधिक उत्तम ये विधियाँ होती हैं। इस सोपान में सृजनात्मक चिन्तन (Creative Thinking) प्रायः सक्रिय रहता है।

4. सम्भावित समाधानों का मूल्यांकन (Evaluating the Possible Solutions) – इस सोपान में व्यक्ति निर्धारित की जाने वाली विधियों का मूल्यांकन करता है। दूसरे शब्दों में, वह प्रत्येक विधि के प्रयोग के परिणामों पर विचार करता है। इस कार्य में उसकी सफलता आँशिक रूप से उसकी बुद्धि तथा आंशिक रूप से संग्रह की गई जानकारी के आधार पर निर्धारित की जाने वाली विधियों पर निर्भर रहती है।

5. सम्भावित समाधानों का परीक्षण (Testing Possible Solutions) – इस सोपान में व्यक्ति उक्त विधियों का प्रयोगशाला में या उसके बाहर परीक्षण करता है।

6. निष्कर्षों का निर्णय-Forming Conclusions- इस सोपान में व्यक्ति अपने परीक्षणों के आधार पर विधियों के सम्बन्ध में अपने निष्कर्षों का निर्माण करता है। परिणामस्वरूप, वह यह अनुमान लगा लेता है कि समस्या का समाधान करने के लिये उनमें से कौन-सी विधि सर्वोत्तम है।

7. समाधान का प्रयोग (Application of Solution)- इस सोपान का उल्लेख क्रो एवं क्रो (Crow & Crow) ने किया है। व्यक्ति अपने द्वारा निश्चित की गई सर्वोत्तम विधि को समस्या का समाधान करने के लिये प्रयोग करता है।

8. यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति, समस्या का समाधान करने में सफल हो। इस सम्बन्ध में स्किनर के अनुसार- “इस विधि से भी भविष्यवाणियाँ बहुधा गलत होती हैं और गलतियाँ हो जाती हैं।”

“Even with this method, predictions are often inaccurate and errors are still made.” -Skinner

समस्या समाधान विधि का महत्व (Importance of Problem-Solving Method)

मरसेल का कथन है— “समस्या समाधान की विधि का शिक्षा में सर्वाधिक महत्व है।”

“The process of problem-solving is of the utmost importance in education.” – Mursell

छात्रों की शिक्षा में समस्या समाधान की विधि का महत्व इसके अनेक लाभों के कारण है। कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं—(1) यह उनमें स्वयं कार्य करने का आत्मविश्वास उत्पन्न करती है। (2) यह उनके विचारात्मक और सृजनात्मक चिन्तन एवं तार्किक शक्ति का विकास करती है। (3) यह उनकी रुचि को जाग्रत करती है। (4) यह उनको अपने भावी जीवन की समस्याओं का समाधान करने का प्रशिक्षण देती है। (5) यह उनको समस्याओं का समाधान करने के लिये वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग का अनुभव प्रदान करती है। इन लाभों के कारण क्रो एवं क्रो का सुझाव है—“शिक्षकों को समस्या समाधान की वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये। केवल तभी वे शुद्ध स्पष्ट और निष्पक्ष चिन्तन का विकास करने के लिये छात्रों का प्रदर्शन कर सकेंगे।”

समस्या समाधान विधि के महत्व (Importance of problem solving method )

समस्या समाधान विधि मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक विधि है। समस्या विद्यार्थी के पाठ्यवस्तु से संबंधित होती है। इसमें छात्र को करके, सीखने के अवसर उपलब्ध होते हैं। 

इस विधि में विद्यार्थी के सामने एक समस्या रखी जाती है और विद्यार्थी उसका हल ढूंढने के लिए प्रयास करता है। अध्यापक हल ढूंढने के लिए प्रेरित करता है।

अन्वेषण विधि

समस्या समाधान विधि के सोपान (Steps of Problem Solving Method)

Problem solving method in teaching, इस विधि की अनुपालन करते समय सर्वप्रथम समस्या की पहचान की जाती है। समस्या को हल करने के लिए समस्या समाधान विधि के चरण को पालन करते हुए हम अपनी समस्या का निराकरण कर अपनी लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।

  • समस्या की पहचान

a.   समस्या का स्पष्ट विवरण अथवा समस्या कथन

b.   समस्या का स्पष्टीकरण विद्यार्थियों द्वारा आपस में चर्चा

c.   समस्या का परिसीमन समस्या का क्षेत्र निर्धारित करना

  • परिकल्पना का निर्माण – जांच एवं परीक्षण के लिए परिकल्पना का निर्माण।
  • प्रयोग द्वारा परीक्षण – परिकल्पनाओं का परीक्षण करना
  • विश्लेषण
  • समस्या के निष्कर्ष पर पहुंचना

समस्या समाधान विधि के गुण (Properties of the Problem Solving Method)

  • विधि से विधार्थी सहयोग करके सीखने के लिए प्रेरित होते हैं।
  • दाती समस्या को हल करने की प्रक्रिया में शामिल होकर उसे हल करना सीखते हैं।
  • विद्यार्थी परिकल्पना निर्माण करना सीखते हैं और इस प्रक्रिया से उसकी कल्पनाशीलता में वृद्धि होती है।
  • विद्यार्थी जीवन में आने वाली समस्याओं को हल करना सीखते हैं।
  • यह विधि विद्यार्थी में वैज्ञानिक अभिवृत्ति के विकास में सहायक हैं।

समस्या समाधान विधि के दोष Problem resolution method faults

  • इस विधि के प्रयोग में समय ज्यादा लगता है।
  • पाठ्य-पुस्तक का अभाव होता है।
  • इस विधि में त्रुटियाँ प्रभावहीन के कारण होती है।
  • गति धीमी रहती हैं।
  • इस विधि से हर विषय वस्तु का शिक्षण नहीं किया जा सकता है।
  • समस्या उचित रूप से चुनी हुई न हो तो वह असफल रहती हैं।
  • चूंकि इस विधि में प्रायोगिक कार्य भी करना होता है। अतः शिक्षक का प्रायोगिक कार्य में दक्ष होना आवश्यक होता है।

Guilford’s three-dimensional theory Notes

त्रिआयामी सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की मानसिक योग्यता को तीन आयामों में वर्गीकृत किया गया है 

1. संक्रिया(operations)

2. विषय वस्तु(content)

3. उत्पाद(product)

संक्रिया में छह प्रमुख बुद्धि की योग्यताओं को देखा गया है- 1. संज्ञान  2.स्मृति अभिलेखन 3.  स्मृति धारणा 3.अपसारी चितंन 4.अभिसारी चिंतन 5.मूल्यांकन

विषयवस्तु के 5 आधार हैं- 1. दृष्टि  विषयवस्तु  2. श्रवण  विषयवस्तु 3. सांकेतिक विषयवस्तु   4.शाब्दिक विषयवस्तु 5. व्यवहारात्माक विषयवस्तु 

किसी भी बौद्धिक क्रिया में छह प्रकार के उत्पाद सम्मिलित रहते हैं-1. इकाई  2. वर्ग 3. संबंध  4. रूपांतरण 5. आशय 6. पद्धति

गिलफोर्ड के अनुसार यह तीनों आयाम-  1.संक्रिया(6), 2.विषय वस्तु(5) और 3.उत्पाद(6) कुल मिलकर 6*5*6=180  उप  जाते तत्व बनहैं। 

Three dimensional theory – According to this theory, mental ability of a person is classified into three dimensions.

1. Operations

2. Content

3. Product

Six major intelligence abilities have been seen in the operation- 1. Cognition 2. Memory Reading 3. Memory Relation 4-Divergent thinking 5. Convergent thinking 6. Evaluation

Five major intelligence abilities have been seen in the Content- 1. Visual  2. Auditing 3. Symbolic 4. Semantic 5. Behavioural.

Six types of products are included in any intellectual activity – 1. Unit 2. Classes 3. 3-Relation 4. System 5. Transformations 6.Implications.

According to Gilford, these three dimensions – 1. Operation (6)   2. Content (5) and 3. Product (6) together become 180 sub elements.